सोमवार, 25 जनवरी 2016

सुर-३९० : "राष्ट्रीय मतदाता दिवस... !!!"


दोस्तों...

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‘भारत’ को
विकसित करने
‘वोट’ देना जरूरी हैं
पर, किसे दे
ये सोचना भी जरूरी हैं
सिर्फ़...
‘नोट’ की खातिर
किसी को भी दे देना
ऐसी भी क्या मजबूरी हैं ???
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‘भारत’ एक लोकतांत्रिक देश हैं जहाँ पर कि हर एक व्यक्ति को अपनी पसंद से अपना ‘नेता’ चुनने का अधिकार हैं जिसके लिये उसे एक ‘मतपत्र’ पर अपनी पसंदगी की मोहर लगानी पडती हैं जिसे तकनीकी युग ने और अधिक आसान बना दिया अतः अब केवल एक बटन दबाकर ही ये काम कर दिया जाता हैं लेकिन किस बटन को दबाना ये भी तो विचार करना चाहिये कि केवल औपचारिकता का निर्वहन कर अपने कर्तव्य से मुक्त हो गये भले ही फिर उसका खामियाज़ा सारे देश को चुकाना पड़े जबकि अब तो ‘NOTA’ का विकल्प भी मौजूद तो ऐसे में यदि हम किसी को भी चुनना न चाहे या हमें लगे कि दिये गये उम्मीदवारों की सूची में कोई भी बंदा ऐसा नहीं जो हमारी सोच के अनुरूप हो या जिसके आने से देश तरक्की की राह में आगे न बढ़ता हो तो फिर बेहतर कि हम अपने कीमती मत को जाया न करें और सभी लोग ये निर्धारित करें कि जब तक देश की बागड़ोर थामने वाले हाथ इतने मजबूत न हो कि वो इसका सर्वांगीण विकास कर सके तब तक ‘लोकतंत्र’ को सही मायने देते हुये स्वयं ही आगे आकर इसके प्रति अपनी जिम्मेदारी समझते हुये अपना कर्तव्य निभाना हैं ।

भले ही हमने माना कि ‘मत’ देना आवश्यक हैं लेकिन ये नहीं कि उसकी महज़ खानापूर्ति की जाये क्योंकि उमर के १८ पायदान पार करते ही हमें स्वयमेव ये अधिकार मिल गया कि हम सरकार बनाने में योगदान दे सकते तो मतदान के दिन बूथ पर जाकर किसी भी बटन को दबा घर जाकर लंबी तान कर सो जाये कि हमारा काम तो हो गया तो ये न भूले कि ‘मतदाता’ तो अपने आप बन जाते पर, उसके साथ एक शपथ भी तो जुडी होती जिसे कभी नहीं पढ़ते---
      
"हम भारत के नागरिक, लोकतंत्र में आस्‍था रखने वाले शपथ लेते हैं कि हम देश की स्‍वतंत्रत, निष्‍पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव कराने की लोकतांत्रिक परम्‍परा को बरकरार रखेंगे । प्रत्‍येक चुनाव में धर्म, नस्‍ल, जाति, समुदाय, भाषा आधार पर प्रभावित हुए बिना निर्भीक होकर मतदान करेंगे।"

हमें इस ‘शपथ’ का मान भी तो रखना हैं इस उद्देश्य की खातिर तो ‘निर्वाचन आयोग’ ने २५ जनवरी को ‘राष्ट्रिय मतदाता दिवस’ घोषित किया तो हम भी इसका महत्व समझे... तभी ये दिन मनाना सार्थक होगा... जय हिंद... जय भारत... :) :) :) !!!
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२५ जनवरी २०१६
© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
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रविवार, 24 जनवरी 2016

सुर-३८९ : "जिंदगी को अपनी ही समझे... पराई नहीं...!!!"

दोस्तों...

