सोमवार, 31 दिसंबर 2018

सुर-२०१८-३६१ : #घड़ी_की_सुइयां #कहती_कभी_न_रुकना




घड़ी की तीनों सुइयां होती अलग-अलग नाप की और अलग-अलग नाम की पर, इन तीनों के बीच आपसी तालमेल से ही समय आगे बढ़ता जो पल-पल बदलता रहता और हमको कुछ कहता जिसे हम अनसुना कर देते...

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कुछ कहती
टिक-टिक करती
घड़ी की सुईयां
सुनो जरा गौर इसको
पल-पल बीत रहा
हर पल निरंतर
गर, समय हो कम तो
न रुकना क्षण भर को भी
बोले ‘सेकंड’ की सुई
थाम के हाथ इन पलों का
पा सकते एक घड़ी
जो देती जीने को
छोटे-छोटे लम्हों की कड़ी
ये कहती ‘मिनट’ की सुई बड़ी
और जो कर ली कदर
एक-एक पल की तो
जरा-सा थमकर इत्मिनान से
फ़िर बढ सकते आगे
पा सकते मंज़िल कोई भी
देती ये बडा संदेश
सबसे छोटी ‘घंटे’ की सुई ||
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आज की रात भी ये अपने साथ इक्कीसवी सदी को कुछ और बड़ा कर देगा साथ ही हमारी उम्र व अनुभव में थोड़ा इजाफ़ा कर देगा जिसे हम रोक तो नहीं सकते लेकिन, इनके साथ कदम मिलाकर चलते हुये अपनी मंजिल को जरुर पा सकते है तो यही करना है ।

यही संकल्प लेना है कि अपने तयशुदा लक्ष्य को पा सके... ☺ ☺ ☺ !!!

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© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)
३१ दिसम्बर २०१८

रविवार, 30 दिसंबर 2018

सुर-२०१८-३६० : #फ़िल्में_जिनकी_विख्यात_देश_विदेश #वो_है_महान_निर्माता_निर्देशक_मृणाल_सेन




२०१८ जाते-जाते अपने साथ सदी के एक महान फिल्मकार को भी अपने साथ लेता गया वो भी ऐसे जिन्होंने भारतीय सिनेमा को विश्व परिदृश्य पर नाम व पहचान दिलाई आज रविवार की सुबह उस निर्देशक ने ९५ की उम्र में अंतिम सांस ली । अपने पीछे अपनी समृद्ध विरासत और वो अनमोल थाती अपनी उन फिल्मों के रूप में फिल्म इंडस्ट्री को सौंपकर गये जिन्होंने हिन्दी सिनेमा को अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक पहुँचाया । सिनेमा की दुनिया में काम करने वालों को कला या समनांतर सिनेमा जैसे एक नवीनत्तम और अलग ही तरह के सिनेमा की सौगात दी । जिसने उस दौर ही नहीं उसके बाद के अनेक फिल्मकारों को इस दिशा में कार्य करने हेतु प्रेरित किया और ये बताया कि कहानी को इस तरह से भी फिल्माया जा सकता है कि वो मनोरंजन देने के अलावा सोचने को भी मजबूर करे ।

हम बात कर रहे है ‘मृणाल सेन’ की जो भारतीय सिनेमा के इतिहास में उस निर्माता-निर्देशक के रूप में अंकित है जिन्होंने सिनेमा की प्रचलित धारा को केवल मोड़ा नहीं बल्कि, उससे एक नई धारा भी उत्पन्न की । जिसमें प्रवाहित होकर केवल कहानी का प्रस्तुतिकरण ही नहीं उसके साथ-साथ फ़िल्मी कलाकारों के अभिनय की भाव-भंगिमा व चरित्र-चित्रण भी कथा के अनुरूप होकर वास्तविकता का सजीव चित्रांकन हो उठता था । यही वजह कि उनकी फ़िल्में बांग्ला भाषा में होने एवं वे बंगाली फिल्मकार होने के बावजूद भी हिंदी सिनेमा में अपना पूर्ण दखल रखते है । क्योंकि, उन्होंने भले ही हिन्दी भाषा में कम फिल्मों का निर्माण किया पर, जो भी बनाई उन्होंने देश ही नहीं विदेशों में भी उन्हें व देश को ख्याति दिलाई व विश्व पटल पर हिन्दी सिनेमा का नाम सदा-सदा के लिये स्थापित कर दिया ।

