शनिवार, 4 जुलाई 2015

सुर-१८५ : "महासमाधि की घड़ी आई... स्वामी विवेकानंद की याद साथ लाई...!!!"

महज़
चार दशक  
जीवन के पाये
पर,
चार युग समान
जिया भरपूर
दुनिया के समंदर से
ज्ञान के मोती
ढूंढ-ढूंढकर समेट लिये
अपने दामन में
फिर बाँट दिये सारे
खोलकर अपने दोनों हाथ
संपूर्ण जगत के समक्ष
बनाया अपने देश को ‘विश्वगुरु’
और अल्प काल में ही
दिखाया सबको कि
‘आयु’ वो नहीं
‘जीवन’ भी वो नहीं
जिसकी गणना
बरसों में की जाती
बल्कि...
चंद पल की
छोटी-सी जिंदगी भी
अगर हो सर्वहितकारी तो
सदियों के लिये अमर कर जाती ॥
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मित्रों...,

चिरयुवा ‘स्वामी विवेकानंद’ देश का गौरव और सभी युवाओं के पथ-प्रदर्शक ही नहीं बल्कि एक ऐसी अमर आत्मा हैं जिसने अपने महान उद्देश्य को पूर्ण करने कुछ पलों के लिये देह का आवरण ओढ़ा था और जब उसने अपना वो लक्ष्य संधान कर लिया तो उस चोले को ज्यों का त्यों उतारकर वापस अंतरिक्ष के सघन वायुमंडल में अपने सूक्ष्म स्वरूप को विलीन कर लिया वैसे, भी अध्यात्मिक दृष्टिकोण से यदि देखा जाये तो हर एक जीवन का कोई न कोई उदेश्य जरुर होता भले ही उसे जानने में कुछ लोगों के एक क्या अनेक जनम गुजर जाते लेकिन उन्हें अहसास नहीं होता जबकि कुछ लोग एक ही जीवन में इतना कुछ कर जाते कि युगों-युगों तक दुनिया उनका गुणगान करती उन्हें स्मरण कर आँखें नम करती लेकिन जाने वाले कभी नहीं आते केवल उनकी स्मृति ही हमारे पास शेष रह जाती हैं जिनके माध्यम से हम उनको अपने करीब महसूस करते क्योंकि वो सिर्फ़ अपने लिये नहीं बल्कि संसार और उसमें रहने वाली प्राणी मात्र के लिये अपना सर्वस्व अर्पण कर देते और दुनिया को इतना कुछ देकर जाते कि उनके जाने के बाद भी लोग उनको भूल नहीं पाते और जब-जब भी उनको याद करने का कोई भी अवसर आता तो अपनी श्रद्धा के सुमन उनके चरणों में चढ़ा उनकी जीवन गाथा को दोहरा कृतज्ञता के अश्रु मोतियों से उनके प्रति अपने मनोंभावों का प्रदर्शन करते जिनकी वजह से उन्होंने इस कठिन जीवन को सरलता से जीने का मंत्र पाया ।


बात जब ‘नरेंद्रनाथ’ की हो तो फिर किसी को भी उनके जीवन दर्शन या उनकी जीवनी बताने की आवश्यकता नहीं क्योंकि हम सब उनके उस त्यागमयी सन्यासी समान निःस्वार्थ सर्वहितकारी जीवन और सूर्य के समान उनके तेजोमय व्यक्तित्व की ज्ञान देने वाली प्रखर रश्मियों से ही तो प्रज्वलित हो रहे हैं तो फिर क्यों न उनके ‘महासमाधि दिवस’ पर उनका पुण्य स्मरण कर अपने आपको उस ज्ञान वर्षा से सराबोर कर सौभाग्यशाली समझने के उस क्षण से वंचित हो जिसने हमें उस मिटटी में पैदा किया जहाँ अवतार लेने देवता भी तरसा करते हैं और जिस भूमि पर अनगिनत साधू-सन्यासी, ऋषि-मुनियों ने हजारों वर्ष कठोर तपस्या कर ईश्वर से न सिर्फ़ वरदान प्राप्त किये बल्कि अपने तपोफ़ल से इस धरती और यहाँ के लोगों को लाभान्वित किया जिससे कि इस देश की धरती को सोना उगलने का वर प्राप्त हुआ और स्वर्ग में बहने वाली ‘गंगा नदी’ भी ख़ुशी-ख़ुशी यहाँ आकर सबको अपने पावन जल से पवित्र बना उनके पापों को धोने लगी और ‘स्वामी विवेकानंद’ समान योगियों ने यहाँ आकर अपने कर्म योग से सबको कर्मयोगी बनने का प्रेरक संदेश दिया जिसे अपनाकर कोई भी एक पल में ही पत्थर से हीरा बन अपने ही नहीं दूसरों के अंधकारमय जीवन में भी ज्ञान की ज्योति जला सकता हैं ।