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जैसे ही ‘मोनिका’ का मोबाइल बजा उसने तुरंत उसे उठाया तो स्क्रीन पर ‘चैताली’ का एक संदेश नजर आया उसने झट से उसे खोल पढना शुरू कर दिया क्योंकि वो रात को बहुत रो रही रही थी की वो कुछ भी करे पर, उसका मंगेतर उससे कभी ख़ुश नहीं होता ऐसे में उसे समझ नहीं आ रहा कि वो क्या करें ? कैसे उसका दिल जीते ?? किस तरह उसके अनुरूप बने ??? उस समय तो उसने जैसे-तैसे उसे समझा-बुझाकर सोने को मनाया कि वो सुबह जल्दी उससे मिलने आयेगी पर, जो मेसेज उसके सामने था वो तो कुछ और ही कहानी बयां कर रहा था---

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उसने कहा,
तुम सोचती नहीं
कुछ सोचा करो
जब सोचना शुरू किया तो
फिर उसने कहा,
बहुत सोचती हो यार
इतना भी न सोचा करो
तो जो भी किया
वो उसे खुश न कर सका
हर बात में कहीं  
कोई कमी रह ही गयी
और...
इससे बचने का
अब एकमात्र उपाय था
कि जेहन को इस देह के पिंजरे से
मुक्त कर दिया जाये
तो मैंने वही किया
पर...
इस पर भी
कोई शिकायत करें तो...
उस जहाँ में भी रूह बेचैन रहेगी ॥
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‘मोनिका’ ये तो जानती थी कि उसकी सखी बेहद संवेदनशील और भावुक हैं जिसे अपने से ज्यादा दूसरों की परवाह होती हैं लेकिन वो कोई ऐसा कदम भी उठा सकती हैं उसे अहसास नहीं था तो इस संदेश को पढ़कर उसे बड़ा जोर का झटका लगा कि उसकी सहेली ने अपनी ज़िंदगी को कभी अपना न समझ सदा उसे लोगों के कहे अनुसार जिया कभी सोचा ही नहीं कि वो अपनी जान देकर भी किसी को संतुष्ट नहीं कर पायेगी लोग तो अब भी बातें बनायेंगे ही काश, वो समझ पाती कि मरने से भी किसी की जुबान पर ताले न लगेंगे... इतने अनमोल जीवन के पल जो उसने गंवा दिये क्या अब वो वापस मिलेंगे ???

उफ्फ... अगर जिंदगी के सही मायने न पता हो तो ‘चैताली’ जैसे इमोशनल लोग तो जी न सकेंगे कि इस दुनिया में हर तरह के लोग मिलेंगे किस किस की खातिर हम अपने आपको बदलेंगे किसी को दुःख न पहुंचाने का मतलब ये तो नहीं कि खुद ही गम के सागर में डूब जाये बेहतर कि अपनी जिंदगी को सिर्फ अपनी समझे उसे दूसरों को ख़ुशी देने के लिये इस्तेमाल जरुर करें पर, फ़िज़ूल में गंवाये नहीं ।    
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२४ जनवरी २०१६
© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
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शनिवार, 23 जनवरी 2016

सुर-३८८ : "नेताजी सुभाषचंद्र बोस... करने आये हिंद का जयघोष...!!!"

दोस्तों...

