रविवार, 27 दिसंबर 2015

सुर-३६१ : "स्माल टाउन गर्ल की लॉन्ग जंप...!!!"

धून की पक्की
मन की सच्ची
दिल की प्यारी
दिमाग की अच्छी
जो भी ठान लिया
पाकर ही रहती
एक छोटे शहर से
महानगर मुंबई तक की
दूरी दो पैरों से नहीं
बल्कि अथक मेहनत से
अपने ही दम पर तय की
श्वेताअब सिने जगत की
नामचीन निर्देशिका बनने लगी
दिल से हम देते बधाई ॥
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मित्रों...,

यूँ सोचो तो बात बहुत पुरानी नहीं लगती लेकिन जब सालों से नापो तो बीस बरस पहले जाकर ही रूकती जी हाँ जिस कहानी का आज हम जिक्र कर रहे उसकी शुरुआत आज से इतने ही साल पहले ही प्रारंभ हुई थी जब एक बेहद प्यारी, खुबसूरत , शौक, हंसमुख और जीवन से भरपूर एक मासूम लड़की से मेरी यूँ ही अचानक रास्ते में मुलाकत हुई जो लगभग एक साल तो इसी तरह कभी भी कहीं भी किसी भी जगह होने वाले आकस्मिक मेलजोल से बढ़ते-बढ़ते दोस्ती के बेमिसाल रिश्ते में बदलने लगी जबकि हम दोनों के मध्य उम्र का भी एक फ़ासला था लेकिन दोस्ती ही तो एक ऐसा सिलसिला होता जो किसी भी तरह के दायरे से बाहर होता तभी तो हम दोनों को पता ही नहीं चला कि कब हम बहुत अच्छी सहेलियाँ बन गयी फिर हम दोनों के मध्य जो संबंध बना तो वो दिन प्रतिदिन के साथ गहरा होते-होते साल दर साल इतना मजबूत हो गया कि अब तो हर तरह की बातों से परे सिर्फ और सिर्फ़ स्नेह का दिलकश नाता बनकर रह गया जिसमें हर तरह की खट्टी-मीठी यादों का समावेश हैं और जब भी हम मिलते तो नये या पुराने सभी अविस्मरणीय किस्सों को दोहराकर कभी बीते हुये काल को फिर से जी लेते तो कभी भविष्य के लिये कुछ नूतन स्मृतियाँ भी गढ़ लेते इस तरह हम दोनों के बीच अलग-अलग शहरों में रहने की वजह से जो लंबी दूरी निर्मित हो गयी हैं उसका अहसास कुछ कम हो जाता और मिलकर बिछड़ने के बाद जुदाई के पलों में मुस्कुराने के लिये भी कुछ सामां इकट्ठा हो जाता सच, ‘दोस्त’ और ‘दोस्ती’ ईश्वर का अनमोल उपहार हैं जो बड़ी खुशकिस्मती से नसीब होता और इस मामले में तो हम बेहद धनी हैं कि हमारे पास हर तरह के दोस्तों का जमावड़ा हैं जिनमें से अधिकांश बीसियों साल पुराने हैं तो कुछ लोगों से नया-नया नाता भी जुड़ा हैं तो अब ‘सोशल मीडिया’ ने भी बड़े बेहतरीन मित्रों से नवाज़ा हैं जिनका शुकराना अदा करने ही आज हमें एक अपनी प्रिय सहेली को माध्यम बनाया हैं जिसने अपनी उपलब्धि से हमें इतना प्रभावित किया कि हमें लगा कि आज हम आप सभी का भी उससे परिचय कराये आप सबको उससे मिलवाये उसकी अनूठी गाथा सुनाये जिससे कि आप सब भी जाने कि हौंसलों की उड़ान से कोई भी किसी भी जगह पहुँच सकता केवल मन की लगन सच्ची होना चाहिये फिर कोई भी मंज़िल हो उसे पाना दुष्कर कार्य नहीं होता सच, कुछ ऐसी ही जोखिम भरी हिमालय पर्वत को फ़तेह करने जैसे साहस की ये कथा हैं

