शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

सुर-४०१ : "चिंतन : गर, रहे आँख खुली... कोई शिक्षा न जाये चूकी...!!!"

दोस्तों...

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‘महक’ की आदत थी कि रात को सोते समय वो दिन भर होने वाली सभी बातों का आकलन करती थी तो आज भी उसी तरह विचार करते समय उसे ध्यान आया कि यूँ तो दिन में होने वाली वो घटना एकदम सामान्य थी जो अक्सर ही सबके साथ गाड़ी चलाने के दौरान हो जाती लेकिन इस समय उसे उसमें जीवन का एक बड़ा गहरा फलसफ़ा मिल गया जब उसने सिलसिलेवार उस पूरे वाकये को इस तरह से दुबारा ख्यालों में जोड़ा---   

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वो बेखबर थी कि
उसकी गाड़ी का इंडिकेटर ऑन था
जिसकी वजह से
उसके पीछे आने वाला उसे
विपरीत दिशा मे जाते देख हैरान था

फिर...

उसे मान उसकी गलती
वो संभल गया
उसके बाजू से इशारा कर
आगे निकल गया

तब उसने बेशक...
बंद तो कर दी गाड़ी की लाइट
लेकिन भीतर की जल गयी
जो उसको समझा गयी

कि अक्सर ही
हम अंजान इस बात से
चलते चले जाते
और हमको देखने वाले
अपने अंदाज़े लगाते जाते

जबकि...
हमारा इरादा न होता
उस राह जाने का
जिसका इशारा हम कर रहे
भले जान-बूझकर नहीं
अनजाने में ही सही

तो हम लापरवाही से
आगे बढ़ते जाते
पीछे वाले हमें देख अपने
अनुमान लगाते जाते

इस तरह
कभी-कभी हम
ना चाहते हुये भी
दूसरों की नज़रों मे
गुनाहगार तो बन जाते

गर...
हो कुछ सीखने का जज्बा
तो जीवन के अनमोल सबक
यूँ राहों मे भी मिल जाते ।।
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वो सोचने लगी सचमुच कितना बड़ा दर्शन छिपा इस छोटी-सी नजर आने बात में यदि इसी तरह हर एक छोटी-छोटी बात से सबक लिया जाये तो न सिर्फ नित कोई सबक मिलता बल्कि जीना भी सहज हो जाता जिसे हम बड़ी आसानी से नजरअंदाज़ कर आगे बढ़ जाते तो अब से उसे हर पल होने वाली आमो-ख़ास घटना में छिपे जीवन मंत्रों को ढूंढना हैं... आज मिले इस ज्ञान ने उसको संतुष्टि का एक भाव दिया और सोच को विराम दिया तो वो मन में ये निश्चय कर पलकें मूंदकर करवट बदलती हुई सो गयी... :) :) :) !!!
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०५ फरवरी २०१८
© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
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सुर-४०० : "फेसबुक का जन्मदिन आया... दिलों में हर्ष लाया...!!!

दोस्तों...

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तकनीक ने
रच दी कल्पना की दुनिया
जो आधी हक़ीकत
तो आधी आभासी होकर भी
संसार को जोड़ती
दूर-दराज के लोगों के बीच
दूरियां कम करती
कहने को ये ‘फेसबुक’ की
एक स्वप्निल सृष्टि हैं
जो ‘मार्क जकरबर्ग’ ने रची हैं
पर, लगती बड़ी भली हैं  
आज के दिन ही
साकार हो अदृश्य तरंगों पर
इसका अस्तित्व बना
जिसने संपूर्ण ब्रम्हांड को एक किया
आज जन्मदिन पर
करतें हम सब इसका दिल से शुक्रिया ॥
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इस सदी को ‘कंप्यूटर’ और ‘तकनीकी युग’ का नाम दे देने भर से ही स्वयं इसकी महत्ता स्पष्ट हो जाती हैं और नित होने वाले नवीन अविष्कारों और ‘गेजेट्स’ के आने से दुनिया हर पल और अधिक ‘स्मार्ट’ होती जाती हैं । जिसकी वजह से आपसी ताल्लुकात भी अब पुराने जमाने के तरीकों से निभाने की जगह उनके लिये भी नये-नये यंत्रों का अविष्कार कर लिया गया हैं ताकि व्यक्ति दुनिया के किसी भी कोने में हो पर वो अपनों के बीच होने के अहसास को महसूस कर सके । इसी आभास को बरकरार रखने के लिये कुछ लोगों ने एक ऐसे माध्यम को तैयार किया जो कहने को तो तरंगों के रूप में हवाओं के सूक्ष्म कणों से बना एक ‘हवाई महल’ हैं लेकिन जहाँ सब एक-दुसरे से न सिर्फ़ दोस्ती कर सकते हैं बल्कि अपने संकोची स्वाभाव या किसी कमी की वजह से यदि खुद को सबके सामने प्रस्तुत करने में हिचक रहे हो तो बिना किसी झिझक सारी दुनिया को अपने हूनर से परिचित करवा अपनी एक पहचान बना सकते हैं ।