आज ही के दिन लगभग सौ साल से थोड़ा ज्यादा पहले ४ जुलाई १९०३ को स्वामी जी ने अपने सभी काज पूरे कर और सारे विश्व को धर्म-कर्म की जलती मशाल सौंपकर ‘योग’ द्वारा अपनी सांसों को साधकर इस नश्वर संसार से विदा ली और उनके जाने के बाद भी ये मशाल अनवरत जल रही हैं हर पथभ्रष्ट को राह दिखा रही हैं ये और बात हैं कि जो आँख होने के बावजूद तेज प्रकाश में भी देख पाने में अक्षम हो वो इस दिव्य ज्योत को किस तरह देख सकते हैं पर, जिनके पास वो सूक्ष्म दृष्टि हैं जिससे कि अदृश्य को भी देखा जा सके वो अँधेरे में भी सब कुछ देख लेते... इसी भेद के कारण कोई केवल ‘नर’ ही बना रह जाता जबकि कोई ‘नारायण’ बन जाता तो ऐसे ही विराट स्वरुप आदमकद ‘स्वामी विवेकानंद’ को कोटि-कोटि प्रणाम... जिन्होंने चंद सालों में बड़ा जीवन जीकर हम सबको बूंद से सागर बन उस महासागर में मिलने का अचूक मंत्र दिया... :) :) :) !!!
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०४ जुलाई २०१५
© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
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शुक्रवार, 3 जुलाई 2015

सुर-१८४ : "फ़िल्मी दुनिया के राजकुमार... आज भी सदाबहार...!!!"

जब भी
रुपहले पर्दे पर
वो आता
हर कोई उसे
अपलक देखता
और सुनता रह जाता
फिर जोर-जोर से
खूब तालियाँ बजाता
उसकी अदाकरी
उसके बोले डायलॉग को
हर दर्शक दोहराता
‘राजकुमार’ का होना ही  
हर फिल्म को हिट बनाता ॥
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मित्रों...,

हिंदी सिने उद्योग को यदि हम एक रियासत या साम्राज्य माने तो फिर उसी स्वपन लोक में काम करने वाले और देखने वालों को अपनी रोबीली आवाज़ के साथ-साथ अपने आलिशान अंदाज़ सम्राटों से हाव-भाव से मंत्रमुग्ध कर देने वाले अभिनेता ‘राजकुमार’ को उस जगत का एकमात्र शहज़ादा माना जायेगा जो ज्यादातर श्वेत लिबास और वैसे ही सफ़ेद जूतों के साथ जब-जब भी सिनेमा के सिल्वर स्क्रीन पर प्रकट होता तो दर्शकों पर जैसे कोई जादू हो जाता और वो उसके शाहाना अंदाज़ से इस कदर प्रभावित होता कि सुध-बुध भूल कर उसके सम्मोहक व्यक्तित्व को न सिर्फ देखता रह जाता बल्कि उसके उतने ही जोशीले कंठ स्वर से निकले एक-एक संवाद को सुनकर खुद भी जोश में आ जाता और उत्साह से जोरदार तालियों की गूंज से पूरे सिनेमा हॉल को गूंजा देता यहाँ तक कि वो तो उस कहानी के खत्म हो जाने के बाद भी उसके असर से बाहर नहीं निकल पाता बल्कि वो तो उस किरदार को अपने साथ अपने घर तक लेकर आ जाता और अकेले में या किसी महफ़िल में उसके उस पुरज़ोर स्वर में बोले गये डायलॉग की हूबहू नकल कर खुद को उसके जैसा महसूस कर अपने आप पर ही इतराता क्योंकि ‘राजकुमार’ ने अपने अनोखे अंदाज़ से इस फ़िल्मी दुनिया को कुछ अलग दिया जिसकी वजह से एक विशेष दर्शक वर्ग उनका दीवाना था और उनकी आने वाली फिल्मों का बेसब्री से इंतजार करता था । उनके साथ तो बहुत सारे किस्से जुड़े हुये हैं जिनकी सच्चाई का तो सबको पता नहीं लेकिन वे उसे सबको बताते हैं जो उनके कद और उनके रहस्मय लेकिन प्रभावशाली व्यक्तित्व के प्रति उनके प्रशंसकों को और अधिक आकर्षित करता तभी तो यदा-कदा अब तक भी उन कथाओं के माध्यम से उनको याद किया जाता और उनका वो आकर्षण बरक़रार रखने में इन रोचक अफ़वाह सरीखे किस्सों का भी बड़ा हाथ हैं जिसने उनको असल जिंदगी में दंभी और आत्ममुग्ध के रूप में प्रचारित किया पर, उस नकारात्मक छवि ने भी उनके दर्शको की संख्या में इजाफ़ा ही किया हैं क्योंकि उनको ‘राजकुमार’ के ‘जॉनी’ बोलने की अदा भाती थी फिर भले ही लोग कहे कि उनके कुत्ते का नाम ‘जॉनी’ था जिसके कारण वो सबको उसी तरह संबोधित करते थे पर, जो भी हो वे जब तलक जिये हर मिलने वाले को ‘जॉनी’ कहकर बुलाया और आज भी बहुत से कलाकार तो उनके अभिनय की नकल या उनके बोलने की शैली की मिमिक्री कर अपनी रोजी-रोटी कमाते हैं जो बताता कि जब भी किसी ‘अभिनेता’ या ‘अभिनेत्री’ ने फ़िल्मी दुनिया में अपने एक ख़ास अंदाज़ से आगमन किया हैं तो उसने अपने लिये एक अलग मुकाम बनाया हैं और भले ही कितने भी नये लोग आ जाये या उसको कॉपी ही क्यों न कर ले लेकिन उसके उस स्थान को फिर कोई भी भर नहीं पाया हैं ।

