रविवार, 6 सितंबर 2015

सुर-२४९ : "काव्यकथा --- रहगुज़र...!!!"

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मित्रों...,


‘चलते-चलते यूँ ही कोई मिल गया था... सरे राह चलते-चलते...’ गीत सुनते-सुनते न जाने क्यूँ मन को ये अहसास हुआ कि मैं सरे राह निकली भी नहीं पर सारी राहें मुझसे ही होकर गुजरती रही जिन पर चलकर न जाने कितने मुसाफ़िर गुजर गये... तो अचानक ये ख्याल मन में उमड़ गया---              

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मैं कोई
रहगुज़र नहीं थी
पर, गुजरते रहे सब
होकर मुझसे
लेकिन किसी ने भी
दो पल से अधिक ठहरना
गंवारा न किया
और मैं ताउम्र बिछी रही
सड़क की मानिंद
देखती रही लोगों को
मुझे रौंद मुंह फेर जाते हुये
आखिर, इससे इतर
एक 'तवायफ़' की जिंदगी
भला और क्या हो सकती थी ।।
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वाकई... भले ही कोई कुछ भी नाम दे हमें पर हकीकत में एक ‘सडक’ से भी बदतर जिंदगी हैं हमारी जिसकी किस्मत में कोई सुधार की भी संभावना नहीं... बस, यूँ ही मिट जाना हैं एक दिन जब न बचे वो चलने लायक फिर कोई ताकता भी नहीं इस तरफ़... फिर भी सारी तोहमतें हमारे ही सर पर आती कि हमने लोगों को बिगाड़ा जबकि सारे बिगड़े हुये लोगों ने हमें कहीं का न छोड़ा मगर, तकदीर के सर पर ही सारा ठीकरा फुटा... तो फिर क्यों करें किसी से कोई गिला... यही नसीब हैं यही कहानी हमारी... किसी ने समझी मजबूरी हमारी... और लब पर यही तराना... ये चराग बुझ रहें हैं... मेरे साथ जलते-जलते... यूँ ही कोई मिल गया था... :) :) :) !!!  
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०६ सितंबर २०१५
© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
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शनिवार, 5 सितंबर 2015

सुर-२४८ : "कान्हा का जन्मदिवस... मनाते भक्तजन...!!!"


सोलह कला पूरण
श्रीकृष्ण भये संपूरण
करने जग उद्धार 
लिया मानव अवतरण
आई ‘श्रीकृष्णजन्माष्टमी’
छूकर प्रभु पावन चरण
करें सर्वस्व अपना समर्पण
भोग-विलास त्याग कर
रहें सदा उनकी शरण
केवल नाम प्रभु का लेकर
सफल हो जाता मरण     
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मित्रों...,

आज सबके प्रिय माखनचोर यशोदानंदन ‘कान्हा’ का जन्मोत्सव हर तरफ बडे हर्षोल्लास से मनाया जा रहा हैं हर किसी ने अपने प्यारे लड्डू गोपाल के लिये सुंदर-सुंदर झांकियां सजाकर तरह-तरह की तैयारियां की हैं और जैसे ही रात के बाढ़ बजेंगे तो सभी लोग मिल-जुलकर उनको प्रेम से जगायेंगे और फिर पंचामृत से स्नान कर रेशमी वस्त्र पहनायेंगे विविध आभूषणों से श्रृंगार कर माथे पर चंदन तिलक लगा उसे अक्षत-भस्म से सजा सर पर मोर-मुकुट लगायेंगे फिर हाथों में छोटी-सी बांसुरी थमाकर माखन-मिश्री का भोग लगाकर उनकी स्तुति गायेंगे और अंत में समवेत स्वर में करतल ध्वनि के समेत आरती गायेंगे जिसकी गूंज से सारा ब्रम्हांड सकारात्मक ऊर्जा से भरकर वातावरण में उसी कार्यात्मक तरंगों को प्रसारित कर देगा जिसके प्रभाव से सुप्त पड़ गयी मानव शक्ति क्रियात्मक ऊर्जा से भरकर पुनः जागृत हो नवीन उत्साह से अपने कर्म क्षेत्र में प्रवृत हो जायेगी क्योंकि ये दिन एक कर्मयोगी के अवतरण का परम पावन दिवस हैं जिसने अपने स्वयं के जीवन दर्शन के द्वारा समस्त प्राणियों को सतत कर्म करने की प्रेरणा देते हुये उसे मोक्षदायिनी श्रीमद्भागवद्गीता रूपी संदेशात्मक धर्मग्रंथ में बंद कर आने वाली पीढ़ी के लिये एक ऐसा अद्भुत चमत्कारिक चिराग छोड़ गये हैं जिसके स्पर्श मात्र से आदमी के अंतर चक्षु खुल जाते हैं और यदि किसी ने उसे मन से ग्रहण कर लिया तो फिर वो खुद कर्म का साकार रूप धारण कर लेता हैं तभी तो जगत पालक विष्णु के इस ‘कृष्णावतार’ का हे कोई दीवाना हैं जिसका संपूर्ण जीवन चरित्र बालपन से लेकर अंत तक इतनी विविधताओं से भरा हैं कि उसमें हर किसी को अपने जीवन के लिये कोई न कोई प्रेरक तत्व मिल ही जाता हैं जिससे वो अपने जीवन को सही दिशा में मोड़कर सार्थकता प्रदान कर सकता हैं

