गुरुवार, 7 जून 2018

सुर-२०१८-१५७ : #प्रीत_का_रंग



यूं सोचो तो
प्रीत का कोई रंग नहीं
मगर, करो महसूस तो फिर
प्रीत के रंग अनेक
लेती ये जनम
गुलाबी अहसास के संग
पर, धीरे-धीरे सुर्ख़ चुनरी ओढ़
बन जाती सजीली दुल्हन
मटमैली धरती सी होकर उर्वर
खिला देती कलियाँ रंगीन
बिखेरती हरियाली हर तरफ
दुलारती ओढ़ा ममता का नीला आसमां
बचाती उनको गम की
काली अंधियारी रातों से बनकर
इंद्रधनुषी प्रखर उजियारा
धीरे-धीरे होकर सफेद
समय के साथ पक
पीली रंगत में ढ़ल जाती
तो पहन भगवा चोला
हो जग से विरत बीते दिनों की
माला फेरने लगती
और होकर अदृश्य ओ बेरंग
खुली हुई फ़िज़ाओं में ही घुल जाती
फिर से जन्मने के लिये ।।

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© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
नरसिंहपुर (म.प्र.)
०७ जून २०१८

बुधवार, 6 जून 2018

सुर-२०१८-१५६ : #लघुकथा_किसकी_WIFE




इनसे मिलिये... ये हैं मिसेज एस.पी.
अपना परिचय पाकर उसने बड़ी गर्वीली मुस्कान के साथ सामने वाली को देखा और अपना हाथ बढ़ा दिया मिलाने के लिये
इन्हें तो शायद, आप जानती होगी आये दिन अख़बार में इनकी फोटो छपती हैं यहाँ के विधायक की पत्नी
उसने बेहद शान से अपने बालों को ठीक करते हुये उसे ऐसे देखा जैसे उसके सामने उसकी कोई हैसियत ही नहीं
और, ये रही आज की पार्टी की होस्ट यहाँ के सबसे बड़े बिजनेसमैन की वाइफ मिसेज बत्रा जिन्हें इस तरह की पार्टीज का बड़ा शौक हैं
उसने सबसे बड़े प्रेम और मीठी मुस्कान के साथ हाथ मिलाया और जब इंट्रोडक्शन का दौर खत्म हुआ तो विधायक की बीबी ने तिरछी मुस्कान से कहा, अब इनसे भी तो मिलवाइये ये मोहतरमा कौन हैं ?
वो जो सबको आपस में मिला रही थी थोड़े संकोच से बोली, ओह सॉरी मैं आप सबको बताना भूल गयी पर, इनके बारे मैं ये स्वयं बताये तो अधिक बेहतर होगा
तब उस पार्टी में पहली बार आने वाली उस आगंतुक ने विनम्रता से हाथ जोड़कर कहा, जी मेरा नाम अनीता हैं और मैं यही कॉलेज में प्रोफेसर हूँ
तो एस.पी. की पत्नी तुरंत हिकारत की दृष्टि डालते हुये उससे बोली, और आपके हस्बैंड क्या करते हैं ?
तब उसने उतने ही धैर्य से जवाब दिया, मेरे पति यहाँ के कलेक्टर हैं और हम अभी कुछ ही दिनों पहले यहाँ आये हैं
तो ऐसा कहिये न कि आप मिसेज कलेक्टर हैं उसने अपनी मुस्कान को बढ़ाते हुये कहा
तब उसने भी मुस्कुराते हुये बड़े प्यार से कहा, न... न... आय एम नॉट वाइफ ऑफ़ कलेक्टर मैं तो बस रोहित की बीबी हूँ क्योंकि, मैंने रोहित की पोजीशन से नहीं उससे शादी की हैं
तब वे सब एक-दूसरे की शक्ल देखने लगी और सोचने लगी कि, उन्होंने तो अपने पतियों से नहीं उनके स्टेट्स से मेरिज की इसलिये उन्हें बदले में यही टैग मिला और जिस रुतबे से बंधी वो अपने उस कद व पद को मेन्टेन करने में इतना व्यस्त कि वे उस लेबल के साथ ही अपनी आइडेंटिटी बनाये घुमती तो ऐसे में वे समझ नहीं पा रही कि असल में वे किसकी बीबी हैं ???