यूँ तो उनका फ़िल्मी दुनिया में आना अकस्मात था लेकिन, जब वे यहाँ आ ही गये तो फिर ऐसा कमाल किया कि भारत सरकार ने उन्हें सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान ‘दादा साहब फाल्के पुरस्कार’ ही नहीं कला के लिये ‘पद्मभूषण’ से भी सम्मानित किया और १९९८ से २००० तक वे राज्यसभा में मनोनीत सांसद भी रहे । उन्होंने अपनी फिल्मों के जरिये २० से अधिक ‘नेशनल अवार्ड’ भी हासिल किये इसके अलावा दुनिया में जितने टॉप फिल्म फेस्टिवल होते हैं केन (फ्रांस), वेनिस, बर्लिन, शिकागो, मॉस्को, मोंट्रियल, कार्लोवी, कायरो सब में उनकी फिल्मों को चुना जाता रहा व उन्हें अवॉर्ड भी मिलते रहे । यही वजह कि देश ही नहीं विदेश में भी उनको अनेकों सम्मान प्राप्त हुये विश्व सिनेमा में उनके योगदान के लिए सोवियत संघ ने भी उन्हें 1979 में ‘नेहरू-सोवियत लैंड अवॉर्ड’ से सम्मानित किया । यही नहीं, उन्हें साल 2000 में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन ने अपने मुल्क का ऊंचा सम्मान ‘ऑर्डर ऑफ फ्रेंडशिप’ मृणाल सेन को पहनाया ये सम्मान पाने वाले वे अकेले इंडियन फिल्ममेकर थे । दो साल पूर्व ही उन्हें ऑस्कर फिल्मों की ज्यूरी का सदस्य भी बनाया गया था ।

उनकी इस विश्व विख्यात शख्सियत की वजह से ही आज उनके निधन की खबर सुनकर देश के प्रधानमन्त्री ने भी शोक संवेदनाएं व्यक्त की तो महानायक अमिताभ बच्चन ने भी श्रद्धा सुमन अर्पित किये क्योंकि उनकी फिल्म ‘भुवन शोम’ के माध्यम से ही उन्होंने पहली बार वोईस ओवर किया था और यही वो फिल्म जिसके आधार पर आमिर खान की फिल्म लगान के नायक-नायिका का नाम भी भुवन व गौरी रखा गया था । १९७६ में उनकी ही बनाई गयी ‘मृगया’ फिल्म से आगे डिस्को डांसर के रूप में अपनी पहचान बनाने वाले मिथुन चक्रवर्ती ने अपने फ़िल्मी कैरियर की शुरुआत की जिसके लिये निर्देशक ही नहीं अभिनेता को भी उस साल के सर्वश्रेष्ठ नायक राष्ट्रीय पुरस्कार मिला जो आज भी ‘मिथुन दा’ की एक बेस्ट मूवी मानी जाती है ।

सिने जगत को उनके दिये योगदान व विश्व परिदृश्य में उनके कद को देखते हुये उनके लिये कुछ-भी या कितना भी लिखा जाना कम ही है उन्हें बेहतर तरीके से जानने-समझने के लिये उनकी फिल्मों का अवलोकन ही पर्याप्त है और हम खुशनसीब कि वे फ़िल्में उपलब्ध है तो सिनेमा के शौकीन उन्हें देखकर ये जाने कि उसने क्या खो दिया... एक दिन अचानक... शब्दांजली... श्रद्धांजलि... !!!

#एक_दिन_अचानक
#चले_गये_मृणाल_सेन

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© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)
३० दिसम्बर २०१८

शनिवार, 29 दिसंबर 2018

सुर-२०१८-३५९ : #सुपर_स्टार_के_पर्याय #राजेश_खन्ना_फिर_याद_आये




आज फिल्म इंडस्ट्री में कहने को तो अनेकों सुपरस्टार हैं लेकिन, एकमात्र साउथ के बड़े वाले अभिनेता रजनीकांत ही है जिनके नाम के पहले स्क्रीन पर ये टाइटल पहले आता है बाद में उनका नाम और हिन्दी सिने जगत में इस टैग को ईजाद करने का श्रेय जिस नायक को जाता वो है हरदिलअजीज आकर्षक अभिनय के धनी ‘राजेश खन्ना’ ।