भले ही वो अपने आचरण से ‘महामानव’ बन गये लेकिन उन्होंने कभी भी किसी के साथ ऐसा बर्ताव नहीं किया जिससे कि उसे उनके सामने अपना आप तुच्छ नजर आये तभी तो जब उनके बाल सखा सुदामा दीन अवस्था में चावल के दानों की सौगात लेकर उनके समक्ष गये तो उन्होंने दौड़कर उसे न सिर्फ़ सीने से लगाया बल्कि बडे स्नेह से उनके पाँव पखार उनको अपने आसन में बिठाकर उनसे उनके सारे हाल-चाल पूछ उनके जाने बिना ही उनके मन का हाल जान लिया और उनके अपने घर पहुंचने से पहले ही ऐसा चक्कर चलाया कि जहाँ कभी उनकी झोपडी थी वहां अपने आप आलीशान महल बन गया इसी तरह जब भी किसी भक्त ने विपदा में घबराकर उनको पुकारा तो वे अपना राज-पाठ और सुख त्याग कर उसकी सहायता करने दौड़ पड़े और जिसे उन्होंने अपनी शरण में ले लिया फिर उसे किसी तरह की फ़िक्र ने परेशान नहीं किया क्योंकि जिसके सखा भगवान् स्वयं हो उसे फिर किस और की जरूरत नहीं सिर्फ़ मन से उनको याद करना हैं और सारे बिगड़े काम स्वतः ही बन जाते हैं और यदि किसी तरह का संकट आता भी है तो वो उसे सहन करने की शक्ति प्रदान कर उसकी परीक्षा लेते हैं और जब उसके मन में अपने लक्ष्य के प्रति तीव्र इच्छाशक्ति का प्रवाह पाते हैं तो फिर उस पर ऐसी कृपा बरसाते हैं कि वो दूसरों के लिये भी प्रेरणा स्त्रोत बन जाता हैं तो ऐसे पारसमणि जन-जन के प्रिय नंद के लाला के अवतरण दिवस पर समस्त भक्तजनों को हृदय से बधाई और अनंत शुभकामनायें... :) :) :) !!!        
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०५ सितंबर २०१५
© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री

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शुक्रवार, 4 सितंबर 2015

सुर-२४४ : "मिले जब गुरु... हुआ ज्ञान शुरू....!!!"

होता न ज्ञान
जो मिलते गुरु महान
पाकर जिनको
बने ‘ज्ञानवान’ हम
तो कहे आदर से सब  
तस्मे श्री गुरुवे नमः
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मित्रों...,