इसलिये इस तरह से एक काल्पनिक जगत ने जन्म लिया जिसे कि हमने ‘आभासी दुनिया’ / ‘सोशल मीडिया’ / ‘सोशल साइट्स’ / ‘वर्चुअल वर्ल्ड’ और न जाने क्या-क्या नाम दिया लेकिन इसकी सशक्त उपस्थिति और इसके हमारे जीवन में महत्व को हम इतने हल्के रूप में नहीं दर्शा सकते क्योंकि वो कोई ‘आभास’ नहीं बल्कि एक ‘वास्तविक अनुभव’ हैं जिसने न जाने कितने लोगों को आपस में मिलवाया, न जाने कितने अधूरे ख्वाबों को पूरा करने एक मंच प्रदान किया, न जाने कितने अवसादग्रस्त लोगों को फिर जीना सिखाया और न जाने कितने नये रिश्तों को जनम दिया । ऐसे में इसे महज़ मनोरंजन का साधन / ‘टाइमपास’ करने का जरिया या एक ‘आभासी संसार’ कहना इसकी उपयोगिता और इसके महत्व को कम करके आंकना हैं क्योंकि भले ही ये हमारी सच्ची-मुच्ची की दुनिया की तरह रिश्तों की ऊष्मा, नजदीकी छुवन, सर पर आशीष का हाथ, रोने को कांधा, गर्मा-गर्म खाना या साथ चलने का अहसास नहीं देती लेकिन तन्हां भी तो महसूस नहीं होने देती शायद इसलिये उस तकनीकी युग में ‘तन्हाई’ की परिभाषा भी बदल गयी हैं अब कोई आदमी खुद को तब तन्हा या अकेला महसूस करता हैं जब उसके ‘मोबाइल’ की ‘बेट्री’ खत्म हो जाती हैं या उसका ‘नेटपैक’ बंद हो जाता हैं ।

ये सब विज्ञान की आधुनिक ख़ोज और तकनीक का कमाल हैं जिसने हमें इतनी सारी सौगातों  से नवाजा हैं और जैसा कि हम सब जानते हैं कि विज्ञान यदि वरदान हैं तो अभिशाप भी हैं जो कि हमारी अपनी सोच और हमारे द्वारा इसके उपयोग किये जाने से ही निश्चित होता हैं । इसलिए यहाँ भी सब तरह के लोग और कारनामे नज़र आ रहे हैं यहाँ तक कि इसकी वजह से अपराध जगत को भी अपने हथकंडे अपनाने के लिये किसी जगह जाने की जरूरत नहीं वो भी अपने स्थल से ही इसे अंजाम दे रहा हैं लेकिन थोड़ी-सी सावधानी और सजगता से हम खुद को इनके चंगुल में फंसने से बचा सकते हैं और अपनी निजता की रक्षा भी कर सकते हैं क्योंकि हमारी नादानी और गलतियों का खामियाज़ा ही हमें किसी बुरे रूप में भुगतना पड़ता हैं । शायद, इसलिये अब इसके साथ सुरक्षा के भी कई इंतजाम जुड़ गये हैं जिनकी जानकारी से हम सब अपने आपको किसी अपराधी का शिकार होने से बचा सकते हैं और इसके लिये ‘फेसबुक’ हमें कई सारी सुविधाएँ प्रदान करता हैं ताकि हम अपने आंकड़ों और जरूरी दस्तावेजों को चोरी होने से बचा सके और अपने मौलिक सृजन पर भी अपना अधिकार जता सके इसके लिये भी उसने यहाँ ‘कॉपीराइट’ का प्रावधान किया हैं । ये और बात हैं कि जिन्हें सिर्फ ‘कॉपी’-‘पेस्ट’ करना हैं वो तो हर हाल में ये कर लेते हैं लेकिन हम अपनी रचनाओं पर अपना दावा प्रस्तुत कर सकते हैं जिसके लिये हमारे पास उससे संबंधित पुख्ता जानकारी होना चाहिये खैर ये ही वो सब छोटी-छोटी बातें या खामियां हैं जिनका जिक्र कर लोग इसे कमतर बताने से नहीं चूकते लेकिन यदि आपको अपने आप पर विश्वास हैं तो आपके लिये यहाँ पूरा मैदान हैं ।

