शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

सुर-२६८ : "कुर्बान करो जान... न कि ईमान...!!!"

‘मज़हब’
सबका अपना
लगता सबको प्यारा
न करो कभी
भूले से भी बुराई इसकी
कि इसे तो ख़ुद हमने बनाया
और फिर इंसान को
अलग-अलग हिस्सों में बांटा
जिसे रब ने एक समान
पंचतत्वों को मिला जिलाया ॥
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मित्रों...,

अम्मी... अम्मी... आज ‘बकरीद’ हैं न तो इस बार आप हम उसकी बलि नहीं देंगे...
प्लीज... प्लीज... आप मेरी बात मानोगे न वरना मेरे सब दोस्त मुझे स्कूल में चिढ़ायेंगे...
प्लीज अम्मी मान जाओ न...

नन्ही ‘रुबीना अपनी अम्मी ‘शाहिदा’ को लगातार पिछले दो दिनों से यही बोल-बोल कर परेशान कर रही थी और वो उसके नाज़ुक मन को ठेस पहुंचाये बिना उसकी बात का जवाब देने का प्रयास कर रही थी लेकिन उसके सवाल कुछ ऐसे थे कि वो समझ ही नही पा रही थी कि आखिर इत्ती-सी बित्ते भर की गुड़िया को वो किस तरह से उन बातों के उत्तर दे जिन्हें दे पाने में बडे-बडे बुद्धिमान और धर्म के जानकार भी कान पकड़ लेते पर, वो तो माँ थी और नहीं चाहती थी कि उसकी कोई जिज्ञासा अधूरी रह जो उसे परेशान करती रहे इसलिये आज उसे इत्मिनान से अपनी गोद में बिठा वो बोली, मेरी जान पूछो जो भी तुम्हारे मन में आ रहा हैं ।

तब वो अपनी मीठी आवाज़ में बोली, अम्मी आज तो सब हमारे स्कूल में हमें चिढ़ा रहे थे कि तुम लोग गंदे हो जो निर्दोष जानवर को मार कर त्यौहार मनाते हो तो बोलो न अम्मी हम उनसे क्या बोले हमें समझ नहीं आता कि हम क्यों उनको मारते हैं... बोलो न...???

शाहिदा ने खुद क संयत किया और बोली, बेटी यदि जानवर को खाने से कोई गंदा होता तो फिर तो सारी दुनिया के आधे से ज्यादा लोग वही कहलायेंगे और ये जो हम अपने घर में बनाते खाते वो तो हम अपने अल्लाह का हुकुम मनाते हैं तो ‘रुबीना’ बोली, अल्लाह का हुक्म वो क्या हैं अम्मी ???

तब उसकी अम्मी ने उसको वो कहानी सुनाई जो उसने अपनी माँ से सुनी थी कि एक बार पैगंबर ‘हजरत इब्राहिम’ को अल्लाह की तरफ़ से फरमान मिला कि जो भी चीज़ तुझे सबसे प्यारी हो उसे मेरे लिये कुर्बान कर दो । तब ‘हजरत साहब’ ने बहुत सोचा तो उनको अपने इकलौते बेटे ‘इस्माइल’ की याद आई जिसे वो सबसे ज्यादा चाहते थे अतः खुदा के हुक्म के अनुसार उसको ही कुर्बान करने का मन बना लिया जिसे सुनकर इस्माइल भी बड़ा खुश था कि उसे अपने खुदा की भेंट चढ़ाया जायेगा इसलिये वो उस दिन का इंतजार करने लगा ।

जब वो दिन आया तो उसकी जगह पर एक दुंबा (भेड़ की नस्ल का एक पशु) कुर्बान हो गया और इस तरह से अल्लाह ने इस्माइल को बचा लिया और हजरत साहब की तरफ से ये कुर्बानी कबूल कर ली बस, तब से ही हम इस परंपरा को निभाते हैं बेटा, धर्म को माना जाता हैं उस पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया जाता क्योंकि हम इतने काबिल नहीं कि उसे बदल सके हम तो केवल उसके आदेशों का पालन करना चाहिये ।

