रविवार, 3 अप्रैल 2016

सुर-४५९ : “हम दोनों नदी के किनारे... पर, जीने के सहारे...!!!”


दोस्तों...

___//\\___

‘अवनि’ और ‘कौस्तुभ’ एक-दूसरे को हद से ज्यादा चाहते थे लेकिन उन दोनों के घरवाले किसी भी तरह से उनकी शादी के लिये तैयार नहीं थे ऐसे में उन्होंने अलग-अलग ही रहने का फैसला किया लेकिन मन के भीतर पलता प्रेम तो इन बातों को नहीं मनाता उसने तो जिसे अपना मान लिया फिर वो भले ही हर पल साथ न हो पर, वो तो जुदाई में भी खुश होने के बहाने ढूंढ लेता---
●●●-------
मिलते नहीं
नदिया के किनारे
पर, सदा चलते
साथ-साथ
एक दूजे के सहारे
हर राह, हर पड़ाव पर
इस आस में कि
कहीं तो आयेगी कोई
संकरी गली
जहां बढ़ाकर हाथ
छू लेंगे परस्पर
ये भी न हुआ तो
कोई गम नहीं
नजदीकी का अहसास ही
कोई कम तो नहीं
जब मिलन न लिखा हो
तकदीर के पन्नों पर
तो इतना आसरा ही बहुत हैं
दुनिया में जीने के लिये
कि बेचैन दिल को
इक सुकून तो मिलता
आस-पास रहने का
आमने-सामने होने का
कम से कम...
इतना ही हो जाये तो
हर एक तूफान को हंसकर
पार किया जा सकता हैं
सच...!!!
---------●●●

वो दोनों भी नदी के किनारे की तरह एक-दूसरे से दूर होकर भी खुश थे कि भले ही मिल नहीं सकते लेकिन जीवन के हर पडाव, हर राह में सदा साथ तो रहेंगे एक दूसरे का सहारा बन कर... इस तरह से उन दोनों ने अपने माता-पिता के फैसले का सम्मान करते हुये अपने प्यार को भी सम्मानित किया कि उन्होंने अपने जीवन को तन्हां होकर रोते हुये बिताने की जगह उसमें ही मुस्कुराने की एक प्यारी-सी वजह जो ढूंढ ली थी... :) :) :) !!!  
------------------------------------------------------------------------------------         
०३ अप्रैल २०१६
© ® सुश्री इंदु सिंह ‘इन्दुश्री
●---------------●-------------●

शनिवार, 2 अप्रैल 2016

सुर-४५८ : "आलेख : 'अहसासों का रिमोट कंट्रोल' !!!"


(संदर्भ : अभिनेत्री ‘प्रत्युषा बैनर्जी’ आत्महत्या प्रकरण)

दोस्तों...

___//\\___

कलर चैनल के शुरूआती धारावाहिक 'बालिका वधू' में नवयुवती 'आनंदी' का किरदार निभा हर किसी का दिल जीतने वाली 'प्रत्युषा बैनर्जी' की असामयिक आत्महत्या, वैसे तो आत्महत्या सभी असामयिक ही होती क्योंकि काल को चुनौती देकर मृत्यु से पहले ही उसका आह्वान कर लिया जाता फिर भी इसे असामयिक इसलिये लिख रही कि ख़ुदकुशी करने वाली कोई मज़बूर, हालातों की मारी, दीन-दुखियारी, पीड़ित, असहाय या परवश जीवन जीने वाली कोई पराश्रित महिला नहीं बल्कि एक खुदमुख्तार, आत्मनिर्भर अपने आप से अपनी तकदीर बनाने वाली और पहली ही बार में एक दमदार चरित्र के माध्यम से अपने आत्मविश्वास, खुशमिजाज से सबको प्रभावित करने वाली नायिका थी जिसने छोटे पर्दे पर ऐसी धूम मचाई कि घर-घर में अपने पात्र के नाम से जाने जानी लगी अपार लोकप्रियता हासिल कर अपनी पहचान बनाने में कामयाब हुई फिर न जाने बड़े पर्दे के लालच या अति महत्वकांक्षा ने उसको बरगलाया कि प्रसिद्धि के शिखर पर विराजमान इस अदाकारा ने स्वैच्छा से वो मुकाम छोड़ दिया

