सोमवार, 15 फ़रवरी 2016

सुर-४११ : "आया न बाद तेरे कोई ऐसा सुखनवर... 'मिर्ज़ा ग़ालिब' तू आज भी राज करता दिलों पर...!!!"

दोस्तों...

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'ग़ालिब' के अंदाज़े बयां
आज भी दोहराये ये सारा जहां
जब अचानक आ जाये
किसी के घर कोई अतिप्रिय तो
तो स्वतः ही जुबां से ये निकलता
"कभी हम उनको
कभी अपने घर को देखते हैं'
कैसे भी हो हालात मगर,
"दिल बहलाने ख्याल अच्छा हैं"
कहकर मगन हो जाते
यदि सख्त हो बीमार तो भी
"बीमार का हाल अच्छा हैं" बोलकर
बुझे-बुझेे नयन मुस्कुराने लगते
दिल में हो कसक तो सहकर भी पीड़ा
सूखे-सूखे लब यही गुनगुनाते,
"आख़िर इस दर्द की दवा क्या हैं"
प्यार की हो बात तो सबको समझाते
"ये इश्क़ नहीं आसां बस इतना समझ लीजे
इक आग का दरिया हैं और डूबकर जाना हैं"
अपनी अनंत ख्वाहिशों के लिये
सब यही राग अलापते
"बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन
फिर भी कम निकले"
बिछड़ने की घड़ी ये कहकर
अपनों को दिलासा दिलाते कि
"मैं गया वक़्त नहीं कि
फिर लौटकर आ भी न सकूँ"
इतने सारे अशआर हर मौजूं पर
ग़ज़ल के पैग़म्बर 'मिर्ज़ा ग़ालिब' के
जिनसे रोशन हमारे हर पल
आज उनकी बरसी पर
बस, इतना ही कहना हैं हमको
"दिल में बसे हो तुम..."
और जीवन के हर यादगारी लम्हें में
बसे तुम्हारे सदाबहार अलफ़ाज़
जिनसे गुलज़ार हमारे दिन और रात ।।
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पूछते हैं वो कि ‘ग़ालिब’ कौन है,
कोई बतलाओ कि हम बतलाएं क्या ???

१५ फरवरी इतिहास की वो दर्दनाक तारीख़ हैं... जिसमें उस्तादों के उस्ताद, शायरों के शायर कम शब्दों में कहे तो गज़ल के मानवीय अवतार... ग़ज़ल को फ़ारसी से आज़ाद कर सहज-सरल उर्दू में बयाँ कर सदियों-सदियों के लिये अमर करने वाले सुखनवर जिनके बारे में कहते हैं कि ‘ग़ालिब’ का हैं अंदाजे बयाँ और... उनके इंतकाल की दुखद खबर दर्ज हैं जिसने हम सबको हर एक अहसास और हर एक विषय पर अपने मन की भावनायें चंद अल्फाजों में अभिव्यक्त करने नायब अशआर दिये जिनके बिना हमारा दिन नहीं गुजरता कि पूरे दिन भर में कोई तो ऐसा लम्हा या पल आ जाता जब अनायास ही जुबान पर उनका लिखा कोई शेर अपने आप ही चला आता उनकी हर आमो-ख़ास मौके पर सरलता से जुबां पर चढ़ जाने वाली और दिल को छू लेने वाली शायरी ने ही उनको जन-जन का लोकप्रिय शायर बनाया और शताब्दियाँ गुजर जाने के बाद भी वो आज भी उतने ही प्रासंगिक कि उन्होंने व्यक्ति की नब्ज को थाम उस पर उसके ही दिल की बात को इस तरह आसान लफ्जों में लिख दिया कि फिर तो जब भी कभी वो अवसर आया सिवा उनके अशआर के कुछ और न याद आया कि उनसा सुखनवर फिर न जमाने में कोई दूजा आया वो तो खुद ही अपने बारे में लिख गये कि---

हुई मुद्दत कि ‘ग़ालिब’ मर गया पर याद आता हैं
वो हर इक बात पर कहना कि यों होता तो क्या होता ???

