बुधवार, 8 अगस्त 2018

सुर-२०१८-२१८ : #किताब_समीक्षा_लाल_फ्रॉक_वाली_लड़की



लेखक    : मुकेश कुमार सिन्हा
श्रेणी     : लप्रेक (लघु प्रेम कथा) संग्रह
प्रकाशक  : बोधि प्रकाशन, जयपुर (राजस्थान)
कीमत   : 120

किताब के बारे में कुछ कहने से पहले ‘दो शब्द’ इस किताब के लेखक और मेरे मित्र ‘मुकेश कुमार सिन्हा’ के बारे में कहना चाहती हूँ जिन्हें माँ शारदे से कलम का वरदान प्राप्त हुआ है इसलिये कविता लिखे या कहानी सब में अपना विशेष प्रभाव डाल देते हैं जो इनकी अपनी पहचान हैं बोले तो आम बोलचाल के साधारण शब्दों को इस तरीके से बड़े ही रोचक अंदाज में प्रस्तुत करते कि उनसे आँखों के समक्ष चित्र तैरने लगते हैं यही तो एक कुशल कलमकार की ख़ासियत होती कि उसके लिखे को पढ़ने पर पन्नों के अक्षर मानव आकृति धारण कर लेते और जो कुछ भी हम पढ़ते वो हमें अपने आस-पास घटता हुआ महसूस होता जिससे कि हम उससे जुडाव महसूस करने लगते और ‘मुकेश कुमार सिन्हा’ इस कला के जादूगर है जिनकी कलम से निकलकर अल्फाज़ जीवंत चित्रों में परिवर्तित हो जाते है उनके लिखे काव्य-संग्रह ‘हमिंग बर्ड’ को पढ़कर भी कुछ ऐसा ही अहसास हुआ और ‘फेसबुक’ पर भी वे जो भी लिखते उसमें हमेशा कुछ नवीनता और अनोखापन होता क्योंकि, वे असामान्य से लगने वाले विषयों व शब्दों का इस तरह साधारणीकरण करते कि उनका मिजाज बदल जाता याने कि उनमें ‘मुकेश कुमार सिन्हा’ का फ्लेवर आ जाता तो वे अद्भुत लगने लगते है उनके इस ‘फ्लेवर’ का स्वाद आप इस कहानी संग्रह में भी ले सकते हैं जिसे पढ़ते-पढ़ते न जाने कितनी बार होंठों पर मुस्कराहट तैर गयी और न जाने कितनी दफा ऐसा लगा जैसे कि ये सब कुछ सबके साथ ही होता पर कुछ ही इसे इतने अनोखे तरीके से व्यक्त कर पाते जिसमें ‘मुकेश कुमार सिन्हा’ जिन्होंने प्रेम के छोटे-छोटे पलों को कहानी में बांधकर ये गुलदस्ता बनाया जिसका नाम ‘लाल फ्रॉक वाली लड़की’ है  

‘सफ़र’ कहानी से प्रेम का आगाज़ होता हैं जो किसी दूसरे पल में यात्रा के दौरान महसूस करता है ‘इश्क़ में शहर हो जाना’ वास्तव में होता क्या है । जब रिश्तों की डोर पुकारती हो तो आँखों में आये आंसू बेसबब नहीं होते ‘मानसून’ की तरह जिसकी वजह ‘तृतीय प्रेम सिद्धांत’ भी हो सकती है ये आगे आकर पता चलता जब हम अगली कहानी पर पहुँचते है । ‘परीक्षा’ प्रेम की हो जब, तब शत-प्रतिशत पास होना कितने मायने रखता ये इस कहानी को पढ़कर ही पता चलता जो ‘ओनली फ्रेंडशिप’ की तरह विखंडित नहीं होती । आगे पन्ने पलटे तो किसी हिट फिल्म के ‘हाउसफुल’ शो में हुई मुलाकात का सिरा ‘कक्षा-९, सेक्शन-बी की छठी घंटी’ से जुड़ जाता हैं । कुछ प्रेम सिगरेट की तरह सेहत के लिये हानिकारक होते है और ‘क्लासिक माइल्ड’ के धुंए की तरह भीतर-ही-भीतर अंतर को सुलगाते है और ऐसे में याद आती ‘थेथरई-दोस्तों की’ तो उदास चेहरे पर भी मुस्कान आ ही जाती है । कभी-कभी यूँ भी होता कि जो हमें प्रेम नजर आता वो नजरों का धोखा होता जिसका अहसास तब होता जब वो किसी ‘मेट्रो’ स्टेशन पर उतर जाता और ‘ब्लड-डोनेशन कैंप’ में बैठकर लड़का किसी तरह अपने गम को भूलाने सुंदर नर्स को देखकर अपने मन को समझाता है कि सफ़र में प्रेम से बचना चाहिये अखिरकार, परदेसियों को तो कहीं न कहीं साथ छोड़ना ही है । ‘आल बिहार क्विज चैंपियनशिप’ जैसी प्रतियोगिता में रनरअप बनकर जिस लडकी की वजह से विनर बनते-बनते बचा वही उसे आखिर में विजेता होने का गौरव महसूस कराती है । प्रेम दूर-दूर रहकर भी पास-पास लगता जब प्रेम दिल के करीब होता तब कभी-कभी मन में भी अप-डाउन चलता रहता ‘दूर-दूर, पास-पास’ लव मी, लव मी नॉट की तरह और कोई सीनियर ऑफिसर किसी जूनियर से इमोशनली ‘ब्लैकमेल’ हो जाती सिर्फ़ इश्क़ की खातिर और कहीं कोई ‘इनबॉक्स’ में प्रेम पा जाता तो कहीं बस में टिकट खरीद ‘गिव एन टेक’ करते-करते दिल भी आदान-प्रदान कर दिया जाता और ये ‘तालमेल’ आपसी सोच का होता जहाँ ‘फैंटेसी’ महज़ एक स्वप्न ही होती है ।