तब ‘रुबीना’ बोली तो अम्मी इस बार आप हमारी बलि दे देना पर, उसकी नहीं हम सबके चिढ़ाने से से तंग आ गये हैं ये सुन शाहिदा ने झट उसे सीने से लगा लिया तो वो बोली अम्मी, हम भी आपकी सबसे प्यारी चीज़ हैं न तो फिर अल्लाह हमारी जगह भी किसी को भेज देगा आप परेशान न हो ।

उसकी मासूमियत पर निहाल होकर वो बोली, बेटी यदि वक्त पड़ा और हमें ऐसा करने मजबूर होना ही पड़ा तो हम अपने देश की भलाई और धर्म को बचाने के लिये ऐसा जरुर करेंगे लेकिन अभी तो हमें वही करना होगा जो हम करते हैं और हाँ, अपने दोस्तों को कह देना कि चिढ़ाने की जरूरत नहीं इस देश में सबको अपने-अपने मजहब को मानने का अधिकार हैं और हमारे जैसे रिवाज़ हैं हम वैसा ही करेंगे और आप के यहाँ जैसी परंपरा हो आप वैसा करो बेटी, हर धर्म में कुछ अच्छा तो कुछ बुरा होता पर, किसी का मजाक उड़ाना उसको आहत ज्यादा गंदी बात हैं न कि कोई पर्व मनाना तो चले तैयारी करें ईद मनाने की जाओ पहले सबको ईद की मुबारकबाद बोलकर आओ... क्या बोलोगी... तो ‘रुबीना’ बडे अंदाज से बोली... कुर्बानी का पर्व ईद सबको बहुत-बहुत मुबारक हो... और दोनों हंस पड़ी... :) :) :) !!!     
   
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२५ सितंबर २०१५
© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
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गुरुवार, 24 सितंबर 2015

सुर-२६६ : "सड़क किसकी ???"

ये सारी
‘सड़क’ मेरी हैं
इसलिये
जो जी में आये
वही करूं...
घर बनाऊ
या फिर
चादर तान
सो जाऊं  
चाहे तो
जोर-जोर से
चिल्लाऊं
या शोर-गुल कर
हल्ला मचाऊं
कभी वहीँ
झांकी सजाऊं
तो कभी
भजन गाऊं
और जब
जरूरत हो तो
शामियाना लगवाऊं
पंगत खिलवाऊं
कोई यदि
रोकने आये तो
उसको मार भगाऊं
आखिर...
मैं भी तो
इस ‘लोकतंत्र’ का
एक शक्तिशाली ‘वोटर’ हूँ ॥
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मित्रों...,

‘भारत’ देश की अनेक विशेषताओं में से एक ये हैं कि यहाँ रहने वाला हर एक नागरिक भले ही अपने कर्तव्यों का पालन करने में चूक जाये लेकिन अपने अधिकारों के प्रति सदैव सचेत रहता और चूँकि वो अपना सबसे कीमती ‘मत’ और अपनी आय का कुछ हिस्सा ‘कर’ के रूप में देकर सरकार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता तो उसके बदले में सभी सरकारी सुविधाओं एवं सरकारी वस्तुओं पर अपना पूर्ण अधिकार समझना उसका जायज़ हक बनता हैं जिसके कारण सरकार भी उसका कुछ बिगाड़ नहीं पाती कि कहीं वो नाराज हो गया तो उसके नीचे से उसकी कुर्सी ही न चली जाये और सबसे बड़ी अंदर की बात तो ये हैं कि यदि आम नागरिक इसी मुगालते में खुश रहे कि इस तरह से वो सरकार का नुकसान कर रहा हैं तो इसमें तो उसका फायदा ही है क्योंकि कम से कम इस तोड़-फोड़ में व्यस्त आम जनता उनकी गलतियों की तरफ़ तो ध्यान नहीं देगी और इस तरह दोनों का ही काम चलता रहता... सही हैं, जब बच्चा मिटटी से खेल हंसता खिलखिलाता तो माता-पिता उसे उसमें मस्त देख अपने काम में लग जाते कुछ ऐसा ही नादानी भरा खेल ‘सरकार और ‘अवाम’ के बीच चलता रहता हैं ।  