आज हम सबके इस प्रिय ‘फेसबुक’ का जन्मदिन हैं और हम सब इसके शुक्रगुज़ार हैं कि इसने हम सबको आपस में जोड़ने के लिये इतना सहज-सरल और कई सुविधाओं से युक्त ऐसा सशक्त ‘प्लेटफार्म’ दिया कि जिस पर खड़े होकर सारा ब्रम्हांड ही एक जगह दिखाई देता हैं और हम सब भी कहीं जाये बिना ही न जाने कितने लोगों से राब्ता बना सकते हैं केवल हमें यहाँ भी अपनी ही रूचि के और अच्छे लोगों को तलाश करना हैं फिर देखिये किस तरह आपका अपना एक ‘व्यक्तिगत कोना’ बनता हैं जिसमें सिर्फ आप और आपके वे चुनिंदा दोस्त होंगे जिनको आप अपने इस दायरे में रखना चाहते हैं और यदि आप इसे अपनी कला को ज़ाहिर करने का पर्दा बनाना चाहते हैं तो खुद बन जाइये अपनी फिल्मों के निर्देशक, नायक / नायिका, लेखक और दिखाइये दुनिया को अपनी बहुमुखी प्रतिभा और यदि कोई कमी हैं तो उसे निखारने ढूंढ लीजिये कोई सच्चा सलाहकार कहने का मतलब कि सब कुछ हैं यहाँ केवल आपके ढूँढने और इसकी वास्तविकता को समझने में कमी हो सकती हैं तो चलो हम सब मिलकर अपने इस अज़ीज को कहे जन्मदिन मुबारक जिसके कारण आज हम सब एक दूसरे से मिल सके... बधाई हो... बधाई हो... आज ही वो शुभ घड़ी आई... जो हम सबको एक साथ लाई... <3 से बधाई... :) :) :) !!!
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०४ फरवरी २०१८
© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
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बुधवार, 3 फ़रवरी 2016

सुर-३९९ : "चिंतन : ‘जिंदगी मेरी तो... फैसला भी मेरा होना चाहिये न...!!!”


दोस्तों...

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‘अपूर्वा’ के सामने आज जो स्थिति आ गयी थी ऐसा सबके साथ नहीं होता ये एक बड़ी ही असामान्य और दुविधापूर्ण घड़ी थी जिसने उसे गहन सोच में डाल दिया था कि आज से दस साल पहले उसकी शादी ‘नरेन’ से हुई थी जो सेना में काम करता था पर, एक दिन अचानक उसके मौत की खबर आई जिसने उसे पूरी तरह तोड़ दिया था क्योंकि शादी को केवल एक महिना ही तो हुआ था ऐसे में दो साल बाद उसके परिवार वालों ने उसका दूसरा ब्याह कर दिया पर, तकदीर ने अजब खेल खेला और आज ‘नरेन’ को फिर उसके सामने लाकर खड़ा कर दिया जहाँ उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो किस तरह इस जटिल समस्या को हल करे इसमें उसकी क्या गलती थी ?

ऐसे में जब ‘नरेन’ ने पंचायत के सामने उस पर अपना दावा प्रस्तुत किया तो हमेशा चुप रहकर सबकी बात मानने वाली ‘अपूर्वा’ ये क्या कह बैठी---

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पुलिस तो
फिर भी अपने मुजरिम की
हथकड़ी थामकर
उसके साथ-साथ चलती हैं ।

एक तुम हो
जिसने हाथों में चूड़ियों
और पैरों में पाजेब की जंजीर
बाँध तो दी पर,
छोड़कर अकेले राह में
चले गये
फिर जब किसी ने
लावारिस सम्पति समझकर
अपना बना लिया तो
चले आये हक जमाने
समझ नहीं आता कि
बेचारी नारी किस जुर्म की
सज़ा काट रही सदियों से
ये रब की अदालत भी
दुनियाबी हिसाब-किताब से चल रही
तारीख पर तारीख दिये जा रही
लेकिन उसके हुकुक और अधिकार
उसे ही देने से घबरा रही ।