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© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
नरसिंहपुर (म.प्र.)
०६ जून २०१८

मंगलवार, 5 जून 2018

सुर-२०१८-१५५ : #जल_आकाश,_वायु_धरती_और_अग्नि #इसके_बिना_नहीं_बचेगी_हमारी_कोई_हस्ती



प्रकृति का आवरण
'पर्यावरण'
छिन्न-भिन्न कर के जिसे
हम खुद में मगन
भूल गये इतनी-सी ये बात
उसके बिना नहीं
हम सबका भी जीवन
ईश्वर का साक्षात स्वरूप होती
हरी-भरी कुदरत
पेड़, नदियां, पहाड़, झरने
पंछी, जानवर और कीट-पतंगे
सबको हमने बर्बाद किया
सबका हमने घर-बार लूटा
विलुप्त हो गयी प्रजातियां अनेक
चंद जो रह गयी शेष
उनका भी नहीं कर रहे सरंक्षण
किस तरह बचेगा फिर हमारा अस्तित्व
बीज शायद, कोई धरती सहेज ले
पुनः प्रकृति को संवार ले
लेकिन, न होगा संभव हमारा पुनर्निर्माण
अगर, हमने मिटा दिया पर्यावरण
जल, आकाश, वायु, धरती और अग्नि
इसके बिना नहीं हमारी हस्ती

‘विश्व पर्यावरण दिवस’ की शुभकामनायें नहीं देना बल्कि, सरंक्षण हेतु सचेत करना हैं क्योंकि, अभी नहीं तो कभी नहीं थोड़ी-सी देर में बहुत देर हो सकती हैं प्रकृति का तुला का पलड़ा एक तरफ इतना झुक गया कि संतुलन न बनाया हमने अभी तो फिर मरने को तैयार हो जाये या अपनी आने वाली पीढ़ी को तड़फते हुये देखें... क्या हैं मंजूर हमें खुद ही सोचना हैं और जल्द भी...  हम तो निकल चुके इस अभियान में बहुत पहले से पर, हमारे अकेले से तो ज्यादा फर्क न पड़ेगा तो सब आये सबको बचाये... ऐसे पर्यावरण दिवस सार्थक तरीके से मनाये... ☺ ☺ ☺ !!!

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© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
नरसिंहपुर (म.प्र.)
०५ जून २०१८

सोमवार, 4 जून 2018

सुर-२०१८-१५४ : #नित_नूतन_होता_अभिनय #जब_किरदार_निभाये_अभिनेत्री_नूतन

 

'शोभना समर्थ' ने बेटियों की मां होने के बावजूद भी कभी इस बात को उस तरह से नहीं लिया जैसा कि उस दौर में समझा जाता था कि बेटियां होना मतलब चिंता में घिर जाना परंतु, कुछ लोग होते हैं तो समय के सांचे में नहीं ढलते बल्कि, सांचे को अपने अनुकूल बना लेते हैं ऐसा ही दृढ़ और आत्मनिर्भर व्यक्तित्व था ‘शोभना समर्थ’ का और आधुनिक विचारधारा भरी हुई थी मन में तो उन्होंने इस बात को बड़ी सहजता से लेते हुए अपनी पुत्रियों को बड़ी बेबाकी के साथ एक खुले माहौल में न केवल पाला बल्कि, उनकी शख़्सियत को भी स्वतंत्र रूप से विकसित होने के लिये पर्याप्त अवसर प्रदान किये जिसका नतीजा कि 'नूतन' 'तनुजा' दोनों एक दूसरे से एकदम अलग मगर, साहसिक चरित्र की प्रगतिवादी अभिनेत्रियां रही जिनमें 'नूतन' ने तो अपनी मां और बहन दोनों से कई कदम आगे बढ़कर अभिनय किया जिसने शुरुआती दौर में ही उनकी एक सशक्त अभिनेत्री की छवि निर्मित कर दी थी