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कृतध्न नहीं
कृतज्ञ बने हम सब
हमें स्वतंत्रता का उपहार
देने वालों को न
कभी भी भूले हम
जिन्होंने हमसे ज्यादा तो नहीं
थोड़ा-सा खून माँगा था
बदले में भरपूर आज़ादी का
जो वादा किया था
उसे अपनी जान देकर निभाया
और हम ‘जय हिंद’ बोल
कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते
‘सुभाषचन्द्र बोस’ के बलिदान को
एक दिन स्मरण कर
खुद को बड़ा देशभक्त कहते
२३ जनवरी केवल एक तारीख़ नहीं
हमारे लिये गौरव दिवस हैं
आओ इसको जन-जन के जेहन में
इस तरह से बसाये कि
लोग सदियों तक उनका गुणगान गाये ॥    
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हम सब बड़े सौभाग्यशाली हैं जिन्होंने इस भारत भूमि में जनम लिया जहाँ के कण-कण में उन देशप्रेमियों का रक्त समाया हैं जिन्होंने अपनी जन्मभूमि को ‘मातृभूमि’ का दर्जा दिया और अपने देश को भी ‘भारतमाता’ मानकर उसका पूजन किया तो जब उसी माँ को फिरंगियों ने गुलामी की जंजीरों में जकड़ लिया तो फिर उसे स्वतंत्र कराने की खातिर अपनी जान तक की परवाह नहीं की ऐसे ही महान सेनानी बहादुर वतनपरस्त थे ‘नेताजी सुभाषचंद्र बोस’ जिन्होंने आज ही के दिन जनम लेकर इस धरा को गौरवान्वित किया जिसके कारण हम सबको आज का ये दिन देखना नसीब हुआ जहाँ हम केवल उन दिनों की दास्ताँ सुनते जबकि हम सबको ये बेफ़िक्र की जिंदगी देने के लिये फिक्रमंदों ने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया बिना ये सोचे कि एक दिन हम इसका मोल न लगा पायेंगे या आने वाली पीढ़ी इतनी कृतध्न होगी कि उनके बलिदान को विस्मृत कर अपने आप में खो जायेगी जिसको परहित धर्म का ज्ञान ही नहीं होगा वो तो सिर्फ अपने लिये जीना जानेगी देश के लिये खुद को कुर्बान करने का तो पूछो ही नहीं बल्कि अपने स्वार्थ की खातिर दूसरों की बलि देने में न हिचकेगी उनके सामने तो केवल एक ही लक्ष्य था कि जिस तरह भी हो वो अपने देश को आज़ादी का तोहफ़ा दे सके फिर भले ही इसकी कीमत उन्हें अपनी जान देकर ही क्यों न चुकानी पड़े वो उन्हें सस्ती ही पड़ेगी कि जिस देश में जनम लिया जहाँ कि मिटटी में पलकर बड़े हुये जिसकी हवाओं में सांस ली उसका ऋण अदा करने साँसों की अदायगी कोई बड़ी बात नहीं इस जज्बे के साथ उस समय की कौम ने अपने आपको सर उठाकर शहादत की कसौटी पर खरा साबित किया जहाँ हर उम्र का क्रांतिकारी ‘वंदे मातरम’ बोल फांसी के फंदे पर झूलने से भी पीछे नहीं हटा फिर भला उनकी कुर्बानी किस तरह से रंग न लाती तो वो तिरंगे के तीन रंगों में यूँ समा गयी कि जब-जब भी हवाओं में परचम लहराता उन सभी शहीदों का नाम फिजाओं में बिखर जाता जो अदृश्य रूप में हमारे साथ सदा उपस्थित रहते और हमें आशीष देते कि यदि वक्त पड़े तो हम उनसे प्रेरणा ले अपने आप की बजाय अपने देश को तरजीह दे जिस तरह उन्होंने उस मुश्किल समय में किया ।

हर एक शहीद की कहानी हमें यही तो बताती कि ऐसे नहीं था कि उन्हें अपने आप से या अपनी जान से प्यार नहीं था लेकिन जब बात देश की आई तो फिर उन्होंने उसे ही प्रथम स्थान दिया क्योंकि ‘स्वदेश’ तो हर हाल में अव्वल होता और हम कभी ये न भूले कि हम देश से हैं... देश हमसे नहीं तो जिसने भी इसे अपना माना उसका सदा मान रखा... :) :) :) !!!    
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२३ जनवरी २०१६
© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
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शुक्रवार, 22 जनवरी 2016

सुर-३८७ : "दुआ बन गयी बद्दुआ...!!!"

दोस्तों...

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कभी-कभी बड़ी मन्नतों से मांगी गयी ख्वाहिश हकीकत बन आंचल में आ तो जाती लेकिन यदि हमें उसे संभालना न आये तो फिर या तो वो हमारे दामन से फ़िसल जाती या फिर हमारा दामन ही उसे सहेजने में नाक़ाबिल सिद्ध होता ऐसी परिस्थिति में कुछ ऐसा ही होता---
             