‘श्वेता शर्मा लमानिया’ भले ही ‘नरसिंहपुर’ जैसे एक छोटे से शहर में जन्मी एवं वही पलकर बड़ी हुई लेकिन उसके सपने तो बचपन से ही बड़े थे तो फिर उस जगह से क्या फ़र्क पड़ता तो ऐसा ही हुआ लेकिन एक दिन में नहीं न ही किसी जादुई चिराग़ से बल्कि बड़ी लंबी मेहनत और अथक परिश्रम के अलावा कई कठिन पड़ावों को पार करने के बाद ही ये कंटक भरा मार्ग तय हो सका जिसमें अपने घर-परिवार की जिम्मेदारी के अतिरिक्त अपनी इकलौती बिटिया के सपनों को पूरा करने की भी धुन समाई थी जिसने उसे कमजोर करने की जगह सकारात्मक ऊर्जा दी जिसकी वजह से उन सबको छोड़कर उसने अपने ही दम पर सपनों की नगरी मुंबई जाने का फ़ैसला लिया क्योंकि उसकी स्वनिल मंजिल तो वही पर उसका इंतजार कर रही थी तो लंबे संघर्ष के बाद आख़िरकार वो दिन आया जब उसका महिला निर्देशिका बनने का स्वपन साकार होने का सुनहरा अवसर उसके हाथ आया तो बस, फिर क्या था पूरी जी-जान से वो जुट गयी अपने ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ को पूरा करने में जिसको उसने नाम दिया था ‘गूँज’ जो कि चौदह अलग-अलग ‘शोर्ट स्टोरीज’ का एक पैकेज हैं जिसकी शूटिंग ‘शूलिन एंटरटेनमेंट’ के बैनर तले अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग कलाकारों के साथ कर उनको अपने लगातार के थकाऊ शिड्यूल से बिना थके ही पूरा किया जिसके बाद कुछ फ़िल्में तो ‘मेनचेस्टर’, ‘कैलिफोर्निया’ और ‘टोरंटो’ फिल्म फेस्टिवल के लिये भी भेजी जा चुकी हैं तो उसको इस बहुत बड़ी सफ़लता पर बहुत बड़ी वाली मुबारकबाद के अलावा आने वाले स्वर्णिम भविष्य के लिये शुभकामनायें कि अब उसकी ये फ़िल्में देश ही नहीं वरन विदेश में भी खूब धूम मचाये उसे मान-सम्मान और पुरस्कार के अलावा वो स्थान दिलाये जिसकी वो हकदार हैं हम सब नरसिंहपुरवासियों को उस पर गर्व हैं कि आज उसकी वजह से इस जगह का नाम भी मुंबई जैसे शहर के लोग भी जानते हैं और एक दिन सारा विश्व भी जानेगा... इसी दिली ख्वाहिश के साथ ‘श्वेता’ से यही कहना हैं---

“सपनों की नगरी मुंबई में ही रुक मत जाना
अपने हौंसलों से एक दिन आकाश भी नापना ।
‘बॉलीवुड’ से ‘हॉलीवुड’ तक अपना नाम करना
‘श्वेता’ तुम हमेशा आगे ही आगे बढ़ती रहना” ॥

इस दुआ के साथ ही ‘आमीन’... कहकर परिचय का ये दौर खत्म करती हूँ कि आगे फिर कभी और भी बातें बताऊंगी उसके किस्से सुनाऊंगी... फ़िलहाल तो कलम को यही रोकूंगी... :) :) :) !!!
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२७ दिसंबर २०१५
© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
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शनिवार, 26 दिसंबर 2015

सुर-३६० : "उधम सिंह... तुम सचमुच हो सिंह...!!!"