जिन्होंने रजत पर्दे पर आकर उसे अपनी उपस्थिति से इस तरह से अपने आभामंडल से रौशन किया कि उनकी उस छवि के लिये स्टार शब्द छोटा पड़ गया और वो हिन्दी सिने जगत के प्रथम सुपर स्टार कहलाये जिनकी मनभावन अदाओं और दिलकश अंदाजों ने हर किसी को अपना दीवाना बना लिया था और जिसकी एक झलक देखने के लिये लडकियाँ दीवानी हो जाती थी ।

हर एक नायिका जिसके साथ काम करने को लालायित रहती थी जिसकी फिल्मों का उनके चाहने वालों को बेसब्री से इंतजार रहता था इसलिये उनकी ज्यादातर फ़िल्में सुपर-डुपर हिट की श्रेणी में आती है उनके आगमन के साथ ही एक और नया शब्द भी सुनने को मिला था चॉकलेटी हीरो और लडकियों को ये कितनी पसंद बताने की जरूरत नहीं तो उस दौर की किशोरियां ही नहीं हर उम्र की महिलायें उनकी दीवानी हो गयी थी और उनकी आँखें मिचमिचाने की अदा हो या फिर हाथों को अपनी ही तरह से लहराने का जुदा ढंग सबने उन्हें उनके नाम से इस तरह से स्थापित कर दिया कि आज तक भी लोग उनके उन्हीं अंदाज की नकल करते है ।

जो दर्शाता कि एक कलाकार के पास यदि उसकी अपनी ही कोई अलहदा अदा हो तो भी वो लोगों को लुभा सकता बशर्तें कि उसके साथ अभिनय की गहराई भी होना जरूरी है क्योंकि, लोग केवल नाजो-अंदाज को अधिक दिन तक याद नहीं रखते वो तो केवल उसकी पहचान के तौर पर उसे दोहराते लेकिन, अंततः एक अदाकार द्वारा अभिनीत की गयी भूमिकायें और यादगार फ़िल्में ही उसकी धरोहर के रूप में शेष रह जाती जिनके माध्यम से उनके प्रसंशक उन्हें आने वाले समय में याद करते और सदियाँ भी उसे उसी तरह से इतिहास में दर्ज करती है ।

इसमें कोई संदेह नहीं कि जो मुकाम ‘राजेश खन्ना’ ने अपनी अनोखी स्टाइल से हासिल किया उसकी वजह से उन्हें भूल पाना मुमकिन नहीं होगा और जब-जब २९ दिसम्बर आएगी उनके जन्मदिन की बधाइयाँ उनके नाम लिखी जायेंगी... क्योंकि, मिसालें भुलाई नहीं जाती सदियों-सदियों दी जाती है... ☺ ☺ ☺ !!!

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© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)
२९ दिसम्बर २०१८

शुक्रवार, 28 दिसंबर 2018

सुर-२०१८-३५८ : #आजकल_चरित्र #महज़_प्रमाण_पत्र




कभी आत्मबल
संयम, नियम पालन से
हीरे की तरह
सावधानी से तराशकर
गढ़ा जाता था
इंसान का चरित्र
जो अब बड़ी आसानी से
कागज़ पर लिख
बना उसका प्रमाण-पत्र
निर्धारित कर दिया जाता है
जिसका कोई लेना-देना नहीं होता
आचरण या व्यक्तित्व से
वो तो तय होता
आदमी के कद और रुतबे से
नहीं कोई मापक यंत्र
जो कर सके इसका आकलन
अब तो लिखा हुआ ही
सर्वोपरि होता
वास्तविकता का जिसमें
कोई अंश नहीं होता
तभी तो...
मिटते ही नामोनिशान
वो भी हो जाता गुमनाम
पर, जो सचमुच होते चरित्रवान
उनका होता सदा गुणगान ।।

#कैरेक्टर_नॉट_सर्टिफिकेट

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© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)
२८ दिसम्बर २०१८

गुरुवार, 27 दिसंबर 2018

सुर-२०१८-३५७ : #शायरी_का_पर्याय_मिर्ज़ा_ग़ालिब #उनके_लिखे_हर्फ़_हर_दास्ताँ_में_शामिल