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रात-दिन
लबों पर थी
बस, एक ही दुआ
ऐ खुदा...
वंश को चलाने
घर को रोशन करने
एक चिराग़ अता फ़रमा
बेटियां तो पराया धन
सिर्फ़ बेटा ही तो अपना
बुढ़ापे का सहारा
एक रोज हुई कुबूल
आ गया कुल का दीपक
जो सचमुच ही बन
प्रचंड अग्नि राख कर
नामो निशान तक मिटा गया
उस खानदान का
जिसे आने वाली पुश्तों तक
बरकरार रखने
बड़ी ही मिन्नत कर
मन्नतों से रब से माँगा था
तब न सोचा कि
केवल, हाथ जोड़ कर
मांगना ही काफी नहीं
इतनी शिद्दत से पायी गयी
नेमत को भी तो
सही तालीम, तहजीब सीखा
विरासत को सहेजना
सबको साथ लेकर चलना
संस्कारों की घुट्टी में पिला
इंसानियत का पवित्र धर्म
परोपकार का सहज सबक
प्रेम का मधुर पाठ पढ़ाना होगा
नहीं तो दुआ को बद्दुआ में
बदलते देख आंसू बहाना होगा ।।
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बाद में पछताने से बेहतर कि पहले ही सोच ले कि केवल इच्छा की पूर्ति ही सब कुछ नहीं जब वो हासिल हो तो फिर उतनी ही संजीदगी से उसका ख्याल भी रखना पड़ता नहीं तो जरा-सी लापरवाही से ही दुआ को बद्दुआ बनते देर नहीं लगती... अक्सर ऐसा ही होता हम किसी भी मनोकामना को पूरा करने बेइंतेहा प्रयास करते लेकिन जब वो पूरी होती तो फिर उसकी तरफ से लापरवाह हो जाते और हमारी यही भूल हमारे लिये घातक सिद्ध होती... इसलिये जब भी भगवान् से कोई वरदान माँगना तो फिर उसे पूरे मनोयोग से सहेजना भी... :) :) :) !!!
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२२ जनवरी २०१६
© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
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गुरुवार, 21 जनवरी 2016

सुर-३८६ : "कुछ सवालों के जवाब नहीं होते...!!!"

दोस्तों...

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विरह के पल
सालते न उतना
जब प्रिय दूर होकर भी
जुदा न होते
लेकिन जब फासलें
जान-बुझकर बढ़ाये जाये या
फिर साथी सदा के लिये
रूठकर दूर चला जाये
तो अकेला हमदम किस तरह
विछोह का ये दर्द सह पाये
खुद से ही सवाल करें
और खुद को ही समझाये
फिर भी कोई जवाब न मिले तो
एक दिन आप अपने में ही घुटकर मर जाये ॥
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‘रेवती’ लगातार कई दिनों से ‘दिवाकर’ को कॉल कर रही थी पर, न तो वो उसे रिसीव कर रहा था और न ही किसी भी कॉल का जवाब दे रहा था ऐसे में वो समझ नहीं पा रही थी कि आख़िर इसकी वजह क्या हैं ? वो क्यों उससे बात नहीं कर रहा ?? आजकल उससे दूर रहने के बहाने तलाशता हैं ???

यूँ जब भी मिलता तो पूछने पर काम की व्यस्तता का एकमात्र रटा-रटाया जुमला उछालकर माथे पर शिकन की परतें लाकर उसकी सहानुभूति बटोरकर चला जाता और वो भी उसे परेशां देखकर सामने तो कुछ कह नहीं पाती लेकिन जैसे ही अकेले होती तो प्रश्नों के जाल में खुद को फंसा हुआ पाती जिसका कोई भी सिरा उसकी पकड़ में नहीं आता कि आखिर जो बंदा कुछ दिनों पहले तक उससे बात किये बिना, उससे मिले बिना एक दिन न रह पाता था अचानक ही उससे दूर क्यों भागने लगा हैं जबकि अब तो कुछ ही दिनों बाद उनकी शादी भी होने वाली हैं पर, जिस तरह का व्यवहार अभी पिछले कुछ दिनों से उसने महसूस किया उससे वो बहुत अधिक चिंतित रहने लगी हैं क्योंकि पहले जहाँ वो नखरे दिखाती थी फिर भी वो उसका पीछा न छोड़ता था उसकी एक झलक पाने हर दूरी को पार कर भी दौड़कर चला आता था वही अब हाथ भर के फ़ासले को भी तय नहीं कर पाता बल्कि यूँ कहों कि उसमें किसी तरह का कोई उत्साह ही नहीं नजर आता न ही उसकी नाराज़गी की ही कोई परवाह करता यदि वो उसे दो-तीन दिन कॉल न करें या उससे मिलने की जिद न करें तो उसकी तरफ से किसी भी तरह का कोई प्रयास नहीं किया जाता ‘रेवती’ जितना भी इस गुत्थी को सुलझाने की कोशिश करती उतना ही खुद को सवालों के घेरे में घिरा हुआ पाती यहाँ तक कि बात न करने या न मिलने की धमकी भी उस पर कोई असर न डालती ।