देशभक्ति
जोश और साहस 
रगों में भरती
जिसके दम पर ही
कोई भी जान
कभी न किसी से डरती
दुश्मन हो कोई भी
जब वीरता
बढ़ाये आगे कदम 
फिर न वो पीछे हटती
क्रांति की मशाल
उसके अंतर में
अनवरत जलती रहती
उधम सिंहहो या कोई और
सदा हाथों हाथ चलती ॥  
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मित्रों...,

भारतीय इतिहास में १३ अप्रैल १९१९ का दिन किसी स्याही से नहीं बल्कि अनगिनत निर्दोष मासूम बेगुनाहों के लहू से लिखा गया हैं जिसे पढ़कर हर देशवासी की आँखों में आंसू तो लहू में उबाल और रगों में क्रोध का सैलाब दौड़ने लगता कि किस तरह से एक क्रूर फ़िरंगी अधिकारी ने जलियावाला बाग़में एकत्र बेहिसाब जनसमूह को धोखे से चारों तरफ से घेर उस पर गोलियों की अनवरत बारिश शुरू कर दी कि उनको संभलने का मौका तक नहीं दिया गया जिसके कारण उस जगह की जमीन उन बेकुसूरों के खून से लाल हो गयी जिसमें न जाने कितने अबोध नन्हे-मुन्ने तो कितनी ही निर्दोष महिलाओं और पुरुषों के अलावा अजन्मे शिशु भी काल की भेंट चढ़ गये जिसकी कल्पना मात्र से हम सहम जाते पर, कभी सोचा कि उस वक़्त जिन देशभक्तों ने इस घटना को देखा या सुना या पढ़ा उन पर क्या गुज़री होगी कि इस हृदयविदारक घटना ने तो अनेक नये क्रांतिकारी भी पैदा कर दिये जिन्होंने इसे अपने मन पर ज्यों का त्यों अंकित कर लिया और जब भी कभी उनके हौंसलों में कमी आती तो वे अपने आपको उसके स्मरण मात्र से पुनः अपार जोश से भर लेते ।

भारतमाता के इन्हीं वीर सपूतों के बीच एक ऐसा दिलेर बहादुर भी मौजूद था जो आज ही के दिन २६ दिसंबर १८९९ को वीरभूमि पंजाब के संगरूरज़िले के सुनामगाँव में पैदा हुआ और बचपन से ही बेहद कष्टों में जीवन-यापन किया क्योंकि बालपन में ही एक-एक कर उनके माता-पिता उनको अकेले छोड़कर चले गये साथ रह गये थे एक बड़े भाई सो बदकिस्मती ने उनको भी छीन लिया पर, वे किसी भी तरह की परिस्थिति या किसी भी संकट से घबराये नहीं बल्कि हर मुश्किल का सामना डटकर किया जिसने बचपन से ही उनके भीतर सहनशीलता, जुझारूपन, निर्भीकता और किसी भी हाल में कभी न झुकने के गुणों का विकास किया यही वजह कि वो विपरीत हालातों में भी सर उठाकर चलते रहे तो कितना भी शक्तिशाली दुश्मन सामने आया उससे तनिक भी भयभीत हुये बिना अपने लक्ष्य को हासिल कर ही रुके उनकी जीवन गाथा यही बताती कि वे सही मायनों में देशभक्त थे जो केवल अपने देश को नहीं बल्कि उस देश के वासियों को भी अपना भाई-बहिन मानते थे तभी तो उनके दुःख-दर्द से वे भी उसी तरह तड़फ उठे थे जैसे कि ये उनकी अपनी ही पीड़ा हो और जब किसी देश में रहने वाले लोगों के भीतर इस तरह का जज्बा एवं अपनापन हो तो फिर उसे कौन सदा गुलाम बनाये रख सकता ।     

