सोमवार, 7 मई 2018

सुर-२०१८-१२७ : #बहुमुखी_प्रतिभा_से_भरपूर #नोबल_विजेता_गुरुदेव_रबिंद्रनाथ_ठाकुर



‘रवि’ सम तेज
‘इंद्र’ जैसी बौद्धिकता लिये
‘नाथ’ बनकर आये वो
‘टैगोर’ परिवार धन्य हुआ
७ मई १८६१ को जन्मे वो बंगभूमि
विलक्षण काबिलियत समाहित थी उनमें
बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे वो
साहित्य, कविता, नृत्य और संगीत
हर विधा में दक्ष हुये
अद्भुत कलाकार और साहित्यकार बन
देश-विदेश में हुये विख्यात
कलम से निकलते शब्द अनुपम
रचते नित साहित्य नूतन   
लिखे कविता या फिर कहानी कोई
होता वो अद्वितीय सृजन
रहते प्रकृति के निकट वो हरदम
पाकर जिससे ऊर्जा भरपूर
बन गये सतत क्रियाशील और सजग
देकर गये हमें खज़ाना संपूर्ण
अपनी लेखनी का बजाय विश्व में डंका
पाकर ‘नोबल’ साहित्य का फिर
बने ‘गुरुदेव’ अजर-अमर
लिखकर राष्ट्रगान दो देशों का
हुये मातृभूमि से ऋणमुक्त
आज जयंती पर हम सब मिलकर
आओ करें उन्हें शत-शत नमन !!!  

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© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
नरसिंहपुर (म.प्र.)
०७ मई २०१८

रविवार, 6 मई 2018

सुर-२०१८-१२६ : #कहीं_स्माइली_में_ही_न_रह_जाये_हंसी #विश्व_हास्य_दिवस_की_समझो_अभिव्यक्ति



आज तो लोग अपनी हंसी हो या ख़ुशी या कोई भी इमोशन उसे दर्शाने के लिये इमोजी का सहारा लेते हैं जो इस कदर हमारे जीवन में शामिल हो गया कि लगता धीरे-धीरे तकनीक के संग कदमताल करते हम एक दिन मशीन बन जायेंगे और फिर अपने होंठो पर सच्ची हंसी की जगह स्टीकर चिपकाकर ही अपनी फीलिंग्स को एक्सप्रेस करेंगे क्योंकि, यंत्रों के बीच रहते-रहते हम अपने भीतर के अहसासों को अभियक्त करना भूल रहे

अपनी आंतरिक गहन अनुभूतियों को आज हम नकली चित्रों के माध्यम से प्रदर्शित कर रहे फिर ये कैसे संभव नहीं कि हम इसके अभ्यस्त नहीं हो जायेंगे वैसे भी लोग दिखावे और बनावटी जीवन शैली को लोग जिस तरह से अमल में ला रहे वो दिन दूर नहीं जब हंसने के पहले सोचेंगे कि कहीं हंसने की वजह से उन्हें असभ्य तो नहीं समझा जायेगा खुद को सभ्य-सुसंस्कृत दिखाने का कुछ लोगों पर अत्याधिक दबाब हैं

जिसके कारण उन्हें अपने होंठो को कितने इंच तक फैलाना ये भी पहले से तय होता जिसका दायरा बढ़ने से उन पर गंवार होने का ठप्पा लगने का भय रहता इसलिये वे रोबोट की तरह निर्देशानुसार ही उनका इस्तेमाल करते जबकि, ये वो वरदान ईश्वर का जो सिर्फ इंसानों को ही मिला परंतु, इसे अभिशाप में बदलने में जिस तरह से जुटे हुये लोग तो निसंदेह ‘हास्य दिवस’ मनाकर ही उसकी पूर्ति की जायेगी

