सोमवार, 9 नवंबर 2015

सुर-३१३ : "धनवंतरी जयंती आई... आरोग्य होने का संदेश लाई...!!!"


सदियों से
आयुर्वेद में छिपा
निरोगी, दीर्घायु होने का
अनमोल खजाना
जिसे बिसरा
भोग-विलास में खो
यहाँ-वहां ढूंढता स्वास्थ्य
‘धनवंतरी जयंती’
न सिर्फ पूजा कर मनाओ
उसका वास्तविक महत्व भी
समझो और समझाओ ॥
---------------------------------●●●
              
___//\\___

मित्रों...,
 

पांच अलग-अलग त्योहारों के ‘पैकेज’ दीपावली महोत्सव का आगाज़ आज ‘धनतेरस’ के साथ हो गया हैं... कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को ‘भगवान धनवंतरी’ हाथ में अमृत कलश लेकर प्रकट हुये थे... जिन्हें की देवताओं का वैद्य और चिकित्सक आचार्य माना जाता हैं और इनकी पुजा से हम सबको भी लंबी आयु और सदा स्वास्थ्य रहने का आशीर्वाद प्राप्त होता हैं... वैसे भी हमारे यहाँ मान्यता हैं कि ‘पहला सुख निरोगी काया’ क्योंकि हमारे सारे सुख, सारी खुशियाँ हमारे तन-मन से जुडी हैं... गर, हम इनको हर तरह के रोग से मुक्त रखना कहते हैं तो इसके लिये हमें अपना ध्यान रखने के अलावा अपने बडो का आशीष और आरोग्य के देवता का पूजन करना चाहिये... इसलिये दीपावली जैसे महान पर्व की शुरुआत इस उत्सव से की गई हैं ताकि हम पहले अपने शरीर को पूर्ण रूप से रोगमुक्त रखें उसके प्रति सचेत रहें जिससे कि आने वाली खुशियों का खुले ह्रदय से स्वागत कर उनका आनंद ले सकें... तो आप सभी को सपरिवार सेहतमंद रहने की शुभकामनाओं के साथ ‘धनवंतरी जयंती’ की अनंत बधाइयाँ.... :) :) :) !!!       
__________________________________________________
०९ नवंबर २०१५
© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
●--------------●------------●

रविवार, 8 नवंबर 2015

सुर-३१२ : "आ रहा त्योहारों का पैकेज... !!!"

धनतेरस
रूपचौदस
दीपावली
अन्नकूट
भाई दूज
एक के बाद एक
आते त्यौहार
ऊबे हुये मन के भीतर
जगाते हर्ष अपार ॥
-----------------------●●●

             
___//\\___

मित्रों...,
 
भारत देश की एक मुख्य विशेषता और भी हैं कि यहाँ हर तरह के रिश्तों और हर तरह की परंपरा को पीढ़ी दर पीढ़ी गतिमान बनाये रखने के लिये और जीवन में आई एकरसता को भंग कर उसमें उत्साह का संचार करने के लिये विविध त्यौहार मनाये जाते हैं जो किसी न किसी रवायत और किसी न किसी आस्था से जुड़े होते हैं और जब इनका आगमन होता तो उतने समय के लिये हर कोई अपने सभी ग़मों, अपनी सभी चिंताओं एवं परेशानियों को किसी घर के किसी कोने में रख जमाने के साथ चला पड़ता जो इनका मुख्य उद्देश्य होता जिससे कि उसे अपनी खोई हुई ऊर्जा की भी पूर्नप्राप्ति होती क्योंकि सारे ही वातावरण में सकारात्मकता घुल जाती जो उदासी को हर फिजाओं में उत्साह का छिड़काव कर देती जिससे सराबोर होकर लोग उसके ही रंग में रंग जाते ये तो बात हुई उन एक दिवसीय त्योहारों की जो आये दिन आते रहते लेकिन इस देश में तो ऐसे भी पर्व हैं जो नौ दिन या दस दिन या महीने भर तक चलते रहते हैं जिनके आयोजन की तैयारी कई दिनों पहले से ही शुरू हो जाती क्योंकि ये महज़ औपचारिकता निभाने की रस्म नहीं बल्कि हमारा सालाना त्यौहार हैं तो घर-घर में साफ़-सफ़ाई का एक लंबा अभियान चालू हो जाता जिसमें हर दिन कोई न कोई काम किया जाता ताकि उसके स्वागत में कोई भी कमी न रह जाये ।

