बुधवार, 8 मई 2019

सुर-२०१९-१२८ : #वासुदेव_चापेकर_सिर्फ_एक_नाम #तीन_भाइयों_ने_देश_की_खातिर_दी_जान



इतिहास की किताब में दर्ज कुछ नाम उसके पन्नों में लिखे-लिखे ही धुंधला जाते तो कुछ चित्र स्मृति की दीवारों में भी खोने से लगते तभी कोई एक दिन आता जो उस तहरीर में पड़ी धूल को हटा उन्हें पुनः सुनहरा कर देता और तस्वीर की हल्की पड़ रही रेखाओं को भी गहरा कर देता क्योंकि, ये नाम किसी स्याही से नहीं बल्कि, उन बलिदानियों ने अपने रक्त से अंकित किये है । अपना सर्वस्व अर्पण करने के बाद जनमानस और उसके हृदयपटल में वो स्थान पाया है जिस पाने की ख्वाहिश तो हर कोई करता लेकिन, वो साहस, वो हिम्मत नहीं जुटा पाता कि यदि वक़्त पड़े तो राष्ट्र की खातिर अपनी जान लुटाने में भी एक पल न हिचके बल्कि, उन अवसरों की प्रतीक्षा में प्रतिपल आतुर रहे जब मौत को सामने देखने पर भी कदम पीछे हटने की बजाय चूमकर उसे गले लगा ले और जिसने ये किया उसे विस्मृत करना कृतध्नता ही कहलायेगी जो वतन के प्रति भी बेवफ़ाई है ।

आज ऐसे ही एक क्रांतिकारी और हुतात्मा का बलिदान दिवस है जिसने देश की खातिर जान की बाजी लगा दी और ये ऐसे स्वतंत्रता सेनानी थे जो अकेले नहीं वरन अपने भाइयों के साथ जंग की लड़ाई में शामिल हुये और तीनों भाइयों ने अपनी जान की परवाह न करते हुये ऐसे काम किये जिनके द्वारा वे गिलहरी सम ही सही स्वाधीनता संग्राम में अपना योगदान दे सके और इसके लिये यदि भारत माता के चरणों में अपना शीश भी चढ़ाना पड़े तो ख़ुशी-ख़ुशी अपनी गर्दन आगे कर दे जिसे अपने कर्मों से उन्होंने सत्य साबित भी किया । ये तीन भाई इतिहास में ‘चापेकर बन्धुओं’ के नाम से जाने जाते है जो कहने को तीन अलग-अलग शरीर थे मगर, उनके भीतर बसी जान व अपने वतन के प्रति सोच एक ही थी इसलिये तो 'दामोदर हरी चापेकर' (1869-1898 ई.), 'बालकृष्ण चापेकर' (1873-1899 ई.) और सबसे छोटे 'वासुदेव चापेकर' (1880-1899 ई.) ने महज 19 साल की अल्पायु में राष्ट्र यज्ञ में अपने प्राणों की आहुति देकर अपने नाम अमर कर दिये जिन्हें भूला पाना नामुमकिन है ।

किसी गुलाम देश में गुलाम होकर जन्म लेना मजबूरी या नियति हो सकती है लेकिन, उन विपरीत हालातों में आज़ाद होने का प्रयास नहीं करना या उन कठिन परिस्थितियों को दोष देते हुये तिल-तिलकर मर जाना जरुर कायरता है और वीर कभी ऐसे मौत मरना पसंद नहीं करते वे जो भी संभव होता प्रयास करते फिर उसके लिये भले ही उन्हें मरना ही क्यों न पड़े मगर, ये अफ़सोस नहीं होता बल्कि, ये संतोष रहता कि कम से कम पांव में बंधी बेड़ियाँ तोड़ने को हाथ तो उठाया था । ये तीनों भाई भी देश के उस कालखंड में जन्में जब फिरंगियों ने उस पर अपना कब्जा जमाया हुआ था फिर भी उन्होंने जब देश में परतंत्रता भरा माहौल देखा तो उसमें रहकर घुट-घुटकर जीने की जगह ‘बाल गंगाधर तिलक’ की प्रेरणा से आज़ादी की लड़ाई लड़ने का फैसला किया और उनमें से दो भाई ‘बालकृष्ण’ तथा ‘दामोदर चापेकर’ ने जून, 1897 ई. में महारानी विक्टोरिया के 'हीरक जयन्ती' समारोह के अवसर पर दो ब्रिटिश अधिकारियों ‘रैण्ड’ और ‘ले. एम्हर्स्ट’ की हत्या कर दी तो तीसरे भाई ‘वासुदेव चापेकर’ ने अपने दोनों भाइयों ‘दामोदर’ और ‘बालकृष्ण’ को गिरफ़्तार करवाने वाले ‘गणेश शंकर द्रविड़’ की हत्या कर दी जिसके लिये तीनों को फांसी की सजा दी गयी और सबसे छोटे भाई ‘वासुदेव चापेकर’ को आज ही के दिन 8 मई, 1899 ई. फाँसी दी गयी थी ।      