ऐसे में वो चीज़ जो बेमोल जिसे हम जन्म से ही सीखकर आते वो विलुप्ति की कगार पर आ गयी जिसे सहेजने दिवस बना दिया गया और अब तो बचपन भी मोबाइल में खोया जिसे देखकर हम बेसाख्ता हंस लिया करते थे अब तो सब सोशल मीडिया पर नकली सामाजिकता का निर्वहन करते-करते असलियत का व्यवहार ही भूल गये ऐसे में इन छोटे-छोटे चित्रों पर ही सारा भार आन पड़ा जिनका उपयोग कर हम अपनी जिम्मेदारियों से नहीं बल्कि अपने भीतर की स्वाभाविक अभिव्यक्ति से महरूम हो रहे

‘विश्व हास्य दिवस’ का आयोजन कर इसकी खानापूर्ति कर रहे जिसकी कोई आवश्यकता नहीं क्योंकि हंसी का कोई दिन नहीं हर पल, हर एक क्षण और हर दिन होता इसलिये इस तरह के दिवस का कोई औचित्य नहीं परंतु, आधुनिक जीवन में तनाव व अवसाद के चलते भी इंसान हंसने के लिये समय नहीं निकाल पा रहा तो इस दिन को बनाया गया जो संकेत कर रहा कि संभल जाओ अपनी उस निश्छल हंसी को याद करो जिसे लेकर जन्मे हो कृत्रिम हंसी इसकी पूर्ति नहीं कर सकती न आपकी रगों में खून के संचार को ही बढ़ा सकती उसके लिये तो खुद को ही खुलकर हंसना पड़ेगा तभी हर एक लम्हा हास्यमय हो सकेगा... ☺ ☺ ☺ !!!
     
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© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
नरसिंहपुर (म.प्र.)
०६ मई २०१८

शनिवार, 5 मई 2018

सुर-२०१८-१२५ : #महिलाओं_अधिकारों_के_प्रति_रही_सदैव_सचेत #भारत_की_पहली_महिला_चीफ_जस्टिस_लीला_सेठ




“एक जज होने के बाबजूद  अगर मुझे जिद्दी नौकरशाही  से इतनी परेशानियो का  सामना करना पड़ सकता है, अगर एक जज होते हुई भी मुझे अपने पति को अड़ियल व भारी  भरकम कंपनी से लडने की जगह सुलह करने की सलाह देनी पड़ती है तो कानून की पेचीदगियो  मे फंसे उन आम लोगो को कितनी परेशानियो और मुश्किलों का सामना करना पड़ता होगा, जिनकी सता तक पहुच नही है या जिनकी सुने वाला कोई नही है और जिनके पास लम्बे समय तक मुकदमा लडने के लिये पैसा और समय नही है या जिन्हें यह जानकारी नही है की नया या अपना हक़ पाने के लिये किसका दरवाजा  खटखटाए”

देश की प्रथम ऐसी महिला जिन्होंने 1958 में लंदन बार परीक्षा में शीर्ष स्थान प्राप्त किया और दिल्ली उच्च न्यायालय की पहली महिला न्यायाधीश बनने के साथ ही भारत में उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश बनने वाली प्रथम महिला बनने का श्रेय प्राप्त किया उन ‘लीला सेठ’ का ये कथन अपने आप में ही बहुत कुछ कहता हैं । जिसकी व्याख्या की जाये तो ऐसे अनेक तथ्य सामने आयेंगे जो ये दर्शाते हैं कि आम हो या ख़ास सभी का जीवन संघर्षमय होता हैं और सबको ही अपने जीवन में खट्टे-मीठे अनुभवों से गुजरकर ही न केवल मुकाम बल्कि, जीवन दर्शन का अद्भुत ज्ञान प्राप्त होता हैं जिसका निचोड़ वो हम सबके साथ साँझा कर हमें अहसास दिलाते कि सबको ऐसी सच्चाइयों का सामना करना पड़ता हैं ।

