गुरुवार, 11 फ़रवरी 2016

सुर-४०७ : "इंद्रधनुषी प्रेमोत्सव का पांचवा रंग : प्रॉमिस डे...!!!"


ये ‘वादा’
ही तो था जो
किया था ‘भगवान’ ने
अपने भक्तों से कि
जब-जब धर्म की हानि होगी
वो इस धरा पर आयेंगे 
और हर युग में उसे निभाया भी ।
.....
तभी तो...
ये ‘कलयुग’ भी
इतना अन्याय, अत्याचार
और ज़ुल्मों-सितम सहकर भी
खड़ा हुआ हैं एक ही टांग पर और....
कर रहा इंतजार ‘कल्कि अवतार’ का अब भी ।।
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मित्रों...,

पश्चिम देशों से आयातित उत्सवों का अनुकरण करने वाली इस आधुनिक पीढ़ी द्वारा मनाये जा रहे ‘इंद्रधनुषी प्रेमोत्सव’ में आज के रंग को ‘प्रॉमिस डे’ का नाम दिया गया हैं और इसलिये सभी तथाकथित प्रेमी-प्रेमिका जोश में आकर एक-दूसरे से कोई ‘वादा’ करते हैं । जिसके साथ उसे पूरा करने का कोई ‘अनुबंध-पत्र’ नहीं होता क्योंकि जब भी बात दिल की और उससे बने रिश्तों की होती हैं तो उसमें किसी भी तरह का कोई भी ऐसा दस्तावेज नहीं होता जिसमें उस रिश्ते के लिये तय किये गये इकरारों का उल्लेख हो जिससे कि उसे प्रमाणित किया जा सके वो तो बस, आपसी स्नेह और विश्वास पर स्वतः ही बनने वाला एक निःस्वार्थ संबंध होता हैं । तभी तो हमारे यहाँ जन्म से बनने वाले सारे के सारे पारिवारिक संबंध किसी भी ऐसे लिखित नियमों के तहत नहीं बल्कि पारस्परिक तालमेल और सुझ-बूझ से चलते हैं और इसी प्रकार कुछ ऐसे भी रिश्ते होते हैं जो हम ख़ुद बनाते हैं तो उनमें भी किसी तरह का कोई करारनामा नहीं बनवाते सिर्फ़ अपने मन की बात को सुनते-समझते हैं तभी तो यहाँ बनाये गये रिश्ते जन्म-जन्मांतर तक चलते हैं क्योंकि हम मनाते हैं कि हर रिश्ते की बुनियाद प्रेम और एक-दूसरे पर विश्वास होता हैं । अब चूँकि वैश्वीकरण और नेटवर्क के चलते सारी दुनिया सिमटकर एक छोटे-से स्क्रीन पर आ गई हैं तो ‘न्यू जनरेशन’ को अपनी संस्कृति की जगह उनके चकाचौंध करने वाले और उपर से एकदम ‘स्मार्ट’ नज़र आने वाले वो दिखाऊ ‘फैशनेबल कस्टम’ बड़े अच्छे लगते हैं लेकिन वो ये भूल जाता हैं कि हर देश के अपने रीति-रिवाज़ और परम्परायें होती हैं जो उनकी प्रकृति और वातावरण के अनुसार निर्धारित होती हैं और जरुर नहीं कि वो हम पर भी लागू हो लेकिन जब किसी ने नकल करने की ठान ली हो तो फिर अक्ल का प्रयोग वर्जित समझा जाता हैं इसलिये बस, बिना दिमाग का उपयोग किये अपनी सुविधा के अनुसार अपनी ‘लाइफ’ को ‘एन्जॉय’ किया जा रहा हैं ये भूलकर कि इस देश में जीवन को साधना माना जाता हैं ।