ये दुनिया हो
या वो उपरवाले की
नारी तो हर जगह सिर्फ
अप्सरा की तरह मन बहलाव का
एक साधन मात्र हैं क्या नहीं ?
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किसी के पास भी उसके सवालों का जवाब नहीं था कि ऐसी परिस्थति में जबकि उसका तलाक नहीं हुआ तो पहला विवाह अमान्य नहीं माना जा सकता लेकिन दूसरा भी तो रीति-रिवाज के साथ हुआ था तो उसे भी तो नकारा नहीं जा सकता था लेकिन अब समय बदल चुका हैं... ये वो स्त्री नहीं रही जिसे उसकी मर्जी के बिना ही किसी के भी हाथों सौप दिया जाता था तो ऐसे में उसके प्रश्नों के जवाब दिये बिना ही कोई फ़ैसला नहीं दिया जा सकता अतः पंच परमेश्वर को चुप हो जाना पड़ा और ‘अपूर्वा’ तय कर चुकी थी कि उसकी जिंदगी का फैसला कोई और नहीं बल्कि वो खुद लेगी कि जीवन तो उसे ही गुज़ारना इन गद्दी पर बैठे तथाकथित न्याय के रखवालों को नहीं जो कभी धर्म तो कभी समाज के नाम पर उसे छलते रहते इस सोच ने उसका खोया आत्मविश्वास लौटा दिया ।  
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०३ फरवरी २०१८
© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
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मंगलवार, 2 फ़रवरी 2016

सुर-३९८ : "भीष्म पितामह जयंती... हर पाप हरती... !!!"

दोस्तों...

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जिसकी छत्रछाया में
सुरक्षित रहा कौरव वंश
जिसके अस्त्रों-शस्त्रों के भय से
भाग जाते रण से दुश्मन
जिसके स्नेह में
पलकर बड़े हुये राजकुंवर
जिसकी प्रेरक शिक्षा नीतियों से
संवरा हर कुमार का बचपन
जिसकी रणनीति से
डरते थे कुशल राजनेतागण
उस गंगापुत्र ‘भीष्म पितामह’ को
जयंती पर करते नमन ॥
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‘महाभारत’ भले ही पूर्व प्रचलित धारणा के अनुसार लोग घर पर न रखते हो कि इसे रखने मात्र से घर ‘कुरुक्षेत्र’ में बदल जाता और आपसी रिश्तों में ‘महासमर’ छिड़ जाता फिर भी इसकी कथा और उसके सभी किरदारों से हम सब बड़ी अच्छी तरह से वाकिफ़ हैं और अक्सर अपनी बातों में उनका जिक्र भी करते कि हर पात्र की अपनी व्यक्तिगत विशेषतायें, अपनी कुछ ख़ासियत हैं जिसकी वजह से बातों-बातों में उनका उदाहरण दिया जाता फिर चाहे वो सौ कौरव हो या पांच पांडव या ‘भगवान् श्रीकृष्ण’ या कोई अल्पकालीन चरित्र ही क्यों न हो पर, हर किसी की महत्वपूर्ण भूमिका हैं जिसके कारण उसे नजरअंदाज़ कर पाना मुमकिन नहीं । फिर पूरी कथा में एक पात्र तो सबके उपर आसमान की तरह छाया हुआ नजर आता जो हर तरह के शत्रुओं से अपने साये तले रहने वाले संपूर्ण राजवंश की रक्षा करता कि उसने यही अटल प्रतिज्ञा ली कि वे सदैव कौरवों के राजसिंहासन के प्रति अपनी जिमीदारी का निर्वहन करेंगे तो फिर आजीवन अपने इस संकल्प को निभाया जिसकी वजह से वो आठवां ‘वसु’ जिसे कि शाप मिला था तो उसको पूरा करने तो उनको मानव रूप में जनम लेना ही था जिसके लिये पतितपावनी जीवनदायिनी ‘गंगा’ ने भी तो पूरा सहयोग दिया कि उन्होंने सभी ‘वसुओं’ को मुक्त कराया परंतु, सात के बाद जब अंतिम आठवें की बारी आई तो उसका कुछ कर्मफल भोगना शेष रह गया था जिसके कारण ‘गंगा’ उसे मुक्त न करवा सकी और उसे अपनी आयु शेष रहने तक इस धरती पर जीवन गुज़ारना था जिसके कारण ‘शांतनु’ के पुत्र के रूप में ‘राजकुमार देवव्रत’ बनकर वो अपना कर्तव्य निभाने में लग गये और इसी क्रम में उन्हें ये कठोर शपथ भी लेनी लेनी पड़ी कि वो आजीवन विवाह नहीं करेंगे बल्कि जब तक जियेंगे राज-सिंहासन की रक्षा करते रहेंगे जिसने उनको ‘इच्छा मृत्यु’ का वरदान दिलाया इस तरह उनके सत्कर्मों से ‘अभिशाप’ भी ‘वरदान’ बन गया पर, केवल वे ही जानते थे कि इस वर के पीछे उनको कितना कुछ असहनीय भी सहना पड़ा क्योंकि भले ही मौत उनकी आज्ञा के बिना उनके पास नहीं आ सकती थी लेकिन वे अपने तमाम कर्तव्यों को पूरा किये बिना उसे आवाज़ भी तो नहीं दे सकते थे अतः जो कुछ भी सामने आया उसे स्वीकार कर आगे ही आगे बढ़ते गये जब तक कि अंतकाल न आ गया ।

