गुरुवार, 10 अगस्त 2017

सुर-२०१७-२२० : ‘हरिशंकर परसाई’... व्यंग्य से करते ठुकाई...!!!


सबसे गहरा घाव वो होता जो शब्दों से दिया जाता कि उसका कोई इलाज़ नहीं वो तो सीधा जाकर मर्म पर ही वार करता और ऐसा जख्म देता कि अगला टीस को न सह ही पाता और न कुछ कह पाता कि शब्द-बाण तो रह-रहकर चुभते कुछ इस तरह से हिंदी साहित्य में व्यंग्य विधा को स्थापित करने वाले विलक्षण प्रतिभा के धनी मध्यप्रदेश का गौरव कहलाने वाले और हर एक विषयवस्तु पर तिरछी नजर रखने वाले साहित्य शिरोमणि ‘हरिशंकर परसाई’ ने कलम रूपी हथियार की मदद से समाज की कुरीतियों ही नहीं हर एक विसंगति पर सटीक प्रहार करते हुये देश व समाज की देह में होने वाले पुराने से पुराने दर्द को भी मिटाने का सतत प्रयास किया कि ताकि इस तरह से वे एक ऐसा भारत बना सके जिसे देखकर कोई उसकी किसी भी प्रथा, सनातन परंपरा या किसी जात-पांत पर कोई ऊँगली उठा न सके कि ये इस विविध संस्कृति के पोषक धर्म-निरपेक्ष देश की वैश्विक पहचान हैं ।

इसलिये उन्होंने अपनी चाँद रूपी मातृभूमि पर धब्बे के समान दिखाई देने वाली छोटी-से-छोटी और बड़ी-से-बड़ी असमानता पर चुटीला कटाक्ष किया जिससे कि वो इन दाग़-धब्बों को आसमान की तरह फैली अपनी श्वेत चादर से विलग कर दाग़रहित होकर उभरे तो आजीवन हर विषय, हर परिस्थिति, हर व्यक्ति, हर नीति, हर घटना, हर प्रसंग, हर तीज-त्यौहार, हर सम-सामयिक मुद्दे, हर कमी, हर विशेषता और हर एक विचित्र दिखाई देने वाली बात को अपनी तेज-तर्रार कलम का निशाना बनाकर हंसी-हंसी में वो सब कह दिया जिसे यदि गुस्से में कहा या लिखा जाता तो शायद, उसका वो सर्वकालिक असर नहीं हो पाता कि मज़ाक तो बर्दाश्त किया जा सकता हैं लेकिन, क्रोध से क्रोध ही उपजता जिसके कारण उनका उद्देश्य बाधित हो जाता तो अपने हाथों में थामी हुई कलम को मीठी छूरी बनाकर ऐसा झटका दिया जैसे कोई कसाई किसी जानवर की गर्दन को एक झटके में ही हलाल कर देता हैं ।

कभी वो किसी धोबी की तरह समाज के उपर पड़े मटमैले आवरण को पटक-पटक कर धो उसे उजला बनाने का प्रयास करते तो कभी किसी डॉक्टर की तरह बड़ी निर्दयता से उसके घाव की चीर-फाड़ करते जिससे कि उसमें भरा हुआ सड़ी-गली कुरीतियों का मवाद बहर निक जाये तो समय-समय पर वे साहित्यकार से समाज सेवक बन एक जागरूक नागरिक होने के अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते यही वजह हैं कि उनका लिखा हुआ आज भी प्रासंगिक हैं कि कहने को भले ही समाज व समय में परिवर्तन हो गया लेकिन उसके भीतर अब भी बहुत गंदगी भरी हुई हैं जिसके दिखाई देने पर अक्सर उनका लिखा कोई वाक्य या व्यंग्य याद आ जाता और उनकी दूरदर्शिता का अहसास होता कि किस तरह से वे समय के पार देख लेते थे और आने वाली परिस्थितियों को महसूस कर उसका व्यंग्य में वर्णन कर देते थे तभी तो भ्रष्टाचार हो या फिर धर्मांतरण बहस या फिर राजनीति सब पर उनका लिखा हुआ कोई न कोई आदर्श लेखन जेहन में तैरने लगता हैं ।

साहित्य व समाज के ऐसे मर्मज्ञ और ज्ञानी आज ही के दिन हम सबको छोड़कर चले गये थे तो आज उनकी पुण्यतिथि पर हम सबको उनको ये शब्दांजलि अर्पित करते हैं और ये प्रयास करे कि जिस तरह के भारत का वे स्वपन देखते था या जिस तरह का वो इसे दुनिया के मानचित्र पर स्थापित करना चाहते थे वैसा ही कुछ सचमुच में कर पाये तो उनके शब्दों को वास्तविक मान-सम्मान दे पायेंगे... :) :) :) !!!
                   