आज हर जगह ‘प्रेमोत्सव’ के इस ‘प्रोमिस डे’ को मनाया जा रहा सब एक-दूसरे को इस दिन की बधाई दे रहे पर कोई किसी को ये नहीं बता रहा कि वो कौन-सा ‘प्रोमिस’ कर रहा हैं चूँकि ऐसा कोई दिन होता हैं और उसे मनाना हैं तो उसकी शुभकामना देना भी तो जरूरी हैं तो दिए जा रहे हैं अब सब कुछ महज़ एक दिन का दिखावा बनता जा रहा हैं । दूसरे देशों में ऐसा इसलिये किया जाता कि उनके पास समय नहीं इसलिये वो दिन विशेष के नाम पर कुछ समय निकालकर एक-दूसरे से बात करते हैं कोई आयोजन करते हैं इस तरह ये एक बहाना बन जाता हैं अपनी दिनचर्या और आपसी रिश्तों में आई एकरसता को भंग कर उसमें नवीनता लाने का पर, सिर्फ़ इसलिये उसे मनाना कि खुद को भेड़चाल का हिस्सा बताना हैं तो फिर किसी तरह के विचार की आवश्यकता नहीं । लेकिन यदि इसके साथ इसमें थोड़ी-सा हिन्दुस्तानी रंग भी मिला जाये तो फिर ये सबको अपना सा लगेगा बिल्कुल उसी तरह जैसे कि चायनीज़ नूडल्स, पिज़्ज़ा, बर्गर, पास्ता आदि में ‘इंडियन तड़का’ देकर उसे अपने स्टाइल में खाते हैं यदि वैसा कुछ इन दिनों में भी किया जाये तो ये सब धीरे-धीरे स्थायी होते जायेंगे वरना क्षणिक आवेश में सबको देखकर इसे मनाते रहने से ये केवल एक दिन का पर्व रह जायेगा और इसमें किये गये वादे-कस्में भी सब रात के साथ अंधकार में विलीन होकर गायब हो जायेंगे । यदि लोग इस तरह के किसी दिन को मना रहे हैं तो उसकी ठोस आधारशिला भी होना चाहिये जिसके बिना ये सब लंबे समय तक नहीं टिक पायेंगे और हमारे बुद्धू हारकर फिर घर लौट आयेंगे ये उम्मीद नहीं विश्वास हैं क्योंकि जड़ें हमारे संस्कारों की गहरी हैं इसलिये जिन्हें लगता हैं कि हमारे बच्चे भारतीय संस्कृति भूल रहे वो इत्मीनान रखे कि इस देश की अपनी गरिमा अपनी पहचान और गौरवशाली इतिहास रहा रहा हैं जहाँ न जाने कितने विदेशी आये गये पर उसने अपनी आत्मा को अक्षुण रखा हैं और ऐसे आयातित पर्व भी बस, चंद दिन के मेहमां रहेंगे फिर जहाज़ का पंछी वापस उसी पर आकर बैठेगा तो जब तक उड़ रहा हैं उसे भी उड़ान का आनंद लेने दिया जाये बस, बड़ों को तो नज़र रखनी हैं कि ये छोटे कहीं इस भीड़-भाड़ में खो न जाये इसलिये हम इस श्रृंखला के माध्यम से ये भी जताना चाहते हैं कि जो हर साल इस दिन के आगमन पर हो-हल्ला मचता हैं वो इसे बढ़ावा भी ही दे रहा हैं जबकि इस पर ख़ामोशी से नज़र रखकर और सार्थक तरीके से उन्हें इसकी निस्सारता का बोध कराने से वो संदेश को समझेंगे । 

हम भी यदि इस दिन को मनाकर एक-दुसरे से कोई वचन दे और फिर साल भर उसे निभाकर अगले साल कोई नया वादा करें तो कोई बुराई तो नहीं लेकिन आज करें और कल भूल जाए तो फिर इनका कोई औचित्य नहीं... वादे तो हर रिश्ते में होते हैं कुछ लिखित-अलिखित तो कुछ मौखिक या अबोले से जो दो अनजान लोगों को एक-दूसरे से आजीवन बांधे रखते हैं और जिनके टूटते ही वो नाज़ुक-सा बंधन भी टूट जाता हैं... इसलिये सिर्फ़ प्रेम के अदृश्य धागों से दो लोग  बंधे रहे तो बिना किसी वादे के भी वो ताउम्र जुड़े रहते हैं जहाँ सिर्फ हाथों में हाथ लेकर आँखों में आखें डालकर देखने भर से जन्मों पुरानी धुंधली कहानियां भी स्मृति के पटल पर उभर आती हैं न जाने किस जन्म का किया वादा कोई कब और किस तरह किसी और जन्म में  पूरा करता हैं ये होती हैं उस वादे की शिद्दत जो करते ही पूर्णता का मार्ग भी ढूंढ लेता हैं वरना यहाँ इतनी अमर प्रेम-कथायें न होती... तो फिर ‘प्रॉमिस’ करें नहीं निभाये भी... और धीरज धरकर करें इंतजार भी... रखें अपने रिश्ते पर विश्वास भी... फिर देखें कैसे आता हैं निखार भी... :) :) :) !!!
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११ फरवरी २०१८
© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’

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बुधवार, 10 फ़रवरी 2016

सुर-४०६ : "इंद्रधनुषी प्रेमोत्सव का चौथा रंग : टेडी डे...!!!"

दोस्तों...