सच, २७ दिसंबर १७९७ को आगरा में जन्मे ‘मिर्ज़ा असदउल्ला बेग ख़ान’ जिन्हें हम सब प्यार से ‘चचा ग़ालिब’ भी कहते आज हम सबके बीच नहीं और जब वे पैदा हुये तो उस वक़्त अंतिम मुग़ल सम्राट जो स्वयं एक उम्दा शायर भी थे ‘बहादुर शाह ज़फर’ का दौर चला रहा था और उन्होंने १८५७ की क्रांति भी देखी इस तरह वो न सिर्फ इतिहास को देख रहे थे बल्कि अपनी कलम से उसे लिख भी रहे थे कि उनके पास अद्भुत भाषा ज्ञान के साथ-साथ जीवन की छोटी-से-छोटी घटना को देखने का एक अलहदा नजरिया था जिसमें दर्शन का पुट देकर वो उसे बेहद ही आसानी से शायरी में ढाल देते और जितना कठिन समय उन्होंने देखा उतने ही विनोदी स्वभाव के वो बनते गये जिसने उन्हें इन विपरीत हालातों से लड़ने का माद्दा दिया और ये उनका सहज हास्य बोध ही था जिसने उन्हें गर्दिश के दौर में भी न सिर्फ जिंदा रखा बल्कि उसे सहन करने की अपरिमित ताकत भी बख्शी तभी तो उनकी हाज़िरजवाबी के किस्से भी उतने मशहूर जितने कि उनके लिखे हुये शेर जो उनके चरित्र की विविध विशेषताओं को दर्शाते ।

एक बार की बात हैं कि उनके घर किसी हिंदू के घर से बर्फी आई तो उनके एक हिंदू मुरीद ने उनसे पूछा कि--- “क्या आप हिंदू के यहां से आई बर्फी खा लेगें? तो जबान और कलम के धनी मिर्जा गालिब ने तपाक से कहा था मुझे पता नहीं था कि ‘बर्फी’ हिन्दू हो सकती हैं या लड्डू का भी कोई मजहब हो सकता है” ।

इस तरह एक बार किसी दुकानदार ने उधार की गयी शराब के दाम वसूल न होने पर मुकदमा चला दिया तो मुक़दमे की सुनवाई ‘मुफ्ती सदरुद्दीन’ की अदालत में हुई और आरोप सुनाया गया कि इनको उज्रदारी में क्या कहना था, शराब तो उधर मंगवाई ही थी सो कहते ही क्या?

आरोप सुनकर झट शेर पढ़ दिया---

“कर्ज की पीते थे लेकिन समझते थे की
हाँ रंग लाएंगी हमारी फाकामस्ती इक दिन” ॥

मुफ्ती साहब ने अपने पास से वादी को पैसे दे दिए और मिर्जा को छोड़ दिया ।

यूं तो मिर्जा गालिब और बदकिस्मती दोनों साथ-साथ चलते हैं, जब पूरी पेंशन न मिलने के कारण उन्हें मुफलिसी में गुजर-बसर करना पड़ी। जिंदगी के सुनहरे दिनों में वो सिर तक कर्ज में डूबे रहे। रोज-ब-रोज दरवाजे पर कर्जख्वाहों के तकाजे मिर्जा गालिब की बेगम उमराओं जान को परेशान करते रहे। एक वक्त ऐसा भी आया जब मिर्जा गालिब के खिलाफ डिक्रियां निकलने लगी। जिसकी वजह से मिर्जा गालिब का गृहस्थ जीवन तनावों से घिरता रहा। मगर क्या मजाल कि इस फनकार को अपने फन से कोई तकलीफ जुदा कर पाती। यहां तक कि तनावो के बीच मिर्जा गालिब अपने नन्हें-नन्हें बच्चों को फौत होते देखता रहा और अंदर ही अंदर रोता रहा। शायद तभी उनकी कलम से यह शेर निकला---

"मेरी किस्मत में "ग़म" अगर इतना था,
दिल भी, या रब, कई दिये होते" ॥

जितनी उनकी मुश्किलें बढ़ी वो उतने ही विनोदी स्वभाव के होते गये और अपने हास्य बोध से उन्होंने हर एक तकलीफ को सरल बना लिया तो फिर तो ये कहना ही था-

रंज से ख़ूगर हुआ इन्सां तो मिट जाता है रंज।
मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसां हो गईं।।

इस तरह उन्होंने जीवन भर अपनी कलम से हर एक मोज़ुं पर अपने अशआर कहे जो इतने मकबूल हुये कि आज भी हम अपनी हर एक बात में उनको पढ़ देते वे खुदा को सर्वव्यापी मानते थे मगर, चूँकि उनका अंदाजे बयाँ जुदा तो उसे भी उन्होंने सीधे न कहकर कुछ इस तरह से कहा---

पीने दे मुझको मस्जिद में बैठकर ऐ ग़ालिब
या फिर कोई ऐसी जगह बता दे जहां पर खुदा नहीं है...