अक्सर देखने में आता कि सरकारी धरोहर को हर कोई अपनी व्यक्तिगत अमानत समझता हैं तभी तो एक तो वो बिना टिकिट रेल-यात्रा तो करता ही साथ वहां की सामग्री भी अपने साथ ले आता इसी तरह जिस दफ्तर या विभाग में काम करता तो वहां की हर एक वस्तु या सामान को अपना मान घर पर ही रख लेना बड़ी आम बात हैं ऐसे में जो यहाँ से वहाँ तक खुलेआम ‘सड़क’ बिछी हुई हैं उसे वो किस तरह से अपना न समझे आखिर, वो तो उसके घर के सामने से जाती भी हैं तो फिर घर में होने वाले हर समारोह के लिए उसे दालान की तरह इस्तेमाल करना उसका हक़ हैं फिर चाहे किसी को कितनी भी परेशानी क्यों न उठाना पड़े उसे कोई सरोकार नहीं वो तो अपना कार्यक्रम वहां कर के ही रहेगा अगला चाहे पैदल जाये या फिर चाहे उसे कोसता रहे उसके कानों में जूं तक नहीं रेंगती उसे तो अपने सिवाय कोई नजर नहीं आता तभी तो हर कोई अपने किसी भी आयोजन के लिये मंच इसी सडक पर बनाता हैं और जबी उसका घर बनता तो उसकी सामग्री रेट, गिट्टी, ईट सब वो इसी ‘सडक’ पर रखवाता जिसकी वजह से कोई गिरे-पड़े या मरे उसे क्या ? उसे तो ये पता हैं कि उसके मकान के आस-पास का ये हिस्सा केवल उसका अपना हैं ।

कभी कोई यहीं पर लाउड स्पीकर लगवा कथा करवाता मिल जायेगा तो कभी किसी की शादी का पंडाल लगा दिख जायेगा तो कभी कोई झांकी सज जायेगी तो किसी को कहीं रहने जगह न मिले तो वो यही अपना आशियाना बना लेगा और कभी-कभी तो कोई भीड़ को जमा कर जादू या करतब दिखता हुआ नजर आयेगा तो कभी कोई कुछ बेचता हुआ राह रोक लेगा याने कि किसी को भी कुछ भी प्रदर्शित करना हैं और उसके पास अपना कोई ‘मंच नहीं तो फ़िक्र की कोई बात नहीं लंबी-चौड़ी ‘सडक’ तो हैं न मजे से उसे इस्तेमाल करो गर, कोई रोकने-टोकने आये तो उसे मुंहतोड़ जवाब देकर शर्मिंदा कर दो और फिर भी न माने तो वही झगड़ा शुरू कर दूसरों के हंसी का पात्र बन जाओ कहने का मतलब कि ये वो क्षेत्र हैं जिस पर कहने को तो किसी का कोई हक नहीं लेकिन मानो तो ये सबकी अपनी हैं और आये दिन हर कोई इस बात को दर्शने से जरा भी न हिचकता तभी तो इस जगह पर नित नया मजमा लगता... ‘सड़क’ बनाने वाला भी सोचता कि चलो अपना काम तो चलता जो यहाँ रहने वाला तोड़-फोड़ करता रहता... हमारे यहाँ ये सड़क चलने से ज्यादा ठहरने के काम आती तभी तो सबकी ‘संपति’ कहलाती फिर कोई क्यों न पेश करें इस पर अपनी दावेदारी जिससे चलती उसकी दुकानदारी... आखिर वही तो हैं उसका सच्चा अधिकारी... :) :) :) !!!       
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२४ सितंबर २०१५
© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
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बुधवार, 23 सितंबर 2015

सुर-२६५ : "काव्यकथा - दुःख से उपजे सुख...!!!"


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मित्रों...,



दुःख तो हर किसी के जीवन में हैं लेकिन गणितीय फार्मूले की तरह दो दुखी अपने दुःख को आपस में मिलाकर सुखी भी हो सकते हैं केवल नजरिया ही तो बदलना हैं जैसे कि इस माँ ने बदला---

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देते हुये
गरीब बच्चे को
भीख में सूखी बासी रोटी
बांझपन की आग में जलती
वो झल्लाकर बोली,
जाने कैसी हैं इसकी माँ
पैदा कर के छोड़ गयी
अपने कलेजे के टुकड़े को
सडकों पर रोने अपने दुखड़े ?