अभी भी एक ऐसा ही महापर्व आ रहा हैं बल्कि यूँ कहे कि आ चुका लेकिन चूँकि इसकी शुरुआत त्रयोदशी से ही मानी जाती तो कल से इस त्योहारों के इस पैकेज का शानदार आगाज़ हो रहा हैं और इसके साथ ही सभी लोग जो पिछले कई दिनों से काम-काज में जुटे थे अब थोड़ी सी राहत महसूस करेंगे और अपने परिवार के साथ मिलकर ख़ुशी से इसमें शामिल होकर हर पल का आनंद लेंगे जिसके लिये दूर-दराज रहने वाले परिजन भी अपने घर-परिवार के बीच आकर इसका हिस्सा बनते हैं तो ख़ुशी दुगुनी न होकर सौगुनी हो जाती हैं तो कल से आने वाले महापर्व आज की भाषा में बोले तो ‘फेस्टिवल पैकेज’ की सभी को अग्रिम शुभकामनायें... :) :) :) !!! 
__________________________________________________
०८ नवंबर २०१५
© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
●--------------●------------●

शनिवार, 7 नवंबर 2015

सुर-३११ : "अब ने रहे सन्देश... न सदेश वाहक...!!!"

कभी मेघ
तो कभी पवन
और कभी कपोत तो
कभी कोई हिरण
बन जाते संदेश वाहक
लाते ले जाते संदेश
सुदूर बसे प्रियजनों तक
पार कर हर बाधा
अब तो सब कुछ हैं
पल-पल की खबरें पहुँचती 
फिर भी उनमें वो बात नहीं
कि खो गयी दिल जोड़ने वाली
वो आत्मीयता कहीं ॥
-----------------------●●●
              
___//\\___

मित्रों...,
महाकवि ‘कालिदास’ रचित ‘मेघदूत’ भले ही किसी ने पढ़ा न हो लेकिन इसके नाम से सभी परिचित होंगे जिसमें नायक ने अपनी नायिका तक अपना संदेश भेजने के लिये बादलों का सहारा लिया भले ही ये एक कल्पना लगे लेकिन आज के लोग समझ नहीं सकते कि किसी जमाने में कितना मुश्किल होता था नगर के समीप ही गये अपनों को कोई खत भेजना उसके हालचाल प्राप्त करना फिर भी जब घर से कोई प्रियजन परदेस जाता तो उस तक अपनी खबर पहुंचाने या उसकी पाने के लिये कई तरह के जतन किये जाते तब भी जरूरी नहीं कि वो मिल ही जाये लेकिन हर समय में इस काम को अंजाम देने के लिये विविध तरीके अपनाये गये और जो भी उपाय समझ में आया उसको आजमाया गया जिसके कारण उस काल का अध्ययन करें तो ज्ञात होता कि अपनों से बिछड़ने पर जब मन व्याकुल हो जाता तो फिर वो केवल दिल की धड़कनों से ही मन को तसल्ली नहीं होती शब्दों की भी जरूरत पडती तो ऐसे में व्यक्ति ने जो भी उस जमाने में उपलब्ध था उसको ही अपना संदेश वाहक बनाया चाहे फिर वो कोई पक्षी हो या जानवर या फिर प्रकृति की कोई शय जिसका हर कहीं गुज़र होता उसने उससे ही अपने अंतर की बात कह खुद का मन हल्का कर लिया और उसके इंतज़ार में घड़ियाँ गिनते हुये उस अवधि को व्यतीत किया जिसमें कभी-कभी महीनों का भी अंतराल आ जाता था ये आज का तकनीकी युग थोड़े न था जिसमें बटन दबाते ही लिखे हुये अल्फाज़ संसार के किसी भी कोने में बैठे किसी भी व्यक्ति तक एक पल में ही न सिर्फ़ पहुँच जाते बल्कि वहां से उसका जवाब भी तुरंत आ जाता हैं ।