प्रेम कथाएं बेशक छोटी-हो, इकतरफ़ा हो पर, उनकी ‘स्मृतियाँ’ गुदगुदी होती एक ‘अमरुद का पेड़’ भी प्रेम के लिये उत्प्रेरक का काम कर सकता है और एक ‘इंजन’ रूपी लड़के को कोई कुशल महिला ड्राईवर मिल सकती तो ‘व्हाई शुड बॉयज हेव आल फन’ की टैग लाइन लगाये कोई टीन ऐज लडकी किसी प्रोढ़ को अंकल कहकर न केवल उसका दिल साथ ही सपना भी तोड़ सकती है । फोर्टी प्लस में सोना चाँदी ‘च्यवनप्राश’ प्रेम को बल देता वैसे तो ‘प्रेम टीचर’ नहीं होते पर, जिन्हें चाहे हम ये दर्जा दे सकते ज्यादातर मामलों में तो ‘प्रेम’ ही ‘टीचर’ होता जो जीवन के महत्वपूर्ण सबक देता । बचपन में तो ‘कंचों का व्यापार’ करते हुये कोई प्रेम पनप जाता जो अंततः ‘पाइथोगोरस प्रमेय’ की तरह सिद्ध हो जाता और टीन ऐज तो ऐसी जिसमें हर किसी का कोई न कोई ‘क्रश’ होता पर, किसी का ही सक्सेस होता लेकिन, जिनका फ्लॉप होता वो भी कहाँ भूल पाते जब-तब उन दिनों की जुगाली करते रहते जब कभी किडनी ‘ट्रांसप्लांट’ के साथ हार्ट भी एक्सचेंज हो गया था । एक दिन किसी सुहाने मौसम में लॉन्ग ड्राइव के इरादे से यूँ ही ‘एनफील्ड बुलेट की यात्रा’ पर निकल जाते कि किसी अजनबी हसीना को लिफ्ट देकर कुछ हसीन पल बितायेंगे मगर, जब हसीना मिली तो मन ही बदल गया ये मन भी साला, बहुत बड़ा नौटंकी है । ‘रेनिंग विथ कैट्स एंड डॉग्स’ एक इत्तेफाक था पर, उसने एक नासमझ लडके को एकाएक ही समझदार व जिम्मेदार बना दिया था । ‘मांझी-द माउंटेन मैन’ फिल्म भले न देख पाये पर, जिंदगी ने जो दिखाया उससे पाया कि उम्मीद सिर्फ़ मांझी से ही होती है । ‘कॉलेज क्लास रूम’ में फिजिक्स-केमेस्ट्री की क्लासेस भले लग जाये पर, इन्हें पढ़ने वालों की केमिस्ट्री बड़ी मुश्किल से मिलती है जब गलतफहमियां क्लियर होती तब ‘क्विज चैंपियनशिप’ हारकर प्रेम की बाज़ी जीतने का मज़ा तो प्रेमी ही जानते है । बनारस की गलियों में एक अनजान अपना एग्जाम सेंटर ही नहीं अनायास ‘प्रेमिका’ भी खोज लेता और ‘माली’ बनकर ताउम्र प्रेम बगिया सींचता है ।

