रविवार, 7 जुलाई 2019

सुर २०१९ १८८ #तुम्हारा_चरित्र_कहाँ_है



तुम्हारे पास 'चरित्र' नहीं है क्या ?

नहीं मैम, प्रिंसिपल ने नहीं दिया बोले बाद में ले जाना अभी वो मैडम छुट्टी पर है जो देती है ।

ओह, फिर तो दिक्कत होगी, बिना 'चरित्र' के एडमिशन नहीं हो पायेगा ।

मैडम, सर तो बोले कि अभी वचन पत्र लगा सकते है फिर जब आ जायेगा तो जमा कर देंगे ।

क्यों मैडम, ऐसा हो सकता है क्या ?

दूसरी मैडम - हाँ, ले सकते है जिनके पास 'चरित्र' नहीं वो वचन पत्र लगाकर उसे बाद में जमा कर सकते है ।

पहली मैडम - ठीक है फिर लाओ ।

तभी दूसरी लड़की आगे आई, उसके डाक्यूमेंट्स चेक कर मैडम बोली अरे, तुम्हारा भी चरित्र नहीं है ।

हैं न मैडम देखिये, ट्रांसफर सर्टिफिकेट में ही जुड़ा है ।

हे, ऐसा भी होता है क्या दिखाओ अरे हां नीचे लिखा तो है 'आचरण अच्छा है' ओके चल जायेगा ।

अगली छात्रा - मैडम बिना 'चरित्र' के एडमिशन नहीं मिलेगा क्या?

मैडम - ऐसा नहीं है वचन पत्र लगाकर ले सकते है जाओ बनवा लाओ ।

तभी पंक्ति में सामने आया एक लड़का जिसके प्रपत्र देखकर मैडम बोली, तुम्हारा 'चरित्र' भी नहीं है क्या ?

सॉरी मैम, घर पर भूल आया अभी जाकर लाता हूँ ।

ओके जल्दी लेकर लाओ, नेक्स्ट दिखाओ अपने डाक्यूमेंट्स ।

तुमने चरित्र नहीं लगाया क्या ?

लगाया है न मैडम ये देखिये उसने स्कूल के लेटर पेड पर लिखा हुआ दिखाया ।

अच्छा तो अलग से बना है ।

जी मैडम, हमारे स्कूल में ऐसा ही मिलता सबको यही मिला है ।

ओके, बाकी डाक्यूमेंट्स दिखाओ ।

इस तरह एक के बाद एक बारहवीं पास करने के बाद कॉलेज में ऑनलाइन एडमिशन के लिये छात्र-छात्रायें अपने सर्टिफिकेट वेरिफिकेशन के लिये आते गये और मजेदार संवाद होते रहे जिन्हें सुनकर उस वक़्त तो कुछ अजीब नहीं लगा कि व्यस्तता व काम करने की जल्दबाजी थी । फिर जब बाद में इन बातों पर गौर किया तो बड़ी हंसी आई और ख्याल भी कि 'चरित्र प्रमाणपत्र' को शार्ट में केवल 'चरित्र' कहने से कैसी विचित्र स्थिति उत्पन्न हो सकती है । ये भी एक सत्य कि 'चरित्र' कागज का टुकड़ा नहीं और न ही उस पर लिखी इबारत से वो अच्छा या बुरा हो जाता फिर भी एक दूसरे व्यक्ति के लिखे बिना ये निर्धारित भी नहीं होता है ।

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© ® सुश्री इंदु सिंह ‘इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)
जुलाई ०७, २०१९

शनिवार, 6 जुलाई 2019

सुर २०१९ १८७ #थैंक्यू_तो_बनता_है



सर्दी हो या गर्मी
या बरसे जमकर बरसात
सुबह-सबेरे टाइम से लेकर आता
वो दैनिक अखबार
जिसके बिना अधूरे लगते
हमको सारे काम
नहीं आये किसी दिन तो लगे
छूट गया कुछ आज
लत ऐसी लग जाती उसकी
जरूरत बन जाती सबकी
जब तक न्यूज़ पेपर नहीं मिलता
दिन भी मानो नहीं गुजरता
बुजुर्गों का साथी ऐसा
नहीं होता अखबार के जैसा
बच्चों इसमें पढें कहानी
देश-दुनिया की खबरें ढेर सारी
मिलती जिससे नई–नई जानकारी
युवाओं को ये रोजगार दिलाये
जॉब्स की सूचनाएं दूर तक पहुंचाये
सभी के मन को ये भाता
लम्बा सफर हो या फिर छोटा रास्ता
टाइम पास भी अच्छा हो जाता
ये अखबार सबका प्यारा
इंतज़ार करें घर सारा
कोई नहीं लाता उसे जाकर
दरवाजे तक लाये हॉकर
प्रातःकाल आलस त्याग जगता
उठा सायकिल फिर भगता
मेहनत का उसकी करो सम्मान
दिल से कहो धन्यवाद ।।

#Dry_Newspaper_In_The_Rain
#Hawkers_Transported_Every_Door
#Say_Thanks_Them_For_Their_Noble_Work
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© ® सुश्री इंदु सिंह ‘इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)
जुलाई ०६, २०१९

