बुधवार, 7 फ़रवरी 2018

सुर-२०१८-३८ : #प्रेमोत्सव_प्रथम_दिवस_रोज_डे


'बसंतोत्सव' याने कि प्रकृति के रंग में रंग जाना सब भूलकर कुछ पल खुद को हसीन नजारों के सुपुर्द कर देना ज़िंदगी की उलझनों और समरसता से बोझिल होकर जो नीरसता या चिड़चिड़ाहट मिज़ाज में समा गई उसे छिटककर खुद से परे उन खुबसूरत दृश्यों से ऊर्जा प्राप्त कर पुनः ऊर्जावान हो जाना ये हमारी संस्कृति हैं । हमारे यहां त्यौहार और प्रत्येक आयोजन के पीछे बड़ी वैज्ञानिक और तार्किक धारणाएं छिपी हुई जिनको न समझकर हम अनजाने में उनकी अवहेलना करते पर, जब कुछ हो जाता या कुछ मनोनुकूल नजर न आता तब फिर लौटकर वहीं आना पड़ता कि ये नियम, ये परंपराएं और ये उत्सव अपने आप में बहुत कुछ समेटे जिनको यदि उसी तरह से नियमानुसार मनाये तो निश्चित ही तन-मन दोनों को फायदा होता कि हर मौसम व ऋतु परिवर्तन के साथ हमारा आहार, विचार, व्यवहार, पहनावा बदलता जिसमें कोताही बरतना हमारे स्वास्थ्य के लिए हितकर न होता इसलिये धीरे-धीरे कुदरत के साथ कदम मिलाकर चलने की सलाह हमारे बुजुर्ग हमको देते हैं । इसी क्रम में बसंत की आमद होते ही वातावरण में ठंडक कुछ कम होने लगती और प्रकृति की इस अंगड़ाई से कलियां खिलकर मुस्कुराने लगती तो भँवरें गुन-गुन कर मंडराने लगते और पेड़ों पर नई कोंपलें तो आम पर बौर आने लगते जिससे आदमी का बौराना भी कुदरतन होता तो प्रेम के इस माहौल में वो भी कुछ-कुछ होता हैं टाइप भीतर महसूस ऐसे में भीतरी और बाहरी दोनों स्तरों पर तालमेल बिठाने के लिए मदनोत्सव का आयोजन किया जाता ।

इसी का पश्चिमीकरण 'वैलेंटाइन वीक' हैं जिसमें 7 फरवरी से 14 फरवरी तक 8 दिन का एक साप्ताहिक कार्यक्रम होता जिसमें हर दिन अहसासों के अलग-अलग मूड को महसूस कर सेलिब्रेट किया जाता और कोई उपहार भेंट कर उसे स्मृति में संजो लिया जाता जिसे मनाया जाने यूं तो बाजारवाद की देन हैं फिर भी किसी के लबों पर मुस्कान लाने या किसी की उदासी को खुशी में बदलने इसे मना लेना कोई गलत नहीं परंतु, जब इसमें स्वार्थ और वासना का समावेश हो जाता तो ये विरोध का विषय बन जाता तो ऐसे में यदि हम इसको अपने भारतीय तरीके से मनाये और इन सातों दिनों में अपनों को छोटी-छोटी सौगातें देकर उनकी सोच को बदलने का प्रयास करें तो इस देशी तड़के से ये भी देशी चाउमीन की तरह हमारा अपना हो जायेगा ।