‘H2O’ में कौन हाइड्रोजन और कौन ऑक्सीजन का अणु ये भले समझ नहीं पाते पर, दो अजनबी खुद पानी की तरह आपस में घुल-मिल जाते है । सिगरेट के धुएं के छल्ले में अपनी प्रेमिका की छवि देखना या ‘प्रेम प्रतीक’ बनाकर अपने प्रेम के बारे में सोचना या फिर ‘जानी दुश्मन’ जैसी हॉरर मूवी दिखाकर अपने प्रेम को नजदीक लाना ऐसा बहुत कुछ आम जीवन में होता जो कालांतर में लप्रेक का कथानक बन जाता है । कभी कोई लड़की ‘मरखड़ गैया’ सी अचानक ही आ जाती जीवन में और बन जाती सीधी-नेक अल्लाह की गाय सरीखी तो कभी-कभी प्रोढ़ावस्था में ‘अनुलोम विलोम’ करते किसी प्रोढ़ पर योग से अधिक मुस्कान असर कर जाती तो वो खुद को जवान महसूस करने लगता है । नोटबंदी जैसे आपातकाल में भी प्रेम कहानियां लिखी जा सकती हैं वो भी एक नहीं तीन और तीनों ही बेहतरीन जहाँ ‘एक’ में पुराना प्रेम पिंक नोटों की तरह गुलाबी हो गया तो ‘दो’ में नया प्रेम शुरू होकर ‘तीन’ में परवान चढ़ गया गोया कि एक, दो, तीन अलग-अलग कहानियां नहीं प्रेम की थ्री स्टेप्स है । यूँ तो मेले प्रेम कहानियों के लिये मुफ़ीद स्थान होते पर, ‘पुस्तक मेला’ भी मन में कोई प्लाट बना सकता हैं क्या ? पर, जब लेखक ‘मुकेश कुमार सिन्हा’ हो तो अपनी ‘हमिंग बर्ड’ के प्रमोशन के जरिये दूसरे के दिल को धड़का भी सकते है बिना संवेदनाओं के लेखक होना आसान भी तो नही वरना, ‘एक शाम’ दो प्रेमियों के बीच की दूरी किस तरह कर पायेगी और प्रेमिका अपने कंजूस प्रेमी को अपनी पहली सैलरी से ट्रीट देने की ख़ुशी की तरह बटोर पायेगी । ‘भैया की शादी’ हो और भाभी की छोटी बहनिया दिल न चुराये ये तो हो नहीं सकता जनाब पर, हीरो तो अपनी हीरोइन के ‘सुनिये’ कहने का ऐसा दीवाना हुआ कि सुध-बुध भूला बैठा कमबख्त होश आया भी तो तब, जब उसके बच्चे उसे मामा कह रहे थे । उफ़, ये ट्रेजेडी किसी के भी साथ न हो कि आपके बड़े भाई आपसे आपके प्रेम को मिलवाने का वादा करें पर, जब वक़्त आये तो वो ‘अप्रैल फूल’ बना जाये । ऐसा शायद, कोई नही जो संडे का इंतजार न करता हो देर तक सोने के लिये आखिर, वही तो संडे का पर्याय हैं पर, कभी-कभी कुछ ऐसी घटनायें एक के बाद एक लगातार होती जो अहसास कराती कि ‘इतवार भी शनिच्चर हो सकता है’ ऐसे में प्रेम का मखमली स्पर्श ही जख्मों पर मरहम लगाता है ।

‘मुकेश कुमार सिन्हा’ विज्ञान गणित से स्नातक होते हुये भी प्रेम जैसे विषय में पी.एच.डी. किये मालूम होते है जो किसी भी परिस्थति, किसी भी घटना या स्थान में ‘प्रेम’ ढूंढ लेते है और उनके इस लघु कथा प्रेम संग्रह ‘लाल फ्रॉक वाली लड़की’ में सर्वत्र प्रेम बिखरा हैं इसमें आपको लव का हर फ्लेवर चाहे वो नमकीन हो या चटपटा या फिर खट्टा-मीठा या रसीला मिला जायेगा शोर्ट में बोले तो यह लव स्टोरीज का चटाकेदार पैकेट हैं जिसे खरीदकर पढ़ने पर मनचाहे जायके की फुल गारंटी है    

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© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
नरसिंहपुर (म.प्र.)
०८ अगस्त २०१८