मुझसे कहती है तेरे साथ रहूंगी सदा,
ग़ालिब बहुत प्यार करती है मुझसे उदासी मेरी

कोई इस जहाँ में ऐसा नहीं जिसकी जुबां पर उसका नाम नहीं, नाम गर, न भी हो लबों पर तो ये नामुमकिन कि उसके अल्फाज़ से कोई वाकिफ़ नहीं गोया कि जिन्हें शायरी की समझ नहीं या जिनका गज़ल में रुझान नहीं वे भी इस नाम से परिचित और कभी-न-कभी उसका कोई शेर कहीं-न-कहीं जरुर पढ़ा होगा कि उनके लिखे कई अशआर तो मुहावरे की तरह प्रयोग किये जाते है जो उनकी मकबूलियत को जाहिर करते कि किस कदर उन्होंने जीवन को हर सांस में जिया ही नहीं बल्कि, अपनी कलम से बयाँ भी किया जो अमूमन किसी न किसी की ज़िन्दगी के किसी न किसी अहसास से टकरा ही जाता तो अनायास ही उसके होंठों पर उसकी लिखी कोई शायरी आ ही जाती है...

हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है,
वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता

किसी के लिये तो उनको निरंतर पढ़े जाना ही नित अर्थों के नये पन्ने खोलता है क्योंकि, जरुरी नहीं कि सामने वाला उसके वही मायने निकाले जो लिखने वाले ने कहना चाहा कभी-कभी तो पढ़ने वाला अपने हिसाब से उसे नये तरह से परिभाषित करता और इस तरह तमाम शोध उन पर जारी रहते कि इतने सारे अनछुये पहलुओं को जानने के बाद भी कुछ ऐसा बाकी रहता जो उसे ही नजर आता जो उसकी तलाश में भटक रहा और यही बेचैनी ही तो है जो ग़ालिब को मिटने नहीं देती और न ही कभी उनका नाम कभी अतीत का हिस्सा बनेगा बावजूद इसके कि उन्हें गुज़रे शताब्दियाँ हुई जा रही है पर सोशल मीडिया के इस जमाने में भी कोई सर्वाधिक लोकप्रिय है तो वो ‘मिर्ज़ा ग़ालिब’ है जिनके नाम पर तो अब वो कलाम भी दर्ज हुये जा रहे जो उन्होंने कभी लिखे ही नहीं जो उनके प्रति लोगों के जुनून को दर्शाता है कि अपने शब्दों को भी उनके नाम के साथ अमर कर देना चाहते है...

तुम न आए तो क्या सहर न हुई
हाँ मगर चैन से बसर न हुई
मेरा नाला सुना ज़माने ने
एक तुम हो जिसे ख़बर न हुई

कोई-भी ऐसा जज्बात नहीं जिसे उन्होंने अपनी कलम से छूकर महसूस न किया हो या कोई ऐसा जज्बा नहीं जो उन्होंने महसूसा हो पर उसे जता न पाये हो कि अपनी फ़ाकामस्ती में रहते हुए भी वे किसी भी संवेदना से बच नहीं पाये चाहे फिर वो इश्क़ हो या उदासी या ख़ुशी या फिर गम का ही कोई आलम सबको उन्होंने इस तरह से सफों पर उतारा कि हर एक वो पल उस रूप में सदा-सदा के लिये इस तरह से पन्नों में दर्ज हो गया कि जब उसे कोई पढ़े तो उस अहसास से ही गुजरता है और खुद को कभी हंसता तो कभी रोता और कभी ग़मगीन पाता हैं कि रगों में दौड़ने वाले लहू के साथ जज्बात भी अक्सर, इस तरह से कलम के जरिये कागज़ पर उड़ेल दिये जाते है और जो शब्दों को इस खुबसूरती से शायरी में बाँधा करता वो खुद कहता है कि...

लफ़्ज़ों की तरतीब मुझे बांधनी नहीं आती “ग़ालिब”
हम तुम को याद करते हैं सीधी सी बात है

अपने इसी सीधे-साधे सटीक बात करने के अंदाज़ ने उनको आम जनता के बीच वो लोकप्रियता दी कि चलते-फिरते भी उन्होंने यदि कोई बात कह दी तो वो बहर में ही निकली कि गज़ल उनकी रूह में समाई हुई थी तो फिर भला गज़ल का वो शहंशाह किस तरह से कोई भी लफ्ज़ बेमानी कह देता इसलिये तो उनके जीते-जी ही नहीं बाद मरने के भी वो हमारे लिये उसी तरह मौज़ूद है जिस तरह से कोई शख्स अपनी मौज़ूदगी को सदेह साबित करता उसी तरह से कलमकार के शब्द ही उसके होने का भरम रखते है और जो रूह भटकती हो वफ़ा कि तलाश में तो वो शरीर के साथ छोड़ने पर भी उसे ढूंढती ही रहती चाहे फिर उसे उस नादानी का गुमां ही क्यों न हो जाये वो उसे खोजता ही रहता है...