उधम सिंहको तो वैसे भी 'सर्व धर्म सम भाव' का प्रतीक माना जाता था क्योंकि उन्होंने अपना नाम बदलकर राम मोहम्मद आज़ाद सिंहरख लिया था जो भारत के तीन प्रमुख धर्मो का प्रतीक है उनकी ये मनोभावना भी स्वतः ही ये ज़ाहिर करती कि वे कितने संवेदनशील और इंसानियत से भरपूर थे जिनके लिये किसी भी मानव में कोई भेद नहीं था वे सभी मजहबों को एक समान मान उनका एक-सा सम्मान करते थे तभी तो अपने नाम में सभी धर्मों को स्थान दिया था इसलिये तो १३ अप्रैल १९१९ को जबकि वे लगभग २० बरस के रहे होंगे पर, इस क्रूरता ने उनके अंदर इंतकाम की ऐसी आग़ जलाई कि वो अनवरत २१ सालों तक जलती रही जब तक कि उन्होंने इस नृशंस हत्याकांड को अंजाम देने वाले ज़ालिम ब्रिगेडियर जनरल रेजीनल्ड एडवर्ड हैरी डायरको ढूंढकर १३ मार्च १९४० में उसके देश में ही जाकर मार नहीं दिया पर, उसके बाद वे भागे नहीं और बड़ी निडरता से अपना आत्मसमर्पण कर दिया ऐसे वीर सपूत को विस्मृत करना किसी कृतध्नता से कम नहीं तो आज उनके जन्मदिवस पर ये शब्दांजली उनको समर्पित हैं... :) :) :) !!!
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२६ दिसंबर २०१५
© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
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शुक्रवार, 25 दिसंबर 2015

सुर-३५९ : "क्रिसमस की बधाई... मरियम ढेरों खुशियाँ लाई...!!!"

अधर्म को मिटाने
आता ईश्वर का दूत कोई
लेकर प्रेम का संदेश
मिटाने पाप का अँधियारा
जिसको न पहचाने
अक्सर ये नादान ज़माना
पर, उसका बलिदान
करे नव धर्म की स्थापना
लिखे अपने लहू से
नई सदी का नया अफ़साना  
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मित्रों...,

भले ही इस दुनिया में अनेक मज़हब और अनेक मान्यतायें हो लेकिन जो धर्म का मूल ग्रहण करते वे जानते कि हम सब एक पारलौकिक ‘परमपिता’ की संतानें अतः हमारे बीच कोई भेदभाव नहीं भले ही उपरी तौर पर कहे कि इस लौकिक दुनिया में हमारे दैहिक माता-पिता भिन्न-भिन्न हैं तो उनके कारण हम उनके बताये धर्म का पालन करते हो क्योंकि इस धरती पर हमने ही अनेकानेक संप्रदाय स्थापित कर इंसानों के मध्य अलग-अलग मतों की दीवारें खड़ी कर दी तो हमारे जन्म लेते ही हमारी आत्मा जिस देह को धारण करती उस परिवार के अनुसार हमारा नामकरण, हमारे धर्म का निर्धारण होता जो जन्म से पहले उस परमधाम में तो सिर्फ और सिर्फ एक ही होता जिसके कारण हम सभी आत्मायें आपस में एक-दुसरे से एक ही संबंध से जुड़े होते तथा उस अलौकिक दुनिया में तो हम आत्माओं का जनक भी तो केवल वो अदृश्य सर्वव्यापी ‘परमात्मा’ होता जिसे हमारी आत्मा काया प्रवेश के बाद ही बिसरा देती और फिर इस मायावी दुनिया में भ्रमित होकर जन्मों-जन्मांतर के चक्र में फंस जाती कि ये संसार एक भूल-भुलैया की तरह उसको तरह-तरह के भुलावों में उलझा देता ऐसे में उपर बैठा सर्व आत्माओं का जन्मदाता किसी पवित्र आत्मा को जमीं पर भेजता जो हमारी अंतरात्मा पर पड़े दुनियादारी के पर्दों को हटाकर हमें अपना वास्तविक स्वरूप दिखाये और हमने जो भगवान की बनाई सृष्टि को अपने मुताबिक ढाल लिया हैं उसको भी वापस उसके मूल स्वरूप में लौटाये तो इस तरह समय-समय पर जबकि चारों तरफ अधर्म का बोलबाला बढ़ जाता और धर्म की आवाज़ मद्धम पड़ने लगती तो इस जगत में किसी न किसी अवतार, पैगंबर, देवदूत, ईश्वर पुत्र का आगमन होता जो हमारी सुप्त हो चुकी आत्मा को फिर से जागृत कर उसे उसकी भूमिका का स्मरण कराता अफ़सोस कि अक्सर हम सब उसको पहचानने में भूल कर जाते तो अपने ही हाथों उसको अपने से दूर कर देते जिसका खामियाजा बाद में पछताकर चुकाते उसको याद कर रो-रो आंसू बहाते जबकि उसकी मौज़ूदगी में उसको नहीं अपनाते बल्कि अलग-अलग ढंग से उसकी परीक्षा लेते शायद, अपनी अपवित्रता के धुंधलेपन में हम उसको सही तरह से देख नहीं पाते तभी तो जितने भी अवतार हुये सबकी ही जीवनगाथा में इस तरह की घटनाओं का उल्लेख मिलता फिर भी हम चेते नहीं जो ईश्वर द्वारा भेजे उन दूतों के संदेश का सार ग्रहण करने की जगह उनको पूजना शुरू कर दिया उनके नाम पर कोई नवीन धर्म बना लिया जबकि यदि हमने सबके प्रवचनों पर गौर किया होता तो आज इतने सारे धर्म-संप्रदाय नहीं होते क्योंकि सबकी वाणी में तो एक ही सार छिपा हैं