इतनी खुबसूरती से रब की हर जगह पर उपस्थिति को शायद, ही किसी ने अभिव्यक्त किया हो यही नहीं उन्होंने तो इश्क़-मुश्क़, दर्दे दिल, ख्वाहिश हर अहसास को यूँ उभारा कि उसके साथ उनके अशआर यूँ जुड़ गये कि जिक्र किसी का भी हो ‘ग़ालिब’ ही याद आते---

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है???

‘गुलज़ार साहब’ ने तो उस गज़ल सम्राट ‘ग़ालिब’ का परिचय अपनी अनूठी शैली में कुछ इस तरह से दिया---

बल्ली मारां की वो पेचीदा दलीलों की-सी गलियाँ
सामने टाल के नुक्कड़ पे बटेरों के क़सीदे
गुङगुङाते हुई पान की वो दाद-वो, वाह-वा
दरवाज़ों पे लटके हुए बोसीदा-से कुछ टाट के परदे
एक बकरी के मिमयाने की आवाज़ !
और धुंधलाई हुई शाम के बेनूर अँधेरे
ऐसे दीवारों से मुँह जोड़ के चलते हैं यहाँ
चूड़ीवालान के कटड़े की बड़ी बी जैसे
अपनी बुझती हुई आँखों से दरवाज़े टटोले
इसी बेनूर अँधेरी-सी गली क़ासिम से
एक तरतीब चिराग़ों की शुरू होती है
एक क़ुरआने सुख़न का सफ़्हा खुलता है
असद उल्लाह ख़ाँ `ग़ालिब' का पता मिलता है ।

आज उन्हीं शायर, गज़लकार, हाजिर जवाब, विनोदी स्वभाव और सुदर्शन व्यक्तित्व के मालिक ‘मिर्ज़ा ग़ालिब’ की बरसी पर तहे दिल से सलाम करते हैं... उनके ही लिखे अशआरों से उनका स्मरण करते हैं... :) :) :) !!!  
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१५ फरवरी २०१६
© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
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सुर-४१० : "इंद्रधनुषी प्रेमोत्सव का अंतिम रंग : वैलेंटाइन डे...!!!"


दोस्तों...