मंगलवार, 7 अगस्त 2018

सुर-२०१८-२१७ :#पाठशाला_का_जन्मदिन_आया #पुरानी_मधुर_यादें_अपने_साथ_लाया




‘व्हाट्स एप्प’ की जब नई-नई शुरुआत हुई तब इसे केवल, चैटिंग या मैसेज भेजने का ही एक माध्यम समझा जाता था परंतु, इसे सकारात्मक तरीके से अपने साहित्यिक गतिविधियों को संचालित करने भी प्रयोग में लाया जा सकता ये थोड़ा देर में समझ में आया तो फिर शुरुआत हुई एक साहित्य मंच ‘छंदमुक्त पाठशाला’ की जिसे ७ अगस्त २०१४ को सागर के रहने वाले एक कवि ‘डॉ अखिल जैन’ ने बनाया और अपने चंद साहित्यकार मित्रों को जोड़कर इसका श्रीगणेश किया जिसमें धीरे-धीरे देश ही नहीं विदेश से भी बेहतरीन कलमकार जुड़े और इसने आंचलिक, राष्ट्रीय से लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक पहुँचने का कीर्तिमान स्थापित किया और दूर-दराज रहने वाले लोगों को एकसूत्र में इस तरह बाँधा कि कब वो समूह एक परिवार बन गया पता ही नहीं चला जिसमें रहने वाले एक-दूसरे से इस तरह आपस में जुड़े कि उन्होंने आभासी रिश्ते को हकीकत में बदल लिया

मित्रता का दायरा बढ़ा तो मुलाकातों का सिलसिला भी शुरू हुआ और किसी न किसी साहित्यिक कार्यक्रम या किसी पारिवारिक समारोह में मिलना-जुलना भी हुआ जिसने इस संबंध को प्रगाढ़ बना दिया जिससे कि परिवार के सदस्य की भांति सब मित्र एक-दूजे के सुख-दुःख में भी शरीक होने लगे जिसने ये साबित कर दिया कि दूरियां भौगोलिक कितनी भी हो यदि हृदय में नजदीकियां हैं तो फिर चाहे कितना भी लंबा फ़ासला क्यों न हो कम ही लगता तभी तो दिल्ली हो या गाज़ियाबाद या फिर सागर या सिरसा या गोरखपुर या इंडोनेशिया या अहमदाबाद सब करीब नजर आने लगे और इन शहरों की सडकें सीधे अपने दोस्तों के घरों तक जाने लगी फिर क्या सबने अपनी इस दोस्ती को बरकरार रखने का प्रयास किया जो आज भी जारी जबकि, इन चार बरसों में कुछ सदस्य बीच सफर में छूट भी गये तो कुछ को असमय ही दुनिया से अलविदा कहना पड़ा  लेकिन, उनके साथ बिताये वो लम्हें सब भी उनकी यादों को तरो-ताजा बनाये रखते है

इस समूह ने अपनी साहित्यिक यात्रा के दौरान कुछ उल्लेखनीय मुकाम भी हासिल किये जिसमें पहला था जब इसकी पहली सालगिरह आई तो ‘उत्कर्ष प्रकाशन’ से इसके सदस्यों की लिखी कविताओं का प्रथम साँझा काव्य संकलन ‘भावों की हाला’ प्रकशित हुआ जिसका शानदार विमोचन १४ सितंबर २०१५ को ‘हिंदी दिवस’ के शुभ अवसर पर हुआ इसके बाद अगली सालगिरह पर ‘स्टोरी मिरर’ द्वारा ‘शब्दों का प्याला’ दूसरा संग्रह आया जिसने इस समूह के कलमकारों को पाठकों के मध्य पहुँचाया इस तरह इसने आकाशीय सूक्ष्म तरंगों से निकलकर ठोस धरातल पर भी अपने लिये स्थान बनाया और ये साबित किया कि तकनीक को यदि सही तरीके से इस्तेमाल किया जाये तो वो वरदान बन जाती और ‘व्हाट्स एप्प’ जैसा ‘मेसेंजिंग पटल’ कलाकारों की कला को अँधेरे कोनों से उठाकर लाइम लाइट में लाने का जरिया भी बनता है... ‘छंदमुक्त पाठशाला’ की सफ़लता यूँ ही साल दर साल बढ़ती रहे आज उसकी चतुर्थ सालगिरह पर यही दिल से दुआ हैं... ☺ ☺ ☺ !!!