आज से करीबन दो हज़ार साल पहले भी इस धरती पर ऐसी ही एक शुद्ध आत्मा का एक तन में प्रवेश हुआ जिसे कि उनके माता-पिता ‘मरियम’ व ‘युसुफ’ ने प्यार से ‘ईसा’ नाम से संबोधित किया कि उनके जन्म से पूर्व ही आकाशवाणी के माध्यम से उनको ये बताया गया था कि उनके घर आने वाली संतान कोई साधारण आत्मा नहीं बल्कि ईश्वर का पुत्र हैं जिसका नाम ‘ईसा’ रखा जाये जो अपने लोगों का पापों से उद्धार करेगा तो उन्होंने वैसा ही किया और उनका पुत्र तो वाकई मानवता का सच्चा पुजारी, भटके लोगों का मार्गदर्शक और दीन-दुखियों का सच्चा हितैषी था जिसके अंदर अनेक सद्गुणों का वास था जिसके कारण उनके सानिध्य में आने वाले सत्चरित्र लोग तो उनसे अत्यंत प्रभावित हो उनके बताये मार्ग पर चलते पर, दुर्गुणी लोग उनसे इर्ष्या रखते जिसके कारण उनके मित्र कम दुश्मन अधिक बन गये थे पर, इस बात से अनजान वो तो सब पर निःस्वार्थ प्रेम की बारिश करते उनको अच्छी-अच्छी बातें बताते कि हम सब उस एक ईश्वर की संतान हैं और जब हमारा हृदय पवित्र होता तो हम ईश्वर को देख सकते हैं अतः हमें मन, वचन एवं कर्म से कोई भी ऐसा काम नहीं करना चाहिये जिससे किसी को दुःख पहुंचे तो वे सबको सदैव सजग रहने की शिक्षा देते और अपने आचरण से हमेशा ऐसा व्यवहार करते कि कभी भूले से उनसे कोई भूल न हो ताकि यदि वे उनका अनुशरण करें तो उनसे ही किसी तरह कि कोई गलती न हो इस तरह एक पैगंबर जो इस संसार में बुराइयों का खत्म करने आता वो अपनी बातों से ही नहीं बल्कि अपने हर क्रिया-कलाप से सारी दुनिया को यही संदेश देता कि हम सब जो अपने उस परमपिता के घर से आने के बाद उसे भूल इस मिथ्या जगत को ही अपना मान लेते दरअसल सब लोग मोह-माया सुंदर पिंजरे में कैद होकर उसको अपना असली घर समझने की भूल करते जिससे उनको यहाँ से जाने का दुःख होता लेकिन यदि हम ये जान ले कि हम तो केवल अपने दायित्व का निर्वहन करने आये जिसके बाद हमें वापस अपने लोक जाना हैं तो हमें मृत्यु का भी भय न हो जैसा कि ‘ईसा मसीह’ के साथ भी हुआ जब उनको सलीब पर लटकाया गया तो उन्होंने किसी से भी कोई शिकायत न कर सबको क्षमा कर दिया क्योंकि वे जानते थे कि जो कुछ भी हो रहा वो देह भुगत रही आत्मा तो इससे विलग हैं तो आज उस ‘सन ऑफ़ गॉड’ के ‘अवतरण दिवस’ पर सभी को बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनायें... सब लोग इसी तरह हंसी-ख़ुशी से मिल हर त्यौहार मनाये... अनेकता में एकता को सार्थक बनाये... ‘मेरी क्रिसमस’ सभी को.... :) :) :) !!!             __________________________________________________
२५ दिसंबर २०१५
© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
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गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