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हर दिली अहसास को
बाँट अलग-अलग दिनों में
इस आधुनिक युग ने
अनमोल ‘प्रेम’ को बना दिया
बाज़ार में बिकने वाला खिलौना
फिर सजा कर दुकानों में
बेचता ये जहां प्यार के नाम पर
कृत्रिम दिखावटी चार पल में
चमक बिखेर मिटने वाला सितारा
जिसमें नहीं वो चमक
जो मिटा सके अंतर में फैला अँधियारा ॥
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देखते-देखते ‘इंद्रधनुषी प्रेमोत्सव’ का आखिरी रंग भी अपनी आभा दिखाकर फिर धूमिल होने की कगार पर भी पहुँच चुका याने कि अब ये महज़ बाज़ार द्वारा आयोजित आठ दिनों तक चलने वाला एक प्रायोजित कार्यक्रम मात्र बन रह गया जिसके हर दिन अलग-अलग एपिसोड प्रसारित होते जिसके बाद पर्दा गिराकर समापन कर दिया जाता वैसे तो हम सब जानते कि ‘चार दिन की चांदनी फिर अँधेरी रात हैं’ तो फर्क केवल इतना पड़ा कि अब वो चार दिनी न रहकर आठ दिवसीय हो गयी हैं मगर, अंत तो वही हैं न कि पहले चकाचौंध रौशनी फिर एकदम से घुप्प अँधेरा छा जाना कि जो भी मिला इन दिनों में वो क्षणिक था सिर्फ उस दिवस का वो ख़ास अहसास जिसे एक दिन में बांधकर २४ घंटे केवल उसको ही जिया लेकिन घड़ी के साथ समय और दिन के साथ तारीख बदलते ही उस अहसास के उपर किसी दूसरे ही अहसास का रंग चढ़ गया तो फिर तो वही हुआ जो होना था मतलब कि जब हम ‘इंद्रधनुष’ के सारे रंगों को आपस में मिला देते तो ‘काला’ रंग बन जाता कुछ ऐसा ही आज के दिन भी होता जब पिछले सात दिनों को अलग-अलग नाम के साथ अलग-अलग जज्बात के साथ मनाया जाता और अंतिम दिन को ‘प्रेम-दिवस’ का नाम दे दिया जाता गोया कि पिछले साथ दिनों जो भी हुआ उसमें प्रेम शामिल नहीं था अगर, था तो फिर उसे अलग से मनाने की जरूरत क्या और अगर नहीं था तो जिस तरह उन दिनों के साथ औपचारिकता का निर्वहन किया गया उसी तरह से इस दिवस को भी महज़ खानापूर्ति के रूप में मनाकर अगले दिन आदमी फिर से अपने पुराने कामों के साथ अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में लौट जायेगा जहाँ इन सबकी सिर्फ यादें ही शेष रहेगी लेकिन जिसने इन दिनों को नहीं बल्कि इससे जुड़े ‘अहसासों’ को वास्तविक रूप में समझा होगा अपने अंतर में महसूस कर जीया होगा तो फिर उसे किसी दिन या तारीख से कोई असर न पड़ेगा कि उसके लिये वो अहसास मायने रखता न कि वो दिन तभी तो वो बिना दिन के भी उसे जब चाहेगा तब मना सकेगा और जिसने खुद को इससे बाँध लिया वो तो अगले साल ही दुबारा इसे पा सकेगा तभी तो लोग कहते कि प्रेम किसी दिन का मोहताज़ नहीं लेकिन इसका मतलब नहीं कि इसे मनाया न जाए बल्कि लोगों का कहना कि हर दिन ही प्रेम से पगे तो सिर्फ एक दिन ही उसका जशन क्या मनाना बल्कि रोज उसमें ही डूबे रहने उसे इस कदर अपने में समो लेना कि वो सहज ही प्रकट हो न कि किसी सामान या दिन के आने पर ही उसका  भाव जगे ।     

‘प्यार’ का अहसास तो प्रकृति में चारों तरफ बिखरा पड़ा कहीं भी नजर डालो वो दिख जायेगा चाहे फिर वो फूलों पर मंडराती तितलियों की शक्ल में हो या दो पक्षियों का आपस में चोंच लड़ाने वाले दृश्य में हो या फिर शमा के जलते ही झट उस पर अपनी जान लुटाने को आतुर डोलते परवाने की प्राण आहुति में हो ये सब ही प्रेम की अद्भुत प्राकृतिक मिसाल हैं जिन्हें देखकर उस ‘मुहब्बत’ के वास्तविक मायने को बड़ी ही आसानी से समझा सकता और फिर अपने भीतर भी उस प्रेम लौ को जलते हुये महसूस किया जा सकता शायद, तभी इश्क़ को ‘आग का दरिया’ कहा गया जिसमें अपने आप को जलाकर ही सोने की तरह निखारा जाता हैं फिर उस कुंदन की चमक कभी न तो फीकी पड़ती और न ही उसका मोल कम हो पाता यही तो हैं सच्चा प्यार जो दिनों दिन बढ़ता ही जाता न कि कुछ दिनों जताकर उसके बाद फिर अगले साल का इंतजार किया जाता जिसने भी अपने ही भीतर छिपे उस अनमोल प्रेम का साक्षात्कार कर लिया फिर उसे किसी भी दिखावटी अहसास की जरूरत नहीं होती न ही वो कहीं भटकता बल्कि वो तो ‘प्यासे चातक’ की तरह भले ही आस-पास कितनी नदिया या सागर क्यों न हो मगर, केवल स्वाति नक्षत्र की जल बूंदों से अपनी तृष्णा मिटाता जिसने इसे साध लिया उसकी प्रेम पिपासा फिर पोखर के जल से बुझ सकती भी नहीं उसे तो सिर्फ अपना ही वो अहसास चाहिये जो कहीं भी नहीं मिलता हम तो कस्तुरी मृग की तरह उसे अपने भीतर लिये फिरते लेकिन इस सच्चाई से अनजान होने के कारण उसे चारों तरफ ढूंढते तो इस ‘वैलेंटाइन डे’ यदि हम भी ये रहस्य जान ले तो फिर हमें भी अपना प्रेम तलाश न करना पड़ेगा बल्कि वो तो ‘परवाने’ की तरह हमें खुद ही खोजता हुआ चला आयेगा और हम भी उसे अपना सर्वस्व समर्पित कर उसके अस्तित्व में यूँ समा जायेंगे कि दो लोग मिलकर एक हो जायेंगे जिसे कि ‘दो जिस्म एक जान’ कहते जहाँ तेरे-मेरे का भेद न होकर शेष रहता तो सिर्फ ‘हम’ का भाव जिसने इसे साध लिया उसने जग पा लिया तो मान ले कि ‘प्रेम’ बाहर से आसान दिखाई देने वाली एक कठिन तपस्या और अपने प्रियतम के प्रति पूर्ण समर्पित होकर की जाने वाली अटूट साधना हैं जो सात-आठ दिनों में नहीं बल्कि सात जन्मों में पूर्ण हो पाती शायद, तभी हमारे यहाँ प्यार के इस संबंध को सात जन्मों का बंधन माना गया हैं तो यदि आप भी इसे दिनों नहीं बल्कि जन्मों में बदला चाहते तो फिर ‘परवाने’ और ‘चातक’ को बनाना अपना ‘लव गुरु’... उसके बाद करना प्यार शुरू... इसके साथ इस ‘प्रेम दिवस’ में पाओ अपना प्यार हरसू... :) :) :) !!!          
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१४ फरवरी २०१६
© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
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शनिवार, 13 फ़रवरी 2016