20 अक्टूबर, 1930 को उत्तरप्रदेश के लखनऊ में जन्मी ‘लीला सेठ’ की कहानी किसी परीकथा की तरह खुशियों से भरी हुई नहीं बल्कि, एक आम लड़की के संघर्ष की गाथा हैं जिसे बचपन से ही मुश्किलों के साथ जीने की आदत पड़ गयी क्योंकि, उनके जन्म के बाद उनके सर से उनके पिता का साया उठ गया ऐसे में उनकी माँ ने अकेले ही उनका लालन-पालन किया और हर तर्क की कठिनाइयों से गुजरकर उन्होंने ऐसा मुकाम हासिल किया कि इतिहास ही रच दिया । उनकी इस अभूतपूर्व उपलब्धि के लिये सदैव उनका नाम शीर्ष पर ही लिया जायेगा जिन्होंने उस कठिनतम समय में हिम्मत हारने की जगह मेहनत व लगन से महिला सशक्तिकरण की इबारत लिखी जिससे प्रेरणा पाकर अनेक स्त्रियों ने अपने जीवन की दिशा बदली और ये मान्यता टूटी कि पुरुषों के वर्चस्व क्षेत्र में औरतें भी न केवल सेंध मार सकती हैं बल्कि, इतना अच्छा काम कर सकती हैं कि आने वाले पीढियां उसके बनाये मार्ग पर चलकर अपने जीवन की राह खुद चुनकर अपनी मंजिल प्राप्त कर सकती हैं ।   

“कोई नहीं चाहता था कि, मैं ये पुरुषप्रधान पेशा अपनाऊं जब मैं काम करने लगी तो मुझे केसेस ये सोचकर नहीं सौंपे जाते थे कि मैं एक औरत हूँ इन्हें ठीक से हैंडल नहीं कर पाऊँगी”

अपनी आत्मकथा में उन्होंने स्वीकार किया कि उनके लिये भी ये पेशा अपनाना आसान नहीं था लेकिन, उन्होंने अपने अनूठे फैसलों और उल्लेखनीय कामों से न केवल देश बल्कि, विदेशों में भी अपने नाम का डंका बजाया और अपने देश का मान-सम्मान बढाया जिसके लिये उनको हमेशा गर्व के साथ याद किया जायेगा कि उन्होंने स्त्री-पुरुष समानता के लिये आवाज़ उठाई तो हिन्दू उत्तराधिकार क़ानूनों में संशोधन कराया जिसके तहत संयुक्त परिवार में बेटियों को बराबर का अधिकार प्रदान किया और स्त्रियों के खिलाफ होने वाले यौन हिंसा अपराध में कड़े नियम बनाने की पहल की इस तरह उन्होंने स्त्री होने के नाते स्त्रियों की समस्याओं को न सिर्फ समझा बल्कि उसके लिये काम भी किया ।

अपनी जिंदगी में सतत क्रियाशील रहने वाली और महिला हितों की चिंतक ‘लीला सेठ’ पिछले साल आज ही के दिन ८७ साल की उम्र में हम सबको छोडकर जरुर चली गयी लेकिन, उनके द्वारा किये गये कार्य व उनकी उपलब्धियां उनकी याद दिलाती रहेंगी... आज उनकी पुण्यतिथि पर उनका पुण्य स्मरण व उनको मन से नमन... !!!     

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© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
नरसिंहपुर (म.प्र.)
०५ मई २०१८

शुक्रवार, 4 मई 2018

सुर-२०१८-१२४ : #लघुकथा_शर्मिंदा_नहीं_हूं_मैं



ये उस वक़्त का सच था जब मैं उसे प्यार करती थी लेकिन, आज नहीं करती तो इस पर क्या मुझे शर्मिंदा होना चाहिए?

मैं वो नहीं कह रही पर, जब ये सब सोशल मीडिया पर लिखा अपने प्यार का सरेआम ढिंढोरा पीटा फोटोज शेयर किए तब सोचना था यार, थोड़ी तो गुंजाइश रखनी थी भविष्य को सोचकर...

प्यार की यही तो खासियत हैं गुंजन कि वो गुंजाइशों के साथ नहीं होता या तो होता हैं या नहीं होता बीच वाली स्थिति केवल वहीं बनती जहां फायदे के हिसाब से निर्णय लिया जाता पर, हमने प्रेम किया तो ये सब न सोचा जो उस समय महसूस किया वहीं लिखा आज भले वो सच नहीं मगर, कल तो था और मैं अपने उन इमोशन या फीलिंग्स पर बिल्कुल भी शर्मिंदा नहीं सहेलियां या रिश्तेदार मजाक उड़ाए तो उड़ाते रहे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता मैँ उसे उसी डेट के साथ देख रही तो वो मुझे गलत नहीं लग रहा तब मैं वही सोचती थी पर, आज नहीं तो क्या करूँ?