वजह जो भी हो पर, इससे उसकी अस्थिर, चंचल, अपरिपक्व मानसिकता का पता तो लगता क्योंकि उसके बाद उनके कैरियर ने कोई उछाल न मारी, न ही किसी जगह वो कोई बड़ा रोल या काम हासिल कर सकी बल्कि यूँ ही छुटपुट से कार्यक्रमों में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाती रही लेकिन भीतर तो अनंत ऊर्जा का सागर हिलोरें मार रहा था और कला भी छटपटा रही थी बाहर निकलने को पर, जब उनको उचित मार्ग न मिला तो बंदी ने असीम ऊर्जा का वो सैलाब फ़िज़ूल बातों में बहाना शुरू कर दिया और कुछ गलत निर्णय भी ले लिये जैसे कि 'बिग बॉस' का यातना गृह और आत्मघाती 'लिव इन' में रहने का ‘अ-साहसिक’ कदम जिसने अनजाने ही उसे उस रास्ते पर डाल दिया जो उसकी मंज़िल नहीं थी पर, करती भी क्या भीतर भरी क्रियात्मक ऊर्जा तो उसे कुछ न कुछ करते रहने को विवश कर रही थी वैसे भी कुछ न कर पाने की पीड़ा का तीव्र अहसास उनको ही होता जो कुछ कर सकते हैं और यही भाव किसी व्यक्ति को भीड़ से अलग खड़ा कर देता लेकिन सिर्फ हायपर एक्टिव होने से ही काम नहीं बनता उचित-अनुचित कार्यों का भी तो इल्म हो तब ही न एकदम परफेक्ट कॉम्बिनेशन बनेगा बस, यही अनभिज्ञता इंसान को पुण्य से पाप की तरफ ले जाती क्योंकि अंदर की बैचेनी को तो करार चाहिये, काम-पिपासा (काम बोले तो ‘कार्य’ वाला काम) को भी तृप्ति का जल चाहिए फिर आगे बढ़े कदमों को ये कहाँ पता चलता कि वो पोखर के गंदे जल की तरफ बढ़ रहे या नदी के साफ़ पानी से प्यास बुझाना चाह रहे बात, तो सिर्फ किसी भी तरह उस प्यास को मिटाने की हैं तो फिर सही-गलत के फेर में पड़कर कौन अपना वक़्त बर्बाद करे तो जो सामने नजर आया उसी को अपना लिया फिर वो अमृत हैं जहर ये तो समय आने पर ही पता चलता

जैसा कि अब हम सबको चल रहा लेकिन जब हमारे सामने यही स्थितियां आयेगी तब हम क्या ये विचार कर पायेंगे शायद, कुछ व्यवहारिक और कम-संवेदनशील लोग रुक जाये कि उनको अपनी तृष्णा के लिये गंगाजल ही दरकार पर, अति-भावुक संवेदनशील व्यक्तियों में ये ठहराव नहीं होता क्योंकि उनकी प्यास उनके दिलों-दिमाग पर काबिज हो जाती फिर ऐसे में उसका अंजाम भला इसके सिवा और क्या होगा ???

ये तो केवल आकलन का एक पहलू, दूसरा तो उससे भी ज्यादा ख़तरनाक जब भावुकता का वही प्यासा मृग ‘प्रेम-मरीचिका’ में फंस जाये फिर तो उसे कोई नहीं बचा सकता क्योंकि ये लोग जेहन की जगह हृदय से ही सोचने का काम लेते तो उनके फैसले सदैव कमजोर ही होते और उस पर अगला बंदा शातिर बल्कि बोले ‘शिकारी’ हो तो बचने का नो चांस कि वो तो इस तरह के शिकार की तलाश में रहता तो यही हुआ 'प्रत्युषा' नाम की भोली-भाली बुलबुल के साथ जिसने अपने लिये ख़ुशी-ख़ुशी कैदगाह चुनी जिसके बाद शुरू हुआ खेल शिकार और शिकारी का जहाँ शिकारी अत्यंत चालाक और शिकार उतना ही नादान उस पर से इस धारावाहिक को हम देख भी न सके जिसके एपिसोड प्रतिदिन वो शिकारी लिख रहा था जिस पर ये अदाकारा अभिनय कर रही थी जैसा-जैसा वो कहता ये दोहराती, उसकी रिहर्सल करती हुआ यूँ कि ये भूल ही गयी कि ये महज़ नायिका नहीं बल्कि अपनी ज़िंदगी की स्क्रिप्ट की खुद निर्देशक, अभिनेत्री और सलाहकार हैं वो अब पूरी तरह से एक जीती-जागती यांत्रिक गुड़िया बन चुकी थी जिसका ‘रिमोट कंट्रोल’ किसी और के हाथ में था तो जब वो जैसी बटन दबाता वैसा ही ये महसूस कर भाव प्रदर्शित करती पर, आखिर कब तक