ये मां का ही निर्भीक पालन-पोषण था जिसने उनके भीतर इतना साहस भर दिया था कि सफलतम नायिका बनने के बाद उन्हें जब ये लगा कि उनके खातों में गड़बड़ हैं तो उन्होंने इसके लिए अपनी मां को जिम्मेदार ठहराते हुए उनके ऊपर मुकदमा दर्ज कर उन्हें कटघरे तक लाकर खड़ा कर दिया जिसकी वजह से रिश्तों में खाई भी बन गयी लेकिन, ये मां की ही शिक्षा थी जिसने उनके भीतर इतनी उन्मुक्त सोच विकसित कर दी कि उसने उन पर ही उंगली उठा दी ऐसा ही एक वाकया और हुआ जब उनके सह-कलाकार ‘संजीव कुमार’ के साथ उनका नाम जोड़ा जाने लगा जिसके बारे में पत्रकार द्वारा सवाल किए जाने पर संजीव जी ने स्वीकार किया कि वे नूतन को पसंद करते हैं और उनको उनसे प्यार हैं जिसे सुनकर नूतन ने उन्हें थप्पड़ जड़ दिया ये बेबाकी और ये बिंदासपन उन्हें विरासत में मिला था तो इन बातों से घबराने या सकुचाने की जगह स्वविवेक से निर्णय लेने में वे पीछे न हटती थी

अभिनय के मामले में भी अपने किरदार को लेकर उनके मन मे स्पष्ट इमेज होती थी जिसकी वजह से पर्दे पर उनके द्वारा अभिनीत कोई भी भूमिका महज़ नौटंकी नहीं प्रतीत होती थी बल्कि, जो भी रोल उनको दिया जाता वे वही नजर आती थी उनके भीतर अपने आपको लेकर किसी भी तरह का संशय या कमतरी का भाव नहीं था इसलिए जब भी उन्हें कोई भूमिका दी जाती वो आत्मा की तरह उसकी देह में प्रवेश कर उसे हूबहू उतार देती यही वजह कि शुरुआती दौर में ही उन्हें जो फिल्में या जो भी पात्र निभाने को दिये गये उन्होंने पूरे मन से उन्हें अभिनीत किया और दर्शकों को हर बार अचंभित कर दिया तो बार-बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का खिताब भी अपने नाम किया और इस तरह वे सफलता का चेहरा बन गयी और सौंदर्य प्रतियोगिता की विजेता लड़की नूतन एक दमदार अभिनेत्री बनकर उभरी जो हर एक भूमिका में फिट थी जिसका होना ही सक्सेस की गारंटी माना जाता था और हर एक कलाकार उनके साथ काम करना अपना सौभाग्य समझता था

इसलिये अपने दौर के सभी बड़े कलाकारों अशोक कुमार, बलराज साहनी, दिलीप कुमार, राज कपूर, देव आनंद के साथ उन्होंने काम किया वे सभी फिल्में मील का पत्थर साबित हुई और आज भी अभिनय संस्थानों में उनको पाठ्यक्रम की तरह पढ़ाया जाता हैं कि इतनी कम उम्र में इतना गंभीर अभिनय करना आसान बात नही  थी । उनकी सीमा, सुजाता, बंदिनीं तो मानो हिंदी सिनेमा के तीन ऐसे ग्रथ हैं जिनका गहराई से अध्ययन कर कोई भी हीरोइन संवेदनशील अभिनेत्री बन सकती हैं और हम धन्य कि वे धरोहर की तरह सुरक्षित हैं जिन्हें हम जब चाहे तब देख सकते और हर बार ही कुछ नया अनुभव कर सकते कि पहले की फिल्मों में एक भी दृश्य, एक भी संवाद या गीत या कलाकार निरर्थक नहीं होता बहुत सोच-समझकर ही कहानी व किरदार के मुताबिक ही उनका चयन किया जाता था

जब हम बार-बार ऐसे मास्टर पीस देखते तो हमेशा कुछ नूतन पाते जिसे देखने से पिछली बार हमारी आंखें चूक गयी थी और ‘नूतन’ तो अभिनय की वो किताब जिसे कितनी भी बार पढ़ा जाये मन नहीं भरता आज उनके जन्मदिवस पर उनको यही भावांजलि… ☺ ☺ ☺ !!!