८ अक्टूबर १९२६ को अविभजित भारत के ‘बलूचिस्तान’ प्रांत जो अब ‘पाकिस्तान’ में हैं इस अभिनेता जिसका असल नाम ‘कुलभूषण पंडित’ था पर, जिसे हमने ‘राजकुमार’ के नाम से जाना का जन्म हुआ और अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद वे पुलिस की नौकरी में लग गये थे लेकिन किस्मत में तो अभिनेता बनना लिखा था तो फिर किस तरह वो केवल उसी पद पर कार्यरत रह पाते तो फिर जो तकदीर में लिखा था उसके लिये अवसर भी उसी किस्मत के लेखे ने जुटा दिया चूँकि वे ‘मुंबई’ के एक ऐसे थाने में पदस्थ थे जहाँ पर अक्सर ही फिल्म उद्योग में काम करने वाले निर्माता-निर्देशकों का किसी न किसी वजह से आना-जाना लगा रहता था तो इसी तरह एक बार वहां फिल्म निर्माता ‘बलदेव दुबे’ किसी आवश्यक कार्य से वहां आये और इंस्पेक्टर ‘कुलभूषण पंडित’ उर्फ़ ‘राजकुमार’ के बात करने के अंदाज से काफी बेहद प्रभावित हुये तो इस तरह उनका इस सिने जगत में आने का संयोग अपने आप बन ही गया और फिल्म का प्रस्ताव उनके पास ख़ुद चलकर आ गया और फिर क्या था उन्होंने तुरंत नौकरी से इस्तीफ़ा देकर अभिनय जगत को अपनाने का फैसला ले लिया और फिर उनके अभिनय की यात्रा का आगाज़ हुआ । जिसमें शुरूआती कुछ फिल्मों की असफलता के बाद १९५७ में मिली ‘महबूब खान’ की अविस्मरणीय महान कृति ‘मदर इंडिया’ जिसने इतिहास बना दिया और उनकी छोटी-सी भूमिका ने भी अपनी गहरी छाप छोड़ी जिसकी वजह से उनको अंतररास्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली और इस तरह सिलसिला शुरू हुआ सफ़लता का जब वर्ष 1959 मे आई "पैगाम"  जिसमें उनको अभिनय सम्राट ‘दिलीप कुमार’ के सामने काम करने का सुअवसर मिला और ‘राज कुमार’ अपने सशक्त अभिनय से दर्शकों के बीच अपनी जगह बनाने में काम्याब हो सके और उसके बाद ‘दिल अपना और प्रीत पराई’, ‘घराना’, ‘गोदान’, ‘दिल एक मंदिर’ और ‘दूज का चांद’ जैसी फिल्मों में मिली कामयाबी के कारण वह दर्शकों के बीच अपने अभिनय की धाक जमाते हुए ऎसी स्थिति में पहुंच गए जहां वह अपनी भूमिकाएं स्वयं चुन सकते थे । अतः अब आने फिल्मों ने उनकी एक नवीनतम छवि गढ़ने में मदद की क्योंकि उसके बाद आई ‘काजल’ और ‘वक़्त’ ऐसी फ़िल्में थी जिसने उनके अभिनय के विविध आयामों की झलक दिखाई शायद, ‘वक़्त’ वो पहली फिल्म थी जिसने इस ‘फिल्म इंडस्ट्री’ को एक नये ‘ट्रेंड’ के अलावा एक नया राजकुमार भी दिया क्योंकि अब भी लोग उस फिल्म में उनके ‘एंट्री सीन’ और धांसू डायलॉग भूले नहीं इसलिये तो अब भी कभी-कभी "चिनाय सेठ, जिनके घर शीशे के बने होते है वो दूसरों पे पत्थर नहीं फेंका करते” या फिर “चिनाय सेठ ये छुरी बच्चों के खेलने की चीज़ नहीं हाथ कट जाये तो ख़ून निकल आता है" जैसे लोकप्रिय संवाद को सब उस तरह से बोलने की कोशिश करते हैं और उसके बाद आई ‘पाकीज़ा’ में उनका बोला गया वाक्य "आपके पांव देखे बहुत हसीन हैं इन्हें जमीन पर मत उतारिएगा मैले हो जायेगें" भी उतना ही ‘पॉपुलर’ हुआ फिर तो उनके लिये ख़ास तौर से संवाद लिखे जाने लगे ।