पहले उसे लगा शायद सचमुच काम बढ़ जाने के कारण ही वो अधिक व्यस्त रहने लगा कि उनकी शादी को लेकर उसने कुछ भविष्य की योजनायें बनाई थी जिनको साकार करने ही उसने खुद को पूरी तरह से काम में झोंक डाला था लेकिन उन शुरूआती दिनों में जबकि उसने कुछ नये-नये प्रोजेक्ट हाथ में लिये थे तब भी उसके लिये वक़्त निकालता था पर, अब तो जबकि सब कुछ नियंत्रित हो चुका हैं फिर भी उसका दूर-दूर रहना समझ से परे हैं वो अपने आप से ही प्रश्न पूछती जाती और कहीं से भी उसे कोई उत्तर नहीं मिल पाता तो थक-हारकर बैठ जाती या शांत होकर मौन साध लेती पर, जैसे ही इस चुप्पी से बाहर निकलती खुद को पुनः उन्हीं सवालों के दलदल में धंसती चली जाती आखिर दिल के हाथों मजबूर जो हैं... कुछ भी हो जाये न तो ‘दिवाकर’ को छोड़ सकती हैं और न ही उसकी जुदाई बर्दाश्त कर सकती हैं और न ही ऐसा कुछ उसके मुंह से सुनने को तैयार हैं तो इसी तरह से अपने आपको समझाते-बहलाते रहना हैं जहाँ से चले थे वहीँ वापस आकर ठहरना हैं... :( :( :( !!!           
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२१ जनवरी २०१६
© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
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बुधवार, 20 जनवरी 2016

सुर-३८५ : "आलेख : क्यों दिल को बहकने से दिल भी न रोक पाये?”

दोस्तों...

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‘जिंदगी’ चैनल जो अब तक सिर्फ पाकिस्तानी / विदेशी सीरियल्स दिखाता था अब वापस भारतीय कहानियों की तरफ़ लौट रहा हैं जिसके अंतर्गत १४ दिसंबर २०१५ से इस पर एक नया धारावाहिक शुरू हुआ ‘आधे अधूरे’ जिसे पंजाब की पृष्ठभूमि पर तैयार किया गया हैं और इसमें ‘कपूरथला’ में रहने वाले एक सीधे-साधे पारंपरिक परिवार को आधार बनाकर कहानी का ताना-बाना बुना गया हैं जिसमें केंद्रीय पात्र ‘जस्सी’ नामक नायिका का हैं जिसे कि इस घर की धूरी की तरह दिखाया जा रहा हैं जिसके ससुराल में उसके पति ‘नरेंद्र’ (नरिंदर’) के अलावा उसका एक छोटा देवर ‘वीरेंद्र’ (‘वीरेंदर’) उसकी सास भी हैं । इस धारावाहिक की ‘टैग लाइन’ हैं “क्यों दिल को बहकने से दिल भी न रोक पाये” जो स्वतः ही इस ड्रामा की थीम को स्पष्ट करती हैं और इस धारावाहिक के प्रारंभ होने पर दिखाये गये प्रोमो से भी ये ज़ाहिर हो गया था कि इसमें देवर-भाभी के मध्य संबंधों को कहानी के मुख्य पात्र के रूप में लिया गया हैं लेकिन इसका स्तर किस तरह का होगा ये समझ नहीं आ रहा था फिर भी जिस तरह से इसका प्रचार-प्रसार किया जा रहा था तो ये तो तय था कि इनके बीच आम नोंक-झोंक वाले या फिर गरिमामय रिश्ते की बजाय एक तरह के नाज़ुक अहसास का तड़का लगाया जायेगा ।