क्योंकि वो कोई सचमुच की मशीन तो थी नहीं तो कहीं न कहीं तो उसके जीते-जागते अंग-प्रत्यंग भी विरोध दर्ज करते होंगे जिसके दबाब में उसकी साँसे घुटने लगी होंगी तो इन स्थितियों में भला कब तक ये सीरियल चलता अंत तो होना था और दुखद ही कि व्यवहारिक एवं बुद्धिजीवी अव्यवहारिक बुद्धुओं को अधिक समय तक नहीं झेल सकता एक दिन वो दुरी बना ही लेता फिर जिसे सहन कर पाना उस आश्रिता के वश में नहीं होता कि जिन कंधों पर बड़े भरोसे से उसने अपना वज़ूद टिकाया हो उसके बिना वो किस तरह से खड़ा रह सकता गिरना ही उसकी नियति आत्महत्या ही उसकी एकमात्र मंज़िल क्योंकि उसे तो अकेले जीना आता ही नहीं उसने तो खुद अपने हाथों से अपनी ज़िंदगी, अपने मन के हर अहसास का रिमोट कंट्रोल उसके हाथों में सौंप दिया फिर उसकी उँगलियों के नीचे आने वाले मनोभाव को अपने जीने का सबब भले ही मशीन न थके कि उसको थकावट होती नहीं मगर, बटन दबाने वाली उँगलियाँ जरूर उकता जाती तो उन हाथों ने छोड़ दिया ‘रिमोट’ साथ उसके ही छूट गया अगले के जीवन का मोह तो बाकी बचे शरीर की पूर्णाहुति करने उसे फंदे पर लटकाना भी तो जरूरी था वो अगर, बचा भी रहता तो बेजान ही रहता तो इस पुरे प्रकरण में समझने की जरूरत ये कि हर उस व्यक्ति की नियति यही हो सकती जिसके मन का मिजाज किसी दूसरे व्यक्ति के क्रिया-कलाप पर टिका होता तो सबसे गुज़ारिश कि न बनो रिमोट चलित मशीन और जो बन भी जाओं तो खुद नियंत्रित करो अपने जीवन की गति... फिर देखो कैसे खिलती ज़िंदगी... बाकी बची हुई  'प्रत्युषाओं' को यही हैं मेरी  शब्दांजलि... :) :) :) !!!
------------------------------------------------------------------------------------         
०२ अप्रैल २०१६
© ® सुश्री इंदु सिंह ‘इन्दुश्री
●---------------●-------------●

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2016

सुर-४५७ : "लघुकथा : प्रेम बनाम अहम्... !!!"


 दोस्तों...

___//\\___

कई दिन हो गये इंतज़ार करते-करते लेकिन ‘सयाली’ महसूस कर रही थी कि अब ‘वरुण’ उसे पहले जैसा रिस्पांस नहीं देता यहाँ तक कि उसके मेसेज इनबॉक्स में प्रतिउत्तर की रह तकते-तकते बेमानी हो जाते पर, जवाब नहीं आता और ये कोई पहली बार नहीं हो रहा था तो ऐसे में उसने उससे मिलकर ही बात करना तय किया और फोन कर बता दिया कि वो शाम को पांच बजे उसी स्थान पर उसकी राह देखेगी जहाँ वो हमेशा मिलते

शाम को जब पार्क में वो दोनों मिले तो ‘सयाली’ ने तुरंत कहा, “क्या हुआ वरुण, कुछ दिनों  से तुमने मेरे किसी भी संदेश का जवाब क्यों नहीं दिया बोलो”

“क्यों दूँ ? तुम जरा इनबॉक्स में गौर से देखने तुमने एक महीने पहले के मेरे मेसेज का जवाब नहीं दिया आज तक तो फिर मैं क्यों दू ?”