वर्ष १९७८ मे आई एक फिल्म ‘कर्मयोगी’ जिसमें उन्होंने दोहरी भूमिका अदा कर लोगों को अपने दो अलग-अलग अंदाज़ एक साथ पेश किये तो १९८० में एक अन्य फिल्म ‘बुलंदी’ में ऐसी शानदार अदाकारी के झंडे गाड़े कि उस दौर के दर्शकों को भी मोह लिया और इस तरह उनकी सभी फ़िल्में चाहे वो ‘हमराज’, ‘नीलकमल’, ‘मेरे हुजूर’, ‘हीर रांझा’ जैसी प्रेम कहानियां हो या 'कुदरत’, 'धर्मकांटा’, 'शरारा', 'राजतिलक', 'एक नयी पहेली', 'मरते दम तक', 'जंगबाज', 'पुलिस पब्लिक' जैसी दमदारपर उन्होंने रूमानी या चरित्र सभी भूमिकायें अपने अंदाज़ में की जिसके ज़रिये वे एक लम्बे अरसे तक दर्शको के दिल पर राज करते रहे यहाँ तक कि नब्बे के दशक में भी उन्होंने कम काम करने के बाद भी ‘तिरंगा’, ‘पुलिस और मुजिरम’, ‘इंसानियत के देवता’, ‘बेताज बादशाह’, ‘गाड और गन’ जैसी कुछ फ़िल्में की और इस साल १९९१ में  आई ‘सौदागर’ जिसमें एक बार फिर ‘दिलीप कुमार’ के साथ उनकी फ़िल्मी टक्कर देखने लायक थी और उसके सारे के सारे डायलॉग चाहे वो "दुनिया जानती है कि राजेश्वर सिंह जब दोस्ती निभाता है तो अफ़साने बन जाते हैं मगर दुश्मनी करता है तो इतिहास लिखे जाते है" या “काश, कि तुमने हमे आवाज दी होती तो हम मौत की नींद से भी उठकर चले आते” या फिर “हम तुम्हें मारेंगे और जरूर मारेंगे लेकिन वह वक्त भी हमारा होगा, बंदूक भी हमारी होगी और गोली भी हमारी होगी” अब भी उनकी याद दिलाते हैं ।