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जब दुनिया में
सब अपने आप में गुम हो
सुनने दिल का दर्द
करीब कोई हमजुबां न हो
इंसान को अपने से
चंद लम्हें की फुर्सत न हो
और...
ऐसे समय में 
नर्म-मुलायम खिलौनों से
अपना दिल बहलाने के सिवाय
पास में कोई चारा न हो
तो वो मूक बेजान साथी भी
बड़ा अपना सा लगता
जिसके साथ कोई पर्दा न होता
बेहिचक दिल का दर्द खुलता
दिन-रात का हर पल
जिसके नजदीक गुज़रता हो
जिसका साथ जेहन को सुकूं देता हो
उसे एक दिन शुक्रिया कहना तो बनता हैं न
तो आज ‘टेडी डे’ पर उसी प्रिय को
सीने से लगाकर ये कहना न भूलना कि
वो आपके लिये कितना मायने रखता
फिर यदि वो ‘टेडी’ न होकर कोई अपना हो तो
याद रखना उसे भी उतना ही प्यार देना
इस तरह से बांटकर चाहत ये दिन मनाना ॥
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‘प्रेमोत्सव’ के इस इंद्रधनुषी सात दिवसीय आयोजन के बीच में ‘टेडी डे’ का आ जाना कुछ असंगत और अटपटा-सा लगता कि जहाँ इस पर्व को प्रेमी-प्रेमिका या चाहने वालों का त्यौहार माना जाता वहां भला किसी खिलौने का क्या काम वो भी जबकि खिलौनों के अनेक विकल्प उपलब्ध हो उनमें से सिर्फ़ ‘टेडी’ का चुनाव कर एक पूरा का पूरा दिन उसके नाम करना कुछ अजीब महसूस कराता लेकिन जब उस नर्म-मुलायम गोलू-मोलू से प्यारे-प्यारे ‘टेडी’ को हाथ में लेकर ये सोचो तो जवाब खुद ब खुद मिल जाते कि क्यों उसे इतना महत्व दिया जाता या कोई समझदार इंसान क्यों अपने हमउम्र को इसे तोहफे के रूप में देता कि भले ही कहने को वो एक खिलौना हैं मगर, छोटे-बड़े हर किसी को प्यारा लगता क्योंकि उसका कोमल अहसास कठोर से कठोर हृदय को भी अपनी ही तरह नरम-मुलायम बनाने की क्षमता तो रखता साथ ही साथ उसकी मौजूदगी से अकेलेपन का अहसास भी कम हो जाता और अनायास ही अपने मन की बात उससे साँझा करने को जी चाहता चाहे वो सुने या न सुने, चाहे वो जवाब दे या न दे या फिर हमारी तरह ही हमको प्यार न दे सके लेकिन फिर भी उसकी ख़ामोशी या असहायता से तकलीफ़ न होती बल्कि मन का गुबार निकाल हल्कापन ही महसूस होता और कहीं बात कहते-कहते अपनी गलती का अहसास भी हो जाता याने कि इस तरह से ‘टेडी’ हमारे उन एकाकी जज्बातों का अकेला मूक गवाह होता जिससे हम बेधडक कुछ भी कहते पर, वो उसे किसी को भी न बताता हाँ, ये और बात कि आप उसे कुछ लिखकर दो या उसके साथ कोई संदेश चिपका कर भेज दो तो फिर वो आपके संदेशों को इधर से उधर प्रसारित करने वाला डाकिया भी बन जाता तो शायद, यही वो वजह जो प्रेम दिवस में इसे भी एक दिन दिया गया ताकि जो लोग अपने दिल की बात जुबां से कहने में शर्माते हो तो वो अपने इस दोस्त के हाथों अपने प्रेम का पैगाम अपने साथी तक पहुँच सकते हैं तो देखा ये कितने काम का होता हैं ।

एक ‘टेडी’ के रूप में आपको सिर्फ अपने मन बहलाव का साधन नहीं बल्कि एक ऐसा सच्चा दोस्त भी मिलता जिसे आप जब चाहे जिस तरह से इस्तेमाल कर सकते कि वो मात्र एक नन्हा-मुन्ना खिलौना नहीं बल्कि एक रूप में अनेक भूमिकायें निभाने वाला बहुआयामी किरदार और कई तरह के काम में आने वाला बहुउपयोगी सामान भी होता जिसे आप जब चाहे जिस रूप में अपने काम में ले सकते और लेते भी तभी तो वो एक साथ खिलौना, दोस्त, संदेश वाहक, हमदर्द, तकिया और मूक राज़दार बनता जिसके होने से हमारा गम, कम भले ही न हो मगर, कुछ हल्का तो हो ही जाता, जिसे सीने से लगाने से किसी के भी न होने की तकलीफ का पता न चलता और जब बोझिल हो पलकें तो उस पर सर रखकर सोने से दिमाग में शोर मचाता हुआ तनाव भी छूमंतर हो जाता तो इतने काम की चीज़ को कोई किस तरह से नजरअंदाज़ कर सकता उसे तो दिल से लगाकर ही रखेगा कि उसने हर पल साथ दिया, न कभी रूठा न नाराज़ हुआ और न ही कभी छोड़कर गया भले ही हमने कभी गुस्से में उसे अपने से दूर ही क्यों न फेंक दिया हो लेकिन जब फिर से धूल पौंछकर उठाया तो उसने नखरे न तो दिखाये, न ही छोड़कर जाने की धमकी दी और न ही मुंह फुलाकर रूठ कर बैठ गया तो इतने प्यारे दोस्त ने क्यों न कहे ‘तुमसे अच्छा कौन हैं...’ सबको ‘टेडी डे’ की शुभकानायें... :) :) :) !!!                    
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१० फरवरी २०१८
© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
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मंगलवार, 9 फ़रवरी 2016

सुर-४०५ : "इंद्रधनुषी प्रेमोत्सव का तीसरा रंग : चॉकलेट डे'...!!!"

दोस्तों...