मैं नादान था जो वफ़ा को तलाश करता रहा ग़ालिब
यह न सोचा के एक दिन अपनी साँस भी बेवफा हो जाएगी

उनकी क्या सबकी साँसों को एक दिन इसी तरह से साथ छोड़कर चले जाना है ये जानते-बुझते भी सब फ़िज़ूल उसे जाया करते चंद ही जो ऐसा कोई काम करते की फिर भले साँसें चूक जाये पर, वो ऐसा मुकाम हासिल कर लेते जब उनके न रहने पर भी उनका किया हुआ काम उनको जिन्दा रखता है यही वजह की आज उनके न रहने पर भी हम उनका जन्मदिन बड़े प्यार से मना रहे है और उन्हें बुला रहे कि वे अपने वादे पर कायम रहते हुये आये क्योंकि, वे हम सबके लिये गुज़रा हुआ वक़्त नहीं है बल्कि, उन्हें याद करके तो न जाने कितने अपना वक़्त गुजारते है...

मेहरबां होके बुला लो मुझे चाहो जिस वक़्त
मैं गया वक़्त नहीं हूँ के फिर आ भी न सकूँ

मिर्ज़ा असदुल्लाह खाँ 'ग़ालिब' साहब को आज उनकी २२१ वी जयंती पर उनके सभी चाहने वालों कि तरफ से यौम-ए-पैदाइश की तहे दिल से मुबारकबाद... <3 !!!

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© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)
२७ दिसम्बर २०१८

बुधवार, 26 दिसंबर 2018

सुर-२०१८-३५६ : #नहीं_भूल_सकते_वो_नाम #उधम_सिंह_ने_किया_ऐसा_काम




इस देश ने अपनी आँखों से अनगिनत शासकों को देखा और अनेकों जुल्म सहे जो इतिहास के पन्नों में रक्तिम स्याही से लिखे हुये है जिनमें जलियावाला बाग़ जैसा क्रूरतम व जघन्य नरसंहार दूसरा कोई नहीं जहाँ घेरकर बच्चे, बूढ़े, युवा और असहाय लोगों को बड़ी निर्दयता के साथ एक अंग्रेज सनकी अफसर ने मौत के घाट उतर दिया जिसके निशान वहां अब तलक मौजूद है ।

जो उस खूनी खेल की निर्मम दास्तान दर्दीले स्वर में बयान करते है जिन्हें पढ़-सुनकर ही हमारा दिल दहल जाता और रगों में बहने वाला खून खौल उठता है ऐसे में जिन्होंने उस भयवाह घटना को दिल पर पत्थर रखकर सहा या उस समय घटनास्थल पर जाकर उस खौफ़नाक मंजर को अपनी आँखों से देखा भले, वे उस पीड़ा को अपनी जुबां से व्यक्त नहीं कर सकते पर पर, अपनों की मौत का बदला जरुर चाहते है ।

इसने जिस नवजवान को सर्वाधिक प्रभावित किया उसने अपने जज्बे को अपने भीतर उस वक़्त तक जज्ब कर के रखा जब तक कि लन्दन जाकर उस हत्यारे को उसके अंजाम तक नहीं पहुंचा दिया उसके बाद ही उसे चैन मिला ऐसे वीर देशभक्त शहीद को आज उसकी जयंती पर बारम्बार नमन जिसने माँ भारती के सपूत होने का फर्ज ही नहीं निभाया बल्कि, उन सब मृतात्माओं को सुकून भी पहुँचाया ।

वे सब जो कहने को उसके रिश्तेदार नहीं थे पर, उसके बावजूद भी उन सबसे उसका रूहानी रिश्ता था और जो न्याय की तलाश में न जाने कब से भटक रहे थे और जब अन्याय का प्रतिफल न मिले तो फिर इस तरह ही प्रतिकार लेना पड़ता है अपना हक छीनना पड़ता है तो उसने भी वही किया और जिस तरह किया वो सुनने में असम्भव लगता पर, उसने उसे सच कर दिखाया आज उस बहादुर को जन्मदिन की मुबर्बाद... उधम सिंह जिंदाबाद... ☺ ☺ ☺ !!!