सुनकर उसकी ये बात
उस मासूम का भर आया दिल
रोककर अपनी रुलाई
उसने धीमे स्वर में कहा,
मैं क्या जानूं क्या होती हैं माँ ?
मैंने तो सडकों पे आँख खोली
सुनी ही नहीं माँ की बोली...

अचानक ही ममता का
एक सैलाब आया...
और उस अभागे को साथ अपने
बहाकर बहुत दूर ले गया
ऐसी जगह जहाँ था
सपनों का खुबसूरत संसार
निसंतान को मिल गया वरदान
बच्चे को उसकी खोयी माँ
भर गया दोनों का खालीपन
न रहा कोई गम का निशान ।।
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इस तरह एक अनाथ को ‘माँ’ मिल गयी तो एक बेऔलाद को संतान और दोनों एक दूसरे से मिल पूर्ण हो गये बस, एक पल ने दोनों का जीवन संवार दिया... काश, सभी इस तरह से खुद को बदल सके तो ये दुनिया जन्नत बन जाये... :) :) :) !!!
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२३ सितंबर २०१५
© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
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मंगलवार, 22 सितंबर 2015

सुर-२६४ : "लघुकथा : मोबाइल संस्कृति...!!!"

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मित्रों...,



शीना, तुमसे कितनी बार कहा कि यूँ देर रात तक घर के बाहर रहना ठीक नहीं और अपने परिधान को तो देखो क्या ये हमारी संस्कृति के अनुरूप हैं तुम आजकल के बच्चे हाथ में ‘मोबाइल’ लिये रात-रात भर जाग न जाने किस तरह की जीवन शैली अपना रहे हो जिसमें अपनी भारतीय संस्कृति के साथ-साथ पहचान भी खोते जा रहे हो ।

उफ़... दादी आपकी ये हर वक्त की रोकटोक पुरातन घिसे-पिटे रीति-रिवाज का बेवक्त राग समझ नहीं आता जब भी मैं देर रात अपने दोस्तों के साथ पार्टी कर लौटूं आपका ये लेक्चर शुरू हो जाता आप समझती क्यों नहीं ये कंप्यूटर युग हैं यहाँ तो रोज लोग फेशन के साथ चलते हर दुसरे दिन नई तकनीक नये गेजेट्स आ जाते तो पुराना जो दस दिन पहले ही लेटेस्ट था उसे फेंक नया ले लेते और आप चाहती हम टेलीफोन से चिपके रहे दोस्तों को संदेश भेजने खत लिखे... और जो नया हैं उसे छोड़ दे... बडबडा कर ‘शीना’ अपने कमरे में जा ही रही थी कि पीछे से दादी की आवाज़ आई... तुम जिस दिन अतीत और व्यतीत का फर्क समझ जाओगी उस दिन ये समझोगी कि हमारी संस्कृति हमारी पहचान हैं कोई ‘मोबाइल’ नहीं जो रोज बदलता रहता ये तो सोच-विचार और आचरण में झलकता तभी तो तेरे दादा धोती कुर्ता पहनकर ‘मोबाइल’ हाथ में लेकर चलते और ‘लैपटॉप’ पर भी काम करते पर, तूने कभी इसका मर्म न समझा उटपटांग कपड़े पहने बिना भी हम मॉडर्न हो सकते है बेटी, आधुनिकता विचारों का बदलाव हैं मात्र कपड़ों का नहीं ।
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२२ सितंबर २०१५
© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
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सोमवार, 21 सितंबर 2015

सुर-२६३ : "छोड़ गयी ये जहाँ... सुरों की सम्राज्ञी 'नूरजहाँ'...!!!"