अपने अंतिम दिनों में उन्होंने एकांतवास कर लिया था और फ़िल्मी दुनिया से उनका नाता लगभग टूट ही गया था पर, कहते हैं कि जब उन्हें अपनी अंतिम घड़ी का अहसास हुआ तो उन्होंने अपने पुत्र ‘पुरू राजकुमार’ को अकेले में बुलाकर कहा कि “देखो मौत और जिंदगी इंसान का निजी मामला होता है अतः मेरी मौत के बारे में मेरे मित्र ‘चेतन आनंद’ के अलावा और किसी को नहीं बताना और मेरा अंतिम संस्कार करने के बाद ही फिल्म उद्योग को सूचित करना” इस तरह वो जब तक जीते रहे एक ‘राज़ा’ की तरह अपनी शर्तों और अपनी शान से जिये और एक लम्बे अरसे तक दर्शकों को अपने अभिनय से दीवाना बनाने वाले और अपने जाने के बाद भी अपनी याद को उनके दिलों में छोड़ने वाले इस महान अभिनेता ने आज ही के दिन ३ जुलाई १९९६ को इस संसार को सदा-सदा के लिये अलविदा कह दिया... पर अपने प्रसंशकों के दिलों में वो अब तलक भी उसी तरह जीवित हैं... :) :) :) !!!
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०३ जुलाई २०१५
© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
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गुरुवार, 2 जुलाई 2015

सुर-१८३ : "महिला का शरीर मंदिर हैं... उसका अपमान गैर-क़ानूनी हैं...!!!"

देर लगी
थोड़ी-सी जरुर
पर, आख़िरकार
कानून को भी
समझ में आ ही गया
कि ‘औरत’ महज़ ज़िस्म नहीं
उसकी देह से खिलवाड़
और फिर समझौता
उसका मजाक न उड़ा पायेगा
उसको अपने दर्द का
सिर्फ़ जरा-सा मुआवज़ा देकर
बहलाया न जा सकेगा ॥
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मित्रों...,

आज अख़बार के मुख्य पृष्ठ पर इन पंक्तियों को पढ़कर मन सुकून के अहसास से भर गया---

“महिला का शरीर उसके लिए एक ‘मंदिर’ की तरह होता है । इसके खिलाफ हुआ अपराध उसमें जीने की इच्छा को कम कर देता है । उसकी प्रतिष्ठा को चोट पहुंचाता है। कभी-कभी इस बात का दिलासा दिया जाता है कि आरोपी पीड़िता से शादी के लिए तैयार है। लेकिन ऐसी किसी बात से कोर्ट को प्रभावित नहीं होना चाहिए। इस आधार पर आरोपी के प्रति नरम रवैया नहीं अपनाया जाना चाहिए” ।
                                                                    -----‘सुप्रीम कोर्ट’

यह अहम फैसला ‘सुप्रीम कोर्ट’ ने दुष्कर्म के एक मामले में दिया है कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा, ‘ऐसे मामलों में पीड़िता और आरोपी के बीच कोई समझौता नहीं हो सकता । पीड़ित और आरोपी के बीच शादी के लिए समझौता करना बड़ी गलती और पूरी तरह अवैध है यह महिलाओं की गरिमा के खिलाफ है ।

आख़िरकार अदालत को महिलाओं की गरिमा और उसके ख्यालात का अहसास हो ही गया तभी तो उसने इतना महान निर्णय सुनाया जो निसंदेह उसके हित में काम करेगा क्योंकि जिस तरह से देश में आये दिन दुष्कर्म की घटनायें बढ़ रही हैं और सरकार या कानून की तरफ से अब तक भी इसके प्रति कोई भी सख्त कदम उठाया नहीं गया हैं जिसके कारण अब भी अपराधी उसे करने से कतराता नहीं बल्कि उसे अपना हक समझता हैं तभी तो किसी भी महिला के लिये अकेले निकलना या किसी जरूरी काम से भी बाहर जाना अक्सर किसी न किसी को उसके साथ कुछ भी करने का निमंत्रण देता सा लगता तभी तो गाँव हो या शहर कहीं भी वो सुरक्षित नहीं चाहे फिर वो मज़बूरीवश नित्य क्रिया के लिये खुलेआम जा रही हो या फिर किसी नौकरी या किसी भी वजह से बाहर निकली हो बुरी नियत वालों को तो वो अपनी संपति लगती जिस पर अधिकार जमाने से उन्हें कोई भी रोक नहीं सकता हैं और जिस तरह से होने वाली घटनाओं के प्रति नाइंसाफी ने उन अपराधियों के हौंसले बढाये और जनता को निराश किया हैं उसकी वजह से अब भी इस तरह के मामलों में कोई भी पड़ना नहीं चाहता वैसे भी किसी के अंदर इतना साहस नहीं जो इनका मुकाबला कर सके या आगे बढ़कर किसी अबला की ही मदद करें तभी तो दिन दहाड़े भी इस तरह की घटनायें आम होने लगी हैं । चूँकि इस देश में किसी भी महिला के साथ इस तरह का कोई भी दुष्कर्म करने पर उसको ही दोषी ठहराया जाता हैं तो उसकी वज़ह से भी इस तरह के घृणित कर्म करने वाले को न सिर्फ़ शह मिलती बल्कि लडकियों को भी अनजाने में कमजोर बना दिया जाता और फिर उनके सामने आत्महत्या या चुप रहने के अलावा और कोई विकल्प नहीं होता और कहीं-कहीं तो इस तरह के मामलों में उस पीड़िता को उसी अपराधी के साथ समझौता कर अपने कदम पीछे हटाने पड़ते या कभी-कभी तो उसके साथ ही उसे ब्याह दिया जाता और हर स्थिति में फ़ायदा सिर्फ उस ‘बलात्कारी’ का ही होता और हर तरह के शोषण के बावजूद भी उस कन्या को ही सर झुकाकर सबका फ़ैसला मानना पड़ता जहाँ कोई भी उसकी मर्जीं न तो पहले ही पूछता था और अब तो उसे इस काबिल भी नहीं समझता और उसका दामन जो तार-तार हो ही चुका हैं अब उसके आंसुओं को भी अपने में समेट नहीं पाता और सबका हासिल जिंदगी भर का अंधकार उसके हिस्से में आता हैं ।