आज प्रेमोत्सव का प्रथम दिवस जिसे 'रोज डे' कहते मनाया जा रहा तो तो इसे यूं मनाये एक गुलाब लेकर अपने रूठों को मनाये प्रेम प्रतीक के रूप में सुर्ख गुलाब का चयन इसलिये ही किया गया कि ये देखने वाले को सकारात्मकता का संदेश देता जहां इसका लाल रंग उत्साह का संदेश देता वहीं कांटों के बीच हंसता फूल मुश्किलों से लड़ने की प्रेरणा देता और पंखुड़ियां अपनी कोमलता को सहेजने की चुनौती देती तो हरी पत्तियां विपरीत हालातों में भी सुरक्षित रहने की शिक्षा देती याने कि गुलाब महज़ फूल नहीं अपने आप में एक जीवन दर्शन हैं जो किसी की कमजोर मानसिकता को मज़बूत बना सकता तो आज इस सोच के साथ किसी के टूटे मनोबल को जोड़ने का प्रयास करते हुए इसे सार्थकता प्रदान करें हैप्पी रोज़ डे कहकर गुलाब थमाते हुये इसी तरह खिलखिलाने की शुभकामना दे... तो आप सब भी गुलाब की तरह दुनिया के गुलशन में अपनी चमक बिखेरें और मुरझा भी गये तो गम नहीं यादों का हिस्सा बन भविष्य को भी मुस्कुराने की वजह दीजिये इसी शुभकामना के साथ सबको इस दिन की बधाई...☺ ☺ ☺ !!!

_____________________________________________________
© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
नरसिंहपुर (म.प्र.)

०७ फरवरी २०१८

मंगलवार, 6 फ़रवरी 2018

सुर-२०१८-३७ : #ऋतू_बसंत_आई


मौसम ने ली अंगड़ाई
वसुधा ने ओढ़ी पीली चादर
और, चली बसंती बयार
तो झूमकर ऋतू बसंत आई...

फूले पलाश-टेसू
सरसों भी खिल मुस्काई
बोले पपीहा-कोयल
अमिया भी गई बौराई
तो झूमकर बसंत ऋतु आई...

कुदरत की ये छटा
तन-मन में हर्ष अपार लाई
देख कर ये सुंदरता
कली-कली खिलखिलाई
तो झूमकर बसंत ऋतु आई...

_____________________________________________________
© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
नरसिंहपुर (म.प्र.)
०६ फरवरी २०१८


सोमवार, 5 फ़रवरी 2018

सुर-२०१८-३६ : #आधुनिक_मीरा_जुथिका_रॉय



हम सबने ‘मीरा’ के भजन पढ़े हैं लेकिन, उन्हें ‘मीरा’ के सुमधुर कंठ से सुनने का सौभाग्य हमें प्राप्त नहीं हुआ तो शायद, इसलिये ईश्वर ने उस आवाज़ को २० अप्रैल १९२० में बंगाल के अविभाजित ‘हावड़ा’ जिले ‘आमता’ नामक स्थान में ‘जुथिका रॉय’ के नाम से फिर एक बार इस धरती पर भेजा ताकि हम उस अमृतमयी वाणी का आस्वादन कर सके और तकनीक के वरदान की वजह से हम सब इतने भाग्यशाली कि जो हम उस वक़्त न सुन सके वो आज ‘यू-ट्यूब’ या ‘इंटरनेट’ के जरिये देख-सुन सकते इसके साथ ही हम अंदाजा लगा सकते कि जब ये स्वर फिजाओं में गूंजते होंगे तो कैसा समां बनता होगा बिल्कुल वैसा ही जैसा कभी ‘मीरा बाई’ के गाने से भक्तिकाल में निर्मित होता होगा जिसको सुनकर जड़-चेतन सभी मंत्रमुग्ध होकर जहाँ के तहां स्थिर रह जाते थे और ये कामना करते थे कि ये स्वर लहरियां इसी तरह इस माहौल को संगीतमय बनाकर सबके अंतर में सुरीलापन घोल दे