आज उनके शहादत दिवस पर कोटि-कोटि प्रणाम... जय हिन्द... वंदे मातरम... 🇮🇳️ 🇮🇳️ 🇮🇳️ !!!
  
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© ® सुश्री इंदु सिंह ‘इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)
मई ०८, २०१९

मंगलवार, 7 मई 2019

सुर-२०१९-१२७ : #क्रोध_ही_नहीं_हर_गुण_समाया #विष्णु_षष्टम_अवतार_परशुराम_कहलाया




वैशाख शुक्ल पक्ष की 'अक्षय तृतीया' एक ऐसी तिथि और एक ऐसा मुहूर्त जिसकी प्रतीक्षा हर धर्मावलम्बी और आस्थावान साधक को होती है । इस शुभ काल में किया गया हर शुभ काज और दिया गया हर पवित्र दान अमिट होता जिसका पुण्य सदियों तलक खत्म नहीं होता क्योंकि, ये घड़ी ग्रह-नक्षत्रों की एक ऐसी पावन बेला होती जिसका योग बड़े संयोग से बनता है । यही वो परम पुनीत महायोग महाकाल जिसमें भृगुकुल शिरोमणि विष्णु के छठे अवतार 'परशुराम' का अवतरण हुआ जिन्होंने अपने अद्भुत शौर्य व अकल्पनीय पराक्रम से ऐसा अविश्वसनीय कथानक रचा जिसके द्वारा उनके बहुमुखी व्यक्तित्व के छिपे गुण धीरे-धीरे सामने आते है । यूं तो हम उनको उनके क्रोध व युद्ध कौशल के लिए अधिक जानते लेकिन, यही उनकी एकमात्र पहचान नहीं उनमें मानवीय चारित्रिक विशेषताएं भी थी जो उनके हृदय के कोमल पक्ष को भी सामने लाती है ।

विष्णु के आवेश अवतार परशुराम सतयुग व त्रेता के संधिकाल में पृथ्वी पर आये और द्वापर से लेकर कलिकाल तक वे अपने परशु की छत्रछाया में हम सबकी रक्षा का भार उठाये हुये और उनकी कृपा की वजह से ही हम भयमुक्त होकर रह पाते है । शास्त्र और शस्त्र का जैसा अनूठा ज्ञान उनके पास था वैसा अन्यत्र दुर्लभ था इसलिए उनका शिष्य बनने के लिए दानवीर कर्ण को भी छल का आश्रय लेना पड़ा और 'राम' व 'कृष्ण' को भी अपने विशेष शस्त्र उनसे ही प्राप्त हुये जो उनकी पहचान माने जाते है और दो अलग-अलग कालखण्डों में उनकी उपस्थिति को दर्शाते है । उनके हृदय की कोमलता का अहसास तब होता जब अम्बा उनसे न्याय की गुहार लगाती है तो स्त्रीत्व के सम्मान की रक्षा हेतु वे अपने ही शिष्य व वीर यौद्धा भीष्म से जंग करने में भी हिचकिचाते नहीं है । मिथिला कुमारी सीता के स्वयंवर में शिव धनुष भंग होने पर उनका आगमन यूं तो क्रोध की चरम अवस्था में होता है लेकिन, अयोध्या नरेश राम का विनीत व्यवहार व मधुर कण्ठस्वर उनके गुस्से को इस तरह से पिघला देता है कि रण की इच्छा से आये परशु आशीर्वाद देकर विदा होते है ।