सुर-३५८ : "खुशियाँ बांटो... सांता बन जाओ...!!!"

रोज-रोज
रात लेकर लाती
अंखियों में स्वपन हजार
लेकिन एक रात आती
जो कर जाती उनको साकार
सबकी तो नहीं
मगर, कुछ लोगों की
मुराद पूरी कर देती हर बार
कि मन का विश्वास ही
बन जाता सांता
दे जाता दामन में खुशियाँ अपार ॥
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मित्रों...,

बचपनकी मासूमियत, निश्छलता नहीं जानती सुख-दुःख, अमीरी-गरीबी वो तो केवल ख्वाहिशों संग अपने कदम बढ़ाती और जो कुछ भी मन को भाता उसे पाने की तमन्ना अपने पालकों से ज़ाहिर कर देती जो उनकी तरह नादान तो होते नहीं इसलिये जानते कि उनकी चादर में कितना समा सकता तो उतना ही या उससे थोड़ा-सा अधिक ही अपने बच्चों को देने की कोशिश करते जबकि उनका भी दिल चाहता कि वो अपने आँखों के तारों को वो सब कुछ दिला दे जो उसके लबों पर मनुहार बन आता फिर चाहे वो आसमां का चाँद हो या धरती का कोई खिलौना मगर, सबकी जेब उसे ये इजाज़त नहीं देती कि वो अपने नन्हे-मुन्नों की छोटी से छोटी इच्छा को भी पूरी कर सके कि उनके लिये तो एक वक़्त की रोटी बल्कि कहे कि दो निवाले जुटाना भी दुष्कर कार्य होता फिर भी इस बात को समझने की जिनकी उमर नहीं वो तो जिद करते ही तो ऐसे में उनको बहलाने ही तो सांताका किरदार गढ़ा गया जिसका दिलासा देकर माँ उनके नाज़ुक दिल को सब्र का घूंट पिला सुला देती कि ओ मेरे लाल, मेरी दुलारी तुम्हारी जो भी मनोकामना हो उसे एक पर्ची पर लिख सच्चे मन से अपने साथी सांताको याद कर सो जाना फिर देखना किस तरह भगवान भेजता हैं उस प्यारे से दोस्त को जो रात को आयेगा और तुम्हारी मनोकामना चुटकी में पूरी कर देगा ।