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© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
नरसिंहपुर (म.प्र.)
०७ अगस्त २०१८

सोमवार, 6 अगस्त 2018

सुर-२०१८-२१६ : #सावन_और_सोमवार #शिवोपासना_के_दिन_ख़ास




यूँ तो आदिदेव महादेव की पूजा पूरे साल ही की जाती लेकिन, सावन और सोमवार का विशेष महत्व हैं क्योंकि, इन दिनों शिव भी एकांत वास कर चातुर्मास की अवधि व्यतीत करते और इस दिन हम जो भी उनके निमित्त उन्हें अर्पित करते या उनके मंत्र का मानसिक जाप करते वो उसे सीधे ग्रहण करते इस तरह हमारा उनसे प्रत्यक्ष कनेक्शन जुड़ जाता जिससे कि हमारी पूजा-अर्चना निष्फल नहीं जाती यूँ तो हम कभी-भी कुछ भी पूर्ण श्रद्धा-भक्ति से करे उसे भगवान् स्वीकार करते और हमारी मनोकामनाओं को पूर्ण करते है

इसके बावजूद भी कुछ दिवस के बारे में धर्म ग्रंथों में वर्णित है कि यदि हम साल के अन्य दिनों किसी वजह या व्यस्त होने के कारण पूजा-ध्यान के लिये समय नहीं भी निकाल पाते तो कोई बात नहीं मगर, इन दोनों की उपेक्षा नहीं करना चाहिये जिसका एक बहुत बड़ा कारण ऋतू परिवर्तन से जुड़ा हुआ है जिसके बदलते ही हमारी गतिविधियाँ भी शिथिल हो जाती परंतु, जब हम इस तरह की साधना करते तो उससे प्राप्त ऊर्जा हमारे तन-मन को इस तरह से लचीला बना देती कि वो इस बदलाव के साथ आसानी से सामंजस्य बिठा लेता हैं

वेद-पुराणों में हर माह या हर दिन की कुछ अलग ही तरह से व्याख्या की गयी जिसे धार्मिक आयोजनों से जोड़ने का एकमात्र कारण यही है कि हम धर्म भय से ही सही इसके प्रति आकर्षित हो और उस अदृश्य शक्ति से जुड़े जो हमें रचती है इसके लिये साधु-तपस्वियों की तरह कोई कठिन तप करने की जरूरत नहीं बस, प्रकृति को ही साक्षात् देवता मानकर हम जो भी चाहे और जिस तरह से भी चाहे कर सकते जो एक तरह से कृतज्ञता ज्ञापित करने का माध्यम है जिसके लिये निराकार प्रभु से न जुड़ सके तो मिट्टी से साकार शिवलिंग का निर्माण कर के भी ये कार्य कर सकते यही तो इस दिन की सहजता है... ॐ नमः शिवाय... ☺ ☺ ☺ !!!

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© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
नरसिंहपुर (म.प्र.)
०६ अगस्त २०१८

रविवार, 5 अगस्त 2018

सुर-२०१८-२१५ : #दोस्ती_एक_ऐसा_अहसास #चलता_जब_तक_चलती_साँस




हो गयी थी
इक दिन मुलाकात यूँ ही
अचानक अनजान से राह चलते
मगर, जब बने दोस्त तो
अजनबियत कब
जिंदगी भर की पहचान बन गई
अहसास ही नहीं हुआ

दो अनजान मिल जाते कभी किसी मोड़ पर तो कभी पडोस में या कभी स्कूल या कॉलेज में तो कभी राह चलते या ट्रेन में तो कभी ऑफिस में या कभी किसी पार्टी में और कभी-कभी तो पहली मुलाकात लड़ाई से होती पर, जब एक बार दोनों के बीच दोस्ती की गाँठ बंधती तो फिर समय के साथ वो धीरे-धीरे इतनी मजबूत हो जाती कि उसे तोड़ना नामुमकिन हो जाता बस, इसमें कोई मनमुटाव की गिरह न लगे यूँ तो दोस्त आपसी मतभेद को खुद ही सुलझा लेता पर, कभी यूँ भी होता कि कोई गठान ऐसी लगती कि मनभेद हो जाता ऐसे में यदि हमें ये अहसास हो कि वो दोस्त हमारे लिये बेहद अजीज तो फिर देर किस बात की ऐसे अवसरों का तो लाभ उठाना चाहिये और उसका हाथ अपने हाथों में लेकर बेहिचक उसे बताना चाहिये कि...  

उन हाथों का हाथ में होना
दिलाता अहसास संपूर्णता का
मुस्कुरा उठता मन का कोना-कोना
उमर कोई हो दोस्त संग हो तो
लगता जैसे आ गया लौटकर बचपन
इस दोस्ती को न चाहे दिल कभी खोना

‘दोस्ती’ रब की नेमत होती जो कहने को तो यूँ ही कभी भी कहीं भी हो जाती पर, इसे निभाना आजीवन बरकरार रखना परस्पर व्यवहार पर ही निर्भर करता जिसके लिये ये बहुत अच्छी बात कि इस नाते में कोई औपचारिकता नहीं होती जिस तरह कि अन्य रिश्तों में होती है इसलिये इसे ताउम्र निभाना मुश्किल नहीं होता और इसे किसी परिभाषा में बांधना आसान नहीं होता क्योंकि, रूहानी अहसास को शब्दों में अभिव्यक्त कर पाने शब्दकोश भी कम पड़ जाता आखिर, उसमें तो वही अल्फाज़ मिलेंगे जो इस दुनिया के इंसानों ने उसमें भर दिये पर, जो आत्मा महसूस करती उस आत्मिक अहसास को ज़ाहिर करने में ये सक्षम नहीं होते वो तो दिल ही समझता हैं...