‘सयाली’ ने आश्चर्य से कहा, वो... वो तो उस वक्त मेरी बुआजी आई हुई थी तो मैं बहुत व्यस्त थी तुम्हें बताया भी तो था तो फिर ये कौन-सी बात हुई?

वही बात जो होना चाहिये थी सच तो ये कि तुमने जान-बुझकर ऐसा किया जबकि उन दिनों में भी मैंने हजारों बार तुम्हें ऑनलाइन देखा ? तो क्या सिर्फ मेरे लिये ही समय नहीं था ?

वरुण, तुम तो हजारों बार मुझे जवाब नहीं देते वो भी मेरे अच्छे-खासे जरूरी से जरुरी संदेशों पर, मैंने तो आज तक कभी ये बात नहीं कही क्योंकि मैं समझती थी कि तुम व्यस्त होगे तो कभी भी इन बातों को मुद्दा नहीं बनाया पर, तुम तो हमेशा ही मेरे जवाब न देने को इशू बना देते हो

तुम्हारी बात अलग तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़ता पर, मुझे बहुत बुरा लगता जब तुम मुझे इग्नोर करती हो

वरुण, तुम्हें ऐसा क्यों लगता बताऊँ क्योंकि तुम अब तक अपने ‘अहम्’ से बाहर नहीं निकले फिर तुम ‘प्रेम’ किस तरह से कर सकते क्योंकि ये दोनों एक साथ नहीं रह सकते सच, अब हद हो गयी आखिर, कब तक मैं ही सब कुछ भूलकर आगे कदम बढ़ाऊं तुम तो हमेशा अपने इगो को लेकर चुप्पी साधकर बैठ जाते, मैं ही जानती कि इस दरम्यां मैं कितनी मुश्किलों से गुजरती इसलिये मुझे लगता कि अब फैसला हो जाये तुम इन दोनों में से किसी एक को चुन लो

फिर उसने देखा कि ‘वरुण’ जो उसकी बात सुन गुस्से में आ चुका था, बिना कुछ बोले अपने ‘अहम्’ को साथ लेकर उसे छोड़कर चला गया और वो अपने ‘प्रेम’ के साथ अकेली रह गयी      
------------------------------------------------------------------------------------         
०१ अप्रैल २०१६
© ® सुश्री इंदु सिंह ‘इन्दुश्री

●---------------●-------------●

गुरुवार, 31 मार्च 2016

सुर-४५६ : "दर्द की देवी 'मीना कुमारी'... की न कभी अदाकारी...!!!"


दोस्तों...

___//\\___

पीड़ा का
साकार रूप बनी
‘दर्द की देवी’ कहलाई
जब-जब भी
पर्दे पर कोई रूप धरी 
‘महजबीन’ की पहचान खो गई
‘मीना कुमारी’ ऐसी अभिनेत्री बन गई
-------------------------------------------------●●●

___//\\___ 

मित्रों...,

वो समय जब भारत में मनोविनोद के बड़े ही सीमित साधन थे तब ‘सिनेमा’ का उदय होते ही वो ‘मनोरंजन’ का ऐसा पर्याय बन गया कि आज भी लोग उसे व उसके कलाकारों को हद से ज्यादा तवज्जों देते और उनकी इस दीवानगी ने ही उस दौर से लेकर आज तक इन अदाकारों के प्रति लोगों का जुनून कम नहीं होने दिया तभी तो उनके बारे में हर जानकारी पाना चाहते और वो दौर जबकि इस जानकारी को पाने के लिये भी इतने यंत्र-तंत्र नहीं थे तब पत्र-पत्रिकाओं में उनके चित्र देखकर और उनके बारे में पढ़कर या फिर ‘रेडियो’ पर उनकी आवाज़ सुनकर ही खुश हो जाते थे तभी तो उस जमाने में सिने-सितारों को जो दर्जा हासिल हुआ वो आज सभी तरह की आधुनिकतम मशीन होने के बावज़ूद भी उनसे कम अभिनय करने वाले लेकिन उनसे अधिक पारिश्रमिक पाने वाले कलाकारों को भी नहीं मिला यही वजह कि उन नींव के पत्थरों को भूल पाना संभव नहीं तभी तो आज भी उस दौर के चलचित्रों को न सिर्फ ‘क्लासिक’ का तमगा दिया जाता हैं बल्कि उसमें काम करने वाले अभिनेता-अभिनेत्रियों को भी उनके प्रशंसक उतनी ही शिद्दत से याद करते और ढूंढ-ढूंढकर उन फिल्मों और कलाकारों को ‘नेट’ पर देखते रहते उनसे सीखने का प्रयास करते क्योंकि ये वो लोग हैं जिन्होंने बिना किसी अभिनय के पाठ्यक्रम या प्रशिक्षण के ही सहजता से ही जिस तरह रुपहले पर्दे पर किरदारों को अभिनीत किया तो वो चरित्र जैसे जीवंत ही हो उठे तभी तो आज भी यदि कोई सिर्फ़ ‘छोटी बहु’ बोले तो लोगों की जुबान पर अपने ही आप ‘मीना कुमारी’ का नाम आ जाता जिसने इस कदर डूबकर उस पात्र को जिया कि किसी को भी नहीं लगा कि ये विमल मित्र की ‘साहिब बीबी गुलाम’ उपन्यास का कोई काल्पनिक चरित्र हैं जिसे रजतपट पर ‘मीना कुमारी’ ने सिर्फ़ निभाया हैं