लेकिन जब ये प्रसारित हुआ तो इसने अब तक प्रचलित सभी मापदंडों को तोड़ दिया यहाँ तक कि सिर्फ ‘देवर-भाभी’ ही नहीं ‘पति-पत्नी’ के रिश्ते पर भी बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह लगा दिया जब बहु बनी ‘जस्सी’ को जहाँ एक तरफ तो बड़ी आदर्श संस्कारवान और अपनी सास की चहेती पूरे घर का ध्यान रखने वाली जिम्मेदार बड़ी बहु के रूप में दिखाया गया जो अपने पति के परिवार की उन्नति के खातिर परदेस जाकर नौकरी करने के निर्णय का सम्मान करते हुये शादी के केवल छेः महीने बाद ही न चाहते हुये भी उसे विदेश जाने की अनुमति देती हैं इस वादे के साथ कि वो उसकी अनुपस्थिति में घर व सभी लोगों का ध्यान रखेगी लेकिन पति के जाने के बाद उसे तन्हाई व अकेलेपन का इतनी शिद्दत से अहसास होता हैं कि वो नवब्याहता अपने सभी कर्तव्यों का निर्वहन करते हुये संपूर्ण घर का नियंत्रण संभालती हैं पर, अपने तन-मन पर नियंत्रण नहीं रख पाती और परिस्थितियों का हवाला देते हुये अपने ‘देवर’ के साथ हर मर्यादा को लांघ अनैतिक रिश्ता कायम कर लेती हैं ।

फिर तो दिन भर घर में चकरी की तरह घूमते हुये हर किसी का खूब ध्यान रखना सारे काम करते हुये सबके बीच संतुलन बनाये रखती हैं और रात होते ही सास के सोने के बाद अपने देवर के कमरे में रातें बिताना उसकी दिनचर्या का इस तरह से अंग बन जाता कि उसे कुछ भी गलत नहीं लगता बल्कि इस तरह के अमर्यादित व्यवहार के कारण जब वो गलती से गर्भवती हो जाती हैं तब भी उसके चेहरे पर शिकन की एक लकीर नहीं उभरती जबकि देवर ये सुनकर परेशान  हो जाता हैं तो पर, वो तो बड़े आराम से अपने देवर के साथ जाकर गर्भपात करवा आती हैं जिसके पीछे इस धारावाहिक में बड़ा ही लचर सा तर्क दिया गया कि पति के न होने पर आखिर वो किस तरह से अपने आपको संभाले रहे, कब तक अपनी इच्छाओं का गला घोंटती रहे तो बेहतर कि अपने साथ-साथ पति के छोटे भाई को भी बरगला पतित बना दे और अपनी अधूरी ख्वाहिशों को अपने पति व सास को धोखा देते हुये इस तरह से पूरा कर ले जबकि उसके पति में किसी तरह की कोई कमी या बुराई नहीं दिखाई गयी इसके अतिरिक्त उसे अपने पति से भी उतना ही प्यार हैं और उसके आने पर वो उसके प्रति भी पूरा समर्पण दिखाती हैं मतलब कि ये सीरियल बताना चाहता कि इस तरह से संतुलन साध लेने से पाप करने का लायसेंस मिल जाता हैं ।

उसके इस कदम ने न सिर्फ देवर-भाभी के खुबसूरत रिश्ते को नापाक किया बल्कि पति-पत्नी के पवित्र संबंध को भी ठेस पहुंचाई हैं साथ ही बाहर जाकर नौकरी करने वाले पतियों के सामने ये प्रश्न खड़ा किया कि यदि वो अपनी पत्नी से परदेस जाकर ‘काम’ करने की अनुमति ले तो बदले में उसको अपनी ‘काम’ भावना को किसी भी तरह पूरा करने की अनुमति भी दे क्योंकि वो तन्हां न रह पायेगी माना कि दुनिया के किसी कोने में इस तरह के किस्से हकीकत का रूप ले चुके हैं लेकिन एक पारिवारिक धारावाहिक अंतर्राष्ट्रीय चेनल पर प्राइम-टाइम में वो भी एक प्रतिष्ठित खानदान की बहु का ये रूप स्वीकार नहीं जो सभ्य समाज को भी इस तरह का गलत संदेश दे रहा हो कि दिल की सुनो दुनिया को गोली मारो बस, अपनी मनमानी करो फिर रिश्ते कलंकित हो तो होने दो जब नायिकायें ही इस तरह की हरकतें करेंगी तो उसका अनुशरण करने वाली महिलाओं को तो शह मिलेगी इसलिये इस तरह की कहानियों को प्रसारित करने से पूर्व उसके मूल भाव को देखना जरूरी हैं जिससे कि समाज में कोई गंदगी न फैले ये क्या कि दिल को तरजीह देकर नायिका को एकाकी दुखी साथ ही जिम्मेदार बताकर उसके गलत कामों को प्रोत्साहित किया जाये फिर तो हर एक औरत यही सोचेगी कि यदि हम अपनी जिम्मेदारी अच्छी तरह निभा रहे तो हमें ये हक कि हम जो चाहे सो कर सकते ।