शुक्रवार, 5 जुलाई 2019

सुर-२०१९-१८६-#आनंद_बिखरा_इधर_उधर #ढूंढते_जिसे_साधनों_में_हम_बेखबर




हमने जितनी अधिक प्रगति और विकास की दौड़ में जितनी तेजी से भागे उसने हमको अनेकानेक सुख-सुविधाओं से तो लाद दिया और तकनीक ने भी हमारी झोली में बहुसंख्यक गेजेट्स व संसाधन डाल दिये जिनकी वजह से हम आज हम खुद को सबसे अधिक सुविधासंपन्न व ऐश्वर्यशाली समझकर फूले न समाते कि एक क्लिक या एक बटन दबाने से फटाफट सारे काम हो जाते है । इस बात से हमारी मुस्कान ही नहीं ललक भी कुछ बढ़ जाती कि इससे ज्यादा कुछ पाने की चाह मन में घर कर जाती जिसके बाद शुरू होती एक ऐसी अंतहीन प्रतिस्पर्धा जिसके चलते हम न केवल सुख-चैन व सुकून के पल ही गंवा देते बल्कि, उन सुविधाओं के अम्बर पर सर पकड़कर बैठ जाते अनगिनत बीमारियों से घिर जाते है । वो जिसे छोड़कर हमने इन सब साधनों को ये सोचकर जोड़ा था कि खुशियों का खजाना तो इसी में छिपा है अंततः ज्ञात होता कि वास्तविक सुख व आनंद तो वहीं था जिसे हमने अभाव समझा हम अनायास ही मुस्कराहट के उन पलों को अभिशाप समझ उनसे पीछा छुड़ाने में जुट गये जबकि, उन्हीं संघर्षों और रिक्तता में छिपे थे जिन्हें अपनी नासमझी या अज्ञानता में हम देख नहीं पाये थे ।

जब ये अहसास हुआ कि वे सभी सामान जो हमने अपने कीमती समय, जीवन के अनमोल लम्हों को बेचकर पाये हमें वो आनंद दे पाने में सक्षम नहीं जिसकी तलाश में हम भटक रहे व्यक्ति को सब कुछ पाने के बाद ही शिद्दत से महसूस होता कि उसे भौतिक सुविधायें नहीं आत्मिक सुख चाहिये जो भीतर ही मौजूद था लेकिन, हम देख नहीं पाये कि उस वक़्त तो इन दुनियावी जलवों से आँखें चकाचौंध हो रही थी । जब इन्हें पाया तो जाना कि जो खो गया वो बहुमूल्य था फिर उसकी खोज शुरू की याने कि एक और गलती जो अंदर है उसे बाहर ढूँढने की बेवकूफी तो इस तरह एक अंतहीन तलाश जारी रहती है और अपने इस ध्येय को हम जल्दी से जल्दी पा सके, मखमली बिस्तर में बेफिक्र सो सके, ऊँची गद्दी या पद पर बैठकर चिंतारहित बन सके, अपने आलिशान घर, ऑफिस में माथे पर शिकन व अनींदी आँखों में फ़िक्र की जगह मुस्कान सजाकर न केवल स्वयं खुश रहे बल्कि, अपने मिलने-जुलने वालों को भी वो ख़ुशी व आनंद बाँट सके जिसकी उनको तलाश है । यदि किसी एक ने भी उस मन्त्र को पा लिया तो फिर वो अपने सम्पर्क में आने वाले सभी को उससे अभिमंत्रित कर उनके जीवन को भी कस्तूरी जैसे आनंद की खुशबू से भर सके जो यूँ तो सबके भीतर समाई मगर, पकड़ उसी के आई जिसने अपनी यात्रा की दिशा बाहर के रास्तों से मोड़कर अपने ही भीतर कर ली हो ।

ऐसे व्यक्ति ‘आनंदक’ बनकर दूसरों को आनंद बाँट सकते इस उद्देश्य से राज्‍य सरकार द्वारा ‘आनंद संस्‍थान’ का गठन 1 अगस्‍त 2016 में ‘आनंद विभाग’ के अर्न्‍तगत किया गया जो कि वर्तमान में ‘राज्‍य आनंद संस्‍थान, मध्‍यप्रदेश शासन’ के ‘अध्‍यात्‍म विभाग’ के अर्न्‍तगत संचालित हो रहा है । जिससे जुड़कर हम ‘आनंदक’ बनकर आनंद की अनुभूति के उस स्वर्गिक अहसास से सबको परिचित करवा सकते इस हेतु से एक ‘जिला स्तरीय आनंद सम्मलेन’ कल 4 जुलाई को जिला पंचायत के सभागृह में आयोजित किया गया जिसमें जिले भर से आनंदकों ने शामिल होकर छोटी-छोटी गतिविधियों में सहभागिता कर ‘आनंद’ को किस तरह से खोजा व वितरित किया जा सकता है ये सीखा और ‘हेप्पी इंडेक्स’ के माध्यम से खुद का मूल्यांकन कर ये जाना कि उसका अपना जीवन कितना आनंदित है । अलग-अलग अभ्यास के जरिये अपने जीवन में आने वाले उन इंसानों को भी पहचाना जिन्होंने कभी उनकी मदद की और कब वे किसी की सहायता कर सके या किसी के दुःख की वजह बने जिससे कि वे अपने आपको सुधार और अपने में आवश्यक परिवर्तन कर वो पारसमणि बन जाये जिसके स्पर्श से उसके करीब आने वाला हर एक व्यक्ति कुंदन बन जाये इसे सीखकर ऐसा बन पाना मुश्किल भी नहीं है ।