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‘चॉकलेट’ सा
मधुर हो जाये
जीवन का हर पल
घुल जाये रगों में
वो पिघली हुई मिठास
निकले जुबान से
शक्कर जैसी मीठी बौछार
बरसे नयनों से भी  
मीठे झरने की फुहार
भिंगो दो सबको
‘चॉकलेटी’ अहसास से
मनाओ ‘चॉकलेट डे’ इस तरह से ॥
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जो भी ये ‘वेलेंटाइन वीक’ मनाते उन्होंने अपने प्रिय को अब तक गुलाब का फूल देकर अपने मनोभावों का इज़हार तो कर ही दिया होगा तो जब हो ही गयी रिश्तों की नई शुभ शुरुआत तो इन पलों को खासम ख़ास बनाने कुछ मीठा होना तो बनता ही हैं न... क्योंकि हमारे यहाँ तो परंपरा हैं किसी भी शुभ काज का आगाज़ हम मीठा खिलाकर ही करते हैं तो फिर ‘इंद्रधनुषी प्रेमोत्सव’ किस तरह से इस मिठास से अछूता रह सकता था तो बस, तीसरे रंग में घोल दिया मीठा स्वाद ताकि रिश्तों में भी बनी रहे मधुरता का मधुरतम अहसास और उसे नाम दे दिया ‘चॉकलेट डे’ कि भले ही हमारे यहाँ मीठे के नाम पर एक लंबी फेहरिस्त हो मगर, जहाँ का ये पर्व हैं वहां तो सिवाय इसके कोई और मिष्ठान्न होता नहीं शायद, तो फिर इस दिन का नाम कुछ और किस तरह से होता तो उन्होंने अपने यहाँ उपलब्ध ‘स्वीट डिश’ के आधार पर ही या निर्धारण किया लेकिन हमारे यहाँ तो मीठे के कई मायने होते हैं ये नहीं कि किसी ने कहा ‘कुछ मीठा हो जाये’ तो उसे पेश कर दी ‘चॉकलेट’ तभी तो जब हम किसी भी आयातित संस्कृति या त्यौहार या खान-पान को अपनाते तो उसमें अपना देशी तड़का लगाना नहीं भूलते जिससे कि उसमें भी अपनेपन की खुशबू आये तो फिर इस दिन को केवल ‘चॉकलेट’ के साथ मनाना तो ज्यादती होगी कि यहाँ तो मीठे के अनेक विकल्प मौज़ूद जिसे जो पसंद हो उसे वही खिला दो कि मन की मिठाई खाकर उसके मन में भी लड्डू फूटने लगे वो ‘दो रूपये में दो लड्डू’ वाले नहीं बल्कि हमारे यहाँ के ‘मोतीचूर’ के या फिर कोई भी क्योंकि हमने तो लड्डुओं तक की अनेक किस्में बनाई हुई हैं याने कि कहने को तो हमारे यहाँ कोई एक मिठाई का नाम लेते लेकिन उसके भी विविध स्वाद हमने तैयार कर लिये हैं मतलब केवल लड्डू-पेड़ा या मात्र बर्फी कहना ही पर्याप्त नहीं होगा उसका कौन-सा प्रकार चाहिये ये भी बताना होगा तभी तो आपको आपके पसंद का मीठा मिल पायेगा नहीं तो फिर ‘चॉकलेट’ के साथ ही मुंह मीठा करो क्योंकि आज के इस बाजारवाद के युग में तो ‘कुछ मीठा हो जाये’ का मतलब सिर्फ़ एक निश्चित ब्रांड ही हैं ।

रिश्तों में मधुरता का अहसास शामिल करने भले ही हम किसी भी मिठाई का इस्तेमाल क्यों न करे वो बेमानी ही होगा यदि हमारे भीतर वो रूहानी भाव नहीं भरा हो जो हमारी जुबान या आँखों से शहद की तरह नहीं टपकता हो तो फिर बाज़ार कितनी भी कीमती ‘चॉकलेट’ खरीद उपहार में दे स्वाद फीका ही लगेगा लेकिन यदि रगों में घुली हो चीनी समान मधुरता तो फिर कुछ न भी देने पर केवल प्यार के दो शब्द बोल देने पर पर ही सामने वाले को वो स्वाद मिल जायेगा क्योंकि जो भी हम आज के दिन दे चाहे कितना भी शानदार या महंगा तोहफ़ा ही क्यों न हो वो क्षणिक ख़ुशी ही देगा लेकिन जो हम अपने व्यवहार से जतायेंगे वो स्थायी होगा जिसका असर आने वाले हर दिन को उसी मिठास से भर देगा इसलिये तो बचपन से हम सबको मीठा बोलने व सबके साथ मिठास भरा बर्ताव करने की सलाह दी जाती जो कहीं बिकता नहीं न ही कोई खरीद सकता ये तो हमारे अंदर ही होता हम ही उसे निर्मित करते पर, आज के भाग-दौड़ के माहौल में हम प्रकृति के साथ-साथ मानवीय प्रकृति से भी दूर हो गये तो कृत्रिम चीजों से खुद को धोखा देते और ताज्जुब की बात कि खुद हमको ये अहसास नहीं कि हम खुद को छल रहे साथ अपनों को भी कि ये छद्म व्यवहार हमारी आदत में घुल-मिल गया जिसे बदलना नामुमकिन तो नहीं पर, बदले तो तब न जब हमें इस बात का अहसास हो हम तो बस, मशीनी रोबोट की तरह तकनीक के साथ कदमताल कर रहे जिसने हमारे अंतर की कोमल भावनाओं को जैसे पाषाण बना दिया जिस पर अब संवेदनाओं का कोई भी असर नहीं होता तो इस तरह के दिनों के पीछे की वैज्ञानिक जाँच-पड़ताल करे जिससे इनकी वास्तविकता का पता चलेगा जिसे जानना हमारे जीवन के लिये जरूरी हैं कि रिश्ते केवल जन्म से या बनाने से भले ही हमारे जीवन में आ जाते हो लेकिन जब तक उनसे रूहानी तालमेल न हो वो केवल दिखावे का बंधन ही प्रतीत होंगे जिनमें जीवंतता तो अहसास ही भरेंगे अक्सर, जिसे हम नजरअंदाज़ कर देते हैं ।