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© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
नरसिंहपुर (म.प्र.)
०४ मई २०१८

सुर-२०१८-123 :



प्रेस और पत्रकारों की आज़ादी का पर्व मुबारक हो सबको जिसने कलम को दी सच बोलने की ताकत अपनी बात रखने की स्वतंत्रता...  ☺ ☺ ☺ !!!

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© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
नरसिंहपुर (म.प्र.)
०३ मई २०१८

बुधवार, 2 मई 2018

सुर-२०१८-१२२ : #मन_अटका_रहा



तन करता रहा यात्रा
यहां से वहां
जीता रहा जिंदगी
ढोता रहा सांसें

लब मुस्कुराते रहे
पांव चलते रहे
हाथ भी अपना काम
करते रहे

आंखें पल-पल तलाशती रही
उम्मीद की किरण
अधीर कान तरसते रहे
सुनने एक आवाज़

मस्तिष्क उधेड़-बुन करता रहा
टूटे रिश्तों के धागों संग
दिल धड़कनों को भूलकर
संजोता रहा गुजरे लम्हें

और,
मन अटका रहा
देहरी पर
पार न कर पाया अब तक
प्रियतम का द्वार

तन बढ़ गया आगे
मन रह गया कहीं पीछे
लौटना नामुमकिन
कोशिशें नाकाम तमाम

क्योंकि,
सुनता नहीं कोई
देते रहो चाहे जीवन भर
उन बंद दरवाजों पर दस्तक

कभी-कभी
ऐसे भी जीना पड़ता हैं
तन कहीं होता और
मन कहीं ताउम्र...!!!

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© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
नरसिंहपुर (म.प्र.)
०२ मई २०१८

मंगलवार, 1 मई 2018

सुर-२०१८-१२१ : #कौन_नहीं_मजदूर #मगर_सब_नहीं_मजबूर



मजदूर हो तुम भी
और मजदूर हैं हम भी
फिर भी हैं बड़ा अंतर
तुम्हारा काम शौकिया हैं
जिसे तुमने स्वयं ही चुना हैं
हमारा काम मजबूरी हैं
जिसने हमें चुना हैं
तुम्हें मिला साथ सबका
पढ़े-लिखे भी हो तुम
हम साथ सबके भी अकेले
पढ़े-लिखे तब जब खाने को मिले
तुम्हारे लिये खाना दोयम
पर, हमारे लिये प्रथम
तुम जब चाहो छुट्टी मना लो
हम जरूरत होने पर भी काम करते
तुम्हारे काम में आगे बढ़ने की गुंजाईश हैं
हमें पीछे खिंचती महंगाई हैं
तुम जहाँ चाहे घूमो-फिरो और ऐश करो
हमारे लिये ये सोचना भी गुनाह हैं
तुम मनाओ तीज-त्यौहार और जन्मदिन की खुशियाँ
यहाँ खबर नहीं कब दिन डूबा कब सुबह हुई
तुम्हारी जिंदगी के मालिक तुम खुद हो
जबकि, यहाँ साँसें भी गिरवी पड़ी हैं
आज तुम ख़ुशी-ख़ुशी मना रहे ‘मजदूर दिवस’
और हम अपनी परेशानियों संग कर रहे मजदूरी हैं    
न कहो खुद को तुम मजदूर साहब
तुम्हें नहीं पता क्या होता बेबस काम करना
सर्दी-धूप या किसी भी मौसम की परवाह न करना
ख़ुशी की बात नहीं मजबूरी हैं मजदूर होना
फिर भी इस नियति को हमने हंसकर स्वीकार किया
आपके जीवन में खुशियों का रंग भरा   

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© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
नरसिंहपुर (म.प्र.)
०१ मई २०१८