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© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)

१० अगस्त २०१७

बुधवार, 9 अगस्त 2017

सुर-२०१७-२०९ : ‘अगस्त क्रांति दिवस’ बना आज़ादी का आख़िरी विकल्प...!!!


९ अगस्त १९४२ को मुंबई के एक पार्क जिसे अब ‘अगस्त क्रांति मैदान’ के नाम से जाना जाता हैं में वो ऐतिहासिक घटना घटित हुई जिसने कि फिरंगियों को भारत से निकलने को मजबूर कर दिया कि आज से ७५ साल पहले राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी ने अंग्रेजों को अंतिम चेतवानी दे दी कि बस, बहुत हो गया... अब अपना बोरिया बिस्तर बांधो और यहाँ से निकल लो कि सोने की चिड़िया कहलाने वाले हमारे देश को तुमने जितना लूटना था लूटकर खोखला कर दिया साथ ही हमारी आपसी एकता को भी भंग कर दिया ऐसे में यदि हमने अपनी जमीन से तुम्हें नेस्तनाबूद नहीं किया तो हमारी आने वाली पीढियां हमें माफ़ नहीं करेंगी कि भारतमाता के इतने वीर सपूतों की बलि चढ़ गयी लेकिन ‘स्वतंत्रता’ अब भी महज़ कल्पना ही रही 

‘भारत छोडो आंदोलन’ वास्तव में भारतीयों का अंग्रजों के खिलाफ एकजुट होकर किया जाने वाला अंतिम प्रयास था और आज़ादी प्राप्त करने का भी आखिरी विकल्प भी कि अब सबने ठान ही लिया था कि चाहे जो भी हो ‘अंग्रेजों’ को तो इस भारतभूमि से खदेड़ना ही हैं तो आज के दिन सबने ये संकल्प लिया कि अब वे चाहे जो हो न तो पीछे हटेंगे और न ही किसी भी खतरे से डरेंगे कि गुलामी से बड़ी कोई जिल्लत नहीं तो इससे बुरा क्या होगा भला इस एक सोच ने सबको हिम्मत दी जिसका परिणाम कि इसके बाद १५ अगस्त १९४७ को बोले तो तीन साल बाद ही फिरंगी सरकार को हमारा हिंदुस्तान हमारे हाथों में सौंपकर वापस अपने देश जाना पड़ा 

जिसने ये साबित किया कि जब हर भय को त्यागकर निडरता के साथ दुश्मन का सामना किया जाता हैं तब उसकी ताकत का सही अंदाज़ा होता जिसे अक्सर हम खुद से ज्यादा आंककर प्रयत्न करने से डरते हैं पर, जब सर पर कफ़न बंधकर मौत का सामना करने भी तैयार हो जाते हैं तो फिर पाते हैं कि जिसे हम अपने से अधिक शक्तिशाली समझ अब तक उसके सामने आने से घबराते रहे वो असलियत में उतना ताकतवर नहीं तो हमारे सतत प्रयासों का नतीजा कि हमने असंभव को भी संभव कर दिखाया और आज उस दिन को याद कर उसकी हीरक जयंती मना रहे हैं जिसने हमें आज़ादी का तोहफा दिया... सबको इस दिन की अनंत मुबारकबाद... इंकलाब जिंदाबाद... :) !!!     

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© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)
०९ अगस्त २०१७


मंगलवार, 8 अगस्त 2017

सुर-२०१७-२१८ : ‘व्हाट्स एप्प’ पर साहित्य का समूह इक निराला... नाम जिसका ‘छंदमुक्त पाठशाला’...!!!