सुर-४०९ : "इंद्रधनुषी प्रेमोत्सव का सातवा रंग : किस डे...!!!"


दोस्तों...

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चूम नहीं सकता
कोई भी अपने ही गालों को कि
महसूस कर सके उस कोमल स्पर्श को ।
.....
न ही रख सकता
अधर अपने माथे पर कि
लगा आशीष का तिलक सजा ले भाल को ।
.....
न ही छू सकता
पलकों को अपने होंठो से कि
ख़ुद पहचान सके उस अलहदा छुवन को ।
.....
शायद,
इसलिये रब ने बख्शा
प्रेम के मिठास भरे इस अद्भुत अहसास को ।
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मित्रों...,

धीरे-धीरे ‘इंद्रधनुषी प्रेमोत्सव’ के सभी ‘रंग’ खत्म होते जा रहे हैं और आज प्रभात के साथ इस पिटारे में से निकल कर ‘किस डे’ सबके सामने आ चुका हैं पर, यदि हम केवल थोडा-सा ही पीछे जाये तो पायेंगे कि इसी देश में एक ऐसा ज़माना था जब इन सब दिनों और पर्वों से तो ये देश अपरिचित था ही साथ-ही ये सब शब्द जो आजकल बड़े खुलेआम प्रयोग किये जा रहे हैं इनका प्रयोग और इनको सबके सामने आज़माना भी वर्जित था । हाँ, ये और बात हैं इनमें से किसी भी अहसास से कोई भी अनजान नहीं था लेकिन अपनी पवित्र सभ्यता और संस्कृति की वजह से इसे जुबान पर लाना बेशर्मी माना जाता था और अब जिसे देखो वो सब धडल्ले से न सिर्फ़ ये सब बल्कि इससे भी ज्यादा गैर वाजिब अल्फाजों का प्रयोग कर रहा हैं क्योंकि अब कुछ भी उसके लिए कल्पना या स्वप्न की बात नहीं रहा सब कुछ एक क्लिक पर एक साथ एक ही जगह उपलब्ध हैं जिसने असमय में न सिर्फ़ उसे कुछ ऐसा ज्ञान भी दे दिया हैं जो कि उसके हित में नहीं हैं बल्कि उसको अधिक मुखर भी बना दिया हैं जो हमारी तहजीब के खिलाफ़ हैं । इसलिये ही हमारे तथाकथित समाज के ठेकेदार इन सबको गलत समझ इसका विरोध करते हैं  जिसकी वजह ये हैं कि उम्र के नाज़ुक दौर से गुज़र रही पीढ़ी जो सही-गलत के भेद से अपरिपक्व होती हैं वो ‘आकर्षण’ और ‘प्रेम’ के बीच के अंतर को समझ नहीं पाती न ही ये समझ पाती हैं कि इस भंवर में गिरने के बाद उसका अंजाम क्या होगा और फिर इसमें से निकलने का मार्ग भी उसे मिलेगा या नहीं । हमारे यहाँ एक और समस्या हैं कि इन विषयों पर बातचीत करना भी नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त समझा जाता हैं जिसके कारण भी किशोर वर्ग कुछ तो स्वाभाविक रूप से अपनी नैसर्गिक प्रकृति से मजबूर होकर तो कुछ इसे जानने की लालसा से प्रेरित होकर इन सबकी तरफ़ झुकता हैं और चूँकि किसी भी बड़े का मार्गदर्शन या सलाह-मशविरा उसके साथ नहीं होता इसलिये वो भटक जाता हैं । ऐसे में जबकि अब वो इन सबमें अपने आप को जोड़ रहा हैं तो अब अभिवावकों को भी थोडा जागरूक और ‘स्मार्ट’ होना पड़ेगा और उनके कदमों की दिशा पर नज़र रखकर ये समझना होगा कि वो किधर का रुख कर रहे हैं और जब समझ आये तो उन्हें अपने विश्वास में लेकर उनकी मित्र बनकर उनको जितना और जैसा भी सहज-सरल होकर समझाया जा सकता हैं उसका प्रयास करना चाहिये क्योंकि रोकना कभी भी किसी समस्या का हल नहीं क्योंकि ये भी इस देश के लोगों की एक एक स्वाभाविक वृति हैं कि मनाही या निषेध की तख्ती के नीचे ही वो वही काम करता हैं जिसके लिये उसे सख्त निर्देश देकर मना किया गया हैं । 