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© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
नरसिंहपुर (म.प्र.)
०४ जून २०१८

रविवार, 3 जून 2018

सुर-२०१८-१५३ : #बस_आज_की_रात




प्रतीक्षा की
वो घड़ियाँ जिनमें
शामिल हो अंधियारी रात
बड़ी मुश्किल से कटती
आँखें भी तो फिर
एक पल न पलकें झपकती
हर आहट पर चौंक-चौंक पड़ती
मन को तसल्ली देती
एक नई सुबह की आस
और दिल को समझाये जाते
कि बस, आज की रात
किसी तरह से गुज़र जाये
उफ़, ये काली अंधियारी रात
छोटे से भय को भी
कितना बड़ा बना देती हैं न
जबकि सबको पता कि
हर हाल में होनी ही हैं सुबह
फिर भी मुश्किल घड़ी में
नादान बच्चे की तरह घबराते
चंद पहर की रात को
थामकर सांसों की डोर गुज़ारते
जबकि ये रात ही तो हैं
जिसकी कोख में सुबह पलती
फिर क्यों जिंदगियां डरती ?

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© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
नरसिंहपुर (म.प्र.)
०३ जून २०१८

शनिवार, 2 जून 2018

सुर-२०१८-१५२ : #सर_पर_लाल_टोपी_रुसी #फिर_भी_दिल_था_हिंदुस्तानी_उसका



पूरब और पश्चिम का ऐसा अनोखा मेल उनके व्यक्तित्व ही नहीं कृतित्व में भी था जहाँ नायक भले ही सूट-बूट में हो या फिर पश्चिमी परिधान में लेकिन, सीने में धड़कने वाला दिल सौ टके हिंदुस्तानी होता था जिसने उसको हर एक दिल का अजीज बना दिया और वैसे भी माटी से जुड़े व्यक्ति का भोला-भाला मानस सहज ही सबको अपना बना लेता हैं तो उन्होंने अपने उस मासूम निर्मल प्रेमिल चेहरे से सब पर ऐसा जादू कर दिया कि भारत से लेकर रूस तक हर एक की जुबां पर उनका नाम और उनके गीत के बोल थे जब देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु जी अपनी बिटिया ‘इंदिरा’ के साथ राष्ट्रपति ‘बुल्गानिन’ के शासनकाल में सोवियत संघ के दौरे पर गये तो वहां से लौटकर उन्होंने ‘पृथ्वीराज कपूर’ को बुलाकर उनसे पूछा, ये आवारा फिल्म क्या हैं? क्या तुम्हारे ही बेटे ने बनाई  हैं? ‘बुल्गानिन’ बहुत तारीफ कर रहे थे तब ‘पृथ्वी’ का सीना किस तरह गर्व से चौड़ा हो गया हो गया होगा इसका अंदाजा हम लगा सकते हैं

हर एक पिता का ये सपना होता हैं कि एक दिन उसका पुत्र उससे भी अधिक नाम कमाये और लोग उसे उसके पिता के रूप में पहचाने तो उनका ये ख्वाब उनके जीते-जी ही उनके सुपुत्र ने बहुत ही कम उम्र में सच कर दिखाया और महज़ २१ साल की उम्र में ‘आग’ जैसी फिल्म का निर्देशन किया और २५ के भी नहीं हुये कि ‘बरसात’ जैसी ब्लाक बस्टर मूवी बना दी जिसने उन्हें उतनी-सी उम्र में ही लखपति बना दिया और भी ३० साल के भी पूरे नहीं हुये कि अपने खुद के विशाल स्टूडियो के मालिक बन गये याने कि जितना कोई सोच भी नहीं उससे अधिक उन्होंने उतनी कम उम्र में प्राप्त कर लिया था जो कि उनका आरंभिक काल था उसके बाद तो उन्होंने फ़िल्मी दुनिया को ऐसे नायब शाहकार दिये कि उन्हें ‘ग्रेटेस्ट शो मैन’ कहा जाने लगा और उनकी फिल्मों का तो लोग सालों-साल तक भी इंतजार करते क्योंकि, वे जानते थे कि वे एक बार में एक ही फिल्म बनाते लेकिन, वो लाज़वाब होती सिर्फ मनोरंजन ही नहीं करती कोई न कोई समाजिक संदेश भी देती