'छंदमुक्त पाठशाला' साहित्य सृजन की एक ऐसी बेमिसाल संस्था जिसका अस्तित्व यूं तो सूक्ष्म तरंगों पर विद्यमान लेकिन उसका असर ऐसा कि सभी गतिविधियां जमीन व कलम से जुड़ी तो हवामहल की तरह कोरी कल्पना नहीं बल्कि आज के स्मार्ट युग में तकनीक की बढ़ती रफ्तार से कदम मिलाने कलमकारों को भी वही माध्यम अपनाना पड़ता जो कि समय की मांग होती तो अब कृतित्व कागजों की जगह लैपटॉप, मोबाइल और टेबलेट पर की-बोर्ड से रचा जा रहा और केवल डायरी या अखबार या पत्रिका के पन्नों पर अंकित होकर सीमित दायरे में नहीं बल्कि संपूर्ण विश्व मे पढा जा रहा तो वैश्वीकरण के इस दौर में एप्प्स की भीड़-भाड़ भरे माहौल में जब 'व्हाट्स एप्प' ने मोबाइल के स्क्रीन पर दस्तक दी और भारतीय लोग उसे समझने में ही व्यस्त थे उस समय 7 अगस्त 2014 को मध्यप्रदेश राज्य के 'सागर' जिले के एक कोने में बैठे रचनात्मक कवि 'अखिल जैन' के मन में ये विचार कौंधा कि क्यों न इस एप्पलीकेशन का प्रयोग रचनाधर्मिता के लिए किया जाये तो इस तरह उस ख्याल को मूर्त रूप देने के लिये बनाया गया 'छंदमुक्त पाठशाला' नाम का प्रथम साहित्यिक समूह ।

जिसे ये नाम देने के पीछे उनकी मंशा यही थी कि छंदमुक्त जो कि सोशल मीडिया के जमाने मे अधिक लोकप्रिय साहित्यिक विधा परंतु लोग इसके वास्तविक स्वरूप व आवश्यक अंगों से भलीभांति परिचित नहीं तो उनको जानकारी भी दी जाए और जो इसके जानकर उनसे कुछ सीखा भी जाये तो बस, नींव पड़ते ही मुख्य आधारस्तम्भ के रूप में एडमिन जी ने अशोक अरोरा जी(जो विगत दिनों हम सबको छोड़कर चले गए), गोबिन्द चांदना जी, नीरजा मेहता और राखी जी को जोड़ा जो पाठशाला के चार मज़बूत ख़म्बों की तरह स्थापित हुये और पाठशाला को साकार किया उसके बाद इसकी के नियमावली बनाई गई कि प्रातः 8 बजे सरस्वती वंदना से दिवस प्रभारी इसके पट खोलेगा और उसके बाद किसी एक विषय पर सभी रात 8 बजे तक लेखन कार्य करेंगे जिसके बीच में किसी तरह के मैसेज या पिक्स का व्यवधान न डाला जाएगा और 8 बजे के बाद प्रस्तुत रचनाओं पर एक संक्षिप्त चर्चा या उनकी समीक्षा पेश की जायेगी जिससे कि रचनाकारों का न सिर्फ उत्साहवर्धन हो बल्कि उन्हें कुछ सीखने और अपडेट होने का अवसर भी मिले तो इस तरह चार लोगों से शुरू हुई इस पाठशाला में बाद में अन्य सदस्यों को भी जोड़कर परिवार का विस्तार किया गया तथा सदस्यों की पटल के प्रति रोचकता व रुझान कायम रखने के लिए अनेक गतिविधियों का आयोजन भी किया गया जिससे सबका आपस मे परिचय बढ़े तथा कुछ नया सीखने को भी मिले इसके साथ ही सदस्यों के जन्मदिन, सालगिरह आदि के लिए ऑनलाइन पार्टियों, कवि-सम्मेलन आदि का भी आयोजन करने के अलावा महान लेखकों की जयंती, पुण्यतिथि आदि को मनाने की परंपरा भी बनाई गई जिससे कि वरिष्ठजनों का आशीष व मार्गदर्शन मिलता रहे ।