‘किस डे’ आने पर सबके मन में केवल वही दृश्य बनता हैं जो उसे इस दिन के नाम पर परोसा जाता हैं जबकि वो खुद ये भूल जाता हैं कि इसकी पवित्रता को उसने सर्वप्रथम तब महसूस किया जब उसने जन्म लिया और उसकी जननी ने वात्सल्यता से भर उसके नन्हे-से फूल जैसे नाज़ुक चेहरे पर ‘ममता का चुंबन’ अंकित किया और जब वही छोटा-सा शिशु बड़ा होकर उसकी इस ममता का प्रतिउत्तर देने लायक होता हैं तो हर कोई उससे ‘प्यार की पप्पी’ की मांग करता हैं और उसे पाकर उसका चेहरा खिल जाता हैं । इसी तरह कभी उसके परिजनों ने तो कभी उसके बड़ों ने उसके माथे पर ‘आशीष का चुंबन’ देकर उसको अपना आशीर्वाद दिया जिसने कदम-कदम और उसकी रक्षा की तब वही प्रेम अहसास ढाल बनकर उसका रक्षक बन गया और जब कभी किसी ने प्रेमातुर होकर उसके हाथ को थामकर उस पर ही ‘चाहत का चुंबन’ दे दिया तो उसकी खुशबू ने उसे रात-दिन सोने नहीं दिया और उसे प्यार का पहला पाठ पढ़ा दिया । इस स्वाद को जनम लेते ही जान लेने के बाद ही पता चलता हैं कि ये कितना पाक अहसास हैं जिसे यदि रूह से महसूस किया जाये तो ये पीढ़ी कभी-भी बाज़ारवाद के बनाये मकडजाल में नहीं फंसेगी बल्कि यदि उसके अपने उसके साथ हितैषी बनकर रहेंगे तो वो भटक भी नहीं पायेगी इसलिये यदि हमारी पीढ़ी इसे मनाती हैं तो मनाये लेकिन आप साया बनकर उसके साथ न रहें न सही लेकिन आपकी नैतिक सलाह उसके कदमों को लड़खड़ाने नहीं देगी आपकी पारिवारिक सोच उसे दलदल में गिरने नहीं देगी क्योंकि वैश्वीकरण और नेटवर्क युग में पली-बढ़ी इस ‘न्यू जनरेशन’ को आप ‘अंतरजाल’ में फंसने से तो नहीं रोक सकते लेकिन लगाम जरुर लगा सकते हैं और कुछ बंदिशे भी रख सकते हैं और वही हम सबको करना हैं ।