कल इस ‘जिला स्तरीय आनंद सम्मेलन’ का हिस्सा बनकर हमने भी आनंद प्राप्त किया व ‘आनंदक’ बनकर ये जिम्मेदारी भी ली कि दूसरों को भी खुशियाँ बाँटेंगे क्योंकि, आज यही वो अहसास जिससे हम दूर होते जा रहे इतनी भी फुर्सत नहीं कि हमारे इर्दगिर्द सर्वत्र कुदरत के जो अनगिनत दृश्य बिखरे पडे हम उन पर ही निगाहें डालकर उस ख़ुशी को पा ले जिसे खो चुके । यहाँ तक कि मोबाइल के आने के बाद तो इतने व्यस्त हो गये कि अपने बच्चों के चेहरे पर खिली मुस्कान ही देख सके इतना भी वक़्त हमारे पास नहीं है ऐसे में राज्य सरकार का ये कदम सराहनीय है । इसकी एक मुख्य गतिविधि ‘अल्पविराम’ है जिसमें जीवन की आपाधापी से कुछ पल चुराकर अपने अंतर्मन में झांककर अपनी आत्मा की आवाज़ को सुनने का प्रयास करते जो शोर में सुनाई नहीं देती है यही वो समय होता जब हम आने अतीत में जाकर अपने पिछले बुरे अनुभवों को जेहन में से मिटाकर वहां पर सकारात्मक विचार लिख सकते है । अपने मस्तिष्क की प्रोग्रामिंग इस तरह से कर सकते है कि वो नकारात्मकता को देखना ही बंद कर दे और हर जगह उसे सिर्फ आनंद ही दिखाई दे जो कठिन नहीं प्रयासों से किया जा सकता है ध्यान की अवस्था में पहुंचकर उस स्थितप्रज्ञ अवस्था को हासिल करना नामुमकिन नहीं और जीवन का सार वही है जो देर से समझ में आता जब समय हाथ से निकल जाता जबकि, यही ज्ञान पहले से हो जाए तो ज़िन्दगी पानी की तरह पारदर्शी व सहज सरल हो सकती है जिसे अनजाने में हम ही कठिन बना देते है ।                
      
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© ® सुश्री इंदु सिंह ‘इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)
जुलाई ०५, २०१९

गुरुवार, 4 जुलाई 2019

सुर-२०१९-१८५ #हिन्दू_धर्म_का_परचम_लहराया #भारत_को_विवेकानन्द_ने_विश्वगुरु_बनाया



हिंदुओं के गिरते आत्मविश्वास और ब्रिटिशों के अत्याचारों से उपजी हताशा को समाप्त कर सनातन हिन्दू धर्म को विश्वपटल पर स्थापित करने के उद्देश्य से स्वामी विवेकानंद ने शिकागो जाने का निर्णय लिया और उसके बाद जो हुआ उसने इतिहास रच दिया और उनके भाषणों पर टिप्पणी करते हुये 'द न्यूयार्क हेराल्ड' को लिखना पड़ा कि, "धर्मों की पार्लियामेंट में सबसे महान व्यक्ति विवेकानंद है । उनके भाषण सुन लेने पर अनायास ही यह प्रश्न उठ खड़ा होता है कि ऐसे ज्ञानी देश को सुधारने के लिये धर्म-प्रचारक भेजना कितनी बेवकूफी की बात है" ।

आज से लगभग 125 वर्ष पूर्व एक नौजवान ने बिना किसी संसाधन, साधन व सुविधा के वो कर दिखाया जो आज उच्च तकनीकी माहौल में करने के बारे में सोचना भी मुश्किल लगता कि यहां तो अपने ही देश में हम अपने धर्म को सर्वश्रेष्ठ नहीं बता सकते जबकि, उन्होंने पूरी दुनिया के समक्ष इसे साबित कर के दिखाया और यही नहीं शिकागो में मिली सफलता ने उनके भीतर उत्साह का वो उबाल ला दिया कि वे अगले 3 सालों के लिये इंग्लैंड में ही रह गये जहां उन्होंने भाषण, वर्तालाप, लेखों, कविताओं, बहस और वक्तव्यों के जरिये हिन्दू धर्म को सारे यूरोप में फैला दिया जबकि, हम अपने ही देश में ऐसा कर पाने में विफल हो रहे है ।