इस तरह जब एक वर्ष पूर्ण हो गये तो प्रथम सालगिरह के अवसर पर समूह के पहले सयुंक्त काव्य-संकलन को प्रकाशित करने की योजना बनी जिसे अमली जामा पहनाया ‘उत्कर्ष प्रकाशन’ मेरठ ने तो उसका अभूतपूर्व विमोचन 14 सितंबर हिंदी दिवस के दिन ‘मौन तीर्थ’, उज्जैन में ‘संत श्री सुमन भाई जी मानस भूषण’ के करकमलों द्वारा समस्त सदस्यों की उपस्थिति में हुआ और इस ऐतिहासिक समारोह में विमोचित किताब 'भावों की हाला' ने न केवल व्हाट्स एप्प के इतिहास में पहली पुस्तक होने का गौरव प्राप्त किया बल्कि सभी सदस्यों को भी आभासी दुनिया से वास्तविक धरातल पर मिलने का अवसर प्रदान किया फिर तो मानो समूह को पंख लग गये और दूसरे वर्ष ‘स्टोरी मिरर’ उसके लिए किसी देवदूत की तरह आया जिसने उसकी द्वितीय सालगिरह पर उसके दूसरे काव्य संकलन 'शब्दों का प्याला' को न केवल प्रकाशित करने का जिम्मा लिया बल्कि देश की राजधानी दिल्ली में उसके भव्य विमोचन का भी प्रबंध किया ।

इस ७ अगस्त को इस समूह ने अपने शानदार तीन वर्ष पुरे करने के साथ ही सृजन में भी एक न्य कीर्तिमान रच डाला हैं कि इस पटल पर इन तीन सालों में समस्त सदस्यों द्वारा लगभग १ लाख छंदमुक्त कविताओं की रचना की जा चुकी हैं जो ये दर्शाता हैं कि सभी सदस्य इसके पटल के प्रति न केवल समर्पित हैं बल्कि इसकी उन्नति के लिये भी सतत प्रयासरत हैं और इसकी तीसरी वर्षगांठ पर तृतीय पुस्तक की योजना भी बन चुकी हैं जिसे शीघ्र ही मूर्त रूप दिया जाएगा तो सभी सदस्यों और पटल एडमिन को समूह की सालगिरह मुबारक... :) :) :) !!!

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© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)

०८ अगस्त २०१७

सोमवार, 7 अगस्त 2017

सुर-२०१७-२१७ : ‘रक्षा-सूत्र’ कहने को कच्चे धागे... पर, बनाते दिलों के बीच पक्के नाते...!!!


सावन का आखिरी सोमवार और पूर्णिमा के साथ ही समापन इस पावन मास का जो अपने साथ लेकर आता रिश्तों का स्नेहिल पर्व ‘रक्षा-बंधन’ जिसमें नेह के दो तार से किसी को भी जीवन भर के लिये एक रिश्ते में बाँध लिया जाता कि इन धागों को ‘रक्षा-सूत्र’ कहा जाता जो सिर्फ भाई-बहन ही नहीं किसी भी पवित्र रिश्ते को इस तरह से एक बंधन में बाँध देता कि फिर उसे तोड़ना आसान नहीं होता बशर्ते कि उस डोर से जुड़ने वाला उसे उतनी ही तवज्जो दे तो फिर हर साल भले ही कलाई पर ये न बाँधा जाये मगर, एक बार जो रिश्ते की गिरह जुड़ गयी तो फिर उसका कसाव हमेशा ही महसूस होता कि वैसे तो ये माना जाता कि गाँठ पड़ जाये तो रिश्ते कमजोर हो जाते लेकिन कुछ रिश्ते ऐसे होते जो गाँठ लगाकर ही जोड़े जाते ऐसे में हमारा दायित्व होता कि उनके बीच की ये गाँठ कभी ढीली होने पाये तो साल दर साल उसे मजबूत बनाने के लिये ये पर्व मनाते जो कहने को तो कच्चे धागों से बनाया जाता लेकिन रिश्ता बड़ा पक्का बनाता जो आपसी गलतफ़हमी या छोटे-मोटे झगड़ों से भी नहीं टूटता लेकिन कभी दिलों में दरार आ जाये तो फिर भले गाँठ कितनी मजबूत हो टूट ही जाती तो अमूमन जो इसकी महत्ता समझते वे केवल औपचारिकता या नाम के रिश्ते को इस बंधन से नहीं जोड़ते सिर्फ़ उनको ही राखी बांधते जिनसे उनका जीवन भर का रिश्ता होता कि किसी को भी राखी बांधना तो बड़ा आसान लेकिन उसके बाद बनने वाले रिश्ते को निभाना बेहद कठिन तो खेल में या भावुकता में आकर इसे बांधने की बजाय बिना रिश्ते के रहना अच्छा और इस तरह की ईमानदार सोच रखने से ही ये पावन बना रहता हैं ।