विविधता से भरे उनके लंबे जीवनकाल व उनमें घटी घटनाओं के माध्यम से उनको जानने का प्रयास करते है तो परत-दर-परत उनके रहस्यमयी चरित्र के भिन्न-भिन्न पहलू सामने आते जो उनके बारे में प्रचलित भ्रामक धारणाओं को खंडित करते है । वे अजर-अमर आज भी हमारे बीच सूक्ष्म रूप से तेजपुंज रूप में उपस्थित है और आज उनकी जयंती व आखातीज के इस शुभ अवसर पर उनसे अपनी व इंसानियत की सुरक्षा की प्रार्थना के साथ-साथ उनकी विशेष अनुकम्पा हम सब पर बनी रहे ये आशीर्वाद भी उनसे मांगते है । सबको इस महापुरुष के आगमन दिवस की बहुत-बहुत बधाई और अकती अनेकानेक शुभकामनाएं... 💐💐💐 !!!

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© ® सुश्री इंदु सिंह ‘इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)
मई ०७, २०१९

रविवार, 5 मई 2019

सुर-२०१९-१२५ : #कार्टून_महज़_व्यंग्य_नहीं #जसम_सामयिक_मुद्दों_का_चित्रांकन_है




अखबार में बड़ी-बड़ी खबरों की चमक फीकी पड़ जाती जब कोने में छपा कार्टून उसी मसले को कम शब्दों में अधिक असरकारक तरीके से अभिव्यक्त कर देता है । यही वजह कि यदि किसी न्यूज़ पेपर में किसी मशहूर कार्टूनिस्ट के बनाये कार्टून छपते है तो लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र वही होता है । हमारे देश में ऐसे भी कार्टूनिस्ट हुये जिनकी प्रसिद्धि अखबार से अधिक थी या यूं कह सकते कि उनके बनाये कार्टून छापने के कारण ही उन समाचार पत्रों को लोकप्रियता हासिल हुई । इसलिये उन्होंने भी उसे मुखपृष्ठ पर स्थान दिया यहां तक कि एक स्थिति ये भी आई कि वे उस अखबार के पर्याय बन गये ।

ऐसे में लोगों को कार्टून की महत्ता समझ आई कि ये महज़ दो-चार आड़ी-तिरछी रेखाओं या कला का प्रदर्शन नहीं बल्कि, सम-सामयिक मुद्दों को आम आदमी के नजरिये और सोच के साथ सहज-सरल भाषा में दर्शा पाना ही इसका मुख्य आधार है । तब इस विधा ही नहीं इसे अपनाने वाले कार्टूनिस्ट्स को भी सम्मान मिलने लगा जिसने अन्य लोगों को भी इस क्षेत्र में आने प्रेरित किया । फिर 5 मई को उन सभी कार्टूनिस्ट्स को उनकी अनूठी सोच व उनकी अद्भुत कलाकारी के लिये मान-सम्मान देने हेतु 'कार्टूनिस्ट दिवस' मनाने का निश्चय किया गया । जो हमें उनके बनाये उन कार्टून्स की याद दिलाती जिसने कभी हमारे होंठों पर मुस्कान की आभा बिखेरी थी ।

आज भी ऐसे अनेक कार्टूनिस्ट जो बखूबी इस काम को अंजाम दे रहे और करेंट अफेयर्स पर अपनी तीखी कलम से वर्तमान के ज्वलंत विषयों पर ऐसा तीखा प्रहार करते है । ये सहज हास्य-व्यंग्य के साथ-साथ सत्तासीन अधिकारियों को उनके किये का चुटीला अहसास भी करा देते तभी तो कार्टून हर अखबार की जान होते है । आज उन समस्त कार्टूनिस्ट्स को उनके इस खास दिवस पर बधाई व शुभकामनाएं जो निःस्वार्थ भाव से निष्पक्षता के साथ केवल अपनी नहीं जनमानस के मन की बात को करोड़ों लोगों के समक्ष रखते है ।

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© ® सुश्री इंदु सिंह ‘इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)
मई ०५, २०१९