उन पर माँ सरस्वती की विशेष अनुकंपा थी तभी तो मात्र १२ साल की उम्र में १९३२ से ही उन्होंने गायन का श्रीगणेश कर दिया और न केवल गाया बल्कि इस कमसिन आयु में उनका प्रथम म्यूजिक अलबम भी रिलीज हो गया जिसने ये जता दिया कि आने वाला समय इस गायिका को न केवल संगीत की दुनिया का सितारा बनायेगा बल्कि, ‘आधुनिक मीरा’ का ख़िताब देकर इतिहास में हमेशा-हमेशा के लिये अमर बना देगा ‘जुथिका रॉय’ की इस अलौकिक प्रतिभा को कवि काजी ‘नजरूल इस्लाम’ और कम्पोजर ‘कमल दास गुप्ता’ ने पहचाना व तराशा जिसकी वजह से १९४० व १९५० में वे देश की शीर्षस्थ गायिकाओं में उनका नाम दर्ज हुआ और उनके गाये भजन ‘घुघंट के पट खोल...’, ‘पग घुंघुरू बांध मीरा नाची...’, ‘तोरे अंग से अंग मिलाके कन्हाई...’, ‘मैं राम नाम की चुड़ियाँ पहनूं...’, ‘मैं तो वारी जाऊं राम...’ इत्यादि ।


१५ अगस्त १९४७ को जब भारत आज़ाद हुआ तो उसके प्रथम स्वतंत्रता दिवस पर देश के पहले प्रधानमंत्री ‘पंडित जवाहर लाला नेहरूजी’ उनसे व्यक्तिगत रूप से विनती की कि, वे जब तक तिरंगा फहराये उन्हें रेडियो पर लगातार अपने गाने को जारी रखना चाहिये जो ये साबित करता कि उनकी आवाज़ असाधारण थी जिसे उसी स्तर का सम्मान देने के लिये इससे उपयुक्त वक़्त और कालखंड दूसरा नहीं हैं । वैसे तो हमने हमेशा यही पढ़ा कि ‘गाँधी जी’ का प्रिय भजन ‘वैष्णव जन तो तेणे कहिये, जे पीर पराई जाणे रे...’ हैं परंतु, ये एकमात्र ऐसी स्वर साधिका जिनके गाये भजनों को ‘गांधीजी’ भी पसंद करते थे और कहते हैं कि जब वे पुणे की जेल में थे तब उनके गाने हर दिन सुनते थे और हर सुबह प्रार्थना सभा की शुरूआत उनके ही गाने बजाकर करते थे किसी भी गायिका के लिये इससे बड़ी उपलब्धि भला और क्या होगी ।   

इतनी बड़ी-बड़ी और महानतम शख्सियतों को अपने गायन से प्रभावित करने वाली इस कोकिला को भारत सरकार ने उन्हे देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार ‘पद्म श्री’ से भी सम्मानित किया जो निश्चित ही उस पुरस्कार से कम था जो उन्हें अपने प्रसंशकों के द्वारा प्राप्त हुआ लेकिन, सरकार का इस प्रकार उनकी कला को मान देना ‘जुथिका रॉय’ को सदैव के लिये सुधीजनों के हृदय में अंकित कर गया ऐसे में आज के दिन ५ फरवरी २०१४ में वे हम सबको छोड़कर चली गयी लेकिन, अपनी आवाज़ के रूप में सदा हमारे बीच उपस्थित रहेंगी... मन से नमन... ☺ ☺ ☺ !!!

_____________________________________________________
© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
नरसिंहपुर (म.प्र.)

०५ फरवरी २०१८

रविवार, 4 फ़रवरी 2018

सुर-२०१८-३५ : #विश्व_कैंसर_दिवस_जागरूकता_से_करें_रोग_शमन



‘कैंसर’ एक ऐसा रोग या बीमारी अक्सर, जिसका नाम सुनते ही लोग डर जाते हैं और रोग कोई भी हो वो न तो व्यक्ति, न उसका कद या पद देखता, न ही देश या समाज से उसे कोई सरोकार होता तो ऐसे में इसके विरुद्ध लोगों को लड़ने व जागरूकता फ़ैलाने के लिये २००५ से ‘विश्व कैंसर दिवस’ मनाया जा रहा हैं ताकि, संपूर्ण जगत के लोगों को इस महारोग के बारे में सही-समुचित जानकारी दी जा सके और वो इसे ‘हौवा’ समझकर भयभीत होकर इसके आगे अपने घुटने न टेक दे जिसका परिणाम कि अब ये उतना भयावह या असाध्य रोग नहीं समझा जाता जितना कि कुछ साल पूर्व समझा जाता था बल्कि, अब तो कुछ लोगों ने जिस तरह से इसको हराकर दुनिया के सामने अपनी अनुभवों को साँझा किया तो इसकी वजह से शरीर में बनी गाँठ भले ही उसी तरह से तकलीफ़देह हो लेकिन, इसके प्रति बनी इस धारणा की गठान कुछ ढीली पड़ी हैं कि ‘कैंसर’ एक लाइलाज़ मर्ज हैं