अपने प्रयासों से उन्होंने लम्बे समय से ईसाई धर्म-प्रचारकों ने हिन्दू धर्म के खिलाफ जो दुष्प्रचार किया, उसकी निंदा फैलाई उस पर पूरी तरह से रोक लगा दी और ये खबर जब भारत पहुंची तो वो हिन्दू जो अपने धर्म से विमुख हो रहा था, जिसे लगातार जुल्म सहते-सहते ग्लानि का अनुभव होने लगा था पुनः अपने धर्म और अपनी संस्कृति को लेकर गौरव का अनुभव बड़ी तीव्रता से करने लगा और वो बुद्धिजीवी युवा जो पश्चिम की चकाचौंध व अंग्रेजी से प्रभावित होकर बहकने लगा था ये देखकर कि अमेरिका के नर-नारी स्वामीजी के शिष्य बनकर हिंदुत्व की सेवा में लगे हुए है तो उन्होंने भी अपने जीवन की दिशा बदल ली जिसका विपरीत मगर, अब देखने में आ रहा जिसे देखकर निश्चित ही उनकी आत्मा को अत्यंत वेदना हो रही होगी पर, हमें तो खुद को सेक्युलर दिखाने का नशा चढा हुआ तो ये सब किस तरह से समझ आये ऐसे में स्वामी विवेकानंद को पढ़ना-सोचना ही एकमात्र विकल्प है ।

यूरोप और अमेरिका में भोगवादी जीवन शैली देखकर उन्होंने उनको संयम व त्याग का उपदेश दिया और भारत में दरिद्रता का शिकंजा देखकर उन्हें कर्म का ज्ञान दिया जिससे वे अपनी निर्धनता को स्वयं दूर कर सके न कि किसी के आगे हाथ फैलाकर अपनी विपन्नता का प्रदर्शन करें वे मानते थे कि जो लोग भूख से तड़फ रहे हो उनके आगे धर्म परोसना ठीक नहीं ये उनका अपमान है अतः रोटी को तरसते हाथों में दर्शन या धर्मग्रंथ रखकर उनका मजाक उड़ाने से बेहतर कि उन्हें कर्म का वो मन्त्र दिया जाये जो उनकी गरीबी को दूर कर सके उनके खोये स्वाभिमान को लौटा सके उनका कहना था कि, "धर्म मनुष्य के भीतर निहित देवत्व का विकास है, धर्म न तो पुस्तकों में है, न ही धार्मिक सिद्धांतों में वह तो केवल अनुभूति में निवास करता है, धर्म अंधविश्वास नहीं जीवन का स्वाभाविक तत्व है" पर, हमने ही उनके उस अनमोल सबक को भुला दिया जिसका नतीजा सामने है ।

हमको असीम ज्ञान देकर वे महज़ 39 की अल्पायु में आज ही के दिन 4 जुलाई 1902 को हमको अलविदा कर के चले गये लेकिन, जो देकर गये यदि हम उसका मूल्यांकन करें और उसमें निहित संदेशों को ग्रहण करें तो जिस तरह फिर से हिन्दू धर्म व जाति अपने उच्च प्रतिमान से नीचे गिर रही उसे बहुत बड़ा सहारा और सम्बल मिलेगा जो उसको पुनः विश्वगुरु बना सकता है ।

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© ® सुश्री इंदु सिंह ‘इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)
जुलाई ०४, २०१९

बुधवार, 3 जुलाई 2019

सुर-२०१९-१८४ #संविधान_ने_हमको_दिया_क्या #कर्तव्य_और_सहिंष्णुता_से_लाद_दिया



‘संविधान’ की मूल ‘प्रस्तावना’ तक को बदलकर उसमें जबरदस्ती ऐसे शब्द ठूंस दिये गये जिनका पालन सिर्फ और सिर्फ सवर्णों को करना है जिससे कि बाकी दूसरों को सारी सहूलियतें और अधिकार मिले । इसे बकायदा थोपने के लिये हिंदुओं की झोली में उसकी कायरता को देखते हुये ‘सहिंष्णुता’ व ‘धर्म निरपेक्षता’ का प्रसाद डाल दिया गया चूंकि, वो बहुसंख्यक है तो जब तक तथाकथित 'अल्पसंख्य' “सनद रहे इस देश में ‘माइनॉरिटी’ के बारे में संविधान में चाहे जो भी लिखा हो लेकिन, मायने उसके महज़ एक ही कौम, समुदाय व मज़हब से लगाये जाते है” धीरे-धीरे उनके समकक्ष न आ जाये वो अमन, भाईचारे व गंगा-जमुनी तहजीब का राग अलापे उसके बाद तो शरीयत लागू हो ही जानी है तो संविधान अपने आप ही खारिज़ मान लिया जायेगा । इसलिए 1976 में 42वां संशोधन कर उसमें तीन नये शब्द ‘समाजवादी’, ‘धर्मनिरपेक्ष’ व ‘अखण्डता’ जोड़े गये जिसके बाद इसका नया स्वरूप यूँ सामने आया...