चले जाते
छोड़ जहाँ कलाकार
पर, सौंप जाते
अपनी कला की विरासत
जो होती सदाबहार ॥
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मित्रों...,

सुरों की सम्राज्ञी का ख़िताब हासिल करने वाली ‘नूरजहाँ’ आज भी अपनी खनकती हुई सुमधुर आवाज़ के कारण संगीत प्रेमियों के दिलों की धड़कन बनी हुई हैं और उनके गाये हुये एक से बढ़कर एक तराने अपनी मधुरता के कारण बेक़रार हृदय का करार बन उन पर मरहम लगाने का काम कर रहे हैं तभी तो उनके जाने के इतने बरसों बाद भी उनका स्थान रिक्त पड़ा हुआ हैं क्योंकि वे तो बाली उमर से ही अविभाजित भारत के बाशिंदों को अपना मुरीद बना चुकी थी फिर भले ही वो उनका दिल तोड़ दूसरे मुल्क में चली गयी लेकिन स्वर लहरियों ने कब किसी आदेश को माना हैं और कब सरहद की दीवारों ने उनका रास्ता रोका हैं तो बस, उनके अपने वतन को छोड़ कर जाने के बाद भी मधुरतम गानो के शौकीनों ने उस गायिकी से अपना नाता न तोड़ा और ढूंढ-ढूंढ कर उनके गाये नगमों को न सिर्फ़ सुना बल्कि उस आवाज़ में उस दर्द को भी महसूस किया जो किसी अपने के बिछड़ जाने के बाद किसी चाहने वाले को होता हैं सच, अपनी जड़ों से काटकर पेड़ को किसी ओर जमीन पर लगा देने पर भले ही उपर से वो हरा-भरा नजर आये लेकिन उसके अंतर में चुभा शूल तो उसे पीड़ा देता रहता हैं जिससे निकली आह को भी हम गान समझ उसके दर्द में अपने दर्द को समो अपने सीने के बोझ को हल्का कर लेते हैं कुछ ऐसा ही हुआ ‘नूरजहाँ’ के साथ भी कि उनके जाने के बाद भी हम उस सुर को भूल न पाये और जब-जब भी उस आवाज़ ने हमें पुकारा तो हर सीमा पार कर रूह-रूह से मिल आई और आँख में नमी की बाढ़ आ गयी जिसने दिल के जख्मों को कुछ राहत तो जरुर दी पर, एक फ़ांस-सी भी कहीं भीतर तक चुभी हुई महसूस हुई जो अब तलक भी तड़फती हुई रूहों का सहारा बनी हुई हैं ।

इसलिये तो पाकिस्तान जाने के बाद जब वे भारत के दौरे पर आई तो उनके अंतर की वेदना के अल्फाज़ों में कुछ यूँ अभिव्यक्त हुई---

“आप को ये सब तो मालूम है, ये सबों को मालूम है कि कैसी नफ़सा-नफ़सी थी जब मैं यहाँ से गई मेरे मियाँ मुझे ले गए और मुझे उनके साथ जाना पड़ा, जिनका नाम ‘सय्यद शौक़त हुसैन रिज़वी’ है । उस वक़्त अगर मेरा बस चलता तो मैं उन्हें समझा सकती, कोई भी अपना घर उजाड़ कर जाना तो पसन्द नहीं करता, हालात ऐसे थे कि मुझे जाना पड़ा। और ये आप नहीं कह सकते कि आप लोगों ने मुझे याद रखा और मैंने नहीं रखा, अपने-अपने हालात ही की बिना पे होता है किसी-किसी का वक़्त निकालना, और बिलकुल यकीन करें, अगर मैं सबको भूल जाती तो मैं यहाँ कैसे आती?”