आज ‘चॉकलेट डे’ पर हमें यही समझना हैं कि ये ‘चॉकलेट’ केवल मिठास का प्रतीक हैं जिसे हमें अपने जीवन में हर एक आदत में अपनाना हैं फिर हर शय में मिठास अपने आप ही घुल जायेगी जिसके लिये फिर किसी दुकान में जाकर ‘चॉकलेट’ खरीदने की जरूरत नहीं होगी क्योंकि तब वो मिठास तो हमारी हर बात में झलकेगी फिर ‘चॉकलेट डे’ मनाने किसी विशेष दिन की दरकार न होगी क्योंकि हर दिन ही ‘चॉकलेट डे’ होगा... तो भर दो हर जज्बात में चॉकलेटी मीठापन जो न हो फिर किसी भी कड़वाहट से कम... ऐसे मनाओ रोज ‘चॉकलेट डे’ सबके संग... :) :) :) !!!    
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०९ फरवरी २०१८
© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
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सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

सुर-४०४ : "इंद्रधनुषी प्रेमोत्सव का दूसरा रंग : 'प्रपोज डे' !!!


दोस्तों...

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क्यों जरूरी इज़हार ???

कभी-कभी मन में
ये इक सवाल उठता
कि जिसे भी हम चाहते
उसे ये बताना जरूरी क्यों ?

उसे तो पता होता न...

मगर,
ये तो महज़ सोच
कभी हमारी ख़ुशफ़हमी
तो कभी गलतफ़हमी
जो हम ये मान लेते कि
अगले को तो हमारी चाहत का
अहसास हैं ही सही तो
फिर उसे कहकर क्यों जताना ??  

कितने निश्चिंत रहते न हम...

जो हमारे साथ रहते
जो हमारे अपने हैं
उनसे भी भला कोई ये कहता
कि ‘तुमसे प्यार हैं’
जबकि हमारे प्यार पर
पहला हक तो उनका ही हैं न
फिर क्यों नहीं हम उनसे ये कहते ???

हम खुद ही उनके शब्द गढ़ लेते...

यदि कह सके
उन सभी अपनों से हम ये
चंद जादुई शब्द तो
सिर्फ कुछ पल की ख़ुशी नहीं
उन्हें जीवन भर के लिये
जीने की प्यारी वजह  
और अनंत ऊर्जा दे सकते

तो अब...
समझ में आया क्या ?
कि दिलों में आये न कभी दूरी
न बने संबंध मजबूरी
इसलिये भले कभी-कभी ही सही   
मगर, प्रेम का इज़हार भी जरूरी हैं ।   
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इंद्रधनुषी सात रंगों से सजे इस सात दिवसीय आयोजन में आज दूसरे रंग जिसे कि ‘प्रपोज डे’ कहते की बारी हैं जिसका तात्पर्य कि साल के ३६५ दिनों में भले रोज-रोज हमारे पास अपने अपनों से ये कहने का वक्त न मिले कि हम उनको कितना चाहते हैं या हमारे दिल में उनके प्रति किस तरह की भावनायें हैं मगर, आज एक दिन तो हम खुले दिल से ये कह सकते कि उनका होना हमारी जिंदगी के लिये कितनी अहमियत रखता और उनकी मौजूदगी का अहसास हमें किस उत्साह-उमंग से भरता कि हम हमेशा उनके लिये कुछ न कुछ ऐसा करते रहना चाहते जो उनके होंठों पर मुस्कान ला सके, कोई भी वो चीज़ जिसके कारण वे ख़ुशी पा सके हर हाल में हम उसे उनके दामन में डाल देना चाहते मतलब, कि हम जो कुछ भी करते या सोचते उसमें वो शामिल होते पर, इतना सब कुछ करते हुये भी हम एक भूल कर जाते जो ये सोचते कि हम उनके लिये ही तो इतना सब-कुछ कर रहे तो फिर अलग से उनको ये कहने की क्या जरूरत कि हम उनके लिये किस तरह की भावनायें रखते या हमारे मन में उनके लिये कितना प्यार भरा वो तो आँखों से ही झलक जाता वो तो सब जानते या समझते तो फिर उसे क्या जताना ???  

सच, हमारा ये मान लेना या हमारे प्रति उनके शब्दों को स्वयं ही सोच लेना जरूरी नहीं कि एकदम वैसा ही हो जैसा कि उनके मन में हो, ये अहसास जुदा भी हो सकता तो बिना कहे-सुने हम किस तरह खुद ही ये तय कर लेते कि हम उसे या वो हमें चाहता ही हैं या जैसा हमारे अंतर्मन में चल रहा हूबहू वही उनके भीतर भी चल रह होगा इसलिये ही शायद, इस तरह के दिनों का चलन शुरू किया गया कि साल-भर की व्यस्तता में यदि हमें एक पल भी ये कहने का वक्त न मिला हो तो आज के दिन तो कम से कम ये बात कह ही सकते हैं कि हम उससे प्यार करते... हमने जो ये भी मान लिया कि ‘प्रपोज डे’ तो केवल प्रेमी-प्रेमिका के इज़हार-ए-मुहब्बत का दिन हैं ये भी हमारी भूल हैं क्योंकि सिर्फ माशूक-माशूका के मध्य ही नहीं ‘प्यार’ का अहसास तो हर रिश्ते में होता सच, कहे तो बिना प्यार के तो कोई रिश्ता बनता ही नहीं यदि हम ये एक बार मान भी ले कि कोई रिश्ता इस तरह से बन भी जाये तो वो लंबा चलता नहीं कि ‘प्रेम’ तो दो दिलों को जोड़ने वाला सेतु ही नहीं बल्कि वो रसायन हैं जो हर रिश्ते-नाते को न सिर्फ़ जोड़ता बल्कि हमेशा एक सूत्र में बांधकर रखता हैं ।