यही थी ‘मीना कुमारी’ के अभिनय की सहजता जिसने उसको दो दशक तक अव्वल नंबर पर रखा और आज तलक भी उनकी यही अदा उन्हें अपने चाहनेवालों के दिलों में भी जीवित रखे हुये हैं क्योंकि भले ही पेशे से वो एक अदाकारा थी लेकिन उसने कभी भी किसी बनावटी भाव-भंगिमा को अपने चेहरे पर आने नहीं दिया बल्कि जब भी जो भी रोल मिला उसे इस तरह से सजीव किया कि देखने वाले को वो झूठा नहीं लगा उनका बचपन जिस अभाव और वेदना से गुज़रा था उसने उनके भीतर दर्द का एक उफनता हुआ सागर पैदा कर दिया जिसकी लहरें उनकी आँखों के रास्ते से आने का मार्ग ढूंढ ही लेती थी यही था उन बोलती हुई सम्मोहक आँखों का राज़ जिसके माध्यम से वो बिना जुबान का इस्तेमाल किये भी इतना कुछ बोल देती थी कि सामने वाला मंत्रमुग्ध-सा बस उनको देखता ही रह जाता था उफ़... क्या बला का जादू था मीना की दर्दीली मय से भरी छलकती नजरों में कि अब तक भी उनके दीवानों को होश नहीं आया हैं इसलिये तो उनके इस दुनिया से जाने के बाद भी हम उनको उतने ही प्यार से याद करते हैं आज उनकी पुण्यतिथि पर उनकी यादों का चले आना ही बताता कि भले ही वो सादगी भरी सुंदरता की प्रतिमा अब हमारे बीच नहीं हैं पर, उनकी अभिनीत सभी फिल्म और उनकी मौजूदगी का अहसास तो अब भी हैं न... जो काफी हैं ये बताने को कि जाने वाले चले जाते... इंसान मर जाते पर, यदि वो एक भी ऐसा काम कर जाते जो उसके बाद भी इस जहान में उसके नाम, उसकी पहचान को जिंदा रखता तो सच मानिये उसने सही मायनों में जिंदगी जी हैं... अपने जीवन को सार्थक बनाया हैं फिर भले ही उसके लिये उसने कोई-सा भी सकारात्मक मार्ग चुना हो पर, जिससे किसी को सुकून या ख़ुशी मिली जाये वो कभी-भी गलत नहीं हो सकता