एक बच्चे के सीखने की शुरुआत उसके आँख खोलते ही हो जाती हैं और इस काम में उसकी सहायिका होती हैं उसकी जन्मदात्री जिसे वो सबसे पहले देखता हैं और जिसके साथ रहकर ही वो जीवन के मायने समझता हैं और फिर इस दुनिया के कर्मक्षेत्र में आजीवन कुछ न कुछ सीखता रहता हैं और जीवन की ये पाठशाला कभी भी बंद नहीं होती जहाँ उसकी शिक्षा अंत समय तक चलती रहती और इस पूरे सफर में उसे ज्ञान के मार्ग पर नित नये-नये शिक्षक मिलते जो जाने-अनजाने उसे गूढ़ ज्ञान देकर उसके अनुभवों के भंडार में वृद्धि कर उसके ज्ञानकोष को भरते रहते जिससे वो  ज्ञानवान बन अपने संपर्क में आने वाले लोगों को भी उस पारसमणि सम ज्ञान से कुंदन बनाता तो ‘शिक्षक दिवस’ पर हम सबका फर्ज़ बनता कि हम उन सभी का आभार व्यक्त करें जिन्होंने हमें कभी भी किसी भी राह पर कोई सबक दिया जिससे हम लाभान्वित हुये तो हमारे देश के द्वितीय राष्ट्रपति और कर्मयोगी ‘डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन’ के जन्मदिवस जिसे कि पूरा राष्ट्र ‘शिक्षक दिवस’ के रूप में मनाता हैं उस मंगलमय दिन पर हमारी प्रथम शिक्षिका माँ से लेकर जीवन में आने वाले सभी गुरुजनों को ‘चोकामय’ शुभकामनायें---

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प्रथम गुरु
हर एक बच्चे की
‘माँ’ बन जाती
देती वो ज्ञानदान
पढ़ाती उन्हें
नैतिकता का पाठ
जीवन सार
पाया जो बाँट देती
भेजती उसे
विद्याध्यन करने
पाकर ‘गुरु’
जीवन संवरता
नित नूतन
अनमोल सबक
देता शिक्षक
कुम्हार-सा गढ़ता
बना उसको
पत्थर से नगीना
खुला आकाश
ठोस आधारशिला
जीवन ध्येय
सौगात में सौंपता
ज्ञान आलोक
हर एक पथ पे
हर क्षण में
उसे राह दिखाता
बन के सूर्य
जब वो चमकता
गुरु का सीना
ख़ुशी से फुल जाता
परोपकार
विद्यादान देकर
गुरु का ऋण
एक शिष्य चुकाता       
अपने साथ
औरों का भी जीवन
वो बना देता
करता हैं नमन
शिष्य गुरु को
देकर अनमोल
गुरु-दक्षिणा
रह जाते अज्ञानी
होते न गुरुज्ञानी !!!
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इस बार ५ सितंबर को अद्भुत संयोग हो रहा जब भगवान् कृष्ण के अवतरण दिवस पर ‘राधकृष्ण’ का भी जन्मदिवस आ रहा हैं तो सभी मित्रजनों को इस पावन पर्व की अनंत शुभकामनयें...  आओ घर-घर ज्ञान का दीप जलाये... इस तरह गुरु का पर्व मनाये... :) :) :) !!! 
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०४ सितंबर २०१५
© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
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गुरुवार, 3 सितंबर 2015

सुर-२४३ : "लघुकथा : भ्रम' !!!

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मित्रों...,


आपके पास न तो अपनी पत्नी और न ही अपने घर के लिये कोई समय हैं जबकि अपने दोस्त ‘अनिल’ को ही देखो अपनी बीबी का कितना ख्याल रखता हैं उसकी हर बात मानता हैं यहाँ तक कि खुद को ‘पत्निव्रता’ भी कहता हैं, ‘समर’ को ऑफिस से आते ही फ्रेश होकर तुरंत कहीं जाते देख ‘अक्षरा’ बोल पड़ी
  
ये बात सुनते ही जैसे कोई ज्वालामुखी फट पड़ा ‘समर’ जब चीखकर  बोला, ‘पतिव्रता’ का विलोम भी कहीं होता हैं क्या... बेवकूफ स्त्री... पति से कहती हैं ‘पत्निव्रता’ बनो... मजाक भी नहीं समझती... ये सब कहने की बातें हैं कोई अपनी पत्नि का सच्चा भक्त नहीं होता... जो नजर आता वो दिखावा हैं जिसकी आड़ में पतिदेव अपनी मनमानी करते और पत्नी खुशफहमी में फूली रहती कि उसका पति उसका कितना कहना मानता हैं... माय फुट... आइंदा मुझसे ऐसी फालतू बात न कहना समझो... कहते हुए पतिदेव अपने उसी दोस्त के साथ चले गये जिसका हवाला देकर वो उनसे आदर्श पति बनाम ‘पत्निव्रता’ बनने के अपेक्षा कर रही थी ।
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०३ सितंबर २०१५
© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री

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बुधवार, 2 सितंबर 2015

सुर-२४५ : "जैसा होता सामने का मंजर... वैसा ही चलता दिल के अंदर...!!!"