प्रथम मामला : मध्यप्रदेश के गुना जिले का है जहाँ पर ‘मदनलाल’ नाम के व्यक्ति के खिलाफ सात साल की बच्ची से दुष्कर्म का मामला दर्ज किया गया था और निचली कोर्ट ने उसे दोषी मानते हुए सात साल की सजा दी लेकिन ‘हाईकोर्ट’ ने पेश सबूतों को खारिज करते हुए कहा कि मामला दुष्कर्म का नहीं लगता । कोर्ट ने इसे महिला की गरिमा को चोट पहुंचाने के लिए बल प्रयोग का मामला माना और 'मदनलाल' को सिर्फ एक साल की सजा सुनाई चूँकि ' मदनलाल' इतनी सजा पहले ही काट चुका था लिहाजा उसे रिहा कर दिया फिर इस फैसले को मध्यप्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी । जिसके फ़ैसले में जस्टिस ‘दीपक मिश्र’ की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा, ‘हाईकोर्ट ने मामले में हल्की धारा लगाकर गलत किया इसे कानूनन सही नहीं माना जा सकता इसलिए हाईकोर्ट दोबारा सुनवाई करे' । कोर्ट ने दोनों पक्षों के बीच हुए समझौते की दलील को भी खारिज कर दिया जिसके लिये उसने दो साल पुराने अपने ही एक फैसले का हवाला देते हुए कहा, ‘दुष्कर्म के मामलों में दोनों पक्षों के बीच कोई भी समझौता आरोपी की सजा कम करने का आधार नहीं हो सकता।’

द्वितीय मामला : जिसका हवाला दिया गया उसमें ‘मद्रास हाईकोर्ट’ ने नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में अनूठा फैसला सुनाया था ‘जस्टिस डी. देवदास’ ने आरोपी को इसलिए जमानत दे दी थी कि वह पीड़िता के साथ समझौते की प्रक्रिया में शामिल हो सके । आरोपी से पीड़िता के नाम पर एक लाख रुपए की ‘एफ.डी.’ भी करवाने को कहा था क्योंकि पीड़िता के माता-पिता का निधन हो चुका है और वह दुष्कर्म के बाद जन्मे बच्चे की मां बन चुकी है पर, ये महिला रेप की वजह से एक बच्चे की मां बनकर भी सुलह करने तैयार नहीं है अतः ‘सुप्रीम कोर्ट’ ने कड़ा रुख़ अपनाते हुए एक अहम आदेश में कहा है कि दुष्कार्म के मामलों में पीड़िता और आरोपी के बीच कोई समझौता नहीं हो सकता न्यायालय ने साफ कहा है कि पीड़ित-आरोपी के बीच शादी के लिए समझौता करना 'बड़ी गलती' और पूरी तरह से 'अवैध' है।