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© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)
२६ दिसम्बर २०१८

मंगलवार, 25 दिसंबर 2018

सुर-२०१८-३५५ : #प्रेम_से_जीतने_आये_दिल #प्रभु_के_प्यारे_पुत्र_ईशा_मसीह




इस दुनिया में ईश्वर ने अपना सन्देश लोगों तक पहुँचाने के लिये अपने अनेक दूत भेजे जो अलग-अलग रूप धरकर इस धरा पर आये और अपने तरीके से सबके बीच ये कहने का प्रयास किया कि, हम सब एक ही प्रभु की सन्तान है । हम सबको आपस में मिल-जुलकर रहना चाहिये क्योंकि, जीवन क्षण-भंगुर है जिसे बेवजह की बातों या लड़ाई-झगड़े में व्यर्थ गंवाने की जगह आपस में प्रेम से व्यतीत करना चाहिये ।

जितने भी अवतार इस जग में आये सबने एक ही बात कहीं एवं सबने हमारे बीच वही पैगाम पहुँचाया जिसके लिये वे यहाँ आये थे पर, हमने उनकी बातों को मानने की जगह उन्हें ईश्वर का दर्जा देकर मन्दिर-मस्जिद-गिरजाघर या गुरूद्वारे में बैठा दिया क्योंकि, ये हमें उन नियम-कायदों पर अमल करने से ये काम अधिक आसान लगा पर, ये भूल गये कि एक दिन आता जिसे कयामत कहते तब हम इनकी कही बातों को दोहराते पर, अफ़सोस तब तक बहुत देर हो चुकी होती है ।

हम गौर करें तो पायेंगे कि, जब हमने किसी एक अवतार की बात को गंभीरता से नहीं लिया या ये माना कि चूँकि वे तो भगवान इसलिये उनके लिये कुछ भी कर पाना मुश्किल नहीं मगर, हम तो अदने-से इन्सान है । तब-तब उस परमपिता ने अपने किसी अन्य पुत्र को पुनः हमारे बीच भेजा जिससे कि देर से ही सही हम ये समझ जाये कि इस जगत में सब उसके ही बनाये बन्दे है जिनका एक ही धर्म है मानवीयता ।

आज भी एक ऐसे ही ईश्वर के प्यारे पुत्र ईशा की जयंती है जो प्रेम का मानवीय रूप धारण कर इस दुनिया में आये और अपने समस्त जीवन में उन्होंने सबको निःस्वार्थ प्यार ही बांटा एवं सदैव उनकी ये कोशिश रही कि सब आपस में प्रेम से रहें । अपने छोटे-छोटे क्रियाकलापों और हर गतिविधि से उन्होंने हमेशा यही जताया कि हम सब एक है और ये साबित करने ऐसा जीवन जिया जिससे हम ये माने कि सबका मालिक एक है ।  

उनके जीवन का एक वाकया ये बताता कि वे कितनी सहजता से सबक सीखते-सिखाते और सबको प्रेम बांटते थे...

एक बार की बात है ‘प्रभु ईसा मसीह’ अपने शिष्यों के साथ कहीं जा रहे थे, तब बीच राह में उन्होंने देखा कि एक गड़ेरिया अन्य भेड़ों की अपेक्षा अपनी एक भेड़ को अतिरिक्त स्नेह कर रहा है । उसने स्नेह से उस भेड़ को गोद में उठाया फिर बहला-फुसला के उसे ताज़ी-हरी घास खाने को दी ये सब देखकर ईसा मसीह ने गडरिये से इस स्नेहातिरेक का कारण पूछा तो वो बोला—“प्रभु, यह भेड़ हमेशा रास्ता भटक जाती है । यूँ तो कहने को मेरे पास और भी बहुत सारी भेड़ें है पर, वे सब सीधे घर आती है लेकिन, यही राह भूल जाती है इसलिये आज इसे अधिक प्यार दिया ताकि ये फिर से रास्ता न भटके” उसकी बात सुनकर ईसा मसीह प्रसन्न होकर अपने शिष्यों से बोले—“जो राह से भटक जाये उन्हें प्यार देकर राह पर लाना चाहिये न कि उन्हें मारना चाहिये या उन पर क्रोध करना चाहिये” ।

हम सबको सदा प्रेम का पथ पढ़ाने वाले प्रेम दूत की जयंती पर सबको बधाई... ☺ ☺ ☺ !!!

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© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)
२५ दिसम्बर २०१८