आज ही के दिन याने कि २१ सितम्बर, १९२६ ई. को अखंड भारत में पंजाब के 'कसूर' नामक स्थान पर एक मुस्लिम परिवार में इस स्वर साधिका का जनम हुआ था चूँकि उनके पिता एक संगीतकार थे तो ज़ाहिर हैं कि जींस में मिली सरगम की धुनों ने उनकी रगों पर अपना कब्जा कर लिया और पूरे घर में गूंजती वाद्य यंत्रों की तानों ने उनको बालपन से ही मौशिकी का बेमिसाल फ़नकार बना दिया और बाल कलाकार के रूप में अपनी अदाकारी एवं गायिकी से उन्होंने लोगों को अपना दीवाना बना दिया फिर आई १९४२ में ‘खानदान’ जिससे ‘बेबी नूरजहाँ’ लाखों दिलों की धडकन अभिनेत्री ‘नूरजहाँ’ बन गयी और उनके गाये गीत “तू कौन सी बदली में मेरे चाँद हैं आ जा....” तथा “मेरे लिये जहाँ में न चैन हैं  न करार हैं...” आज भी उसी तरह अपना जादू बरक़रार रखे हैं और फिर तो जो सिलसिला शुरू हुआ तो एक के बाद एक अनगिनत गानों की झड़ी ही लग गयी... जब उन्होंने गाया कि “आंधियां गम की यूँ चली बाग़ उजड़ के रह गया....” तो लगा मानों किसी का कीमती खजाना लूट गया हो... इसी तरह जब अभिनय सम्राट ‘दिलीप कुमार’ के साथ आवाज़ से आवाज़ मिला उन्होंने ये तान छेड़ी कि “यहाँ बदला वफ़ा का बेवफ़ाई के सिवा क्या है, मोहब्बत करके भी देखा मोहब्बत में भी धोखा है, कभी सुख है कभी दुख है अभी क्या था अभी क्या है, यूँ ही दुनिया बदलती है इसी का नाम दुनिया है...” तो हर किसी के लब पर यही स्वर उभर आये जिसने उसके मन की पीड़ा को खुलकर सबके सामने ला दिया और जब पुनः युगल स्वर में उन्होंने ये सुर लगाया “हाथ सीने पे जो रख दो तो क़रार आ जाये, दिल के उजड़े हुए गुलशन में बहार आ जाये...” तो हर बेचैन दिल को मानो करार मिल गया और फिर तो उनकी आवाज़ ने जब भी जो कुछ भी गाया वो अमर बन गया ।

जब उनकी अपनी अलग आवाज़ में ये स्वर कानों में पड़ता हैं “आजा तुझे अफ़साना जुदाई का सुनाये, जो दिल पे गुज़रती है वो आँखों से बताये...” तो हम उस अफसाने को सुनने बेकरार हो जाते जो आँखों को देखें बिना भी आवाज़ से ही झलकता हैं उफ़... गहन पीड़ा से सधी हुई थी उस स्वर साधिका की आवाज़ और उससे निकला हर तराना एक अनमोल नगीना चाहे वो “क्या यही तेरा प्यार था, मुझको तो इन्तज़ार था” हो या फिर “तुम आँखों से दूर हो, हुई नींद आँखों से दूर...” और ऐसे में आई ‘अनमोल घड़ी’ तो मील का पत्थर बन गयी और उसमें उनका गाया हर एक नगमा “आवाज दे कहाँ है, दुनिया मेरी जवां हैं....”, “जवाँ है मोहब्बत हसीं हैं समां...” और “मेरे बचपन के साथी' मुझे भूल न जाना देखो देखो हंसे न जमाना...” सदा-सदा के लिये अमर हो गया और फिर देश छोड़कर जाने से पहले जब उन्होंने ये गाया “तुम भी भुला दो, मैं भी भुला दूँ, प्यार के पुराने गुज़रे ज़माने...” तो लगा कि वो जाते-जाते हम सबको अपना पैगाम यूँ देकर जा रही हैं... आज उनके जन्मदिवस पर उनके ही गाये इस गीत से उनको पुष्पांजलि अर्पित करते हैं---

“आ इंतजार हैं तेरा, दिल बेक़रार हैं मेरा
आजा न सता ओर, आजा न रुला ओर
आजा के तू ही हैं मेरी तकदीर का तारा... :) :) :) !!!”  
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२१ सितंबर २०१५
© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
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रविवार, 20 सितंबर 2015

सुर-२६२ : "अंतरात्मा की आवाज़... करो न उसे इंकार...!!!"