शनिवार, 4 मई 2019

सुर-२०१९-१२४ : #पाषाण_नहीं_इंसान_बनो



अब तक इंसान
पूरी तरह पत्थर नहीं हुआ है
क्योंकि, अब भी
कुछ स्थानों पर वार हो तो 
चोट का अहसास होता है उसको
शायद, कुछ मर्मस्थान
अब भी बगावत करते है जिस्म के
नहीं होना चाहते
वो उन खुबसूरत और मार्मिक
संवेदनाओं से जुदा इसलिये,
खुद को पत्थर में ढ़लने नहीं देते है ।
.....
जिस दिन
पंचतत्वों से बना शरीर
जिसमें कठोरता का कोई अंश
शामिल नहीं होता
बन जायेगा ‘संवेदनहीन’
हर एहसास से परे
तब क्या फर्क रह जायेगा
उस इक बुत में
जिसे तराशा संगतराश ने
और किसी ‘मानव’ में
जो बनाया है
इश्वर ने खुद अपने हाथों से
पर, फिर भी इंसान
न जाने क्यूँ बदलता जा रहा
पत्थर की एक शिला में
मगर, अब भी
पूरी तरह नहीं बदला इंसान
पूरा पत्थर नहीं हुआ
उसके सीने में धड़कता है
नाजुक अहसासों के
कोमल तंतुओं से बना ‘दिल’
जो कमजोर होता
महसूस करता सूक्ष्मतम
मानवीय संवेगों को
पत्थर होना नहीं चाहता है ।
.....
कोई कितने भी
कपाटों में बंद कर ले
बना ले खुद को
कितना भी मजबूत उपर से
पर, होता नरम भीतर से
तो हो जाता मजबूर
जब होता उसका सामना
भावुकता से भरे किसी क्षण से
या गुजरता किसी मार्मिक वाकये से
जो हिला देता उसके
संपूर्ण वजूद को
तब स्वयं के इस छिपे
अनजाने रूप से परिचय होता
जिसका वो समझता कि,
पाषाण हो चुका
ये पल ही बताता कि
कठोर पहाड़ों से ही तो फूटता
निर्मल मनोवेग का झरना
जो वापस उसे इंसान बना देता है ।  
.....
     
#संवेदना_बचाओ
#मानवता_को_सहेजो  
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© ® सुश्री इंदु सिंह ‘इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)
मई ०४, २०१९

शुक्रवार, 3 मई 2019

सुर-२०१९-१२३ : #कैसे_कहे_प्रेस_स्वतंत्र #स्क्रिप्टेड_न्यूज़_देते_एजेंट




‘प्रेस’ को आज़ादी दिलाई गयी कि वो स्वतंत्र होकर निष्पक्ष रूप से अपनी बात दुनिया के समक्ष रख सके और 3 मई को यूनेस्को और संयुक्त राष्ट्र के 'जन सूचना विभाग' ने मिलकर ‘अंतर्राष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस’ घोषित किया ताकि, इसके माध्यम से संचार जगत से जुड़े लोगों को ये याद दिलाया जाये कि उनकी कलम और शब्द उनके अपने है । वो किसी भी मसले या किसी भी प्रकरण पर बिना किसी दबाब या बिना किसी प्रतिरोध के सटीक तथ्यात्मक सूचनायें जनता के सामने लाये जिसके आधार पर लोग अपनी राय बनाये न कि उनको किसी एजेंडे के तहत ऐसी जानकारियां प्रस्तुत की जाये की उनकी मानसिकता भी उसी के अनुरूप ढल जाये । इसी वजह से प्रेस को किसी भी मुल्क की आधारशिला का चतुर्थ स्तम्भ माना गया जिस पर उसकी बुलंद इमारत खड़ी होती ऐसे में उसकी जिम्मेदारियां भी अधिक बढ़ जाती क्योंकि, वो आज जो भी समाचार या फिर सूत्रों के हवाले से जो भी आंकड़े या तथ्य पेश कर रहे वो कल इतिहास बनकर संदर्भ के रूप में प्रयोग किये जायेंगे इसलिये उनका वास्तविक होना अत्यंत जरुरी है ।
  