इस बार आप इस अहसास के सभी रंगों को याद करें और आप खुद पायेंगे कि सबसे सच्चा और प्यारा हैं मासूमियत से भरा सलोना वो अल्हड़ खिलखिलाता अनुभव जब आप किसी बच्चे से ‘किस्सी’ मांगते हैं और वो आपके गालों पर गुलाब की पंखुड़ी से कोमल होंठ रखकर उस मधुरता का अनुपम स्वाद देता हैं जिसके आगे आप भी एकदम से उतने ही छोटे और नन्हे बन जाते हैं और उसे गोद में लेकर उसे प्यार की पप्पी देते हैं... इस दुनिया में न जाने कितने अनाथ बच्चे और ऐसे लोग हैं जो इससे महरूम हैं तो कुछ ऐसा करें कि वो भी इस दिन को आपके साथ मना पाये और थोड़ी देर को ही सही उनकी बेरंग दुनिया में थोड़े रंग बिखेर दिये जाये क्योंकि कोई भी कुछ भी कर ले पर ख़ुद को तो किसी भी तरह नहीं चूम सकता न पर, इसकी पाकीज़गी को भंग किये बिना ही इसे अंतर में महसूसा जाना चाहिये... एक भंवरे की तरह नहीं जो हर कली पर मंडराता हैं बल्कि एक चकोर की तरह जो सिर्फ स्वाति नक्षत्र की बूंद से ही अपनी प्यास बुझाता हैं जिसके लिये इंतजार भी करता हैं और न मिले तो जान दे देता हैं पर, किसी भी जल को छूता नहीं... ये होती हैं प्रेम की शिद्दत, प्रेम की कशिश जिसके वशीभूत होकर ही इसकी पाकीज़गी को आत्मा में उतारा जा सकता हैं... :) :) :) !!!  
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१३ फरवरी २०१६
© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’

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शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2016

सुर-४०८ : "इंद्रधनुषी प्रेमोत्सव का छटवा रंग : हग डे...!!!"

दोस्तों...

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वज़ूद अपना ही
लगता बड़ा अधूरा
जब दिल होता अकेला
चाहता थाम ले किसी की बाहें
लेकर आगोश में
फेर सर पर प्यार से हाथ
बोले प्यार से भरे दो मीठे बोल
जब नम हो आँखें तो
मिल जाये किसी का कांधा
जिस पर रख सर
निकाल दे मन का सारा गुबार
और जब कभी मिले कोई उपलब्धि तो
किसी के हाथ गर्व से
थपथपा कर पीठ बढाये आत्मबल
और हर एक अर्धांग
पाकर अपना आधा हिस्सा
हो जाये मुकम्मल
पाने पूर्णता का ये प्यारा अहसास
मनाये अपनों के साथ ‘हग डे’ आज ॥
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इंसान कितना भी कहे कि वो अकेला रहना चाहता या वो एकदम तन्हाई पसंद लेकिन किसी भी हाल में वो अपनी कुदरती इंसानी फ़ितरत को बदल नहीं सकता क्योंकि जीवन के सारे अहसास चाहे वो ख़ुशी के हो या गम के हर कोई ऐसे अहसासी समय में किसी का साथ चाहता कि इन्हीं ख़ास पलों में वही अकेलापन खाने को दौड़ता कभी जिसको पाने सब कुछ छोड़कर अपना अलग जहाँ बनाया था मगर, जब भी दामन में आई कोई भी दुआ साकार होकर या कभी यूँ ही बैठे-बैठे तो कभी किसी वजह से मन के भीतर जज्बात का सैलाब उमड़ पड़ा तो महसूस हुआ कि काश, कोई तो होता जिसके साथ वो अपने इस रूहानी अहसास को बाँट लेता क्योंकि कोई भी इंसान चाहे वो आंतरिक रूप से कितना भी मजबूत क्यों न हो या उसका किरदार कितना भी सख्त क्यों न हो लेकिन किन्ही विशेष पलों में अंतर में बड़ी मेहनत से बनाया गया तटस्थता का वो हिमालय भी पिघलने लगता जिसके दम पर सबसे विलग होने का फैसला लिया था यदि ये सब मानवीय भावनायें न होती तो फिर इंसान महज़ एक बुत होता जिस पर किसी भी तरह के मौसम, किसी भी बात का कोई फर्क नहीं पड़ता मगर, ऐसा नहीं वो कहने को भले ही मिट्टी से बना मानवीय पुतला हैं लेकिन माटी की इस काया में तरह-तरह की संवेदनायें भी तो भरी हैं जिनसे वो हर जज्बात को बड़ी शिद्दत से महसूस कर उसके अनुसार प्रतिक्रिया व्यक्त करता और फिर इन क्रिया-कलापों पर किसी दूसरे की प्रतिक्रिया भी चाहता जिसके बिना ये सब बेमानी हैं ।