‘मित्रता’
मुश्किल बांध पाना
शब्दों में इसको
कि वो अल्फाज़ ही नहीं
शब्दकोश में किसी
जो कि महसूस कर सके उसे
महसूसती आत्मा जिसे

चूँकि, ये रिश्ता आत्मा से जुड़ा होता इसलिये न केवल अंतिम साँस तक दोस्तों को आपस में जोड़े रखता बल्कि, जिस्म मरने के बाद भी चलता रहता और फिर कभी किसी जनम में मिल जाते बिछड़े यार और पहचान लेते एक-दूसरे को आखिर, दोस्ती का नाम जिंदगी और जिंदगी का नाम दोस्ती ऐसे ही तो नहीं कहते... सबको इस दिवस की शुभकामनायें... हर रोज इसे खूब मनाये... ☺ ☺ ☺ !!!

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© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
नरसिंहपुर (म.प्र.)
०५ अगस्त २०१८

शनिवार, 4 अगस्त 2018

सुर-२०१८-२१४ : #प्रतिभा_को_भी_होती_कद्रदान_की_दरकार #बनाती_जो_आभास_गांगुली_को_किशोर_कुमार



प्रारंभिक गायकों पर अपने से पूर्व के सुपर हिट गायक ‘के.एल.सहगल’ का इतना गहरा प्रभाव था कि वे रिकॉर्डिंग के समय उसके असर में आकर अपनी मौलिक आवाज़ को भूलकर उसकी तरह ही गाने लगते और ये हादसा ‘आभास कुमार गांगुली’ के साथ भी हुआ इसलिये १९४८ में अपने जीवन की पहली फिल्म ‘जिद्दी’ का पहला फ़िल्मी गीत जब उन्होंने गाया तो अच्छे-से-अच्छे सुनने वाले भी न जा सके कि ये ‘के.एल.सहगल’ की आवाज़ नहीं है क्योंकि, प्रतिभा तो उनमें जन्मजात थी बस, उसको निखारकर उभरने की लिये किस कद्रदान की दरकार थी वो जब मिला तो फिर इतिहास बन गया जिसने उसे हरदिलअजीज सदाबहार हरफ़नमौला फ़नकार ‘किशोर कुमार’ बना दिया जिसके आगे आज तक कोई पहुँच पाया कारण कि सबने उसके जैसा बनने की कोशिश की लेकिन, जो पहले से ही हो उस जैसे दूसरे की जरूरत ही क्या जिस तरह ‘के.एल. सहगल’ के होते हुये किसी नकली ‘सहगल’ की नहीं थी तो ऐसे में अपनी खुद की पहचान को दुनिया के सामने लाने किसी ऐसे पारसमणि सदृश मार्गदर्शक की आवश्यकता होती जो हमारी हमसे ही मुलाकात कराये जिस तरह ‘जामबंत जी’ ने ‘हनुमान’ की कराई थी

‘किशोर कुमार’ के जीवन में ये भूमिका ‘गुलज़ार’ ने निभाई जिन्होंने उनके गीतों की दिशा व रेंज बदल दी और उनसे वे गीत गवाये जो लोगों को लगता था कि उनके द्वारा गाया जाना संभव नहीं और आश्चर्य की बात कि वे खुद भी तो यही समझत थे लेकिन, ‘गुलज़ार’ ने जब उनको अपने शब्द दिये तो फिर उनके भीतर का वो गायक भी जाग गया जो उससे पहले तक देव आनंद, राजेश खन्ना या अमिताभ बच्चन जैसे सुपर सितारों के लिये गाते-गाते उनकी ही आवाज़ बन गया था जबकि, गुलज़ार ने उन्हें उनकी उस आवाज़ से मिलवाया जो उनके भीतर ही कहीं छिपी थी परंतु, अब तक बाहर नहीं निकली थी तो उन्होंने अपनी जादुई कलम से एक से बढकर एक गाने उनके लिये लिखे जो आज तक ‘किशोर’ के सर्वाधिक लोकप्रिय व मधुर गीतों में गिने जाते और मील के पत्थर कहलाये जाते है और इन गीतों में इनकी संजीदगी भी झलकती जो बताती कि एक कलाकार को केवल अवसर ही नहीं उसकी वास्तविक पहचान की भी आवश्यकता होती जिसके रूप में उसके जाने के बाद उसे याद किया जाये

वो संजीदा ‘किशोर दा’ इन गीतों में दिखाई देते है...