वे कल्पना को इस तरह से रजत पर्दे साकार करते कि देखने वाले आँखे और मुंह फाड़कर उसे देखते रह जाते थे और उन दृश्यों को देखने बार-बार सिनेमाघरों में जाते थे जिसकी वजह से उनकी फ़िल्में ज्यादातर ब्लाक बस्टर ही होती थी तो टिकिट खिड़की तोड़ सफलता अर्जित करती थी जिसके दिवाने सिर्फ हमारे देश के लोग ही नहीं विदेशों में रहने वाले भी थे वे पहले ऐसे भारतीय फ़िल्मकार थे जिन्होंने हिंदी सिनेमा को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई और उनका फिल्मों के प्रति समर्पण ऐसा था कि वो जो भी कमाई करते उसे अपनी अगली फिल्म में लगा देते और यदि फिल्म फ्लॉप हो तब भी हिम्मत नहीं हारते बल्कि, अधिक जोश-खरोश से अगली फिल्म की तैयारी में जुट जाते उनका ये जुनून ही था जिसने उनको सोते-जागते सिर्फ फ़िल्में बनाने को प्रेरित किया और वे सिर्फ एक अदाकार या निर्देशक ही नहीं बेहतरीन संगीत के जानकार और मानवीय संवेदनाओं व जज्बातों के गहनतम दृष्टिकोण के मालिक थे

यही वजह कि उनकी फिल्माई कहानियों में नायक, नायिका, चरित्र कलाकार, संगीत, परिधान सब कुछ एकदम परफेक्ट होता था और हर एक भाव उभरकर सामने आता था ये हमारी बदनसीबी हैं कि वे हमको कम उम्र में भी छोडकर छे गये लेकिन, उनका जो जीवन मंत्र था, ‘शो मस्ट गो ऑन’ वो बदस्तूर जारी हैं उर उनका परिवार आज चार पीढ़ियों से फ़िल्मी दुनिया की सेवा कर रहा हैं उसे अपना योगदान देकर दुनिया के कोने-कोने में पहुंचा रहा हैं और ये साबित कर रहा कि...

कल खेल में हम हो न हो
गर्दिश में तारे रहेंगे सदा
भूलोगे तुम, भूलेंगे वो
पर हम तुम्हारे रहेंगे सदा
होंगे यहीं अपने निशाँ
इसके सिवा जाना कहाँ
जीना यहाँ मरना यहाँ    

इसलिये वो मरकर भी मरे नहीं यही कहीं हैं, हमारे आस-पास फिल्मों में, रजत पर्दे पर या गीत-संगीत में... बस, देखने वाली नजर होनी चाहिये... मिल जायेंगे... उन तक हमारा सलाम पहुंचे कि हम भी उनको भूले नहीं... ☺ ☺ ☺ !!!

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© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
नरसिंहपुर (म.प्र.)
०२ जून २०१८

शुक्रवार, 1 जून 2018

सुर-२०१८-१५१ : #ख्वाजा_अहमद_अब्बास_और_नर्गिस #फ़िल्मी_दुनिया_की_धरोहर_जिनकी_जुगलबंदी



दो अद्भुत प्रतिभायें जब मिलती हैं तो फिर कला की दुनिया में कैसा चमत्कार होता हैं ये लिखने की नहीं देखने की बात हैं जिसे साकार कर दिखाया ‘ख्वाजा अहमद अब्बास’ और ‘नर्गिस’ ने जिनका मिलन फ़िल्मी दर्शकों के लिये किसी सौगात से कम नहीं था क्योंकि, वे तो उन दोनों की ही कलाकारी के दीवाने थे ऐसे में उनका मिलकर काम करना माना उनके मनोरंजन का दुगुना होना तो फिर भला ऐसी जोड़ियों के एकाकार से बनी फ़िल्में किस तरह न हिंदी सिनेमा के इतिहास की धरोहर बनती इन फिल्मों ने तो बाल्यावस्था की हिंदी फ़िल्मी दुनिया को अपनी मेहनत व लगन से ऐसी कृतियाँ उपहार में दी जिसने अपने देश में ही नहीं विदेशों तक में परचम फहराया और उसे नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया जिस तरह से एक की कलम से निकले चरित्र को दूसरे ने हूबहू सिल्वर स्क्रीन पर उतार दिया वो भी ऐसा कि उसके अभिनय में में कहीं कोई नकलीपन या दिखावट का आभास नहीं हुआ कि उसने तो भीतरी अहसासों को ही अपने चेहरे पर दर्शाया जिससे देखनेवाले ने अपना नाता जोड़ लिया