शुरूआती दौर में ये एक ‘चुप्पा बदमाश’ की तरह धीरे-से शरीर के किसी भी हिस्से को अपना निशाना बनाता फिर धीरे-धीरे संपूर्ण तन ही नहीं मन पर भी अपना जाल फैलाकर दोनों को कमजोर बना देता और जैसा कि हम जानते कि ‘मन के हारे, हार हैं... मन के जीते, जीत’ तो वही होता लोग जितना इस व्याधि से अपने जीवन को नहीं खोते उससे ज्यादा तो इससे होने वाले भय से अपने भीतर संचित शक्ति व ऊर्जा को भी खत्म कर देते हैं जिसकी वजह से इसे अपने पैर फ़ैलाने में अधिक सुविधा होती जिससे कि ‘जो डर गया, वो मर गया’ वाली कहावत चरितार्थ हो जाती मगर, जिसने इसके खिलाफ जंग छेड़ी अपने आपको मजबूत कर इसके विरुद्ध खड़ा हुआ तब कुछ देर तो उसे इसके कष्टप्रद इलाज के कारण परेशानी जरुर झेलनी पड़ती परंतु, अंततः इसे उसके शरीर को छोड़ दुम दबाकर भागना पड़ता जिसके अनेक जीते-जागते उदाहरण हमारे समक्ष अपनी सशक्त मौजूदगी व पूर्ण दम-ख़म के साथ उपस्थित हैं         

यदि इसके संदर्भ में अपने देश ‘भारत’ की बात करें तो ‘तंबाखू’, ‘धुम्रपान’, ‘मद्यपान’ जैसे हानिकारक व नशीले पदार्थों का सेवन करने और कुछ अपने शरीर के प्रति लापरवाही की वजह से भी हमारे यहाँ इसके रोगियों की संख्या अधिक हैं जिससे कि अमूमन इसका पता बड़ी देर से चलता तब तक ये अपनी सामान्य अवस्था से खतरनाक स्टेज तक पहुंच जाता तो उपचार भी कठिन होने के साथ-साथ संभवनाओं से परे हो जाता हैं इसलिये इस दिवस का यही उद्देश्य कि सभी लोगों में इसके प्रति जागृति आये और वे समय-समय पर अपना चेकअप करवाये जिससे कि इससे ग्रसित व्यक्ति समय पूर्व ही इसके प्रति सचेत होकर सजगता के साथ अपने इलाज के लिये शारीरिक व मानसिक रूप से तैयार हो सके और वे जो इतने सक्षम नहीं कि इसका खर्च वहन कर सके उनके लिये भी सामाजिक संगठनों व अपने आस-पास के दायरे से अनुदान की व्यवस्था करें तो फिर इसे समूल नष्ट करना रोग-विज्ञान से इसका नाम मिटाना कोई असंभव कार्य नहीं होगा बस, संकल्प लेने की देरी हैं
       
आज ‘विश्व कैंसर दिवस’ पर यही शपथ लेना हैं कि दूसरों को इसके प्रति सजग करना हैं और जिन्हें इसने जकड़ा हुआ उनका आत्मबल बढ़ाकर इससे मुक्त कराना हैं... ☺ ☺ ☺ !!!

_____________________________________________________
© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
नरसिंहपुर (म.प्र.)

०४ फरवरी २०१८

शनिवार, 3 फ़रवरी 2018

सुर-२०१८-३४ : #चौदहवीं_का_चाँद_वहीदा_रहमान


चौदहवीं का चाँद हो
या आफ़ताब हो
जो भी तुम खुदा की कसम
लाज़वाब हो...