प्राचीन काल से पौराणिक कथाओं ही नहीं ऐतिहासिक प्रसंगों में भी इसका उल्लेख मिलता हैं जो ये दर्शाता कि किस तरह सहायता पाने या रक्षा की आवश्यकता पड़ने पर कभी ‘राखी’ कहलाये जाने वाले धागों तो कभी उसके स्थान पर जो भी उपलब्ध हैं चाहे फिर आँचल का छोर हो या कोई किनारी उसे ही प्रतीक रूप में भेजकर कई महान चरित्रों ने इसे गरिमा प्रदान की हैं तभी तो आज भी सरहद पर बैठे भाई हो या दूर कोई अपना उसकी सुरक्षा हेतु उसकी कलाई पर इसे बांधकर ईश्वर से उसकी कुशल-क्षेम की प्रार्थना की जाती... हम सब भी सभी रिश्तों की प्रगाढ़ता हेतु हृदय से शुभकामना प्रेषित करें और इस तरह सबके साथ मिलकर इस पर्व को मनाये... तो इसकी खुशियाँ सहस्त्र गुनी हो जायेगी... :) :) :) !!!        
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© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)

०७ अगस्त २०१७

रविवार, 6 अगस्त 2017

सुर-२०१७-२१६ : ‘दोस्त’ हो जैसे आत्मा... ‘दोस्ती’ ऐसा आत्मिक नाता...!!!


 इक रिश्ता
जो छूट गया अधूरा
किसी जनम में
.....
बनकर ‘दोस्त’
वो जुड़ जाता आकर
बीच सफ़र में
.....
साथ छोड़ जाये
भले, हर संबंध कभी
साथ रहती मगर
‘दोस्ती’ हर रहगुज़र में
.....
कि ये नाता
नहीं जुड़ा रक्त से
जो टूट जाये
कहीं किसी पल में
.....
कि ये नहीं ‘देह’ का
ये तो ‘आत्मा’ का बंधन हैं ॥
-----------------------------------●●●
  
किसी जनम का कोई अधूरा रिश्ता जो पूरा न हो पाया किसी वजह से वो अगले जनम में ‘मित्र’ बनकर फिर किसी मोड़ पर मिल जाता कि बाकी रिश्तों में तो अपेक्षाओं व औपचारिकताओं का निर्वहन होता लेकिन ‘दोस्ती’ एक ऐसा अनौपचारिक निःस्वार्थ बंधन होता जो हर तरह की परिस्थिति और हर तरह की कठिनाइयों के बावजूद भी साथ नहीं छोड़ता जबकि बाकी रिश्ते तो कभी-भी थोड़ी-सी मुश्किल सामने आने पर हाथ छोड़ सकते या कहीं न कहीं मजबूरीवश न चाहते हुये भी साथ-साथ तो चलते लेकिन दो लोगों को जोड़ने वाला रसायन कमजोर पड़ जाता जिससे उनके मध्य संबंधों की गर्माहट कम हो जाती पर, दोस्त तो अंतर से जुड़े होते तो बिना कहे, बिना सुने भी दिल का हाल जान जाते चाहे फिर उनके बीच कितनी भी दूरियां हो बस, आवाज़ सुनने की देर हैं और अगला बोल पड़ता कि क्या बात हैं यार, बता न...