हवाओं पे लिख दो हवाओं के नाम
हम अनजान परदेसियों का सलाम

वो शाम कुछ अजीब थी
ये शाम भी अजीब हैं
वो कल भी आस-पास थी
वो आज भी करीब है

कोई होता जिसको अपना
हम अपना कह लेते यारों
पास नहीं तो दूर ही होता
लेकिन, कोई मेरा अपना

मुसाफ़िर हूँ यारों
न घर है न ठिकाना
मुझे चलते जाना है
बस, चलते जाना है

भोर आई गया अंधियारा
सारे जग में हुआ उजियारा
नाचे-झूमे ये मन मतवाला


दिए जलते हैं फूल खिलते है
बड़ी मुश्किल से मगर, दुनिया में दोस्त मिलते है

मैं शायर बदनाम मैं चला...

नदिया से दरिया
दरिया से सागर
सागर से घर जाम
जाम में डूब गयी यारों
मेरे जीवन की हर शाम

ओ मांझी रे...
अपना किनारा
नदिया की धारा है

मैं प्यास तुम सावन
मैं दिल तुम मेरी धडकन
हैं न, हूँ तो...

तुम आ गये हो, नूर आ गया है
नहीं तो चरागों से लौ जा रही थी

इस मोड़ से जाते है
कुछ सुस्त कदम रस्ते
कुछ तेज कदम राहें...

    
इसके अलावा घर, देवता, पलकों की छाँव में, बसेरा, गोलमाल, थोड़ी-सी बेवफ़ाई, गहराई, रत्नदीप, किनारा, नमकीन आदि फिल्मों में इनके संगम ने लाज़वाब गीतों का सृजन किया जिन्हें सुनना ही मानो सुकूं पाना हैं तो आज उनके जन्मदिवस पर यही कहेंगे कि ‘तेरे बिना जिंदगी से शिकवा तो नहीं, शिकवा नहीं... तेरे बिना जिंदगी भी लेकिन, जिंदगी तो नहीं’... वाकई, उनके बिना जिंदगी, जिंदगी नहीं पर, उनके गीतों से गुलज़ार हैं... जन्मदिन मुबारक किशोर दा... ☺ ☺ ☺ !!!

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© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
नरसिंहपुर (म.प्र.)
०४ अगस्त २०१८

शुक्रवार, 3 अगस्त 2018

सुर-२०१८-२१३ : #कविता_ने_चुना_जिसे_स्वयं_राष्ट्रकवि #ऐसे_थे_मैथिलिशरण_गुप्त_कलम_के_धनी




‘सोशल मीडिया’ के जमाने ने लेखन के शौकिया लोगों को अपने सृजन को प्रस्तुत करने एक-से अधिक मंच या प्लेटफार्म प्रदान किये जिसका नतीजा कि वो सब जो कभी छिपकर य अपनी डायरियों में ही अपने अहसासों को लिखा करते थे धीरे-धीरे खुलकर सामने अ गये और इसके साथ ही वे भी जिन्होंने न तो कभी लिखा या जिनके जींस में भी लेखन का कोई गुणसूत्र नहीं था एकाएक दूसरे को देखकर इस कदर प्रभावित हुये कि उनके डी.एन.ए. में छिपे हुये लेखक के गुण अचानक से उभरकर इस तरह से सामने आये कि पुरस्कार, सम्मान व प्रकाशन के मामले में वे स्थायी व प्रतिष्ठित रचनाकारों से भी कहीं आगे निकल गये मगर, इनमें से शायद, ही कोई एक कवि ऐसा हो जिसका कद आदमकद हो और जो साहित्य के क्षेत्र में स्थापित कवियों के चरणों तक भी पहुँच सके जिन्होंने अपने नाम के आगे कवि का टैग लगाने या कोई सम्मान खरीदने के लिये लेखन को नहीं चुना बल्कि, लेखन ने ही इन्हें अपने लिये चुना