करें जब
कोई भी काम
अंदर से एक आवाज़
आती तो हैं
ये ओर बात हैं कि
सबको देती न हो सुनाई
पर, कठिन घड़ी में
हमको समझाती तो हैं 
लेकिन, अक्सर हम
कर देते उसको अनसुनी
पर, जिसने भी सुनी उसकी बात
उसे न फिर हरा सके हालात ॥
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मित्रों...,

‘दिव्यंका’ ने घर में किसी को भी बिना बताये यहाँ तक कि अपने दोस्तों से भी मशविरा किये बिन उसके शहर में ही बनने वाली एक फिल्म के ऑडिशन के लिये आवेदन तो कर दिया ये सोचकर कि जब उसकी मूवी रिलीज़ होगी तो सब आश्चर्यचकित रह जायेंगे पर, न जाने क्यों हमेशा उसे लगता कि वो कुछ गलत कर रही हैं इसकी वजह शायद, ये थी कि उसका मन अनमना था पर, वो समझ नहीं पा रही थी कि जब वो अपनी पसंद का काम करने जा रही हैं तो फिर भी उसे अच्छा क्यों नहीं लग रहा हैं ???

उसने सोचने की बहुत कोशिश की पर, कारण समझ न पाई बस, अंदर से कोई तो आवाज़ आ रही थी जिसे वो लगातार अनसुना कर रही थी ऐसे में उसने अपनी ख़ुशी को तरजीह देते हुये वही काम किया जो वो चाहती थी न कि वो जिसे उसके अंदर बैठा डर करने से मना कर रहा था और जिस दिन उसे ऑडिशन के लिये कॉल आई वो किसी को भी कुछ भी कहे बिना चुपचाप उस जगह चली गयी पर, वहां जाकर उसे लगा कि उसने गलत किया क्योंकि वहां का माहौल एकदम मूवी के लिये होने वाली शूटिंग के विपरीत था तो भीतर से किसी ने कहा कि उसे यहाँ से लौट जाना चाहिये पर, उसने जानने की कोशिश की तो उसे कहा गया कि उसका भेजा गया विडियो और पोर्टफोलियो इतना शानदार था कि उसे बिना स्क्रीन टेस्ट के ही चुन लिया गया हैं और कल से उसे शूटिंग पर आना हैं अचानक इतने बडे ऑफर को पाकर वो विस्मित रह गयी पर, जब डायरेक्टर ने उससे कॉन्ट्रैक्ट साइन करवा साइनिंग अमाउंट पेश कर दिया तो उसने भीतर घुमड़ते संशय भरे विचारों को जोर से हटा दिया और उसकी देह के अंदर कोई जो उसे ऐसा करने से मना कर रहा था उसे धता बता दिया और अगले दिन आने का वादा कर चली गयी ।

सारी रात उसे नींद न आई वो तो केवल आने वाले जीवन के सपनों में खोई खुद को एक स्थापित नायिका के रूप में देख अपने ही आप में मगन हो रही थी इसलिये जब कोई भीतर से उसे कहता कि यार, ये तू क्या कर रही हैं या क्या करने जा रही हैं या एक बार तो सबको बता दे न सही ज्यादा लोग लेकिन कम से कम अपनी प्रिय सहेली को ही सही इसमें शामिल कर ले तो वो झुंझला जाती कि जब इतनी आसानी से उसका बरसों पुराना ख्वाब पूरा होने जा रहा हैं तो उसका मन उसे डरा क्यों रहा हैं मन में कोई भी नकारात्मक ख्याल आखिर आ ही क्यों रहा हैं ???