बाकी रिश्तों में तो आमने-सामने उतरे चेहरों को देखकर भी बमुश्किल कोई समझ पाता कि ही उसके साथी के भीतर क्या हलचल चल रही केवल, चंद प्रगाढ़ संबंधों में ही ऐसा होता जहाँ दो लोग दो जिस्म एक जान की तरह होते तो महज़ एक-दूजे के अहसास से ही मायूसी के पीछे की वजह जान जाते और जब किसी रिश्ते में इतनी गहराई होती तो फिर वो एक जन्म नहीं जन्मों-जन्मों संग चलता और ‘मित्रता’ में तो ये भी कि सिर्फ एक नहीं बल्कि अनेक लोगों से ये नाता बनाया जा सकता जो आज के तकनीकी युग में तो वैश्विक स्तर पर भी बन रहा तो सभी आभासी और वास्तविक दोस्तों को 'मित्रता दिवस' की आत्मिक शुभकामनायें... :) :) :) !!!            

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© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)

०६ अगस्त २०१७

शनिवार, 5 अगस्त 2017

सुर-२०१७-२१५ : ‘आंसू’ बनो तो... ऐसा बनना...!!!


बह जाना
किसी की आँखों से
या बहाना किसी की आँखों को
बनकर आँसू...

दोनों में
बहुत फर्क होता हैं

जब आपका जाना
किसी को इतना दर्द दे जाये
कि वो आँसू रोक न पाये
तो समझो कि
किसी के दिल में आप
थोड़ी सी सही जगह तो बना पाये
जीते जी न सही मरकर तो
अपने वज़ूद का उस ग़ाफ़िल को
अहसास करा पाये

मगर,
जब आपकी वजह से
किसी की आँख नम हो जाये तो
उस दर्द का बोझ उठा पाना
आसान नहीं होता
कि कभी आपकी बेरुखी
तो कभी आपकी दिल्लगी और
कभी आपका रुखा व्यवहार
किसी के कोमल हृदय में
कांटे सा चुभ जाता
फिर उसका तीखापन एक दिन
आपको भी चुभन दे जाता

गर,
बनना ही हैं आँसू तो
फिर सुनो ख़ुशी का बनना
हंसते-हंसते आँखों से निकलना
मन को भी हल्का कर जाना ।। 
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© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)

०५ अगस्त २०१७

शुक्रवार, 4 अगस्त 2017

सुर-२०१७-२१४ : मानसून और ‘किशोर कुमार’ बिन सावन भी लगे बरसात...!!!


( हरफ़नमौला ‘किशोर दा’ के जन्मदिन पर गीतों भरी श्रद्धांजलि... )

रिमझिम गिरे सावन, सुलग-सुलग जाये मन
भींगे आज इस मौसम में, लगी कैसी ये अगन...

वैसे भी सावन और बारिश को यादों का मौसम कहा जाता हैं उस पर अपनी प्रियतमा से दूर तन्हाई के आलम में खिड़की के पास उदास खड़ा ‘अरमान’ बाहर आसमान से टपकती बूंदों को देख रहा था तो ऐसे में जैसे ही एफ. एम. पर इस गीत की स्वर लहरियां गूंजी तो गाने के बोलों ने उसे ‘दिशा’ से हुई पहली मुलाकात की याद दिला दी जब एक रात ऐसी ही झमाझम बरसात में वो उससे अचानक टकरा गया था तो उस बारिश से बचती-बचाती शर्माती सकुचाती वो उसे बड़ी ही प्यारी एकदम ‘चलती का नाम गाड़ी’ फ़िल्म की ‘मधुबाला’ जैसी लगी तो होंठो पर अपने आप ये गीत आ गया...

एक लड़की भीगी-भागी सी
सोती रातों में जागी सी
मिली एक अजनबी से
कोई आगे न पीछे
तुम ही कहो ये कोई बात हैं...

उसके बाद उन दोनों का कहीं न कहीं इस तरह से मिलना-जुलना होता रहा कभी मार्किट में तो कभी बस या सड़क पर कहीं भी जिसने उनके मन में दबी प्रेम की चिंगारी को भड़का दिया तो फिर उन दोनों ने एक-दुसरे का परिचय व मोबाइल नंबर ले लिया जिसके मार्फत उनकी बातें शुरू हो गयी जिससे उन दोनों को एक-दुसरे को जानने-समझने का मौका मिल गया और जब इस जान-पहचान से उनकी आपस में अच्छी ट्यूनिंग बन गयी तो एक दिन ऐसी ही बरसात में उन दोनों ने कुछ इस तरह से अपने प्रेम का इज़हार किया...