इस बात पर विश्वास कर अपनी मनचाही चीज़ को मचलते बच्चे ख़ुशी के उमड़ते सागर को भीतर दबाये उस चीज़ को सोचते-सोचते आँख मूंद ख्वाबों-ख्यालों की दुनिया में खो जाते फिर पता ही नहीं चलता कब रात बीत जाती और सुबह का सूरज उनके लिये खुशियों की सौगात लेकर आ जाता और उनकी मुंहमांगी मुराद को कभी तो कोई सचमुच का देवदूततो कभी इंसान के रूप में छिपा कोई मददगार तो कभी उनकी माँ या उनके पिता ही सांताबन पूरी कर देते याने कि हर किसी के अंतस की चाहत को हकीकत में साकार करने वाला ही सही मायनों में सांताकहलाता जो जरूरी नहीं कि लाल व सफेद रंग के कपड़े पहने लंबी-लंबी दाढ़ी वाला हो जिसके हाथों में तरह-तरह की वस्तुओं से भरा झोला लटका हो वो तो किसी भी रूप में या किसी भी भेष में आ सकता केवल हमारे पास नज़र हो उसको पहचानने की तो हम उसे किसी भी स्वरूप में देखकर जान लेते कि यही तो हैं सांता’... कभी-कभी तो हम स्वयं ही अपने आपको ही अपना मनचाहा उपहार देकर वही बन जाते तो ये जो सांताका बाहरी आकार-प्रकार हैं ये तो केवल उस हमदर्द का एक तयशुदा रूप-रंग हैं लेकिन यदि मन की आँखें खुली हो तो हम अपने आस-पास घुमने वाले अनेकों सांताको पहचान सकते जो उसी की तरह से दूसरों की आधी-अधूरी तमन्नाओं को पूर्णता का जामा पहनाते हैं ।

सांता क्लॉज़जो भी हो कल्पना या हकीकत पर, हर किसी की ज़िंदगी में जो भी छोटी या बड़ी इच्छायें होती वो कम से कम उनके पूरा होने का विश्वास तो पैदा करता इस तरह से ये कमज़ोर व्यक्ति को भी संबल देता कि कोई तो हैं जो उसकी ख्वाहिश को पूरा कर सकता भले ही ये बचपन का निर्दोष भोलापन हो जो सहज ही हर बात में विश्वास कर लेता लेकिन इसने न जाने कितने ही बच्चों की कल्पनाओं में हकीकत के रंग भर उनको सचमुच का अहसास दिया इसलिये उसका आगमन सबको लुभाता और आज के दिन तो हर कोई बच्चा बन उसका इंतजार करना चाहता क्योंकि भले ही कोई बड़ा हो जाये लेकिन उसकी इच्छायें तो कभी खत्म नहीं होती बल्कि वो तो उम्र के साथ-साथ बढ़ती जाती केवल ये होता कि बड़े होने पर हम ये जान लेते कि हमें अपने मनपसंद सामान दिलाने वाला सांताकौन था ऐसे में अब अपनी संतानों के लिये वही भूमिका हम निभाना शुरू कर देते तो इस तरह से ये परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी सालों से चली आ रही कि जैसे ही कोई बच्चा बड़ा होता तो वो अपने बच्चों के लिये अपने माता-पिता की तरह सांताबन जाता जो ये सिद्ध करता कि सांतातो सबके अंदर होता तो... आओ चले उसे जगाये किसी की इच्छा पूरी कर जाये... इस तरह 'क्रिसमस' की पूर्व संध्या मनाये... :) :) :) !!!     
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२४ दिसंबर २०१५
© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
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बुधवार, 23 दिसंबर 2015

सुर-३५७ : "नूरजहाँ की गायिकी... कला की अद्भुत अदायगी...!!!"

गायिकी
अमर रहती सदा
गायक/गायिका
भले ही रहे न रहे
उस पर बसी हो
यदि कंठ में स्वर की देवी
आवाज़ में हो कशिश
तो फिर वो 
साथ अपने कलाकार को भी
सदा जीवित रखती
फिर जब बात हो
सुरों की शहज़ादी की तो
‘नूरजहाँ’ ख़ुद ब ख़ुद याद आती
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मित्रों...,

दिया बुझाकर आप जलाया
तेरे खेल निराले... दिल तोड़ के जाने वाले... !!!