चिठ्ठी आई हैं... आई हैं... चिट्ठी आई हैं... ये महज़ फ़िल्मी गीत नहीं इसमें जो दर्द छिपा हैं उसे केवल वहीँ महसूस कर सकता जिसने कभी अपनों से दूर रहने की पीड़ा सही हो और जब बात अपने वतन से दूर रहने की हो तो इसकी अहमियत और भी अधिक बढ़ जाती जिसे इस नगमे में दर्शाया गया हैं अब तो कोई दुनिया के किसी भी हिस्से में चला जाये किसी भी तरह की दूरी का अहसास नहीं होता क्योंकि केवल संदेशों के माध्यम से ही नहीं बल्कि वीडियो कालिंग की सहायता से भी उससे किसी भी समय संपर्क करना आसान होता जबकि कभी ऐसा सोचना भी मुमकिन नहीं था तब तो कागज़ में लिखे शब्दों में ही लिखने वाले की छवि की कल्पना कर अपन आपको बहलाया जाता था सच... अब भले ही खतों का सिलसिला न रहा लेकिन जिस किसी ने भी कभी भी किसी को भी अपने मनोंभावों को पत्रों के रूप में प्रेषित किया हैं वो जानता हैं कि एक छोटे से पन्ने में लिखे एक छोटे से शब्द उसके लिये कितनी कीमती होते हैं जिनको पाने के लिये वो एक-एक पल बड़ी बेताबी से काटता हैं पलकें बिछाये द्वार या खिड़की में बैठा रहता और जब डाकिये का स्वर सुनाई देता तो दौड़कर पहुँच जाता ऐसे में जब उसे पता चलता कि उसका कोई भी खत नहीं आया तो उस वक़्त उसका जो हाल होता उसे सिर्फ़ वही समझ सकता हैं और फिर वही पल... पल... पल... हर पल... कैसे कटेगा पल... हर पल... एक अंतहीन इंतज़ार की शक्ल में उसके दिलों-दिमाग में अनवरत गूंजने लगता जो कब खत्म होगा इस जाने पाने का कोई तरीका ही नहीं था उसके पास सिवाय राह तकने के जो हर बीतने वाले लम्हे के साथ उसकी बेचैनी का इम्तिहान लेता रहता हैं ।

कबूतर जा... जा... जा... कबूतर जा... जा... जा... याद आया... जी हाँ कभी ये नन्हा कपोत भी लोगों की पाती इधर से उधर लाने ले जाने का एक बेहतरीन जरिया था जो उड़ता-उड़ता न जाने कितने पड़ाव पूरा करता हुआ अपने गंतव्य तक पहुंच पाता और फिर वहां से प्रतिउत्तर पाकर उतनी ही दूरियों से गुजरकर पुनः भेजनेवाले के पास पहुँच जाता कभी-कभी नहीं भी पहुँच पाता आखिर पक्षी हो तो हैं लेकिन जब आपके पास अपनों की खैरियत जान पाने की कोई और तरकीब न हो तो फिर उसके भरोसे ही काम चलाना पड़ेगा और कभी तो कोई इंसान ही पैगाम को उसकी प्रतीक्षा करने वाले तक पहुँचाता था जिसे कभी ‘दूत’ तो कभी ‘कासिद’ तो कभी ‘डाकिया’ और कभी ‘पत्रवाहक’ या ‘संदेशवाहक’ कहा गया जिस काम को अब भी हवाओं में बिखरी तरंगे अंजाम दे रही याने कि बात अब तलक भी वही हैं जो सदियों से पहले थी कि हवा का गुज़र तो यत्र-तत्र-सर्वत्र हैं तो उससे बेहतर तरीके से इस काज को भला और कौन कर सकता हैं तो पहले भी ‘हवा’ ही ये काम करती थी अब भी करती हैं बस, तकनीक ने उसको अपने तरीके से प्रसारित करना शुरू कर दिया हैं तो बदलते ज़माने के साथ हम भले ही बदल गये लेकिन अहसास तो अब भी वही हैं तो कभी यंत्रों से पीछा छुड़ाकर प्रकृति के इन कासिदों को आजमाकर देखें इसमें जो लुत्फ़ आयेगा वो एक झटके में मिलने वाले इन झटपट मेसेज से अधि कारगर होगा... चलो हम भी किसी तितली... या परिंदे को अपने मन की बात बताते हैं... एक संदेश भेजते हैं... प्रतीक्षा की आग में जलते हैं... फिर से प्रकृति से जुड़ते हैं... आखिर... हवा से ही तो दोस्ती करनी हैं... :) :) :) !!!                 
__________________________________________________
०७ नवंबर २०१५
© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
●--------------●------------●