साथ ही उच्चतम न्यायालय ने दुष्कर्म के मामलों में अदालतों के नरम रुख़ को भी गलत ठहराया और इसे महिलाओं की गरिमा के खिलाफ बताया 'रेप' और रेप की कोशिश के मामलों में शादी के नाम पर पीड़ि‍ता और अपराधी के बीच सुलह पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जाहिर की है। सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़े फैसले में कहा है कि जिस तरह अदालतें ऐसी सुलह के आदेश देती हैं वो ना सिर्फ गैरकानूनी हैं बल्कि उनसे महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुंचाती हैं। अपना फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बलात्कार समाज के ख़िलाफ़ एक अपराध है, ये दो पक्षों के बीच का मामला नहीं है जो आपस में सुलह कर लें । अदालत ये नहीं जान सकती कि ऐसी सुलह वास्तविक है- क्योंकि पीड़ित दबाव में या जीवन भर के सदमे से बचने की कोशिश में सुलह को मजबूर हो सकती है ।

इस तरह के फ़ैसले एक नारी की अस्मिता और उसके गरिमा को बनाये रखने में सहायक होंगे जहाँ दुष्कर्म के बाद उसे सुलह के नाम पर और अधिक पीड़ित न किया जा सकेगा और उसे अपने इच्छा से जीने का अधिकार मिलेगा अतः कोई भी उसे मजबूर न कर सकेगा कि एक जबरदस्ती के बाद उसे एक खिलौना समझकर उसकी भावनाओं से खेलते रहने का मौका मिल जाये जो हो गया उसे रोकना भले ही नामुमकिन था लेकिन उसके बाद भी उसे होते रहने देना या उस वहशी को अपना पति बनाकर उसके जुल्मों तले घुट-घुट के जीना उसकी मजबूरी नहीं हो सकती उसे अधिकार हैं कि वो इसके लिये कानूनन इंकार कर सके अपनी गरिमा को बरक़रार रख सके अब कानून उसके साथ हैं... उसे भी अपनी तरह से जीने का अधिकार हैं... :) :) :) !!!
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०२ जुलाई २०१५
© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
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बुधवार, 1 जुलाई 2015

सुर-१८२ : "डॉक्टर डे... शुक्रिया कहने का डे...!!!"

वो
कोई
अपना नहीं
मगर...
पराया भी तो नहीं हैं ।
...
उससे
मेरा कोई
गहरा ताल्लुक
कोई रिश्ता या
नाता भी तो नहीं हैं ।
...
फिर भी
उसने मुझे
मेरे हर दर्द से
निज़ात दिलवाई
मेरे जख्मों पर 
मरहम भी लगाया 
मेरी हर बीमारी का
उपचार किया
मुझे हर तकलीफ़ से
छुटकारा दिलाया
तो फिर आज उसको
मैं क्यों न कहूँ ‘शुक्रिया’ ।
...
वो कोई और नहीं...
मेरा ‘फैमिली डॉक्टर’ हैं जी ॥
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मित्रों...,

एक जुलाई की सुबह आते ही अपने साथ लेकर आती हैं हमारे उन हमदर्दों का ख़ास दिन जिनकी वजह से हम अपने हर छोटे-बड़े दर्द से मुक्ति पाते हैं जैसा कि हम सभी जानते हैं कि पंचतत्वों से बनी हमारी ये ‘देह’ इन पाँचों तत्वों के असंतुलन की स्थिति में रुग्ण हो जाती हैं और फिर उसकी इस बीमार अवस्था को यदि कोई ढंग से समझ पाता हैं तो वो हैं ‘वैद्य’ जो हाथ पकड़कर सिर्फ़ नाड़ी देखकर ही रोग़ का पता लगा लेते हैं और फिर जरा-से उपचार मात्र से उसे पुनः स्वस्थ कर हमें प्रसन्नचित्त होने का एक और अवसर देते हैं । चूँकि जमाने के साथ नीम-हकीम या वैद्यों की संख्या में तो कमी आ गयी हैं और उनका स्थान ले लिया हैं उच्च शिक्षित ‘डॉक्टर्स’ ने जो अब आधुनिक तकनीकों से और भी कारगर तरीके से मरीज को रोगमुक्त कर देते हैं फिर भी बहुत से मर्ज ऐसे हैं जिनका इलाज़ अब भी खोजा जा रहा हैं फिर भी कहते हैं कि यदि आपका ‘डॉक्टर’ आपकी नब्ज को बेहतर तरीके से समझता हैं तो फिर भले ही कितनी भी लाईलाज बीमारी क्यों न हो जाये वो आपको उसका अहसास होने नहीं होने देता और जितना भी उसके द्वारा मुमकिन हो वो आपको भले ही आपकी बीमारी से छुटकारा न दिला पाये लेकिन इस बात का प्रयास करता हैं कि जितना अधिक से अधिक हो सके वो आपकी जिंदगी को उसके अंत तक पहुँचने से रोक पाये । अक्सर एक सबसे अच्छा ‘डॉक्टर’ तो केवल अपनी बातों से ही आपकी हर तकलीफ़ को आधा कर देता हैं और आपको भी भले ही कितनी भी असहनीय पीड़ा क्यों न हो रही हो या कोई कैसी भी बीमारी की आशंका क्यों न जता दे पर, जब आप उसके करीब जाते हैं तो अपने उस दुःख को जैसे भूल ही जाते हैं और यही तो एक चिकित्सक का काम हैं कि लोग उसके पास आने से घबराये नहीं बल्कि उसे अपना मित्र समझ अपने हर दुःख, अपनी हर तकलीफ़ को उसके साथ साँझा करें ।