इस गीत को तन्हाई में सुने तो अहसास होगा कि आवाज़ की अति कोमलता भी हृदय को तडफाने के काबिलियत रखती कहते हैं कि जब वो सुरों की साधिका के नपे-तुले गले से निकले तो उसका उतार-चढ़ाव अपने साथ-साथ सुनने वाले को भी कभी कल्पनाओं के किसी उच्च शिखर पर बैठा देता जहाँ सिवाय सुकून के कुछ भी न महसूस होता तो कभी हौले से हकीकत के धरातल पर खड़ा कर देता जहाँ आँखों में अश्कों की नमी छोड़ जाता जो अपने आप में ही उस फ़नकार के फन को साबित करता जिसमें अपने श्रोताओं को बांधकर रखने का हुनर होता जो अपने आप ही नहीं आ जाता उसके लिये बड़ी साधना करनी पड़ती तब कहीं जाकर कला की देवी का वरदान प्राप्त होता जिसके कारण कोई कलाकार इतना सिद्धहस्त बन जाता कि फिर वो कोई भी नगमा गाये या कुछ भी यूँ ही गुनगुनाये सब कुछ लाजवाब बन जाता तभी तो फ़िल्मी दुनिया का वो दौर जबकि आज की तरह तकनीक मौज़ूद नहीं थी तो अपने कंठ एवं साजों से ही अपने तराने को बेमिसाल बनाना होता ऐसे में ‘नूरजहाँ’ ने अपनी गायिकी ही नहीं अदाकारी भी कुछ ऐसा समां बनाया कि वे एक उम्दा अभिनेत्री ही नहीं बल्कि ‘मल्लिका-ए-तरन्नुम’ का ख़िताब भी हासिल कर पाई जो ज़ाहिर करता कि वे अपने दौर की सर्वश्रेष्ठ फ़नकारा थी तभी तो उस समय आने वाली सभी गायिकायें उनकी ही तरह गाने का प्रयास करती जिस तरह से उस जमाने के सभी पुरुष गायक ‘के. एल. सहगल’ की तरह तरह से गाते थे क्योंकि ये सवाक फिल्मों की शुरूआत थी तो जिन्होंने हिंदी फिल्मों को गाना सिखाया या जिनकी आवाज़ से रजत पर्दा सुरीला हुआ वो सभी मील के पत्थर बन फ़िल्मी दुनिया की इतिहास में सदा-सदा के लिये अमर बन गये जिनके किस्से आज भी उनके सभी प्रशंसकों के जेहन में उतने ही ताज़ा हैं जैसे कि मानो ये कल की ही बात हो तभी तो उनके जाने के बरसों-बरस बाद भी हम उनको उतनी ही शिद्दत से याद करते कि उन्होंने हमारी तन्हाई को महकाने दिल को छूने वाले सुरीले नगमे दिये तो हमारा मनोरंजन करने अपनी अदाकारी के नायाब जीते-जागते चरित्र भी दिये जो अपने नाम से सदा-सदा के लिये अमर बन गये

आंधियां गम की यूँ चली बाग़ उज़ड़ के रह गया...

स्वरों में कंपन देकर उनको लहराते हुये हवा के झोंकों की तरह सर्वत्र संचारित कर देना ‘नूरजहाँ’ की खासियत थी इसलिये जब भी वे जो भी गाती तो उसके सुर अपने आप ही चारों दिशाओं में फ़ैल जाते यहाँ तक कि वे जब हिंदुस्तान को छोड़कर भी चली गयी तो उनकी आवाज़ हर सरहद की दीवार और दूरियां नापकर भी हमारे कानों तक आ गयी कि कलाकार न तो मज़हब और न ही किसी मुल्क की जागीर होते वो तो केवल अपने चाहनेवालों के दिल की संपत्ति बन सदा उनके अंतर में कैद रहते और जब-जब भी उनकी पुण्यतिथि या जयंती आती तो हमें उनकी स्मृति स्वतः ही आ जाती तो आज मल्लिका-ए-तरन्नुम की पुण्यतिथि पर मन से नमन... :) :) :) !!!          
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२३ दिसंबर २०१५
© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
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