वक़्त की
उँगलियों पर
सांसों की डोर से बनी
‘जीवन माला’
मनका-मनका कर
आगे बढ़ती ही जाती
हर क्षण होते अनुभवों से
कड़ी-कड़ी जुड कर
धीरे-धीरे पूरी होती जाती   
और खत्म होते ही जीवन चक्र 
दाना-दाना बिखर जाती   
जिन्हें समेटकर भी
दूसरी माला बन नहीं पाती
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मित्रों...,

‘जीवन’ में कितने क्षण या कितने जीवन होते ये तो किसी को भी नहीं पता लेकिन ये तय हैं कि हर एक आने वाला नया पल अपने साथ कुछ नया लेकर आता जिससे मन का मिजाज भी बदल जाता और क्यों न बदले आखिर ‘मन’ का दूसरा नाम ‘वक्त’ ही तो हैं जो कभी स्थिर नहीं रहता सबको पीछे छोड़कर हमेशा आगे-ही-आगे बढ़ता जाता और इन आते-जाते लम्हों का जो भी असर उसके उपर होता उसे जेहन के सफों पर अदृश्य स्याही से लिखता जाता जिसे पढ़ने का समय भी सबको नहीं मिल पाता लेकिन जब कभी तन्हाई में ये पन्ने खुल जाते तो वो खुद अचरज में पड़ जाता कि किस-किस मुकाम से होकर गुजर गयी जिंदगी अपने कदमों के निशाँ पीछे छोड़कर जिन पर लिखी इबारत ने उसे फिर से उसी दौर में पहुंचा दिया जब उसने इन सब पलों को जिया था कभी हंसकर तो कभी रोकर उनका खट्टा-मीठा अमृत पिया था तभी तो वो पल अमर होकर उसके स्मृति ग्रंथ में सदा-सदा के लिये दर्ज हो गये और अब यही उन बीती बातों का चलचित्र दिखा रहे जिसमें कहीं सुख तो कहीं दुःख हैं और कहीं ऐसे भी वाकये हैं कि जिसने उसकी जिंदगी का रुख ही बदल दिया तो कुछ ऐसे मुकाम भी जहाँ पहुंचकर जीवन गाड़ी फंस गयी या अटक गयी और किस्मत का धक्का खाकर फिर आगे बढ़ गयी तो कहीं ऐसे भी पानी के बुलबुले जैसे क्षणभंगुर घटनाओं के सिलसिले हैं जब ‘मन’ उन पलों के साथ बह गया उनका ही होकर उन जैसा ही सोचने लगा और जैसे कोई अम्मोहन टुटा और वो वापस मुख्य धारा में शामिल होकर फिर से सबके साथ बहने लगा

वाकई कभी-कभी हम समय के किसी हिस्से के रंग में यूँ रंग जाते कि बस, उस पल तो उसी तरह का बन जाना चाहते जैसी कि उस शय को देखकर मन की तासीर हो जाती तभी तो बच्चों के साथ खेलते हुये हम बच्चे बन जाते और पढ़ने या लिखने बैठते तो गंभीर हो जाते याने कि जिस तरह का माहौल होता उसी तरह से व्यवहार करने लगते जो कि सबके लिये न सही मगर, सामान्यतः उन लोगों के लिये बड़ा अनुकूल होता जो अपने आपको किसी तरह के आडम्बर से नहीं बांधते तो वे उन्मुक्त होकर अपने मनोभावों का प्रदर्शन करते लेकिन जिनके भीतर कुछ हिचक होती वे अंतर को दबाकर बैठे रह जाते जबकि चंद लोग अपने को सर्वश्रेष्ठ जाहिर करने किसी भी तरह की प्रतिक्रिया नहीं करते लेकिन फिर भी जीवन की क्षण-भंगुरता के अहसास से हर किसी के अंदर एक से ही भाव जगते और वो उस पल से ही खुद को बदलने का निर्णय ले लेते जिसे कि ‘श्मशान वैराग्य’ कहा जाता जिसकी कैफियत हर किसी अंदर एक समान ही होती तभी तो जब भी कहीं ऐसा कोई मंजर नजर आता हर आँख अपने आप भींग जाती और कहीं भीतर का कोई कोना द्रवित होकर उसके लिये सोचने लगता सच, जीवन एक ऐसी अनपेक्षित रहस्यों से भरी कहानी हैं जिसके अगले पृष्ठ पर क्या लिखा हैं कोई नहीं जानता उसे तो बस उस कथा में लिखे किरदार को उसी तरह से निभाना हैं जैसा कि उसमें दर्ज हैं क्योंकि इसे लिखने वाला कलमकार कोई आदम जात नहीं बल्कि उपरवाला ‘रब’ हैं जिसने हर एक रूह को एक अलग किरदार और कथा से नवाजा हैं और हमें तो केवल अपने को दिये गये पात्र को अभिनीत करना हैं