शुक्रवार, 6 नवंबर 2015

सुर-३१० : "अभिनय के रंग बेशुमार... देकर गये 'संजीव कुमार'...!!!"

अभिनय ऐसा
घुल गया रगों में
कि हर एक किरदार को
रजत पर्दे पर जीवंत कर दिया
तोड़कर उम्र की सीमायें
उतर गये पात्र की खाल में
इस तरह से गहरे कि
खुद को भूल उस चरित्र को ही
अपना वजूद मान लिया
बन गयी यादगार
उनकी निभायी हर भूमिका   
चाहे बने हो नायक, सहनायक
या फिर कोई खलनायक
सबको अंतर से भरपूर जिया
आज उस कलाकार
नाम जिसका ‘संजीव कुमार’
आई पुण्यतिथि तो
हर एक प्रशंसक ने
दिल से उसको याद किया ॥
---------------------------------●●●
               
___//\\___

मित्रों...,
 
किसी भी कलाकार के लिये सबसे बड़ी तारीफ़ और गर्व की बात तब होती हैं जब सिनेमा के पर्दे पर निभायी गयी उसकी काल्पनिक भूमिका को देखने वाला असलियत में एक जीता-जागता अपने ही आस-पास का कोई जीवित चरित्र समझ उससे अपने आपको जोड़ लेता तथा उसको दर्शकों का बेशुमार प्यार मिलता फिर जब कोई अभिनेता ऐसा हो कि वो जब भी कोई भी पात्र अभिनीत करें तो लगे ही नहीं कि वो किसी तरह का अभिनय कर रहा हैं तो फिर उसे भूलना नामुमकिन होता क्योंकि तब तो वो उस पात्र के रुप में सदा के लिये अमर हो जाता और आज जिस अभिनेता की बात हम कर रहे हैं उसने तो जब भी जो भी चरित्र रुपहले परदे पर निभाया उसे देख कर लगा ही नहीं कि वो कोई अभिनय हैं बल्कि देखने वाले ने तो उसे उसके नाम से नहीं बल्कि जिस पात्र को उसने अभिनीत किया उसके नाम से जाना और इस तरह उसका हर एक रोल अविस्मरणीय बन गया चाहे फिर वो कोई भी फिल्म हो हमने उसकी वजह से उसे देखना पसंद किया और आज भी जब भी किसी चैनल पर उसकी कोई फिल्म आती तो देखने वाले उसमें ही खोकर चैनल बदलना तक भूल जाते कि उन्हें ये अहसास होता ही नहीं कि वो कोई फ़िल्मी कहानी देख रहे हैं जो न तो आज की हैं और न ही उसमें अभिनय करने वाला वो अभिनेता अब इस दुनिया में ही हैं लेकिन यही तो एक कलाकार की खूबी होती कि वो भले ही इस दुनिया से चले जाए लेकिन अपनी कला का खजाना अपनी विरासत के रूप में अपने चाहने वालों के लिये छोड़ जाता जिसे देख-देख कर वो उसे सदैव याद करता हैं ।