जैसा कि आज के ‘डिजिटल युग’ में हम सब देख रहे कि न केवल नये-नये न्यूज़ चैनल या समाचार पत्र दिन-ब-दिन सामने आ रहे बल्कि, कुछ ऐसी वेबसाइट या पेज या ब्लोग्स भी जानकारों के द्वारा लिखे जा रहे जिनका उद्देश्य केवल अपनी बात जिसे वो सही समझते उसी नजरिये से सबके सामने पेश करना है । अधिकतर चैनल या न्यूज़ पेपर को देखकर लगता ही नहीं कि ये निष्पक्ष है और निर्भीक रूप से सत्य व प्रमाणिक खबर दे रहे बल्कि, उनको पढ़कर और देखकर ही समझ आ जाता कि ये किसके इशारे पर या किसके लिये इतनी मेहनत कर रहे और किसका प्रचार कर रहे है । तब इनको देखने-सुनने के बाद मन के किसी कोने में सवाल उठते कि...

क्या वाकई ये स्वतंत्र है ?
क्या सचमुच ये किसी के गुलाम नहीं है ??
क्या वाकई इन पर किसी का प्रेशर नहीं है ???

तब इनके जवाब में भीतर से ही कोई आवाज़ आता कि अब शायद, ही ये अपने उस नेक उद्देश्य के लिये कार्यरत है क्योंकि, अब तो हर किसी के गले में किसी न किसी का पट्टा पड़ा और हर कोई किसी ने किसी के एजेंट के रूप में काम कर रहा है । फिर इनकी ‘निष्पक्षता’ या ‘ईमानदारी’ दुर्लभ वस्तुयें प्रतीत होती जिसे बेचकर या गिरवी रखकर ही ये व्यक्ति या दल विशेष के प्रवक्ता बने नजर आ रहे है ऐसे में इन्हें सच्चा, जुझारू व निर्भीक पत्रकार या संवाददाता कहने में हिचक होती है । कभी इस देश में ही ये आलम था कि सच्ची खबर जनता के बीच पहुँचाने की खातिर ये सत्ता से टकराने में भी नहीं घबराते थे और जो भी जानकारियाँ इन्हें प्राप्त होती उसे ज्यों का त्यों सबके सामने परोस देते थे । फिर उसे सुनने या पढ़ने वाला अपनी राय कायम करता था पर, अब तो सब कुछ प्री-प्लान एवं रेडीमेड होता जिसमें कितना बताना, कितना छिपाना और किस तरह से बताना सब कुछ पूर्व निर्धारित बोले तो स्क्रिप्टेड होता है ।

स्वार्थ के इस दौर और इन विकट परिस्थितियों में चंद ऐसे रिपोर्टर है जो जन जोखिम में डालकर भी पत्रकारिता धर्म निभा रहे और इस प्रयास में लगे कि लोगों को हर हाल में हक़ीकत बताई जाये पर, अफ़सोस कि लोगों को डिजाइनर जर्नलिस्ट तो पसंद आते लेकिन, जो सच दिखा या बता रहे होते उनकी बुराई करते उनको झूठा बताते है । इन सबका का नेगेटिव इफ़ेक्ट ये होता कि लोगों का सभी पर से विश्वास उठ जाता और उन्हें सच भी झूठ लगता और जो भी खबर दिखाई या प्रिंट की जाती वो उसे संदेह की नजरों से देखता जिसने पत्रकारों की निष्ठा व पारदर्शिता को कठघरे में खड़ा कर दिया है । आज का दिन उनको आईना दिखाने के लिये मुफीद कि वे जो पूरी दुनिया व समाज को आईना दिखाते एक बार खुद भी उसमें झाँक ले कि क्या वे वही है जो ये सोचकर पत्रकार जगत में आये थे कि देश-दुनिया की सच्चाई से सबको अवगत करवायेंगे मगर, सिक्कों की खनक के आगे ईमान डोल गया तब किस तरह से वो खुद का सामना करते होंगे ।

आज ‘विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस’ पर समस्त सत्यनिष्ठ पत्रकारों को बधाई जो अपने पेशे के प्रति समर्पित और जो एजेंट बने किसी पार्टी के उनको यही सन्देश कि लौट आये वापस वहां, सच्ची खबरें राह तक रही जहां... जय हिन्द... !!!
   