कहने को भगवान ने सब इंसानों को एक जैसा ही बनाया और एक समान तत्वों से भी बनाया लेकिन बाहरी रूप से एकदम पूर्ण नजर आने वाला हर मानव वास्तव में अपूर्ण होता जो अपने ही समान किसी दूसरे इंसान से मिलकर खुद को मुकम्मल पाता क्योकि किसी के भी पास ये हुनर नहीं कि वो अपने ही आपको गले लगा सके, खुद का ही आलिगन कर उस अहसास को महसूस कर सके जो किसी के सीने से लगकर महसूस होता जिसके मजबूत घेरे में वो खुद को बेहद सुरक्षित भी पाता उसे लगता कि बाँहों से बनाये गये इस बंधन में वो एकदम सुरक्षित हैं कोई भी उसका कुछ नहीं बिगड़ सकता फिर वो एकदम बेफिक्र होकर अपनी आँख मूंद बड़ी निश्चिंतता से उसके सीने पर सर रख सो जाता और इस दायरे का अभ्यस्त तो वो जनम के साथ ही हो जाता जब पैदा होते ही ममता से भरे हाथ बड़ी एहतियात से उसे अपने अपने में संजोते और जब-जब भी वो रोता या कोई डरावना सपना देखकर घबरा जाता तो वही दो हाथ बड़ी तत्परता से उसे सांत्वना देते उसके नन्हे माथे, उसके सर को थपकी देकर सहलाते तो वो भूलकर अपना दुःख फिर मुस्कुराने लगता या गहरी नींद में खो जाता फिर जैसे-जैसे वो बड़ा होता जाता इस प्रेमिल स्पर्श का आदि होता जाता और जब भी उसके जीवन में ऐसा कोई पल आता तो सहज ही मन में ये भाव उमड़ आता कि काश, कोई होता जो उसके इन यादगार क्षणों को बाँट सकता उसके सुख-दुःख का साथी बन सदा उसके साथ रहता इसलिये तो इंसान को सामाजिक प्राणी की संज्ञा दी गयी जिसके लिये एकाकी जीवन गुजरना या तो सज़ा या फिर अभिशाप होता शायद, इसी वजह से ‘परिवार’ नामक संस्था और ‘विवाह’ जैसे संस्कार की नींव रखी गयी ।

‘इंद्रधनुषी प्रेमोत्सव’ का ‘छटा रंग’ जीवन के लिये जरूरी इसी भाव को दर्शाता जिसे ‘हग डे’ कहकर मनाया जाता तो आज वही ‘आलिंगन दिवस’ हैं जिसके बिना अपना आप लगता अधूरा हैं तो आज सभी अपने अपनों को ही नहीं बल्कि जिनका कोई भी नहीं उन्हें भी ये बेमोल तोहफा देकर वो अनमोल ख़ुशी पाये जो कहीं भी नहीं मिलती और ये वो अहसास जो हम अपने आपको खुद नहीं दे सकते किसी की जरूरत पड़ती... ये तो पूछो उससे जिसका कोई नहीं या जिसके हाथ नहीं या जो सबके साथ होकर भी अकेला हैं वही जानता कि वो किस सुखसे वंचित और जो जान-बुझकर ही इससे दूर रहते वो तो बदनसीब ही कहलायेंगे कि एक ‘जादू की झप्पी’ न सिर्फ अपनेपन का अहसास देती बल्कि मनोबल भी बढ़ा देती जिससे हर काम तेज गति से किया जा सकता तो सबको ‘जादू की झप्पी’ वाले इस दिन की ढेर सारी शुभकामनायें... :) :) :) !!!                    
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१२ फरवरी २०१८
© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
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