जहाँ कोई बात या पात्र दिल को छू जाता या अपना-सा लगता तो फिर उसे अपनाने में कोई पीछे नहीं रहता यही वजह कि ‘अब्बास साहब’ ने जो भी कहानियां गढ़ी उनके लिये प्रेरणा अपने आस-पास के वातावरण या समाज से ली तो फिर जो किरदार उभरे उनमें खुद का अक्स देख पाना किसी के भी लिये नामुमकिन नहीं था और इसलिये तो ‘आवारा’, ‘श्री 420’, ‘अनहोनी’, ‘परदेसी’ और ‘जागते रहो’ जिस भी फिल्म में ‘ख्वाजा’ ने नायिका का चित्रण ‘नर्गिस’ को ध्यान में रखकर किया उसे उन्होंने भी उसी तरह निभा पाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी इन दोनों की जोड़ी ने कमाल कर दिया इनका मिलना भी एक इत्तेफाक था और फ़िल्मी क्षेत्र में आना भी किस्मत का संयोग क्योंकि, दोनों ने ही इसे अलग-अलग परिस्थितियों में अपनाया जहाँ ‘नर्गिस’ ने अपनी माँ को कमजोर आर्थिक स्थिति से उबारने के लिये तो ‘ख्वाजा अहमद अब्बास’ ने ये दिखाने के लिये कि वे केवल आलोचक ही नहीं बल्कि एक बेहतरीन कहानीकार व निर्देशक भी हैं तो इस तरह इनका इस अलग कार्यक्षेत्र में सफर शुरू हुआ

जिसमें ‘राज कपूर’ भी जुड़ गये जो इन दोनों के हुनर से न केवल वाकिफ़ थे बल्कि उनके प्रशंसक भी थे तो ये एक सफल टीम बन गये जिन्होंने साथ में कई हैरतअंगेज कारनामे किये और अपने चाहनेवालों को मनोरंजन ही नहीं संदेशप्रद फिल्मों के उपहार दिये ‘अब्बास साहब’ की लेखनी से ‘नर्गिस’ इस कदर प्रभावित थी कि उन्होंने इसरार करके अपने लिये डबल रोल वाली कथा ‘अनहोनी’ लिखवाई जो एक तरह से ‘आवारा’ को उलटकर बनाया गया फिमेल वर्शन था और  इस तरह इन्होने साथ में जितना भी काम किया वो उल्लेखनीय रहा सबसे बड़ी बात कि अब्बास साहब की 'शहर और सपना' के अलावा दो फ़िल्मों, 'सात हिंदुस्तानी' (1969) और 'दो बूंद पानी' (1972), ने राष्ट्रीय एकता पर बनी सर्वश्रेष्ठ फ़ीचर फ़िल्म के लिए ‘नरगिस दत्त पुरस्कार’ जीते इस तरह इन दोनों का आपसी रिश्ता सिर्फ पर्दे तक ही कायम नहीं रहा कुदरत ने भी उन्हें एक करने में कोई कमी न रखी

१ जून जहाँ ‘नर्गिस’ का जन्मदिवस तो वही ‘ख्वाजा अहमद अब्बास’ की पुण्यतिथि बन गयी इस तरह प्रकृति ने उनका सम्मान किया यूँ तो दोनों का अपना व्यक्तिगत जीवन भी अनेकानेक उपलब्धियों से भरा पड़ा लेकिन, आज दोनों का स्मृति दिवस तो बात सिर्फ उन फिल्मों या कहानियों की जिनमें उन दोनों के नाम जुड़े... हमें ये यादगार फ़िल्में देने दोनों का आभार और ढेर सारा प्यार... ☺ ☺ ☺ !!!

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© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
नरसिंहपुर (म.प्र.)
०१ जून २०१८