“हम भारत के ‘लोग’, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके ‘समस्त नागरिकों’ को न्याय, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा, उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता बढ़ाने के लिए, दृढ़ संकल्प होकर अपनी संविधानसभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ईस्वी (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत दो हजार छह विक्रमी) को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं”।

इसे संशोधित तो कर दिया पर, तारीख वही रखी जो संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर जी ने स्वीकृत की थी इसे भी बदला जाना था जब ये शब्द उन्होंने नहीं जोड़े और न ही उनके द्वारा प्रस्तावित प्रति में ही इसका उल्लेख था लेकिन, ये सब क्योंकि, साजिशन किया गया तो मूल तिथि को ज्यों का त्यों छोड़ दिया ताकि, नई पीढ़ी जो ज्यादा खोजबीन कर के नहीं पढ़ती या जिसे इन सबमें दिलचस्पी नहीं वो इन षडयंत्रो को समझ नहीं सके । इस तरह ‘सवर्ण’ बोले तो ‘हिंदुओं’ को ये नया डोज पिलाया गया जिसमें भले शुरुआती पंक्तियां हम भारत के लोग हो लेकिन, कहीं न कहीं ‘लोग’ का तात्पर्य ‘हिन्दू’ तथा ‘समस्त नागरिकों’ से अभिप्राय ‘मुसलमान’ ही है बस, ये शब्द मि. इंडिया की तरह अदृश्य है ।

उसको पिछले 50-60 सालों में उसे इस तरह से ये शब्द रटवा दिए गए कि उसने भी मान लिया कि इसका पालन केवल उसे करना है और दूसरी कौम को बढ़ने के पूरे अवसर मुहैया करवाने में सरकार के किसी भी काम या योजना में न तो मीनमेख निकालना है और न ही शंका करना है । इसलिये तब से आज तक वही हो रहा है अल्पसंख्यक बढ़ रहा है, फलफूल रहा है और बराबरी के स्थान पर आने से केवल कुछ कदमों की दूरी पर है तो तब तक थोड़ा और सब्र कर लो हिंदुओं जैसे तुम्हारे बाप-दादाओं ने किया उसके बाद बंटवारे को ख़ामोशी से स्वीकार कर लिया । इसलिए मंदिर टूटे या तुम्हारा मकान या तुम्हें अपना जन्मस्थान छोड़ने ही क्यों न मजबूर होना पड़े अल्पसंख्यकों की खातिर तुम चुपचाप बलिदान देते रहो वरना, उन्हें कुरबानी लेना आता ही है जो अल्लाह को भी बहुत प्यारी है । ऐसे हालातों में अपने ऊपर होने वाले हमलों को भटके हुए नौजवानों या गुंडों की कारस्तानी समझो क्योंकि, आतंकी हो या चोर या फिर हमलावर या अल्लाह हु अकबर कहकर धमाका करने वाले ध्यान रहे ये कभी मुसलमान नहीं होते पर, इनके खिलाफ बोलने वाले, जय श्री राम का नारा लगाने वाले शत-प्रतिशत हिन्दू होते जिनको माफ करना भी संविधान के खिलाफ है ।

ये भी न भूलना कि ऐसे किसी मौकों पर कभी कोई मानवतावादी, समाजवादी, लिबरल, फेक मीडिया तुम्हारे साथ खड़ा नहीं होगा आखिरकार, एक तो तुम हिन्दू, दूसरे बहुसंख्यक जो गुनाहे अजीम है जिसकी कोई सुनवाई या माफी संविधान में नहीं लिखी गयी तुम्हें सिर्फ और सिर्फ एकतरफा प्रेम का निबाह करना है उनसे कोई अपेक्षा करना भी कुफ्र है क्योंकि वे सिर्फ अधिकारों व फायदे के लिये संविधान का नाम लेते बाकी सभी कामों में कुरआन व शरीयत को मानते जिसमें देश का वजीरे आज़म भी यदि उंगली करें तो विपक्ष खड़ा हो जाता आखिर, उसने ही तो संविधान को उनके माफिक बदल-बदलकर ऐसा बना दिया कि आज ‘हिन्दू’ या ‘सवर्ण’ शब्द ही गाली बन चुका है । यदि हम इतिहास की गलतियों को भूला दे और उनका जिक्र न करें तो भी जिस तरह से वामपंथियों ने मिलकर उसका कबाड़ा कर दिया उसका खामियाजा तो भुगतना ही होगा क्योंकि, सच्चाई तो इन मक्कारों को सहन ही नहीं होती अतः जैसे ही किसी पुरातन ऐतिहासिक सन्दर्भ का उल्लेख करो ये रिरियाने / मिमियाने लगते और वर्तमान खबरों में भी तभी इनका जमीर या भीतर सोयी कुम्भकर्णी मानवता जागती जब शोषित कोई अल्पसंख्यक मतलब तो आप सब समझ ही गये होगे हो अन्यथा सवर्णों पर आक्रमण, उनके घर चोरी, उनको पलायन को मजबूर करना, उनके आस्था के केन्द्रों को तोड़ना जैसी मामूली घटनाओं पर ये संज्ञान तक नहीं लेते उस पर इनका लिखना, कहना या उनसे कोई अभियान चलाने की अपेक्षा करना ही मुर्खता है ।