इसलिये इनका लिखा हुआ एक शब्द भी निरर्थक या व्यर्थ नहीं रहा और इनकी निस्वार्थ साहित्य साधना ने इनको साधारण से आसाधारण ही नहीं महाकवि बना दिया जबकि, फ़िलहाल जो सक्रिय कवि मंचों पर भी धमाल मचा रहे और एक-एक कवि सम्मेलन के लाखों रूपये कमा रहे वो कभी-भी उस प्रसिद्धि या शिखर को नहीं पा सके और न ही अपने चाहने वालों से वो प्रेम-आदर प्राप्त कर सकेंगे जो इन लोगों ने सहज ही पा लिया क्योंकि, इन्होने किसी लालच से या खुद को सेलेब्रिटी बनाने के लिये नहीं लिखा बल्कि, इन्होने तो आत्म-प्रेरणा से ही कलम उठाई क्योंकि, इनके भीतर इश्वरप्रदत्त प्रतिभा समाई थी तो बिना लिखे ये रह भी न सकते और मिजाज में इतनी संवेदनशीलता कि परपीड़ा से द्रवित हो जाते और किसी ऐ.सी. रूम में बैठकर नहीं बल्कि, दूसरों की वेदना को अंतर से अनुभूत कर के ही कोई भी सृजन किया जिसने इन्हें उन ऊंचाइयों पर पहुँचाया जहाँ इनसे पहले कोई नहीं पहुंचा

ये ऐसे प्रतिमान बन गये फिर कोई दूसरा न इनके जैसा बन सका क्योंकि, उस दौर के सभी कवि या लेखक अपनी विशिष्ट शैली व अभिव्यक्ति की वजह से ही अपनी अलग पहचान बना सके और इस ख़ासियत ने ही इन सबको एक विशेष दर्जा दिलाया यहीं नहीं इन्होने वो ख्याति पाई कि भले ही इनको उतने पुरस्कार या सम्मान न मिले हो पर, वे स्वयं ही सम्मान बन गये जिसे प्राप्त करना भी इनके बस की बात नहीं कि कलम चलाना और अनुभूति के साथ हृदय के लहू को स्याही बनाकर कुछ लिखना दोनों ही अलहदा बातें हैं जिसमें सिद्धहस्त होना भी आसान नहीं पर, जिसे ये सिद्धि हासिल हुई वो स्वयं ही प्रसिद्धि के चरम पर पहुँच जाता और एक ऐसी मिसाल कायम करता जिसके आगे पहुंच पाना दूसरे के लिये नामुमकिन होता ऐसे ही एक कलमकार जिसने कविता को सिद्ध कर लिया था आज उनकी जयंती हैं... मन से नमन महाकवि-राष्ट्रकवि मैथिलिशरण गुप्त जी को जिनकी वजह से हम कविता को समझ सके... ☺ ☺ ☺ !!!

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© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
नरसिंहपुर (म.प्र.)
०३ अगस्त २०१८

सुर-२०१८-२१३ : #सूटकेस_में_बंद_ज़िंदगी



  
आज सुबह-सुबह
खोला जब अख़बार तो
सुर्खियों पर नजर पड़ी
जहाँ लिखा था कि,
सूटकेस में बंद
एक नवजात बच्ची मिली
धड़का लगा जोर से
अनायास नम हो गई आँखें भी
जेहन की सुई गई अटक
उफ, एक ज़िंदगी जिसने अभी
पलकें तक न खोली
कोख से सूटकेस में आ गई
कोई बच्चे को तरसता
तो कोई इस तरह उसे फेंकता
मानो, वो कोई सेनेटरी नेपकिन
या अनुपयोगी सामान हो
कभी उसे कचरे के ढेर में तो कभी
कोख के भीतर ही मार देते
जो बच भी गयी तो
कमी नहीं दरिंदों की यहाँ
जीते-जी उसे वो लाश बना देते
न जाने कब तक बेटियां
अपने आपको साबित करेंगी
न जाने कब सोच बदलेगी
जब बेटा-बेटी केवल
विज्ञापन की इबारत में नहीं
सच में एक समान होंगे
कब तक ऐसी खबरें छपेंगी
सूटकेस में बंद ज़िंदगी
खुलकर जीने को तड़फेंगी
न जाने कब तक ???
इन अनुत्तरित सवालों के जवाब
कब तक बेटियां पूछेंगी
कब वो पूर्णतया सुरक्षित होंगी
घर के भीतर न घुटेंगी
ये बच्ची बच भी गई अगर,
कौन इसकी मां बनेगी
या ये भी मेरी तरह
रेड लाइट पर भटकेगी
रात की रानी बनेगी
नहीं, इसे बचाना होगा ताकि,
बची रहे ममता, बचा रहे ममत्व
नाउम्मीद होकर न ईश्वर
बंद करें सृजन ।।

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© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
नरसिंहपुर (म.प्र.)
०२ अगस्त २०१८