अपनी भूमिका निभाते-निभाते हम अपने आपको ही अपनी जिंदगी का सिरमौर समझने लगते पर, सत्य तो सत्य ही होता जिसका अहसास अंतिम घड़ी से सामना होने पर ही होता क्योंकि किसी का जीवन कैसा भी सुविधायुक्त या सुविधाविहीन क्यों न रहा हो लेकिन उस आखिरी सफर पर सबको पैदल ही जाना हैं जो कुछ भी यहाँ मिला या कमाया सब कुछ यही छोड़कर जाना हैं शायद, इसी कारण जब उसके समक्ष कोई ऐसा नजारा आता जो उसे इस हकीकत का अहसास कराता तो बेशक यही ख्याल आता कि काश, घड़ी की सुइयों या कदमों को वापस मोड़ सकते... काश, उस एक अवसर को फिर से जी सकते या काश, उस पल को बदल सकते.... लेकिन ‘काश’.... तो ‘काश’ ही होता और कोई जीवन ऐसा नहीं जिसमें कोई ‘काश’ न हो क्योंकि जितनी तेजी से समय का पहिया घूमता या मन भागता उतनी तेजी से हम अपने आपको नहीं बदल सकते बस, चंद पल ही उस तरह से सोच सकते जैसा कि प्रत्यक्ष दिखने वाली वस्तु के दृष्टिगोचर होते ही मन में भाव उमड़ता जो केवल क्षणिक होता और हमें कभी फलक पर उडाता तो कभी जमीन पर ला पटकता... क्या कहे सिवाय इसके कि दिल तो हैं दिल... दिल का ऐतबार क्या कीजे... कभी हंसे कभी रोये क्या कीजे... सच... जैसा होता सामने का मंजर... वैसा ही चलता दिल के अंदर... :) :) :) !!!        
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०२ सितंबर २०१५
© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री

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मंगलवार, 1 सितंबर 2015

सुर-२४४ : "बेशक करो इकतरफा प्यार... पर, न करो गले पर वार...!!!"


‘चाहना’
किसी को बुरा नहीं
‘मानना’
अपना भी बुरा नहीं
पर, जबरन
उस पर हक जताना
या उसको अपना बनाना
ये हो सकता हैं
कुछ भी मगर...
‘प्यार’ तो हर्गिज़ नहीं
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मित्रों...,