हमें तो केवल अधिकारों का निर्वाह और सहिंष्णुता का पालन करना वो भी तब तक जब तक कि निरीह विध्वंशक, मासूम अत्याचारी, अबोध पत्थरबाज, मानवतावादी विस्फोटक को उनका हक हासिल न हो जाये और वे इस देश में संविधान की जगह शरीयत लागु न हो जाये क्योंकि, हमको थोड़े न अभिव्यक्ति की आज़ादी, धार्मिक स्वतंत्रता या समानता का अधिकार मिला है ।     
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© ® सुश्री इंदु सिंह ‘इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)
जुलाई ०३, २०१९

मंगलवार, 2 जुलाई 2019

सुर-२०१९-१८३ : #जो_शेष_उसे_बचा_लो #या_फिर_मरने_को_तैयार_रहो




आये दिन हमारे सामने ऐसे कई दृश्य आते जो हमें ये अहसास कराते कि हम कुदरत को दिनों-दिन कितना नुकसान पहुंचाते जा रहे जिसका खमियाजा उसमें रहने वाले मूक पशु-पछी, जीव-जंतु ही नहीं पेड़-पौधे भी भुगतते पर, वे न तो प्रतिकार कर सकते और न ही हमारे विकास व तकनीक से अपनी जान ही बचा सकते है । वे तो ये भी नहीं समझते कि उनका जीवन हमारे लिये कितना जरूरी वे तो हमारे बिना जी सकते लेकिन, हमारा उनके बिना जीवन सम्भव नहीं अन्यथा वे जरूर अपनी अहमियत का फायदा उठाते तब हमें उनकी रक्षा करनी पड़ती ।

हमने अपनी बौद्धिकता व स्वार्थ के चलते जैसे ही ये जान लिया कि प्रकृति द्वारा मुफ्त में दी गयी सभी नेमतें बेहद अनमोल जिनका हम निर्माण नहीं कर सकते पर, इनसे जीवन-यापन करने के साथ-साथ अत्यंत लाभ भी कमा सकते है । बस, ये ज्ञान प्राप्त होते ही हमने जो प्राकृतिक खजाने का दोहन शुरू किया तो ये भूल गये कि हमारे पैरों के नीचे से जमीन ही खिसकती जा रही आसमान, हवा, पानी प्रदूषित हो रहा जिन्हें हम बना नहीं सकते और सभी सम्पदा विलुप्त हो रही जिनकी समाप्ति पर हमारे जीवन का भी अंत छिपा हुआ है ।

धीरे-धीरे सूरज का तापमान 50 डिग्री पर पहुंच रहा हम झुलस रहे पर, चिंता जताने से आगे नहीं बढ़ रहे, खाने-पीने की समाग्री लगातार घट रही पर, खेती की जमीन पर बिल्डिंगें खड़ी करने से पीछे न हट रहे लोगों को प्रॉपर्टी की तो परवाह पर, भूख इनसे नहीं मिटती इस सच को जानकर भी अनजान बना हुआ कि सब कुछ अभी थोड़े मिटा है । कहने का तात्पर्य कि ये मानवीय प्रवृति जब तक उसे लगता कि कुछ भी बचा है तब तक वो निश्चिंत रहता और आग लगने पर ही कुआं खोदता जबकि, पहले से यदि व्यवस्था रखे तो बिगड़ी को संभाल सकता मगर, उसे तो लग रहा कि पृथ्वी यदि नष्ट हो भी गयी तो क्या मंगल, चांद व अन्य ग्रह तो बाकी उन पर जाकर रह लेंगे अर्थात कोई भी संभावना सामने नजर आती तो भविष्य के लिए कुछ करने की बजाय वो बेफिक्र होकर सोना पसन्द करता है ।

अभी भी इतनी सारी खबरें नित आती लेकिन, उनके समाधान हेतु कोई प्रयास सामूहिक स्तर पर नहीं होता केवल, वे जो जागरूक या आने वाले विनाश को लेकर चिंतित वही अपने स्तर पर खामोश कार्य किये जाते जिसकी वजह से हमें समस्या की भयावहता समझ नहीं आती है । जो संकेत या चिन्ह हमें बार-बार अलर्ट करने हमारे सामने आते हम उनको नजरअंदाज कर आगे बढ़ जाते मगर, अब वो समय आ गया कि हम इन्हें देखकर न तो चुप रहे और न ही निष्क्रिय बल्कि, जहां जो सम्भव या जिसकी आवश्यकता तत्काल वो करें गिलहरी जैसा नन्हा प्रयास जो कुदरत को बचाये वो भी सरहानीय है ।

ऐसा ही एक काम किया अमेरिका के फ्लोरिडा के लार्गो की रहने वाली 'करेन मेसन' ने जिन्होंने 20 जून को एक तस्वीर ली जिसमें चिड़िया का बच्चा अपने मुंह में सिगरेट का टुकड़ा दबाए हुए है उन्होंने इस तस्वीर को केवल अपने पास ही सुरक्षित नहीं रखा बल्कि, जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से उसे अपने फेसबुक पेज पर शेयर किया और कैप्शन लिखा,