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© ® सुश्री इंदु सिंह ‘इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)
मई ०६, २०१९

गुरुवार, 2 मई 2019

सुर-२०१९-१२२ : #टिप्पणी_का_नाज़ुक_वार #रिश्तों_में_ला_सकता_भूचाल



आजकल ‘फेसबुक’ पर जिस तरह से लेखक/लेखिकाओं, कवि/कवयित्रियों की संख्या दिनों-दिन बढ़ रही ये बड़ा-ही चिंताजनक विषय है इसे पढ़कर निश्चित ही आप सोचेंगे कि अब ये कौन-सी राष्ट्रीय समस्या हो गयी ये तो बड़े हर्ष की बात है कि ‘फेसबुक’ के माध्यम से लोगों को एक मंच मिला है । इसके आने के बाद वे सभी लोग जो अब तक अपने मन की बात कहीं डायरी या मन के किसी कोने में ही दर्ज रखते थे अब सबके सामने प्रदर्शित कर रहे है और इसके द्वारा उन सभी रचनाकारों को भी लाभ हो रहा है जिनकी रचनायें अप्रकाशित रह जाती थी । अब न सिर्फ सबको छपने का अवसर मिल रहा है बल्कि, उनकी कृति के सार्वजानिक होने से त्वरित प्रतिक्रियायें भी मिल रही है जिससे वे खुद को अपडेट भी कर पा रहे है । नये-नये विषयों जिन पर लिखना अब तक केवल कल्पना में ही संभव था उसे इस तरीके से सबके सामने ज़ाहिर करने से भी लोग हिचक नहीं रहे क्योंकि, इस विशाल संसार में उनको अपनी रूचि के पाठकों का साथ मिल रहा है ।

ऐसे में अनेक लोगों के लेखन के क्षेत्र में आने से समस्या क्या है तो भई मैं भी इसके खिलाफ़ नहीं हूँ ये तो वाकई में हम सभी के लिये बेहद प्रसन्नता का विषय है कि अब हम सभी अपनी भावनाओं / मन में उठने वाले विचारों को सबके साथ सांझा कर पा रहे है । हर एक बात के सकारात्मक व नकारात्मक दोनों पहलू होते तो उस आधार पर इसके साथ भी एक ऐसा ही गलत पक्ष भी जुड़ रहा है जो जाने-अनजाने लोगों के व्यक्तिगत जीवन को प्रभावित कर रहा है । ऐसे अनेक मामले देखने में आये जब किसी की कलम से आकर्षित होकर सामने वाला उससे इस हद तक नजदीकी रिश्ता कायम कर लेता कि पता ही नहीं चलता कब वो उसके रिश्तों के टूटने की वजह बन जाता है । अपने मन की भावनाओं को कमेन्ट या सन्देश के जरिये दर्शाते-लिखते कब वो आभासी दोस्त अपनी मर्यादित सीमा का उल्लंघन कर जाता कब उसकी निजता में प्रवेश कर जाता दोनों को ही अहसास नहीं होता क्योंकि, शुरुआत में ये सब मन को अच्छा जो लगता है ।

किसी कलमकार की किसी रचना पर उस दोस्त की लिखी गयी टीका-टिप्पणी भी कभी-कभी उसके जीवन साथी या करीबी रिश्तों की सरल रेखा में तीसरी रेखा की तरह शामिल होकर एक कोण बना देती और ‘त्रिकोण’ का यही निर्माण घनिष्ठ सम्बन्धों में कितना घातक हो सकता ये बताने की जरूरत नहीं है । ऐसे में ये जरुरी है कि जब ये समझ आये कि कोई दोस्त हद से ज्यादा बढ़ रहा है या अपनी सीमा रेखा पार कर निजी ज़िन्दगी में अतिक्रमण कर रहा है तो उसे वही रोक दे या अपने रिश्ते के बीच एक लिमिट निर्धारित करे ताकि, दोस्ती की पवित्रता बनी रहे और किसी विस्फोटक रिलेशन में तब्दील होकर जोड़ी ब्रेकर न बन जाये । इसके अलावा अपने लाइफ पार्टनर की प्रोफाइल, उसके प्रत्येक स्टेट्स व उन पर आने वाले कमेंट्स पर अगर नजर भी रखनी पड़े तो कोई गलत बात नहीं अन्यथा खबर तब होगी जब अगला आपके प्रियतम को ही आपसे छीन लेगा क्योंकि, फेसबुक ने केवल नये लोगों को ही आपस में नहीं जोड़ा बल्कि, कई पुरानी / अधूरी / अनकही कहानियों को भी पूरा करने का मौका दिया है ।