इस एक गीत से केवल उसकी खुबसूरती का अंदाजा लिया जा सकता जो निसंदेह लाज़वाब हैं क्योंकि, बड़ी-बड़ी बोलती हुई शरारती आँखें उस पर कमान-सी तनी हुई भवें और उनके बीच से निकलती नुकीली पतली गढ़ी हुई सुतवां नाक जिस पर हीरे की लौंग ऐसी जंचती कि पता न चलता किसकी अहमियत अधिक फिर उसे देखकर ये पक्का हो जाता कि उसने पहनी इसलिये हीरा चमक उठा हैं यकीन न हो तो ‘तीसरी कसम’ एक बार जरुर देख ले जिसमें उनके किरदार का नाम भी ‘हीरा ही हैं अब बात करें यदि उनके फूल की पंखुरी के मानिंद गुलाबी-गुलाबी होंठों की तो लगता जैसे कोई गुलाब ही खिल उठा हो और जिस सुराहीदार गर्दन पर ये पूरा चाँद-सा मुखड़ा टिका उसका क्या कहना कि खुदा ने बड़ी फुर्सत से बनाया होगा इसे... ये जुमला ‘वहीदा रहमान’ पर सटीक बैठता हैं जिनकी देहयिष्ट भी सांचे में ढली हुई जैसे किसी संगतराश ने बड़े ही इत्मीनान से एक-एक अंग को तराशकार उस आकार में गढ़ा हो जैसा कि नायिकाओं का वर्णन साहित्य में किया गया हैं

खुदा भी आसमां से
जब ज़मीं पर देखता होगा
मेरे मेहबूब को किसने बनाया
सोचता होगा ?

ये गीत भी निश्चित उनके अनुपम और मुगलई सौंदर्य को देखकर ही लिखा गया होगा लेकिन, इसे पढ़कर कहीं आप ये न सोचने लगन कि वो महज़ सुंदरता की एक जीती-जागती प्रतिमा मात्र हैं बल्कि, उनमें अभिनय प्रतिभा भी उतनी ही शिद्दत से भरी हुई थी तो ऐसे में सोचिये जब वो रजतपट पर नमूदार होती होंगी तो किस तरह का जादू बिखरता होगा तो वही हुआ जब उन्होंने हिंदी सिने जगत के सबसे सुनहरे दौर में इस क्षेत्र को चुना जिसका श्रेय उस जमाने के सर्वाधिक प्रतिभावान निर्देशक-अभिनेता ‘गुरुदत्त’ को जाता हैं जिन्होंने दक्षिण में तमिलनाडु के मुस्लिम परिवार में जन्मी ‘वहीदा’ की सादगी-सुंदरता, नृत्य में प्रवीणता और तहजीबी नाजों-अंदाज के चलते उन्हें अपनी ‘सी.आई.डी’ मूवी में बेहद छोटी-सी वो भी नकारात्मक भूमिका दी परंतु जब उन्होंने इस चरित्र में अपने नैनों के बाण चलाये और अपनी अदाओं के जलवे बिखेरें तो देखने वाले उसके किरदार के मुताबिक दिखाये गये लटकों-झटकों की गिरफ़्त में आ गये हालाँकि रोल बेहद छोटा था पर, जब वे ‘देव आनंद’ से बड़े ही रहस्यमय अंदाज में कहती हैं कि ‘मुझे एक गूंगा तोता चाहिये’ तब उनकी संवाद अदायगी, आँखों की भाव-भंगिमायें और हाथों के सधे हुये संचालन ने फ़िल्मी दुनिया में उनके भविष्य को सुनिश्चित कर उसे इतिहास में अपना नाम दर्ज करने का मौका दे दिया

कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना
जीने दो ज़ालिम बनाओ न दीवाना
कोई न जाने इरादे हैं किधर के
मार न देना तीर नज़र का किसी के जिगर पे
नाज़ुक ये दिल है बचाना ओ बचाना
कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना

इस एक गीत ने उनके अंदर छिपी नैसर्गिक अभिनय क्षमता का परिचय दे दिया और इसके शब्दों ने उनके इरादे भी ज़ाहिर कर दिये ‘कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना’ याने कि आज ‘खलनायिका’ का रोल जरुर कर रही हूँ लेकिन, एक दिन जरुर ‘अभिनेत्री’ बनकर इस पर्दे पर छा जाउंगी तो जब उस दौर के नामचीन अभिनेताओं और निर्देशकों का साथ उनको मिला तो फिर मानो उनका स्वप्न सत्य हो गया और एक के बाद एक प्यासा, कागज़ के फूल, साहिब बीबी और ग़ुलाम, तीसरी कसम, ख़ामोशी, गाइड, काला बाज़ार, सोलवां साल, बात एक रात की, मुझे जीने दो, आदमी, दिल दिया दर्द लिया, फागुन, कोहरा, प्रेम पुजारी, पत्थर के सनम, नीलकमल, बीस साल बाद, शगुन, मशाल, अदालत, एक फूल चार कांटे, धरती, नमकीन, एक दिल सौ अफ़साने जैसी अनगिनत फिल्मों का हिस्सा बनकर उन्होंने कीर्तिमान रचा और आज भी वे यदा-कदा रजत परदे पर नजर आ जाती हैं याने कि उनकी प्रभावशाली गरिमामय उपस्थिति अब भी हमको उस सुनहरे अतीत से जोड़े हुये हैं... आज उनके जन्मदिवस पर उनको अपने सभी चाहने वालों की तरफ से ढेर सारी शुभकामनायें... ☺ ☺ ☺ !!!

_____________________________________________________
© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
नरसिंहपुर (म.प्र.)

०३ फरवरी २०१८

शुक्रवार, 2 फ़रवरी 2018

सुर-२०१८-३३ : #प्रेम_भूला_अकड़_लेता_जकड़



‘युविका’ का गुस्सा जैसे हमेशा उसकी छोटी-सी नाक पर बैठा ही रहता लेकिन, कुछ दिनों से उसकी बड़ी बहन महसूस कर रही थी उसकी छुटकी कुछ बदल रही हैं जिसका मूड पल में तौला, पल में माशा और शेयर मार्किट की तरह अप-डाउन होता रहता और उसकी इगो तो बर्फ की मानिंद पिघलकर न जाने कब फिजाओं में काफूर हो चुका बस, मोबाइल की स्क्रीन चमकने की देर और कितनी भी उदास हो तुरंत मुस्कुराने लगती हैं

वजह की पड़ताल की तो निष्कर्ष कुछ यूँ सामने आया जिस दौर से वो खुद गुजर चुकी थी... तो उन्हीं ख्यालों में खो गयी...

●●●●●
कर लिया...
एकदम दृढ फैसला
और इस बार ये अंतिम भी हैं
कि चाहे अब कुछ भी हो
मुझे तुमसे बात नहीं करना हैं
न ही भेजना हैं कोई संदेश
जब तुम मेरे बिना रह सकते हो
मुझे याद किये या संदेश भेजे बगैर तुम्हारा
दिल बड़ा अच्छा गुज़रता तो
फिर मैं अकेली ही क्यों ?
पीड़ा के इस झंझावत से गुजरूं
खुद से ही सवाल करूँ
और फिर खुद को ही कोई भी
संतोषजनक उत्तर देकर मनाती रहूँ
जबकि, तुम अपनी सुविधा
और अपने समय के मुताबिक
किसी टाइमपास साधन की तरह
जब भी जी चाहे मेरा इस्तेमाल करो
और मैं किसी टुकड़े की तरह फेंके गये
तुम्हारे उस संदेश को अमृत मान ग्रहण करती रहूँ
खुद को धन्य समझती रहूँ
अब बस, बहुत हुआ
ये आखिरी संदेश बाद इसके
कल से तुमको कोई संदेश न भेजना हैं
चाहे तुम कितना भी क्यों न मना लो
या कितना भी अच्छा संदेश क्यों न भेजो ?
अब तुम्हारी मनमानी नहीं सहने वाली मैं
तुम्हारी उँगलियों के इशारों पर
कठपुतली से नहीं नाचने वाली मैं
तभी अचानक मोबाइल का स्क्रीन चमका
तुम्हारा नाम दिखाई दिया
जिसे देखकर लब मुस्कुरा उठे
सर्वांग में ख़ुशी की लहर दौड़ गयी
फिर मैं सब भूल तुमसे बतियाने लगी
लेकिन, चंद दिन बाद
फिर वही संकल्प और कसम का दौर
फिर यही अंजाम कि
प्रेम का अहसास भी किस तरह
बड़ी आसानी से स्वाभिमान को खत्म कर देता
वो जो सबसे अकड़ते
सीधे मुंह बात तक न करते और
सड़ी-सड़ी सी बातों में जिनका अहं आहत हो जाता
वो भी प्रेम के आगे रीढ़विहीन हो जाते
उस असाध्य को पाने फिर एक बार जुट जाते ।।
---------------------------------------------------------●●●