बालपन से ही अपने परिवार को पालने की जिम्मेदारी उनके नाज़ुक कंधों पर आ गयी जिसने उसे वक़्त से पहले ही संजीदा बना दिया तभी तो बिना ही ग्लिसरीन के उनकी आँखें छलक जाती और पर्दे पर अनवरत दर्द को अभिव्यक्त करते हुये वो साक्षात ‘दर्द की देवी’ बन गयी और इसमें उनका साथ दिया उनकी पुरसुकून ह्रदय को बेधने वाली उस कशिश भरी आवाज़ ने जिसे सुनकर आदमी अपनी सुध-बुध भूल जाता... इस तरह वो मासूम बाला जिसका नाम कभी ‘महजबीन’ था वो बाल चरित्र, धार्मिक किरदारों को निभाते-निभाते ‘मीना कुमारी’ नाम की एक महानतम अभिनेत्री बन गयी जिसने हर तरह के सम्मान और पुरस्कार तो अपनी झोली में किये ही साथ-साथ अपने अंतर की बैचेनी को सफे पर उतारते-उतारते वो एक ‘शायरा’ भी बन गयी जो ये ज़ाहिर करता हैं कि कुछ ऐसा भी था उनके भीतर जिसे वो अभिनय से भी अभिव्यक्त नहीं कर पा रही थी तो उसके लिये उन्होंने अपनी ‘डायरी’ को अपना हमदम अपना हमनवां बनाया और उसमें अपने मन की पीड़ा को लिखती गयी जिसे पढ़कर पता चलता हैं कि वो कितनी नाज़ुक और भावुकता से भरी नारी थी पर, अफ़सोस कि उसे उसका ही परिवार, उसका शौहर या उसके जीवन में आने वाले तमाम लोग भी उसे रत्ती भर भी न समझ पाये... अमूमन ख़ामोशी के पीछे कोई तूफ़ान छूपा होता लेकिन सबको देर से खबर होती जब वो आकर गुजर जाता... ‘मीना कुमारी’ उर्फ़ ‘महजबीन’ नाम की ‘सितारा’ आसमान से टूटकर आने वाली एक दुआ थी जिसे कोई दामन या प्यार भरे हाथों का सहारा नहीं मिला वरना, वो यूँ पूरी हुये बिना ही तो चली नहीं जाती... अक्सर लोग टूटते तारे को देखकर उससे कोई ‘विश’ मांगते लेकिन जब अनजाने ही वो पूर्ण होकर उसके आंचल में आ जाती तो उसे समझ नहीं पाते शायद... तभी तो वो किसी भी कोने या दरार से टपक जाती... यही तो उसके साथ भी हुआ... तो आज पुण्यतिथि पर यही चंद अल्फाज़ समर्पित हैं... रंजोगम की उस जीती-जागती दिव्य आत्मा को... :) :) :) !!!
------------------------------------------------------------------------------------         
३१ मार्च २०१६
© ® सुश्री इंदु सिंह ‘इन्दुश्री
●---------------●-------------●

बुधवार, 30 मार्च 2016

सुर-४५५ : "हिंदी सिने जगत की पटरानी... 'देविका रानी'...!!!"

दोस्तों...

___//\\___

चमक उठा
रुपहला परदा
देख उसका सौंदर्य
मंत्रमुग्ध हुये दर्शक
देखकर उसका अभिनय
बनी ‘देविका रानी’
हिंदी सिनेमा की पटरानी
---------------------------●●●

उस दौर में जबकि हिंदी सिनेमा अभी अपने बाल्यकाल में ही था आगमन हुआ ‘देविका रानी’ का जिन्होंने आते ही सिनेमा की परिपाटी ही बदल दी क्योंकि उसके पहले जितनी भी अभिनेत्रियाँ आई वे सब अपने परिवेश एवं रहन-सहन के स्तर के साथ-साथ शिक्षा के मामले में भी कमजोर थी जबकि ‘देविका रानी’ तो एक मुकम्मल अदाकारा थी जो गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर के खानदान से ताल्लुक रखती थी और जिसे कि उस जमाने में ‘ड्रीम गर्ल’ से लेकर ‘फर्स्ट लेडी ऑफ़ द इंडियन स्क्रीन’ का ख़िताब हासिल हुआ यहाँ तक कि देश के प्रधानमंत्री भी उनके अभिनय एवं हुस्न के दीवाने थे । हम सब उनको १९३६ में दादामुनि अशोक कुमार के साथ आई उनकी ‘अछूत कन्या’ फिल्म से भलीभांति जानते हैं और इसका गीत ‘मैं वन की चिड़िया बनकर, वन-वन डोलूं...’ तो मेरे ख्याल से हर किसी ने ही गुनगुनाया होगा तीस के दशक में बनी ये फिल्म उस समय की एक सामाजिक स्थितियों के अनुसार एक साहसिक कदम माना जाता हैं जिसकी कहानी में महात्मा गांधीजी के विचारों का प्रभाव स्पष्ट था और इस फिल्म ने बेहतरीन कथा के अलावा गीत-संगीत, कलाकार, फोटोग्राफी के साथ-साथ सहज स्वाभाविक अभिनय व सरल दिल को छू लेने वाले संवादों के जरिये लोकप्रियता के सभी स्थापित कीर्तिमान ध्वस्त कर दिये और सभी फनकारों को ले जाकर सीधे चोटी पर विराजमान कर दिया ।