इसे देखने पर ये सवाल भी जेहन में उभरता कि अपने परिवार के प्रति अपने सभी फ़र्ज़ पूरे करना क्या हमें ये हक देता कि हम अपनी मनमानी कर सकते, जो विश्वास हमने अपने समर्पण अपनी सेवा से हासिल किया उसकी जो चाहे वो कीमत वसूल कर सकते यहां तक कि अनैतिक संबंध बनाने की स्वतन्त्रता भी प्राप्त कर सकते याने कि जो कुछ इतनी बरसों की मेहनत से हासिल किया उसे पल दो पल की खुशियों की खातिर दांव पर लगा अपने त्याग का मनचाहा दाम हासिल कर सकते हैं लेकिन ये भूल जाते कि हमने अपने परिजनों के लिए जो कुछ भी निःस्वार्थ मन से किया आखिरकार कहीं उसकी भारपाई कर ली तो क्या उसके बाद भी हम उतने ही दम से अपने उन कर्तव्यों का गुणगान कर पायेंगे हमारी आत्मा हमें नहीं कचोटेगी या उसका गला घोंटकर ही तो घर के साथ-साथ मर्यादा की दहलीज़ लांघ पाये थे ।

इसके अतिरिक्त इस धारवाहिक ने एक अन्य बेहद संवेदनशील मुद्दे को भी हवा दी हैं जिसमें एक लड़की के जीवन के साथ खेलने को उसी तरह से दिखाया जैसा कि अधिकांशतः इस तरह के अनैतिक रिश्तों में होता कि वो किसी के सामने न आने पाये तो उसको छिपाने के लिये किसी अन्य से प्रेमी की शादी करा दी जाये इस तर्क के साथ कि वो उनके नाजायज रिश्ते का पर्दा बनेगी मतलब कि एक लड़की जो इस बात से अनजान हैं, अपनी शादी के ख्यालों में खोई हैं उसे अपने मतलब के लिये ब्याह के नाम पर घर ले आया जाये ताकि उसकी आड़ में ये गंदा खेल बदस्तूर चलता रहे वाकई ऐसा ही होता पर, कोई ये नहीं सोचता कि वो जो विवाह कर के आ रही उसकी अपनी भी तो कोई ख्वाहिशें, अरमान या सपनें होंगे और जब वो ये जानेगी तो उसके दिल पर क्या गुजरेगी पर, जिन्हें अपनी वासनाओं से फुर्सत नहीं वो भला किसी की भावनाओं की क्या कद्र या फ़िक्र करेंगे तभी तो ‘जस्सी’ का किरदार जिस तरह की बातें करता या अपने पाप को अनवरत जारी रखने जो तर्क देता वो हर एपिसोड के साथ कुछ प्रश्न छोड़ जाते उस पर ‘जस्सी’ ने तो हद ही कर दी अपनी ही छोटी बहन को अपनी देवरानी बनाने का फैसला किया और जब उनकी पहली रात का ख्याल आया तो बीमारी के नाम पर उसे सारी रात अपने पास बिठा अपनी विकृत मानसिकता का एक और पहलू सामने रखा ।                                         