ऐसे में यदि दोनों कहीं कमिटेड नहीं या किसी रिलेशनशिप में बंधे नहीं तो भी कोई दिक्कत नहीं लेकिन, मामला तब गड़बड़ हो जाता जब वो रचनाकार दिल की डोर से किसी से जुड़ा हो तब तीसरा आकर उसे अपने शब्दों के बाण से काट दे तो सभी की जिंदगियां उलझ जाती है । ऐसी ही परिस्थिति में सावधान व सतर्क रहने की जरूरत क्योंकि, सोशल मीडिया कोई आपका घर तो नहीं कि दरवाजे-खिड़की बंद कर के किसी के आने पर पाबंदी लगा दी जाये और ब्लॉक भी कोई ऐसा हथियार नहीं कि किसी के भेष बदलकर आने को रोक सके या हर माध्यम पर पहरे बिठा सके तो ऐसे में सजगता ही एकमात्र बचाव व उपाय है ।                 
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© ® सुश्री इंदु सिंह ‘इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)
मई ०२, २०१९

बुधवार, 1 मई 2019

सुर-२०१९-१२१ : #सुपर_स्टार_बने_मज़दूर #फिर_भी_बदलाव_बहुत_दूर




१ मई का पर्याय बन चुका है ‘मजदूर दिवस’ जो कि लगभग 130 वर्षों से ज्यादा समय से मनाया जा रहा है और श्रमिकों को उनका हक मिले इसके लिये तमाम प्रयास सभी श्रमिक हित संगठनों के द्वारा किये जा रहे है जिसमें बॉलीवुड का भी सहयोग रहा और बड़े-बड़े अभिनेताओं ने अपनी दमदार भूमिका के माध्यम से उसके जीवन के अलग-अलग पहलुओं को दर्शाने अलग-अलग रूप धरकर उसके बहु-आयामी व्यक्तित्व को रजत पर्दे पर प्रस्तुत किया जिससे कि आम जनता भी उसके निजी जीवन व उसकी परेशनियों को समझ सके और जितनी भी फ़िल्में उनके जीवन पर बनी उन सभी ने जनमानस पर अपनी अमिट छाप छोड़ी आज इस अवसर पर कुछ चुनिन्दा फिल्मों की नजर से ये जानने की कोशिश करते है कि क्या उससे मजदूरों के जीवन में कोई परिवर्तन हुआ या केवल उन अभिनेताओं को ही अपने रोल के लिये सराहना और पुरस्कार मिले...

सबसे पहले क्रम में याद आ रही है 1953 में बनी ‘दो बीघा जमीन’ जिसमें महान अभिनेता के तौर पर अपनी पहचान बनाने वाले ‘बलराज साहनी’ ने ‘कृषक’ व ‘रिक्शेवाले’ दो किरदारों को एक साथ निभाया था जिन्हें ‘श्रमिक’ की श्रेणी में रखा जा सकता है और इसमें उन्होंने उस पीड़ा की हूबहू अभिव्यक्ति की थी जिससे एक मजदूर को प्रतिदिन गुजरना पड़ता है और उनके पात्र ‘शम्भू’ ने देश ही नहीं विदेश में रहने वाले दर्शकों को भी प्रभावित किया और अनेक सम्मान इसे हासिल हुये पर, प्रश्न ये है कि क्या इसके बाद लोगों का उन रिक्शेवालों के प्रति नजरिया बदला या उनके प्रति कोई इंसानियत का भाव जगा जिससे कि उनके जीवन स्तर में सुधार हो सके यदि ऐसा नहीं हुआ तो फिर ये महज़ एक कहानी के सिवा कुछ भी  नहीं क्योंकि, किसी सामाजिक सन्देश वाली फिल्म को बनाने का उद्देश्य तो यही होता कि वो माहौल में कोई परिवर्तन लाये यदि ऐसा नहीं होता तो फिर वो सिर्फ एक ड्रामा ही कहलायेगा जिसे देखकर लोग भूल जाते है ।