‘हरिभाई जरीवाला’ जिन्हें कि हम सब ‘संजीव कुमार’ के नाम से बखूबी जानते हैं वे ९ जुलाई १९३८ को एक साधारण गुजराती परिवार में पैदा हुये थे और बचपन से ही उनके मन में अभिनय के प्रति आंतरिक रूचि थी जिसकी वजह से वे अपने स्कूलों में खेले जाने वाले नाटकों में भाग लेना शुरू कर दिया और उसके बाद इसी क्षेत्र में अपना मुकाम बनाने की खातिर उन्होंने फ़िल्मालय के एक्टिंग स्कूल में प्रवेश लेकर अभिनय की बारीकियां सीखना शुरू कर दिया और यही रहते हुये उन्हें १९६० में ‘हम हिंदुस्तानी’ फिल्म मिली जिसे कि ‘स्टार ऑफ़ मिलेनियम’ अभिनय के शहंशाह ‘अमिताभ बच्चन’ की भी पहली फिल्म माना जाता हैं वैसे तो इसमें उनका रोल अत्यंत छोटा था लेकिन इस तरह से उन्हें फ़िल्मी संसार में पदार्पण करने का सुनहरा अवसर तो मिल ही गया और फिर चला ‘संघर्ष’ के पथरीले रास्ते का एक कठिन दौर जिसमें कोई भी उल्लेखनीय काम नहीं मिला लेकिन तकदीर में जो लिखा था वो तो होना ही था तो आठ साल के इस कठिन दौर को गुजारने के बाद १९६८ में उन्हें मिले ‘शिकार’ फिल्म जिसमें कहने को तो उनकी सहनायक की भूमिका थी और नायक थे ‘धर्मेंद्र’ लेकिन इस मौके को उन्होंने इस तरह से भुनाया कि उस वर्ष का ‘सर्वश्रेष्ठ सहनायक का फिल्मफेयर’ ख़िताब उनके हिस्से में आया जिसने फ़िल्मी दुनिया में उनके लिये सफलता के साथ ही जोरदार आगाज़ का मार्ग तैयार कर दिया क्योंकि इसी साल आई ‘संघर्ष’ फिल्म ने उनके संघर्ष को विराम दिया जिसमें उनको अभिनय सम्राट ‘दिलीप कुमार’ के साथ सह-अभिनेता की भूमिका निभाने का वही अवसर मिला जिसकी उनको तलाश थी और वे अपने प्रभावशाली अभिनय से दर्शकों के दिलों में अपनी गहरी छाप छोड़ने में सफल रहे ।

इसके बाद उनके अद्भुत अभिनय की वो बेमिसाल पारी शुरू हुई जिसमें उनके प्रशसंकों को उनके अभिनय के एक से बढ़कर एक रंग देखने की मिले जब उनके सामने एक के बाद एक 'आशीर्वाद', 'राजा और रंक', 'सत्यकाम' और 'अनोखी रात' जैसी फिल्मों ने सफ़लता के नये-नये सोपान दिये जिन पर कदम रखते हुये वे ऊंचाइयों पर पहुँचते गये ऐसे में १९७० में आई 'खिलौना' फिल्म जिसने अपार सफलता अर्जित करने के साथ ही अभिनेता ‘संजीव कुमार’ को फिल्म इंडस्ट्री में एक कामयाब अभिनेता के रुप में स्थापित कर दिया और उनकी एक अलहदा पहचान भी बना दी और इसी साल आई मील का पत्थर कहलाई जाने वाली एक अनोखी शैली की एकदम अलग ही मिज़ाज की कथा ‘दस्तक’ जिसने उनको अपने अभिनय के लिये प्रथम ‘राष्ट्रीय सम्मान’ भी दिलाया फिर इसके बाद १९७२ में आई ‘कोशिश’ जिसमें उन्होंने एक गूंगे-बहरे व्यक्ति का इतना संवेदनशील अभिनय किया कि उनको देश ने पुनः ‘राष्ट्रीय पुरस्कार’ से सम्मानित किया और अब निर्देशकों को भी उनके  बेमिसाल अभिनय क्षमता के नये-नये आयाम देखने को मिले जब उन्होंने इसके बाद ‘नया दिन नयी रात’ में एक ही साथ नौ अलग-अलग किरदारों के माध्यम से अभिनय के नवरसों को एक साथ फ़िल्मी पर्दे पर बड़ी आसानी से उतार दिया और ‘शतरंज के खिलाडी’ में तो अभिनय की नयी इबारत लिख दी जिसे केवल देखकर ही पढ़ा जा सकता हैं ।