आज उसी भीष्म पितामह की जयंती पर उनका स्मरण कर अपने श्रद्धा सुमन उनके चरणों में अर्पित करते कि वो फिर से इस धरती पर आये आज फिर एक बार इस देश की उनकी जरूरत हैं... वो आर्यावर्त जिसको न मिटने देने की उन्होंने कसम खाई थी वो धीरे-धीरे विनाश की तरफ बढ़ता जा रहा तो ऐसे में सबको राह दिखाने उस पितामह की जरूरत हैं जो एक पालक, एक शिक्षक की तरह सबकी पालना करता... :) :) :) !!!
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०२ फरवरी २०१८
© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
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सोमवार, 1 फ़रवरी 2016

सुर-३९७ : "कल्पना नहीं हकीकत.... 'कल्पना चावला' !!!


दोस्तों...

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‘कल्पना’
नहीं हकीकत थी वो
धरा पर नहीं
आकाश में घुमती थी वो
अपनी अथक मेहनत
और अपने बुलंद इरादों से
जमीं-आसमां एक कर गयी वो
अब बनकर एक नक्षत्र
रहने लगी हमसे बहुत दूर वो
आज भी सातों आसमान के पार से
अपनी जन्मभूमि को निहारती वो
जो जन्मी तो ‘भारत’ में
लेकिन भरकर बड़ी ऊंची उड़ान
पहुंच गयी थी विदेश में वो
आज भी दूर से हर बेटी को
खुद पर गर्व करने का
संदेश दे रही वो
कि कोई आम लडकी नहीं
देश की बेटी ‘कल्पना चावला’ थी वो
आज पुण्य तिथि पर...
उसको श्रद्धांजलि दे रहे हम लोग ॥
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दिनों दिन साक्षरता का प्रतिशत बढ़ता जा रहा उसके बावजूद भी हमारे देश में ‘कन्या भ्रूण’ की हत्या की जा रही जिससे निरंतर लिंगानुपात बढ़ता जा रहा फिर भी पुरातन पंथी सोच रखने वालों की बुद्धि का क्या करें जो आज भी लडकियों को बोझ समझ उनको जन्मने ही नहीं देते तो ऐसे में इस भूमि के उस इलाके में ‘हरियाणा’ में जहाँ पर कि ‘लिंगानुपात’ एक विकट समस्या बन चुका हैं के एक छोटे से कस्बे ‘करनाल’ में ०१ जुलाई, १९६१ को ‘कल्पना चावला’ का जन्म हुआ जिन्होंने अपनी अदम्य इच्छाशक्ति के बल पर इतनी ऊंची छलांग मारी कि सिर्फ अपने गाँव ही नहीं बल्कि देश को भी पार कर लिया और फिर अपनी ख्वाहिशों के पर लगाकर सीधे आसमान तक उड़ान भर ली जिसके कारण वो सुदूर अंतरिक्ष में जाने वाली प्रथम भारतीय महिला होने का गौरव हासिल कर सकी भले ही उन्होंने ‘अमरीका’ की नागरिकता लेकर अपने आपको दूसरे देश में बसा लिया हो मगर, जिसके दिल में अपना देश बसता फिर वो विश्व में कहीं भी रहे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि उसका हर कदम अपने वतन की भलाई के लिये होता और उसकी हर काम्याबी पर देश का बच्चा-बच्चा गर्व करता और जब भी वो दुनिया के किसी भी कोने में जीत हासिल करें तो सीना उसके जन्मदाता देश का चौड़ा होता और बड़ी आन-बान-शान से झंडा भी अपने देश का फ़हराया जाता जो सबके लिये गौरव के यादगार पल लेकर आता ।

उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा भी अपने ही देश में ग्रहण की १९७६ तक उन्होंने अपने गाँव के 'टैगोर स्कूल' से स्नातक कर लिया और फिर १९८२ में ‘चंडीगढ़’ जाकर ‘एरोनॉटिकल इंजीनियरिंग’ की पढ़ाई की परंतु उनका सपना तो एक ‘अंतरिक्ष वैज्ञानिक’ बनना था तो शुरूआती अध्ययन करने के बाद १९८४ में वे ‘एरोस्पेस इंजीनियरिंग’ में ‘एम. ए.’ करने ‘टेक्सास विश्वविद्यालय’ चली गयी फिर तो जैसे उनके सपनों को पंख लग गये और उन्होंने अपने इच्छित विषय में पूर्ण दक्षता हासिल करने के उद्देश्य से १९८८ में ‘कोलोरेडो विश्वविद्यालय’ से ‘डॉक्टर ऑफ़ फ़िलॉसफ़ी’ करने की ठानी जिसने उनको उड़ने का हौंसला प्रदान किया क्योंकि इसी साल ‘कल्पना’ ने अपने ख्वाब को ताबीर देने के लिये ‘नासा’ के ‘एम्स रिसर्च सेंटर’ में काम करना शुरू किया जहाँ १९९४ में उनको वो पथ मिल गया जिस पर चलकर वो धरती से सीधे आकाश में पांव रख सकती थी कि इसी जगह पर उनका चयन बतौर ‘अंतरिक्ष-यात्री’ किया गया ।

अब कल्पना को इंतज़ार था अपनी पहली उड़ान का जो शीघ्र ही उनके सामने आ गयी जब उनको ‘एस. टी. एस.-87 कोलंबिया स्पेस शटल’ में चढने का मौका मिला और इसके माध्यम से उन्होंने १९ नवंबर से ५ दिसंबर, १९९७ तक उस स्थान पर वक्त गुज़ारा जिसे केवल किताबों में पढ़ा था यही नहीं पहली बार नजदीक से उस अहसास को जिया जिसे अब तक स्वपन में ही महसूस किया था तो इस अनुभूति ने उनके अंदर ऊर्जा का ऐसा स्त्रोत खोल दिया जिसके बल पर वे आगे ही आगे बढ़ती चली गयी कि उनको तो उस ऊँचाई तक पहुंचना था जहाँ तक पहले कोई महिला पहुंची न हो जिससे कि लोग बेटी के पैदा होने पर शर्म की जगह गर्व का अनुभव करे तो फिर वे रुकी नहीं उसके बाद जल्द दूसरी उड़ान का अवसर मिल गया और वे १६ जनवरी, २००३ को 'कोलंबिया स्पेस शटल' सके द्वारा अपने मिशन पर रवाना हुई जो कि अगले १६ दिनों तक चलना था जिसमें उन्होंने अपने सहयोगियों सहित लगभग ८० परीक्षण और प्रयोग किये पर,  लौटते समय न जाने क्या हुआ कि ०१ फरवरी २००३, को उनकी ‘शटल’ दुर्घटना ग्रस्त हो गई जिससे ‘कल्पना’ समेत ६ अन्य अंतरिक्ष यात्रियों की असमय दुखद मृत्यु हो गई ।

आज उसी अनहोनी का स्मरण कर हम अपने देश की उस साहसी बिटिया को नमन करते जिन्होंने अनवरत अपने कर्म से छोटे से जीवन में एक बड़ा संदेश दिया कि यदि बेटियों का परिवार उनका साथ दे तो फिर वे जमीन ही नहीं आसमान तक पहुँच सकती तभी तो बेटी बचाने का संदेश देते समय हम ऐसी गौरवशाली कन्याओं का उदहारण देते जिन्होंने अपने जीवन काल में अवसरों का भरपूर लाभ उठाते हुये न सिर्फ अपना लक्ष्य प्राप्त किया बल्कि लडकियों को भी उससे आगे पहुंचने का एक लक्ष्य थमा दिया... तो आज पुण्यतिथि पर उनको देश का सलाम... :) :) :) !!!
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०१ फरवरी २०१८
© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
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