“स्किमर चिक को उसके पैरेंट ने सिगरेट के बट की पेशकश की यदि आप सिगरेट पीते हैं तो कृपया सिगरेट के बट्स कहीं भी न छोड़ें अब, समय आ गया है कि हम अपने समुद्र तटों को साफ करें और उनके साथ इस तरह का व्यवहार करना बंद करें” ।  

समुद्र तट पर अपने बच्चे को सिगरेट का टुकड़ा खिलाती इस मदर बर्ड की इस दारुण तस्वीर ने हर किसी का ध्यान अपनी तरफ खींचा और उसे सोचने पर मजबूर किया कि उसकी वजह से निर्दोष पशु-पंछी किस तरह से अपनी जान गंवा रहे प्रकृति ने हमें जीवन दिया और हम उसे मौत दे रहे है । हमें अपने इस कृत्य पर शर्मिंदा होना चाहिए मगर, अपनी लाइफ का जश्न मनाये जा रहे है क्योंकि, अभी ये स्थिति हमारे बच्चों के साथ नहीं आई जब कभी ऐसा हुआ तब सोचेंगे तब तक मौज-मजा किया जाए आखिर, चार दिन की ज़िंदगी है क्यों, उसे फ़िज़ूल की चिंताओं या बातों में गंवाना यदि कुदरत की ये मासूम निरीह सन्तानें खत्म भी हो गयी तो हमें क्या ?

उल्टा इनके न होने से हमको तो फायदा ही है सारी जमीन, सारा आसमान, जंगल सब हमारा हो जाएगा फिर जहां चाहे रहो, जो चाहे करो पर, एक पल ये ख्याल न आता कि ये सब इस सृष्टि को चलाने में हमसे अधिक योगदान दे रहे और इनके होने से हमारा भी इस पृथ्वी पर रह पाना सम्भव है अन्यथा, इनके अभाव में कीट-कृमि बढ़ जायेंगे जो हमारा जीवन दुश्वार कर सकते है । फिर भी ऐसी भयावह कल्पनाओं से भी हम नहीं डरते कि ये भयानक भविष्य अभी कोसों दूर तब तक हम तो बढ़िया से जीकर निकल जायेंगे जो बचेंगे वो सोचे और देखें कि उन्हें इन हालातों में क्या करना मेरा तो इतने पानी व ऑक्सीजन में अच्छे से जीवन कट जायेगा इस स्वार्थी सोच ने हो ये बेड़ा गर्क किया हुआ है ।

ये तस्वीर और ऐसे अनेकानेक दृश्य जो प्रतिदिन हमारी आंखों के सामने आते हमें संकेत कर रहे कि, वक्त आ गया है कि हम चेतें इससे पहले की बहुत देर हो जाये बात सिर्फ एक सिगरेट के बट की नहीं है हम ऐसा बहुत कुछ कर रहे हैं जिससे वन्यजीव खतरे में पड़ रहे हैं चाहे वो प्लास्टिक का इस्तेमाल हो या एसी या अन्य गेजेट्स सभी न केवल पर्यावरण बल्कि, हमारे स्वयं के लिये भी खतरा है । इन सबको हम जितना इग्नोर करेंगे और कोई सकारात्मक कदम न उठाएंगे प्रकृति उतनी ही तीव्रता व क्रोध के साथ इसका प्रतिकार करेगी तब फिर आज के जैसे मूकदर्शक बनने के हम कुछ न कर सकेंगे क्योंकि, करने वाला समय जब था हम यूँ ही बातों या व्यर्थ कामों में उसे व्यतीत कर रहे थे ।

ये वो अवसर है जिन्हें हमें समझना है, झपटना है, बाद में हमारे हाथ में कुछ न रहेगा कुदरत के प्रकोप को चुपचाप झेलने के सिवाय हमारी अभी की खामोशी हमारे ही नहीं आने वाली पीढ़ी के भविष्य को भी खतरे में डाल रही है । इससे पहले कि प्रलय आये, आओ हम फिर से इस दुनिया को सबके रहने लायक बनाये, इस मानसून अधिक से अधिक पेड़-पौधे लगाये, जल सरंक्षण से पानी बचाये और विलुप्ति की कगार पर पहुंच रही प्रजातियों को फिर से बसाये... ये वसुंधरा केवल हमारी नहीं, इसमें सबका हिस्सा और सबका हक है ।

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© ® सुश्री इंदु सिंह ‘इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)
जुलाई ०२, २०१९

सोमवार, 1 जुलाई 2019

सुर-२०१९-१८२ : #दोस्त_जैसा_हो_अगर_डॉक्टर #हर_रोग_हो_जाये_झटपट_छूमंतर




शिल्पी – डॉक्टर साहब, मेरी तो आधी बीमारी केवल आपके यहाँ आकर आपको देखकर ही मिट जाती है और बाकी की आधी आप से बात कर इसलिये जैसे ही लक्षण दिखाई देते मैं दौड़कर आपके पास चली आती हूँ । कई बात तो बिना अपॉइंटमेंट लिये भी आ जाती मगर, आप हमेशा मुस्कुराकर स्वागत करते यही वो बात है जो दर्द को खत्म कर देती काश, सारे डॉक्टर आपके जैसे हो जाये तो लोग अस्पताल आने से डरने की बजाय आने के बहाने ढूँढने लगे आखिर, दोस्तों से मिलना तो सबको ही भला लगता है । 