इस तरह उन्होंने लगातार ये सिलसिला जारी रखते हुये ‘सीता और गीता’, ‘अंगूर’, ‘अनामिका’, ‘मनचली’, 'मुक्ति', ‘आंधी’, त्रिशूल, 'पति पत्नी और वो', 'देवता' , 'जानी दुश्मन', 'गृहप्रवेश', 'हम पांच' , 'चेहरे पे चेहरा' , 'दासी' , 'विधाता' , 'नमकीन' , 'मौसम' ,'हीरो'  और ‘विधाता’ तक अनेक फ़िल्में की जो आज भी उनको हम सबके बीच उसी तरह से जीवित रखे हैं जिस तरह से और जिस तरह की किरदार को उन्होंने निभाया हैं और हमारी बदकिस्मती कि आज ही के दिन ०६ नवंबर १९८५ को एकाएक आये हृदयाघात ने उनको असमय ही अल्पायु में हमसे जुदा कर दिया तो आज उनकी पुण्यतिथि पर शब्दों की ये पुष्पांजलि उनको अर्पित करते हुये ‘अल्लामा इक़बाल’ का ये शेर उधार लेती हूँ ----

"हजारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है ।
 बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा” ॥

सच... कुछ लोगों पर ये पंक्तियाँ बड़ी ही सटीक बैठती हैं जिनमें से ‘संजीव कुमार’ भी एक हैं... :) :) :) !!!      
__________________________________________________
०६ नवंबर २०१५
© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
●--------------●------------●

गुरुवार, 5 नवंबर 2015

सुर-३०९ : "साइकिल की तरह चलती जाये जिंदगानी...!!!"

हर पल
हर एक घड़ी
देती कोई नई सीख
अलबेली जिंदगी  
गर, हो नजर खुली
तो दिख ही जाती
देती कोई प्रेरक संदेश
अलबेली जिंदगी
चाहते समझना इसको  
तो करो सदा इसकी बंदगी ॥
------------------------------●●●
    
___//\\___

मित्रों...,

जरूरी नहीं कि सिर्फ ‘पाठशाला’ या किसी ‘गुरु’ के सानिध्य में रहकर ही हम कोई सबक हासिल करें ये तो कोई भी किसी भी जगह रहकर और किसी भी वस्तु से प्राप्त कर सकता हैं अगर उसके अंदर किसी नूतन ज्ञान को जानने की जिज्ञासा हैं जिस तरह बालपन में कोई बच्चा अपने खिलोनों को तोड़-जोड़कर कुछ न कुछ जानता ही हैं उसी तरह यदि हम अपने आपको सजग रखें तो फिर हर एक वस्तु हमारी शिक्षक बन जाती क्योंकि ये लगन हमारे अंदर ही विद्यमान होती जो हमको कुछ नवीन सीखने को प्रेरित करती तभी तो कोई होता जो जीवन के हर पड़ाव पर अपनी समस्त ज्ञानेन्द्रियों को जागृत रख अंतिम क्षणों तक उतनी ही ऊर्जा से सक्रिय रहता जबकि कोई तो पूर्ण ऊर्जा से भरा होने पर और सब तरह के साधनों से संपन्न होने पर भी कोई शिक्षा हासिल नहीं कर पाता कि उसके भीतर वो जज्बा ही नहीं होता जो उसके दिलों-दिमाग में किसी नई विद्या को सीखने के प्रति उत्साह पैदा कर सके और इस तरह से यत्र-तत्र सर्वत्र अनमोल मोतियों सा बिखरा ये ज्ञान का खज़ाना यूँ ही अनदेखा रह जाता ।