इस तरह की फिल्मों / सीरियल के माध्यम से औरतों को ‘विमेन लिबरेशन’ के नाम पर इस तरह के संबंध बनाने के लिये उकसाना या नायिका का इस तरह से उसकी पैरवी करते दिखाना एक तरह से पुरुषों के वर्चस्व को ही फिर से स्थापित करना हैं या आदमी अपनी इच्छा पूरी करने अब उसे ही हथियार बना रहा जहाँ वो उसे आधुनिक बता अपने से अधिक साहसी बताता तो वो खुद ही आगे बढ़कर उसके बोले बिना उसकी ख्वाहिश पूरी कर देती याने कि औरत फिर आदमी के द्वारा मुर्ख बनाई जा रही हैं आजकल पुरुष निर्देशक इस तरह के धारावाहिक/फिल्म बनाकर उसे बोल्ड होने का अहसास दिलाता जिससे काम तो उसी का सधता और नारी समझती कि उसने उसे मुर्ख बना दिया जबकि हकीकत केवल वही जानता कि किस तरह से उसने उसको चने के झाड़ पर चढ़ाकर अपना उल्लू सीधा किया इस तरह सांप भी मर गया लाठी भी न टूटी मतलब आदमी ने अपनी हवस भी पूरी कर ली और उसे जबरदस्ती भी न करनी पड़ी औरतों को इस बड़ी गहरी साज़िश को समझना होगा कि फ्रीडम का तात्पर्य केवल शारीरिक संबंधो में अगुवाई करना नहीं हैं बल्कि खुद को दिलों-दिमाग से इतना अधिक मजबूत बनाना हैं कि भावनाओं में बहे बिना निर्णय ले सके नहीं तो घर हो या बाहर उसका स्थान तो बिस्तर पर ही सीमति रहेगा वो भी उसकी मर्जी से क्योंकि उसे तो पता ही नहीं न कि आदमी उसे सर पर चढ़ाकर किस तरह से अपना काम निकल रहा पहले दबाता था अब जब लगा वो मुमकिन नहीं तो खुद दबकर उसे श्रेष्ठ बता वही हासिल कर रहा जो चाह रहा था और वो पहले भी उसकी वासना पूर्ति का साधन थी आज भी हैं ।   

हो सकता हैं कि आगे इस धारावाहिक में कोई नया मोड़ देकर इस अनैतिक रिश्ते को लगाम लगा दी जाये और ‘जस्सी’ को पश्चाताप करते दिखाया जाये लेकिन जो हुआ वो तो मिट न जायेगा जो सवाल उठे वो तो वैसे ही अनुत्तरित रह जायेंगे और वो तो अपनी सफाई में यही कहेंगे ‘अनैतिक या नैतिक तर्क से ही बनता हैं, किसी की नज़र में जो नैतिक हो दूसरे को वही अनैतिक भी नज़र आता हैं’ और अपने स्त्री पात्र को दिल के बहकने के नाम पर ऐसे ही न सिर्फ गिराते रहेगे बल्कि अकेली सहानुभूति की पात्र बता उसके नाजायज़ कदमों को जायज ठहराते रहेंगे जिसमें हर हाल में नुकसान सिर्फ स्त्री का ही हैं और उस पर विडंबना ये कि अब उसके ही द्वारा पुरुषों की अपनी मनमर्जी पूरी की जायेगी और उसे खबर भी न होगी... इस भौतिकवादी युग में देह को सर्वोपरि बताने की मंशा यही हैं तभी तो चंद सेकेंड्स के विज्ञापनों में भी औरत के शरीर का ही इस्तेमाल किया जाता जिसमें उसे मर्दों के प्रति आकर्षित होते, आगे बढ़कर गले लगाते या उसके साथ समय बिताने को आतुर दिखाया जाता जिस पर यदि आने वाले समय में अंकुश न लगाया गया तो जल्द ही उसके भीतर इस तरह की मानसिकता का प्रवेश हो जायेगा फिर वो ‘जस्सी’ की तरह अपने देवर या किसी भी रिश्तेदार से न तो संबंध बनाने में चूकेगी न ही गलत तरीके से अपनी दैहिक भूख मिटाने किसी तरह का अपराधबोध महसूस करेगी क्योंकि उसके पास अपनी सड़ी-गली दलीलों, अपने बेशर्मी भरे कुतर्कों के तीरों से भरा तरकश जो होगा जिससे वो समाज, परिवार, सभ्यता, संस्कृति, संस्कार, परिवार, रिश्तों को बुरी तरह से बेंध डालेगी... इससे पहले कि ये दिन आये आओ अभी से चेत जाये... रिश्तों की गरिमा को शर्मिंदा होने से बचाये... :) :) :) !!!  
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२० जनवरी २०१६
© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
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