‘चाहत’ का भाव हर एक प्राणी के भीतर होता हैं और वो जन्म लेते ही इस अहसास से परिचित हो जाता हैं ये और बात हैं कि धीरे-धीरे इसके मायने और दायरे बदलते जाते हैं तभी तो बचपन में किसी प्रिय खिलोने के बिना न रहने वाला बच्चा बड़ा होते ही उस जगह पर किसी और को रख लेता हैं और जैसे-जैसे उसकी उमर बढ़ती हैं उसकी अपनी चहेती वस्तु के प्रति दीवानगी का ग्राफ भी उसके मिजाज के अनुसार उपर ही उपर चढ़ता जाता हैं जो गर, संयम व मर्यादा की जंजीरों से बंधा न हो तो किसी आवारा कुत्ते की तरह हद से बाहर हो जाता और किसी निर्दोष को उसके पागलपन का शिकार बनना पड़ता ये और बात हैं कि अक्सर उसे अपनी उस जेहनी बीमारी का पता ही नहीं होता या दूसरों के द्वारा उसे ‘सनकी’ या ‘पागल’ की संज्ञा दिये जाने पर वो भी खुद को वही समझने लगता या कभी-कभी तो हर सीमा से परे वो केवल खुद को ही इस दुनिया का बेताज बादशाह और हर चीज़ को अपनी मिल्कियत समझता जिसकी वजह अक्सर उसका वो माहौल होता जो उसकी उन हरकतों को बढ़ावा देता जिसके कारण दिन-ब-दिन इस तरह की मनमानी करते-करते उसकी हिम्मत कटी पतंग की तरह आसमान को छूती जाती और उपर उड़ने की मियाद खत्म होने पर ही वो नीचे जमीन पर आती पर, इस तरह उसका पतन होने पर अंजाम तो तय हैं ही फिर भी जो बिंदास हर बंधन से परे उड़ रहा हवाओं में उस पर फिर किसका जोर चलता सिवाय हवाओं के जो अपनी रवानी के संग उसे भी अपने संग बहाती ले जाती और इस उड़ने के चक्कर में वो भूल जाता कि फिर जब यही हवा थमती तो उसकी सांसो की डोर को भी काट देती लेकिन इसे याद रख पाना या सोच पाना ही अगर उसके वश में होता तो क्या वो इस अंजाम को हासिल होता लेकिन उसने तो पल-पल उसको  चेताने वाली अंतरात्मा की आवाज़ को सदैव नकार दिया तो फिर किस तरह से बच सकता था

आजकल अमूमन देखने-सुनने में आता हैं कि एकतरफा प्रेम में प्रेमी अपने अलावा किसी और के बारे में न तो सोचता और न सुनना ही पसंद करता बल्कि वो तो अपने आपको और अपनी भावना को ही सर्वोपरि मानकर उसे पाना चाहता जिसे उसने अपना मान लिया इसमें अगले की रजामंदी से कोई सरोकार नहीं होता इसलिये तो कभी-कभी वो मुहब्बत की दहलीज़ को पार कर उसे अपनी जद के कारागार में बंद कर लेता या जबरन उसे अपना बना लेता अपने इश्क़ को मुक्कमल मानकर जिसका खामियाजा सिर्फ़ और सिर्फ़ उस मासूम को भुगतना पड़ता जिसे या तो उस प्रेम का पता ही न होता या फिर उसने इस तरह की हरकत की उम्मीद न की होती पर, सामने वाला तो बस, हर हाल में जिसे पसंद करता उस पर अपना हक जताने उसे अपना बनाने की हर तरह से कोशिश करता जिसके लिये यदि उसे अपने ही उस प्रियतm को मार देना भी पड़े तो गुरेज नहीं करता ऐसा भी पढ़ने में आया जबी किसी एकतरफा प्रेम ने किसी को सरेआम तेजाब डालकर जला दिया तो कभी उसको रुसवा कर दिया तो कभी उसकी जान ले ली या फिर कभी उसे उठवा लिया ये विचार किये बिना कि उसकी इच्छा या सपने क्या हैं क्यों ??? सिर्फ़ इसलिये कि वो उसको चाहता हैं ये किस तरह का प्रेम जो किसी को हर हाल में अपना बनाकर ही अपने प्रेम को पूर्ण समझता फिर चाहे उसे वो कैद कर ही क्यों न रख ले लेकिन ये भूल जाता कि प्रेम पैदा नहीं किया जा सकता यदि नहीं हैं तो वो फिर नहीं ही रहेगा लेकिन जबरदस्ती करने वालों को तो अपनी जिद के सिवा किसी की परवाह नहीं उसकी भी नहीं जिसे अपनी जान से ज्यादा चाहने का दावा कर उसकी ही जान ले लेता... उसके बाद भी जो फासला उनके बीच था वो उसी तरह कायम रहता... काश, इसे समझ ले इकतरफा प्यार  करने वाले तो कुछ जाने बच सकती हैं... मुहब्बत जिंदा रह सकती हैं... क्या नहीं... :) :) :) ???
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०१ सितंबर २०१५
© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री

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