‘प्रेम’ ही वो औषध जिसने ये कायापलट किया और उसकी ‘लिटिल सिस्टर’ को जीना सीखा दिया कभी जिन अहसासों को वो महसूस नहीं कर पाती थी अपने ‘इगो’ के कारण अब उनको जी रही थी, ‘प्यार’ की लहरों संग बह रही थी... उसे उसकी चाहत मिल जाए ये दुआ कर वो कब हाथ उठा बैठी पता न चला... तो आसमान की तरफ देखकर बोली.. आमीन... ☺ ☺ ☺ !!!

_____________________________________________________
© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
नरसिंहपुर (म.प्र.)

०२ फरवरी २०१८

गुरुवार, 1 फ़रवरी 2018

सुर-२०१८-३२ : #आकाशीय_करिश्मा_कल्पना_चावला




‘करनाल’ से ‘अंतरिक्ष’ तक की उड़ान भरने वाली देश की बेटी ‘कल्पना चावला’ को बचपन से ही आकाशीय ग्रह-नक्षत्रों से बड़ा प्यार था और उनके बारे में जानने की गहन उत्सुकता ही थी जो उन्हें पहले एक छोटे-से गाँव से विदेश और फिर वहां से आसमान तक ले गयी और उसके बाद उसी जगत में वो खो भी गयी इस तरह से अपनी ही बात को सच साबित कर गयी जिसे वो जाने-अनजाने अक्सर कहा करती थी, “मैं अंतरिक्ष के लिए ही बनीं हूं, हर पल अंतरिक्ष के लिए बिताया और इसी के लिए मरूंगी” तो १ फरवरी २००३ को जब हर कोई उनके वापस लौटकर आने और अंतरिक्ष में बिताये अपने बहुमूल्य समय में हुये अनुभवों की दास्तान सबको सुनाने की प्रतीक्षा कर रहा था तभी वो दर्दनाक हादसा घटित हुआ उनका यान ‘कोलंबिया’ जो आकाश से धरती को छूने ही वाला था ने जैसे ही पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश किया, वैसे ही उसकी उष्मारोधी परतें फट गईं और यान का तापमान बढ़ने से वो दर्दनाक हादसा घटित हुआ जिसने धरती की बेटी को वापस अंतरिक्ष में बुला लिया इस तरह भारत को गौरवान्वित करने वाली और जन्म से पहले ही कोख़ में मरने वाली अनेक अजन्मी बच्चियों को बचाने वाली आकाशीय परी सूक्ष्म तरगों में विलीन हम सबसे हमेशा-हमेशा के लिये जुदा हो गयी मगर, बेटियों को एक संदेश दे गयी कि अगर वो कोशिश करें तो आसमान भी उनकी पहुंच से दूर नहीं बस, उड़ान भरने की देर हैं