इसी तरह 1983 में आई स्टार ऑफ़ मिलेनियम ‘अमिताभ बच्चन’ की एक सुपर हिट फिल्म ‘कुली’ जिसमें उन्होंने दूसरों का बोझा उठाने वाले ‘कुली’ का किरदार ही निभाया था उसमें एक संवाद था 'मजदूर का पसीना सूखने से पहले उसकी मजदूरी मिल जानी चाहिए जनाब' जो कि मजदूरों की मेहनत को सटीक तरीके से बताता है जिसका मूल्य तुरंत चुकाना चाहिये फिर भी हकीकत एकदम इसके उलट यहाँ तो उसके दाम को लेकर ही बड़ी देर तक बहस चलती उसके बाद भी अक्सर तय रकम से कम ही दी जाती जबकि, उन्हीं व्यक्तियों के द्वारा बेवजह पैसों को नशे या मौज-मस्ती में लूटा दिया जाता लेकिन, एक मजदूर को देते समय एक-एक पाई ही नहीं एक-एक मिनट का हिसाब किया जाता तो ऐसे में यही महसूस होता कि फिल्म देखकर उसके संवाद सुनकर हम भले तालियाँ बजाये या उसे दोहराये लेकिन, वो व्यर्थ है यदि हम उसको अपने जीवन में न अपनाये तो यही हो रहा कि हम इस बात के मायने ही भूल जाते जब किसी मजदूर से उसकी मजदूरी पर लम्बी बहस करते है ।  

1983 में ही ‘ट्रेजेडी किंग’ के नाम से मशहूर अभिनय सम्राट ‘दिलीप कुमार’ ने ‘मजदूर’ नाम से ही एक फिल्म में अभिनय करते हुये फैक्ट्री में काम करने वाले श्रमिक वर्ग की अनगिनत परेशनियों व उनके निजी जीवन को दर्शकों के सामने रखा और उसे फर्श से अर्श तक का सफर पूर्ण कर गरीबी से निजात पाते दिखाया गया और इसी फिल्म में अजीम शायर ‘फैज़ अहमद फैज़’ के एक गीत का ‘हसन कमाल’ ने अपने तरीके से खूब इस्तेमाल किया गया जो मजदूरों की महत्ता ही नहीं उनको दिये जाने वाले मेहनताने की नगण्यता को भी ज़ाहिर करता है क्योंकि, जो हम उसको देते वो उससे अधिक का हकदार होता और यदि किसी दिन उसने अपने जायज हिस्से की माग की तो वो क्या होगी उसे हम इस गीत के जरिये समझ सकते है जिसका एक-एक शब्द उसकी मेहनत का यथार्थ आंकलन करता है...

हम मेहनतकश इस दुनिया से जब अपना हिस्सा मांगेंगे
एक बाग़ नहीं, एक खेत नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे

दौलत की अँधेरी रातों ने मेहनत का सूरज छुपा लिया
दौलत की अँधेरी रातों से हम अपना सवेरा मांगेंगे

क्यों अपने खून पसीने पर हक़ हो सरमायादारी का
मजदूर की मेहनत पर अब हम मजदूर का कब्ज़ा मांगेंगे
   
इसे हम सुनकर गाते जरुर है पर, मजदूरों के अधिकार उसको नहीं देते ये भूल जाते कि यदि किसी दिन सचमुच उसने अपने हिस्से की मांग कर ली तो हमारे लिये कुछ न बचेगा इसलिये जरुरी कि हम उसका पसीना सूखने से पहले उसके परिश्रम का सही दाम चुका दे तब ही इन फिल्मों का बनाया जाना सार्थक होगा व मजदूरों को भी सम्मान से जीने का अवसर हासिल होगा तो आज ‘मजदूर दिवस’ पर हम यही संकल्प ले कि सभी मजदूर को उनके काम ही नहीं श्रम की वजह से सही दाम ही नहीं पर्याप्त आदर भी देंगे तब ही समाज में समानता आयेगी अन्यथा दूरी बनी ही रहेगी जो मेहनतकश के साथ अन्याय है ।                 
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© ® सुश्री इंदु सिंह ‘इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)
मई ०१, २०१९