वैसे तो हम न जाने क्या-क्या कहते रहते यहाँ तक कि लगातार बोलते-बोलते कभी थकते नहीं लेकिन जब बात आती अपनों से ये कहने कि हम उनको चाहते तो न जाने क्यों उस समय ही या तो कभी सारे शब्द कहीं खो जाते या कभी जुबान में ही कांटे उग आते याने कि जब बोलना हो मन की बात तो चुप लग जाते जो स्वतः ही ये दर्शाता कि हमारे लिये अपने प्यार को जताना बड़ा कठिन कार्य मालूम होता भले कोई पहाड़ उठाने कह दे या हमसे कुछ भी करा ले लेकिन इस मुश्किल में न डाले हम तो अपनी आँखों से, अपने काम से या उपहार देकर ये समझते कि हमने ये काम कर दिया जबकि महंगी से महंगी सौगात के आगे प्यार के दो बोल से कीमती कुछ भी नही शायद, इसलिये ये आसानी से निकलते नहीं तो ऐसे में इसका एकमात्र उपाय यही नजर आता कि हम फिर से बच्चे बन जाये जो बड़ी मासूमियत से गले में बांहे डालकर गालों में प्यार की मुहर लगा तोतली बोली में हमसे अपने प्यार का इज़हार कर देते तो इस ‘प्रपोज डे’ में बन जाये एकदम बच्चे और अपने सभी रिश्तों में डाले अहसास सच्चे... तभी ये सार्थक होगा... :) :) :) !!!
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०८ फरवरी २०१८
© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
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रविवार, 7 फ़रवरी 2016

सुर-४०३ : "इंद्रधनुषी प्रेमोत्सव का पहला रंग : ऱोज डे...!!!"


दोस्तों...

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गुलों में गुल
बना ‘गुलाब’ सुर्ख
रंगों में रंग
जब हो ‘लाल’ संग
रिश्तों में रिश्ता
साथी जैसे ‘फ़रिश्ता’
अहसासों में अहसास
‘प्यार’ जो चलाये सांस
हो जाये अगर,
इन सबका एक साथ मेल
तो न हो कोई फिर जीवन में फेल ।
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भारतीय संस्कृति में ‘सात’ अंक का बड़ा ही गहरा महत्व हैं जिसमें एक गहन दर्शन भी छिपा हुआ हैं चाहे फिर वो सात ‘सुर’ हो या सात ‘जनम’ या सात ‘फेरे’ या सात ‘आसमान’ या सात ‘दिन’ या सात ‘समंदर’ या इंद्रधनुष के सुनहरे सात ‘रंग’ इनकी ये संख्या महज़ इत्तेफ़ाक नहीं न ही सिर्फ़ कोई भी संख्या निश्चित करनी थी तो ‘सात’ ही ले लिया यदि ऐसा होता तो फिर कोई भी इनको बदल देता और इनके प्रति यूँ आकर्षित न होता पर, हमारे यहाँ तो हर चीज़ के पीछे कोई न कोई महत्वपूर्ण व ठोस वजह होती जिसके कारण उसे चुना जाता तो इन सबकी एक समान संख्या भी विशेष कारण या वजह की तरफ इशारा करती जिसे नजरअंदाज़ कर पाना मुमकिन नहीं तो शायद, आज के समय के आयातित एवं विवदास्पद ‘प्रेमोत्सव’ को सप्त दिवस आयोजन के अंतर्गत अलग-अलग दिन के रूप में मनाकर अंतिम दिन जो कि आँठवा होता के साथ समाप्त करना भी किसी विशेष मायने की तरफ इशारा करता जिसे हम समझ नहीं पाते कि ये हमारे यहाँ का पर्व नहीं न ही हमारे यहाँ इस तरह के दिवस मनाने का प्रचलन हैं लेकिन जिस तरह से वैश्वीकरण के आधुनिक युग ने सम्पूर्ण भूमंडल को एक सूत्र में बाँध दिया तो फिर उनकी संस्कृतियों के मध्य भी तो इस तरह का आदान-प्रदान होगा ही तभी तो आज हम दूसरे देशों में मनाये जाने वाले पर्वों को भी अपनी ही संस्कृति का हिस्सा मान यूँ मनाने लगे जैसे वो हमारी विभिन्न तरह-तरह की परंपराओं को जोड़ने की एक कड़ी हो ।