ऐसा नहीं हैं कि ‘कल्पना’ के लिये ये यात्रा आसान थी वो भी उस राज्य में जहाँ बेटियों के लिये खुलकर साँस लेना भी आसान नहीं होता जहाँ की संकुचित विचारधारा और रुढ़िवादी माहौल में दम घुटता हैं वहां उसने एक मध्यमवर्गीय परिवार में १७ मार्च १९६२ को जनम लिया इसके बाद शुरू हुआ अपने लक्ष्य तक पहुंचने का दुर्गम सफर जब उन्होंने स्कली पढ़ाई समाप्त करने के बाद चंडीगढ़ के पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज में एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में बी.टेक की पढ़ाई के लिए एडमिशन लिया । उस समय तक भारत ने अंतरिक्ष विज्ञान में उतनी तरक्की नहीं की थी अतः अपने सपने को पूरा करने और ‘अंतरिक्ष’ तक पहुंचने के लिये एकमात्र रास्ता ‘नासा’ से ही गुजरता था तो १९८२ में वे अमेरिका चली गईं जहाँ उन्होंने ‘टैक्सस यूनिवर्सिटी’ से ‘एयरोस्पेस इंजीनियरिंग’ में ‘एम.टेक’ की पढ़ाई पूरी करने के बाद ‘यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो’ से ‘डॉक्टरेट’ की डिग्री भी हासिल की याने कि अंतरिक्ष जगत का उच्चतम ज्ञान प्राप्त कर लिया । अब बारी थी इस ज्ञान को व्यवहार में उतारने की की जिसके लिये अन्तरिक्ष में उतरना जरूरी था तो आख़िरकार १९८८ में ‘कल्पना चावला’ को अपनी तयशुदा मंजिल ‘नासा’ के ‘रिसर्च सेंटर’ में नियुक्ति मिल गयी जिसने उनके मन में ये विश्वास जगाया कि अब वो दिन दूर नहीं जब वो उड़कर सितारों के पास पहुंच जायेगी उनको छूकर अपनी कल्पना से मिलान कर सकेगी

फिर आया साल १९९५ जो उनके लिये बड़ी खुशखबरी लाया जब मार्च में उनको पहली अंतरिक्ष उड़ान के लिए चुन लिया गया और उनका पहला अंतरिक्ष मिशन १९ नवंबर १९९७ को शुरू हुआ जिसमें ६ अंतरिक्ष यात्रियों के साथ उन्होंने उड़ान भरी और अंतरिक्ष में पहुंचकर उन्हें लगा मानो उनका ख़्वाब पूरा हुआ कि यही वो जगह थी जहाँ वो शुरू से ही पहुंचना चाहती थी इस यात्रा ने उनके भीतर उत्साह ही नहीं परम आत्म-विश्वास से भर दिया कि यदि आत्मबल मजबूत हो तो कोई भी लक्ष्य मुश्किल नहीं और उनकी इस सफ़लता ने देश की बेटियों को भी आत्माभिमान से भर दिया कि आसमान भी दूर नहीं चाहे तो उसे वे हाथ बढ़ाकर छू सकती हैं उसके बाद २००० में उनको दूसरे अंतरिक्ष मिशन के लिए भी चुन लिया गया परंतु, हमारा दुर्भाग्य कि ये उनके जीवन का आखिरी मिशन भी साबित हुआ क्योंकि इसकी शुरुआत ही तकनीकि गड़बड़ियों के साथ हुई जिसकी वजह से वो काफी विलंब से १६ जनवरी २००३ को उड़ान भर पाया इस मिशन में वे १६ दिन अंतरिक्ष में बिताकर जब आज के दिन ही वापस लौट रही थी तो धरती पर कदम रखने से पहले ही हवाओं में बिखर गयी पुनः अंतरिक्ष में लौट गयी मगर, ये कह गयी कि “स्वप्न से सफ़लता तक पहुंचने का कोई मार्ग नहीं लेकिन, यदि आपके पास अपना कोई ख्वाब हैं तो रास्ता आपको स्वयं ही ढूँढना होगा और फिर उस पर लक्ष्य प्राप्ति तक चलने का हौंसला भी करना होगा” उनके अनुभव से निकली ये सीख हम सबके लिये प्रेरणा हैं... नमन... देश की बेटी को...
  
_____________________________________________________
© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
नरसिंहपुर (म.प्र.)

०१ फरवरी २०१८