हम एक लीक पर चलना ही पसंद करते तो उससे हमारी इन्द्रियां भी उस एकरसता की अभ्यस्त हो जाती लेकिन यदि हम उनका उपयोग करते तो फिर वो हमें सदैव कुछ करने को उकसाती रहती और यही मन की बेचैनी जिसके अंतर में होती वो कभी कभी शांत नही बैठता हर पल, हर एक क्षण कुछ न कुछ सोचता रहता और फिर उसे अंजाम देने की जुगाड़ में लग रहता और यदि आप भी ऐसा बनना चाहते हैं तो याद रखें कि अपने आपको कभी भी ‘संतुष्टि’ का जाम न पिलाये कि जिसे पीकर आपका अंतर्मन एकदम सुस्त हो जाये और फिर कुछ भी करना न चाहे बल्कि उसे तो बीच-बीच में ‘असंतुष्टि’ के कडवे घूंट पिलाते रहे जिससे कि परिवर्तन की लहर कर्मेन्द्रियों को सतत कर्म करने के लिये धक्का लगाती रहे सनद रहे कि यही तो वो धक्के होते जो हमें आगे बढ़ाते लेकिन साथ ही ये भी ध्यान रखना कि ये धक्के उस थपकी की तरह हो जो कुम्हार अपने मटके को अंदर से देता जिससे कि वो एक निश्चित आकार ले सके यदि इसका वेग अधिक हुआ तो फिर आपको गिरने से कोई भी नहीं रोक सकता मतलब जीवन में सब कुछ संतुलित हो तो फिर वो साइकिल की तरह सधी हुई गति से हर तरह के रास्तों पर आगे ही आगे बढती जाती और यदि आँखें खुली हो तो गलती से कोई बाधा आने पर ब्रेक की सावधानी हमें बचा लेती ।

ईश्वर ने हमें ‘ज्ञानेन्द्रियाँ’ और ‘कर्मेन्द्रियाँ’ इस लिये तो प्रदान की कि हम उनका सदुपयोग करते हुये उनके तालमेल से अपना जीवन सफ़ल बनाये न कि उनका उपयोग किये बिना उनको जंग लगने दे जिस तरह खड़े-खड़े साइकिल भी जाम हो जाती उसी तरह हमारी देह को भी आलस का रोग लग जाता जिससे वो कुछ भी न करना चाहता साथ ही आपने ये भी देखा होगा कि यदि उसके पुर्जों की नियमित देखभाल करें तो वो लंबे समय तक साथ देती तो हम भी अपने सभी अंगों का ध्यान रखे तो वे हमारे सहयोगी बन आजीवन हमारा साथ देते... यहाँ तक कि जब वो स्टैंड पर खड़ी होती तो उसका वो स्टैंड हमें अपने घर की याद दिलाता जहाँ हम भी शांतचित होकर सुकून के पल बिताते तो देखा आपने एक खड़ी हुई साइकिल से भी कितनी सारी ज्ञानवर्धक जानकारियां मिल सकती हैं... हैं न... :) :) :) !!!             
__________________________________________________
०५ नवंबर २०१५
© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
●--------------●------------●

सुर-३०८ : "लघुकथा - गृहलक्ष्मी...!!!"

             
___//\\___

मित्रों...,

दस साल की ‘पूर्वी’ आंगन में खेल रही थी और वहीँ उसकी माँ भी बैठकर चावल बीन रही थी कि अचानक उसकी गेंद उछलकर थाली पर पड़ी जिससे कि सारे चावल वहीँ आंगन में बिखर गये और वो नादान मासूम अपने बचपने में उन्हीं दानों पर पैर रखकर अपनी गेंद उठाने कि तभी उसकी माँ ने टोका, बेटी आपको कितनी बार समझाया कि अन्न देवता होते हैं इन पर पैर नहीं रखते तुरंत वो अबोध बालिका बोली, पर माँ मैंने तो कई फिल्मों और सीरियल्स में देखा हैं कि जब भी नई दुल्हन ससुराल में आती हैं तो इन्हीं को अपने पांव से गिराकर ही घर के अंदर घुसती हैं ।      

माँ उसके मुख से इतनी गहरी बात सुन सोच में पड़ गयी कि बच्चे भी कितना कुछ समझते हैं सच ही तो कहा उसने कि वो ही तो गृहलक्ष्मी हैं तो वात्सल्यता से उसके सर पर हाथ फेरकर बोली, तू ही तो मेरी ‘लक्ष्मी’ हैं ये सब तेरी वजह से ही तो हैं एक दिन तू भी तो इसी तरह किसी के घर जाएगी और उस दिन की कल्पना कर उनकी आँखों में नमी आ गयी जिसे छूपा सरे चावल समेटती वो अंदर चली गयी ।
__________________________________________________
०४ नवंबर २०१५
© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
●--------------●------------●