जिस तरह से हमारे यहाँ कि बहुत सारी चीजें वो न सिर्फ इस्तेमाल करते जा रहे हैं बल्कि उनका गुणगान भी कर रहे तो फिर हम किस तरह से अछूते रह जाये कि केवल उपरी परिधान या भाषा या खान-पान ही नहीं हमने तो अब तीज-त्योहारों को भी अपना ही मान लिया और जब भी कोई तारीख आती तो हम दूर-दराज के मुल्कों में मनाये जाने वाले दिनों का भी जायजा लेते और फिर उसे मनाकर अपनी ख़ुशी ज़ाहिर करते कि हमने कभी भेद-भाव को तरजीह दी नहीं लेकिन अपने हिसाब से उन दिनों का स्वरुप बदल जरुर लिया तभी तो ‘फरवरी’ का महीना आते ही सबकी नजरें उन आठ दिनों पर गड़ जातो जिसमें सभी लोग अलग-अलग दिनों में अलग-अलग पर्व मनाते मगर, इसकी गंभीरता नहीं समझते बल्कि अपने स्वभाव के अनुसार उनको अपने स्वार्थ के हिसाब से परिवर्तित कर लिया इसलिये तो इस ‘प्रेमोत्सव’ को विरोध का सामना करना पड़ता जबकि इसमें यूँ तो कोई बुराई नहीं लेकिन जिस तरह से युवाओं ने इन दिनों को अपनी सस्ती भावनाओं के प्रदर्शन का जरिया बनाया और अपनी अनैतिक इच्छाओं की पूर्ति का सहज-सरल मार्ग समझा उसके कारण तथाकथित बुद्धिजीवी और समाज के ठेकेदार इसे नापसंद करते क्योंकि वे जानते कि इसकी आड़ में केवल अपनी वासनाओं की पूर्ति की जायेगी लेकिन यदि इसे मनाने वाले केवल औपचारिकता का निर्वहन करने की जगह इसकी गंभीरता को समझे इनमें छिपे दर्शन को पहचाने तो फिर किसी को भी इसमें कोई आपत्ति न होगी क्यंकि जिस तरह हमारे यहाँ विदेशियों के भोजन पिज़्ज़ा, बर्गर, हॉट डॉग, नूडल्स आदि को देशी तड़का लगाकर अपना लिया उसी तरह से इन दिनों में भी अपनी भारतीयता का रंग घोलकर इन्हें भी देशी त्योहारों में बदला जा सकता वैसे भी खुश होने की वजह तलाशने वालों को तो ये दिन ख़ुशी ही देते और जिनको मन-मुटाव रास आता उनके लिये ये झगड़े के कारण बन जाते ।

आज ‘इंद्रधनुषी प्रेमोत्सव’ का पहला रंग ‘रोज डे’ मनाया गया... लोगों ने एक-दुसरे को अलग-अलग रंग के गुलाब देकर अपनी मनोभावनाओं का इज़हार किया जिसने उदास चेहरों पर मुस्कान की छटा बिखेर उन्हें ख़ुशी से भर दिया तो ऐसे में ये दिन बुरा किस तरह हो सकता जो किसी भी व्यक्ति के भीतर एक गुलाब के फूल के बदले में नई आशा-उमग का संचार कर उसे उत्साहित कर देता तो सभी को सकारात्मक तरीके से ख़ुशी का सन्देश देने वाले इस ‘रोज डे’ की शुभकामनायें... :) :) :) !!!
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०७ फरवरी २०१८
© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
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शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

सुर-४०२ : "राष्ट्र के कवि प्रदीप... जिसने जलाया स्वतंत्रता का दीप...!!!"

दोस्तों...

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सरल मन
सहज जीवन
संवेदनाओ से भरा
हृदय का चमन
जेहन में बसा रहता सदा
सबसे प्यारा वतन         
यही कामना कि सदा रहे
देश में चैन ओ अमन
ऐसे देशभक्त समर्पित
‘कवि प्रदीप’ को
करते हम मन से नमन ॥
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६ फ़रवरी, १९१५ को ‘मध्य प्रदेश’ में महाकाल की नगरी ‘उज्जैन’ में एक ब्राह्मण परिवार के यहाँ माँ सरस्वती के मानस पुत्र 'रामचंद्र नारायणजी द्विवेदी' का जनम हुआ जिसे हम सभी लोग ‘कवि प्रदीप’ के नाम से बेहतर तरीके से जानते हैं क्योंकि ‘कविता’ तो मानो उनके रोम-रोम में बसती थी तो ‘शब्द’ उनकी रगों में दौड़ते-फिरते थे और ‘विचार’ जेहन के गलियारों में चहलकदमी करते रहते थे और जब तपस्या में लीन साधक की तरह अपनी जन्मभूमि व मातृभूमि के प्रति आगाध निष्ठा से भरी ‘कलम’ कागज़ पर चलती तो फिर देशप्रेम से भरा ऐसा ओजपूर्ण सृजन होता कि सुनने वाले के भीतर अपार देशभक्ति संचार होता और मस्तक स्वतः ही गर्व से ऊंचा हो जाता तभी तो आज तलक भी उनका लिखा हर गीत जिसमें मिटटी की सौंधी महक, अपनेपन का सलोना अहसास, वतन का असीम प्रेम भरा हैं ‘राष्ट्रगीत’ की तरह बजाया और सुना जाता जो सुनने वाले को अपनी जन्मभूमि के प्रति कर्तव्य की भावना से भर उसके मन में उसके लिये कुछ करने का भाव पैदा कर देता इतना जीवंत लेखन हो जब किसी कवि का तो उसे महज़ साहित्यकार या लेखक कहकर उसका संपूर्ण आकलन नहीं किया जा सकता कि उनके लिखे  गीतों ने उस दौर में जबकि देश अंग्रेज सरकार का गुलाम था स्वतंत्रता आंदोलन में जन-जन के अंतर में क्रांति की मशाल जलाने तीली का काम किया कि उनके शब्दों में तेज आग थी जो हर किसी को सकारात्मक ऊर्जा से भर वतन के वास्ते अपनी जान तक निसार करने प्रेरित करती थी यही वजह कि जब उन्होंने १९४३ में ‘किस्मत’ फिल्म के लिये ये गीत लिखा---

“आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है,
दूर हटो ए दुनियां वालों हिंदुस्तान हमारा है...”