काटे नहीं कटते ये दिन ये रात
कहनी थी तुमसे जो दिल की बात
लो आज मैं कहती हूँ... ‘आय लव यू’

प्यार की इस शुरुआत ने उन दोनों की हिचक तोड़ दी तो दोनों ने मिलकर भावी जीवन के सपने देखना शुरू कर दिया कि किसी प्राकृतिक स्थान पर उनका अपना छोटा-सा घर होगा जहाँ आस-पास हरियाली ही हरियाली और झूमता सावन होगा कि ये बारिश अब उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गयी थी बोले तो उनकी प्रेम कहानी का एक अहम किरदार जिसने उन्हें मिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तो फिर उससे जुड़ाव होना लाज़िमी ही था इसलिये जब भी बारिश होती वे जरुर मिलने का प्रोग्राम बनाते आज भी जोरदार बरसात में दोनों सडक पर मस्ती करते हुये जा रहे थे कि अचानक ‘अरमान’ का पैर फिसल गया तो ‘दिशा’ ने उसे उठाने हाथ बढ़ाया तो उसने उसे भी अपने पास खींचकर गाना शुरू कर दिया...

आज रपट जाये तो हमें न उठइयो
हमें जो उठइयो तो खुद भी फिसल जइयो...

इस तरह हंसते-गाते उनके जीवन के दिन गुजर रहे थे और दूरियां नजदीकियों में बदल रही थी आखिर बारिश के मौसम में कोई किस तरह से खुद को संभाल सकता हैं जबकि उनके बीच प्यार भी गहरा हो तो बस, एक दिन वो उससे मिलने उसके घर पर गयी जहाँ वो अकेला ही रहता था कि तभी बारिश शुरू हो गयी तो दोनों छत पर जाकर भींगने लगे और मोबाइल पर बारिश के गीत लगा दिये जिसे सुनते-सुनते भींगने का मज़ा कुछ ज्यादा ही बढ़ गया तभी ये गीत बजा...

भींगी-भींगी रातों में ऐसी बरसातों में कैसा लगता हैं ?
ऐसा लगता हैं तुम बन के बादल मेरे बदन को भिंगो के मुझे छेड़ रहे हो...

इसने ‘अरमान’ को थोड़ा अधिक रोमांटिक बना दिया तो उसने ‘दिशा’ से उस रात वहीं रुकने की मनुहार की जिसे उसने टाल दिया और घर चली गयी पर, घर नहीं पहुंची कि उसी रात एक्सीडेंट में उसकी मौत हो गयी तब से ‘अरमान’ अकेला उन दिनों को याद कर कभी रोता तो कभी हंसता हैं कि काश, उस दिन 'दिशा' ने उसकी बात मान ली होती तो आज वो दोनों साथ होते ।

उसके जाने के बाद उसने उसके सपनों का घर उसी तरह से बनाया जैसा कि वो हमेशा से चाहती थी चारों तरफ प्राकृतिक सुरम्य वातावरण हरे-हरे पेड़ पौधे, रंगीन फूल, सुंदर उड़ती तितलियां, चहचहाते पंछी, नदी में अठखेलियाँ करती सुंदर मछलियां और सबसे बढ़कर रिमझिम बरसता सावन सब कुछ उसके मन-मुताबिक था बस, वही नहीं थी तो ये सब और वो तराने जो उनके जीवन से जुड़े उसके होने का अहसास कराते थे तब अक्सर वो सोचा करता...

चिंगारी कोई भड़के तो
सावन उसे बुझाये
सावन जो अगन लगाये
उसे कौन बुझाये ???

अब ये विरह की अग्नि यूं ही अनवरत उसके सीने में जलती हुई उसे भी सुलगाती रहेगी जिसके साथ जलकर एक दिन वो भी अपनी 'दिशा' के पास पहुंच जाएगा इसी उम्मीद पर वो जुदाई के इन लम्हों की चिता बनाकर उस पर जीवित लेटा था कि बस, जल्दी से आखिरी सांस आये जो उसे 'दिशा' से मिलाये तो उसकी ये एकाकी तड़पन सुकूँ पाये ।

मेरे नैना सावन-भादो
फिर भी मेरा मन प्यासा...

उसके घर से निकली ये एक आवाज़ दूर तक गूंज रही थी ।
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© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)

०४ अगस्त २०१७