डॉक्टर – शिल्पी, मैंने डॉक्टरी का पेशा ज्वाइन करते समय ही ये डिसाइड कर लिया था कि मैं अपने मरीजों से किसी डॉक्टर की तरह नहीं बल्कि, एक दोस्त की तरह मिलूँगा क्योंकि, एक तो दोस्त बनकर मरीजों के डर को खत्म करना आसान होता दूसरा, बड़े-से-बड़े रोग में भी उनका इलाज कर पाना सम्भव हो जाता नहीं तो साधारण बुखार में ही व्यक्ति घबराकर मर्ज बढ़ा लेता है ।

शिल्पी – आपकी इसी सोच ने देखिये न आपके कितने दोस्त बना दिये जो यहाँ आता अपनी ख़ुशी से आता न कि जबरन या मजबूरी में जबकि, बड़ी-से-बड़ी तकलीफ़ में भी लोगों की सोच यही होती कि जितना टाला जाना सम्भव ही उतना ही ठीक है । आपके व्यवहार ने मगर, कम ही सही लोगों की सोच को बदलने का काम तो किया और हम सौभाग्यशाली है कि आप हमारे शहर में हमारे करीब है । आपको पता आपके पहले यहाँ जो डॉक्टर थे वे न तो किसी की बात ध्यान से सुनते और न ही प्यार से बोलते लगता जैसे सिर्फ ड्यूटी कर रहे हो उस पर इतना तो सड़ा-सा मुंह बनाये रहते कि सर्दी-जुकाम में भी लगता जैसे किसी बड़ी बीमारी ने जकड़ लिया हो जबकि, आपके पास आने से बड़े-से-बड़ा दर्द भी छोटा लगता है ।

डॉक्टर – ये तो इस पेशे को इतना गंभीर बना दिया गया कि सालों-साल डॉक्टरी पढ़ते-पढ़ते और फिर प्रैक्टिस करते-करते इंसान हंसना ही भूल जाता लेकिन, जो समझते कि इसमें मरीज से जुड़कर उसे बेहतर तरीके से ठीक किया जा सकता है । वे इस इस काम को उतनी ही सहजता से करते जैसे कोई दोस्त अपने दोस्त को समझता तो बिना कहे ही उसके मन की बात, उसकी तकलीफ़ समझ जाता है । यही फलसफ़ा मैंने अपने प्रोफेशन में अपनाया और देखो तुम जैसे प्यारे-प्यारे अच्छे-अच्छे दोस्त मिले जो अस्पताल या डॉक्टर का नाम सुनकर डरते नहीं बल्कि, ख़ुशी-ख़ुशी मुझसे मिलने यहाँ आते है । एक डॉक्टर के लिये भला, इससे बढ़कर दूसरी ख़ुशी की बात और क्या हो सकती है जो मैंने सोचा वो कर दिखाया और अपनी उस सोच को भी सही साबित किया जिसे अमूमन सम्भव नहीं समझा जाता है ।

शिल्पी – अब तो आपको अपनी इस सोच को भी एक रिसर्च पेपर में छपवा देना चाहिये जिससे कि दूसरे डॉक्टर्स भी आपकी तरह बने और डॉक्टर-पेशेंट के बीच दोस्ताना सम्बन्ध बने न कि आदमी ये सोचे कि डॉक्टर तो लुटेरा होता चाहे जान चली जाये मगर, अपनी फीस नहीं छोड़ता उसे किसी से कोई कोई सरोकार नहीं केवल अपनी फीस से मतलब होता यदि ऐसा हो गया तो सच, बहुत से लोग तो यूँ ही स्वस्थ हो जायेंगे ।

तभी दरवाजे पर नॉक हुई और आठ-दस लोग केबिन के भीतर आये उन्होंने डॉक्टर साहब को हेप्पी डॉक्टर डे कहकर विश किया व फूलों का गुच्छा और मिठाई का डब्बा भी थमाया ये देखकर शिल्पी भी उठकर खड़ी हुई और बोली, मुझे तो याद ही न रहा कि आज एक जुलाई डॉक्टर दिवस है सॉरी, मेरी तरफ से भी आपको बहुत-बहुत बधाई गिफ्ट ड्यू रहा नेक्स्ट टाइम जरुर दूंगी ।

डॉक्टर – मेरा गिफ्ट तो तुम सबका ये स्नेह और प्यार है जो अमूमन सभी डॉक्टर को नसीब नहीं होता तो मेरी तरफ से तुम सबका भी शुक्रिया लो सब मुंह मीठा करो आखिर, डॉक्टर डे बिना मरीजों के तो हो नहीं सकता न... और सब जोर-जोर से हंसने लगे ।
        
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© ® सुश्री इंदु सिंह ‘इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)
जुलाई ०१, २०१९