तो वीर रस से भरे इस देश राग़ ने हर एक क्रांतिकारी को आज़ादी की लड़ाई में भाग लेने का जोश दिलाया जिसमें अप्रत्यक्ष रूप से फिरंगियों को ही निशाना बनाया गया था जिसके लिये सरकार की तरफ से उनके खिलाफ गिरफ्तारी का वारंट भी जारी किया जो ये बताता कि जहाँ एक तरफ कुछ देशभक्त तन-मन से राष्ट्र की सेवा कर रहे थे तो वहीं दूसरी तरफ कलमकार अपनी कलम की ताकत से वहीँ काम कर रहे थे जिससे आंदोलनकारियों के हताश मन को अपनी खोयी हुई शक्ति प्राप्त होती और इस इस गीत की लोकप्रियता तो उस वक्त चरम पर थी कि सिनेमा घरों में दर्शक खड़े होकर बार-बार सिनेमा मालिकों से इसे दोहराने की मांग करते जिसकी वजह से इसे फिल्म खत्म करने के बाद भी दिखाया जाने लगा और यही वो फिल्म हैं जिसने ‘कोलकाता’ की एक टाकिज में लगातार चार साल तक चलने का कीर्तिमान स्थापित किया इसी तरह इसके पूर्व १९४० में वे ‘बंधन’ फिल्म के लिये लिखे अपने गीत ‘चल चल रे नौजवान...’ से इस तरह का प्रभाव पैदा कर चुके थे जिसने न जाने कितने देशभक्तों के अंदर आगे बढ़ने हेतु साहस का संचार किया यहाँ तक कि स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री ‘श्री जवाहर लाल नेहरुजी’ ने भी बताया कि उनकी बेटी ‘इंदु’ जो बाद में देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनी भी अपने बाल्यकाल में एक ‘वानर सेना’ बनाई जिसमें वे अपने साथियों के साथ यही गीत गाती थी और उस समय तो ये लगभग ‘राष्ट्रगीत’ की तरह गली-गली गूंजता था ।

जब-जब भी देश में प्रतिकूल परिस्थिति उत्पन्न हुई ‘कवि प्रदीप’ की कलम ने उतने ही अनुकूल गीतों की रचना की कुछ ऐसा ही माहौल था साठ के दशके में जब ‘चीन’ द्वारा किये गये आक्रमण में मिली पराजय से देश में निराशाजनक वातावरण था तो ऐसे कठिन वक्त में फिर उनकी कलम ने जादू रचा और 'ऐ मेरे वतन के लोगों, जरा आंख में भर लो पानी...' का सृजन किया जिसने उन को ‘राष्ट्रकवि’ की उपाधि का हकदार बना दिया यहाँ तक कि उन्होंने तो इस गीत से मिलने वाली ‘रॉयल्टी’ की रकम को शहीद सैनिकों की विधवा पत्नियों को देने का निश्चय किया जो उनकी अपने हमवतन लोगों के प्रति उदारता वृति को दर्शाता हैं और इस गीत का असर तो अब भी किसी के दिलों-दिमाग से कम होता दिखाई नहीं देता और हर राष्ट्रिय पर्व पर इसे बजाया जाता उनकी प्रभावशाली कलम का लोहा तो उस समय के हर वरिष्ठ कवियों ने माना और महाकवि ‘सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी’ जिन्होंने उनको ‘प्रदीप’ नाम दिया था ने तो १९३८ में ही उनके बारे में अपने मनोभाव यूँ अभिव्यक्त कर उनकी उज्ज्वल भविष्य का मार्ग प्रशस्त कर दिया था---

"आज जितने कवियों का प्रकाश हिन्दी जगत में फैला हुआ है, उनमें 'प्रदीप' का अत्यंत उज्ज्वल और स्निग्ध है हिन्दी के हृदय से प्रदीप की दीपक रागिनी कोयल और पपीहे के स्वर को भी परास्त कर चुकी है इधर 3-4 साल से अनेक कवि सम्मेलन प्रदीप की रचना और रागिनी से उद्भासित हो चुके हैं।"

उन्होंने विशुद्ध हिंदी गीत, कविताओं के साथ फ़िल्मी गानों का भी सृजन किया लेकिन कभी किसी भी हाल में उनकी कलम से कोई अश्लील या हल्का गान नहीं निकला और वे केवल एक कवि ही नहीं बल्कि गीतकार, संगीतकार होने के साथ-साथ उम्दा गायक भी थे और उनके गाये सभी गीतों ने अपनी विशिष्ट गायन शैली के कारण जनमानस में अपनी गहरी  पैठ बनाई फिर चाहे वो “साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल...” हो या फिर “हम लाये हैं तूफ़ान से कश्ती निकाल के इस देश को रखना मेरे बच्चों सम्भाल के...” या फिर “आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ झांकी हिंदुस्तान की इस मिटटी से तिलक करो ये धरती हैं बलिदान की...” या “चल अकेला चल अकेला...” या फिर “कितना बदल गया इंसान...” या “पिंजरे के पंछी रे...” या “इंसान का इंसान से हो भाईचारा यही पैगाम हमारा...” गीतों की फेहरिश्त तो काफी लंबी अतः उसे विराम देते हुये ‘राष्ट्रकवि प्रदीप’ को आज उनके जन्मदिवस पर ये शब्दांजलि अर्पित करती हूँ... :) :) :) !!!
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०६ फरवरी २०१८
© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
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