हूँ... ये बेकार के विचार भी न बड़ा तंग करते हैं... वो काबिल हैं तभी तो उसका अभिनय देखें बिना ही न सिर्फ़ उसका चयन कर लिया गया बल्कि उसे उसका मेहनताना भी पेशगी के तौर पर दे दिया गया तो ऐसे में कुछ भी सोचने की जरूरत क्या उसे तो अब सिर्फ़ अपने काम पर ध्यान देना हैं और जो स्क्रिप्ट आज उसे दी गयी उसे पढ़कर उसकी तैयारी करना हैं अंततः ये तय कर वो सो गयी और जब सुबह उठी तो तरोताजा होकर शूटिंग स्थल पर पहुंची तो वहां एक सेट लगा हुआ था जहाँ उसके एक दो शॉट लिये गये और इस तरह अगले एक सप्ताह तक चला तो उसे लगा कि वो भी कितनी मूर्ख थी जो इतने अच्छे ऑफर को ठुकराने जा रही थी जबकि यहाँ तो सभी कितने अच्छे हैं और कोई फालतू बात तक नहीं करता फिर धीरे-धीरे उसने महसूस किया कि अब उसके भीतर का डर भी खत्म हो चुका हैं कहीं से कोई आवाज़ नहीं आती और अगले दिन सुबह-सुबह जब वो वहां पहुंची तो डायरेक्टर ने उसे कहा कि आज शूटिंग शहर के पास बने एक पार्क में हैं तो वो जाकर उनकी गाड़ी में बैठ जाये सबको तुरंत निकलना हैं फिर शाम होने से पहले वापस भी आना हैं तो वो सीधे बाहर खड़ी गाडी में बैठ गयी और थोड़ी देर में सभी गाड़ियाँ और लोग लोकेशन के लिये रवाना हो गये और रास्ते में गाडी रुकने पर उसने कोल्ड ड्रिंक मंगाकर पी और चलती गाड़ी में हवा के झोंको से उसे पलकें भारी लगने लगी तो उसने आँखें मूंद ली और जब उसकी आँखें खुली तो उसने खुद को उस जैसी कई दूसरी लडकियों के साथ जहाज पर पाया और जब उसने सब कुछ जानने का प्रयास किया तो पता चला कि उसे और अन्य सभी लडकियों को बेच कर उनकी तस्करी की जा रही हैं तो  उसे सुन वो बेहोश हो गयी क्योंकि वहां उसकी आवाज़ सुनने भले ही कोई मौजूद हो भी लेकिन मदद करने कोई नहीं था और उसे बार-बार याद आ रहा था कि आज भी सुबह उसका दिल अजीब-सा धडका तो था लेकिन उसने इसे भी दरकिनार कर अंजान लोगों पर विश्वास किया ।

अब जबकि वो अपने स्वार्थ के हाथों में फंसकर बर्बाद हो चुकी थी तो उसे समझ में आ गया था कि जो उसे रोक रही थी, बार-बार चेता रही थी वो कोई और नहीं उसकी अपनी ही ‘अंतरात्मा’ थी जिसे उसने हमेशा नकारा तो फिर उसने भी उसे समझाना छोड़ दिया था पर, आज उसे उन सभी संकेतों के गूढ़ अर्थ समझ आ चुके थे जिनके माध्यम से उसे जगाने के कई प्रयास किये गये थे पर, उसने उन सभी को ही नज़रअंदाज़ कर अपनी मनमानी की तो सजा तो मिलनी ही थी ऐसे में उसने यही तय किया कि भले ही वो अपनी सबसे बड़ी हितैषी को पहचानने में चूक गयी पर, अब अपनी जिंदगी गंवाकर पाई इस सीख को वो सबको देकर जायेगी जिससे कि सभी ये जाने कि उसका मार्गदर्शक तो उसके अंदर ही बैठा हैं और वो उसे बाहर ढूंढता फिर रहा हैं तभी तो धोखा खाता हैं लेकिन जिसने उसने जान-पहचान लिया फिर उसे किसी भी मार्ग पर कोई दुविधा नहीं होती काश, कि उसने अपने उस सच्चे साथी को चुप न कर दिया होता तो वो बच सकती थी सच... अक्सर हम ये गलती कर जाते और उसे खामोश कर देते जिससे कि वो हमें टोंकना छोड़ देती लेकिन इसमें हमारी ही हानि होती तो वो सबको बतायेगी कि वो ऐसा न करें... ये स्वर अनसुना रह जाने पर फिर मौन हो जाता तो जब भी कभी लगे कि अंदर से कोई बोल रहा हैं तो उसे जरुर सुने और खुद निर्णय न ले सके तो किसी अनुभवी की मदद ले लेकिन उसे चुप रहने न कहे... गर, उसने तान ली चुप्पी की चादर तो फिर सो जायेंगे अंतरवीणा के तार भी... :) :) :) !!!                    
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२० सितंबर २०१५
© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
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