यूँ तो हम सब चाहते ही नहीं कि हमें कभी भी उसके पास जाना पड़े अमूमन इस देश में एक धारणा बनी हुई हैं जिसके कारण अधिकांश लोग अपने रोग से उतना नहीं डरते जितना कि ‘डॉक्टर’ या ‘अस्पताल’ जाने से उनकी रूह कांपती हैं इसकी वजह शायद ये हैं कि हमें बचपन से ही उसके नाम से डराया जाता हैं और उसकी सुई की बात कह-कह कर हमारे भीतर उसके प्रति एक प्रकार का भय भर दिया जाता हैं जो बाल्यकाल गुजर जाने के बाद भी मन के किसी कोने में उसी तरह बरकरार रहता हैं और जब-जब भी हम अस्वस्थ होते उसी काल्पनिक चित्र से घबरा जाते हैं । ‘तकनीकी युग’ की वजह से जब सब कुछ बेहद आसान हो गया हैं तो फिर किसी भी बीमारी के इलाज़ पर भी इसका असर हुआ हैं और अब तो लोग ‘नेट’ पर सब तरह की जानकारी उपलब्ध होने से अपनी मनोस्थिति को भी अच्छे से समझ पाते हैं लेकिन उसके बावज़ूद भी यही मनाते कि हमें कभी किसी डॉक्टर के पास न जाना पड़े लेकिन फिर भी यदि हम गौर करें तो पाते हिं कि हमारे यहाँ दिन-ब-दिन सर्वसुविधायुक्त अस्पतालों की संख्या में इज़ाफा होता जा रहा हैं । ये और बात हैं कि इन सभी तरह के चिकित्सालयों में सबका जाना संभव नहीं क्योंकि इस जगह के खर्च को वहन कर पाना हर किसी के बस की बात नहीं फिर भी पुरानी और आज की चिकित्सा पद्धति में जो परिवर्तन आया हैं उससे जहाँ उपचार सहज हुआ हैं वहीँ उसका खर्च भी तो बढ़ा हैं पर, खुदा का शुक्र हैं कि हमारे यहाँ ऐसे डॉक्टर्स भी हैं जो केवल नाममात्र की फीस लेकर दर्दमंदों को उनकी तकलीफ़ से छुटकारा दिलवाते हैं जो ये दर्शाता हैं कि उन्होंने अपने पेशे के साथ जो शपथ ली उसके प्रति वो अपनी जिम्मेदारी को न केवल समझते बल्कि अपने फर्ज़ को भी उतनी ही ईमानदारी से निभाते भी हैं ।

आज का ये विशेष दिवस समर्पित हैं ऐसे ही आस्थावान कर्मनिष्ठ चिकित्सकों को जिनकी वजह से बहुत-सी बीमारियों का खात्मा किया जा सका हैं... जिन्होंने लगातार अथक परिश्रम से ऐसी दवाइयाँ बनाई कि किसी भी व्यक्ति को किसी भी रोग की वजह से असमय जीवन से हाथ न धोना पड़े... हम उन सबको <3 से धन्यवाद कहें कि उन्होंने हमारे दर्द को हमसे बेहतर समझ हमें उससे छुट्टी दिलवाई... सबको ‘डॉक्टर्स डे’ की बहुत-बहुत बधाई... :) :) :) !!!
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०१ जुलाई २०१५
© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
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