यही वो फिल्म थी कि जिसे देखकर अपने समय के देश के प्रथम प्रधानमंत्री ‘श्री जवाहरलाल नेहरु’ ने किसी आम दर्शक की तरह उनके किसी प्रशसंक के समान ‘देविका रानी’ की तारीफ़ में अपने हाथों से एक भावनात्मक प्रशंसा पत्र लिखा और २५ अगस्त १९३६ को एक विशेष शो के दौरान कांग्रेस कार्यकारिणी के सदस्यों ने इस फिल्म को एक साथ देखा जिसमें नेहरु जी के अलावा सरदार वल्लभ भाई पटेल, आचार्य नरेंद्र देव तथा श्रीमती सरोजिनी नायडू शामिल थी इस तरह इस अभिनेत्री ने अपने व्यक्तित्व व कृतित्व से सिर्फ आम नागरिक ही नहीं बल्कि वरिष्ठ नेतागणों को भी प्रभावित किया । हिंदी सिने जगत में उनका पदार्पण भी किसी साधारण फिल्म से नहीं हुआ बल्कि १९३३ में ‘हिमांशु राय’ के लंदन स्थित इंडो-इंटरनेशनल टॉकीज बेनर के तले बनी अंग्रेजी फिल्म ‘कर्म’ से हुआ जिसे किसी भारतीय द्वारा निर्मित पहली अंग्रेजी सवाक फिल्म होने का गौरव हासिल हैं और यही वो फिल्म हैं जिसमें भारतीय सिनेमा का प्रथम किसिंग सीन भी फिल्माया गया और इस फिल्म के प्रदर्शन के बाद लंदन के प्रमुख समाचार पत्रों में केवल इसी का जिक्र था और शानदार समीक्षायें भी प्रकाशित हुई ‘मोर्निग पोस्ट’ पेपर में लिखा गया कि, “इसमें जरा भी शक नहीं कि ‘कर्म’ की नायिका ‘देविका रानी’ स्वक फिल्मो की श्रेष्ठतम तारिकाओं में हैं” तो ‘द स्टार’ ने एक कदम आगे बढ़ाकर लिखा,”जाकर मिस देविका रानी द्वारा बोली गयी अंग्रेजी सुनिये, आपको न तो इससे बेहतर आवाज़ सुनने को मिलेगी और न इससे बेहतर चेहरा देखने को मिलेगा, देविका रानी का बेमिसाल सौंदर्य लंदन को चकाचौंध कर देगा” ।

जब आप इनके बारे में जानते तो पता लगता कि आज की अभिनेत्रियाँ जो काम इतनी सुविधाओं और अकूत कमाई के बावजूद भी बमुश्किल कर पा रही वो उन्होंने उस दौर में बड़ी सहजता से किया और अंतर्राष्ट्रीय स्तर की अभिनेत्री होने का गौरव हासिल किया जिसकी देश-विदेश में एक साथ जबर्दस्त तारीफ़ हुई अपनि पहली ही फिल्म ‘कर्म’ से उन्होंने सबको अपना दीवाना बना लिया था जब ये फिल्म भारत कोकिला सरोजिनी नायडू ने देखि तो जिस तरह से अपनी भावनाओं को शब्द दिये वो अपने आप में ही किसी सम्मान से कम नहीं उन्होंने कहां, “मैं ‘कर्म’ को एक साहसपूर्ण प्रयास ही नहीं बल्कि एक उल्लेखनीय उपलब्धि मानती हूँ, यह चित्र अपने आप में एक और निर्माता ‘हिमांशु राय’ के विलक्षण साहस, कल्पनाशीलता, धैर्य तथा सूझ-बूझ की प्रशस्ति हैं, वहीँ दूसरी और वह फिल्म की नायिका उस सुंदर तथा प्रतिभावान कृषकाय नारी ‘देविका रानी’ की प्रशस्ति हैं, जो नाटक के हृदयस्थल से रोमांस के जादुई फल के रूप में कुसमित होती प्रतीत होती हैं” ।

‘देविका रानी’ तो वो महानतम अभिनेत्री जिसे अपने देश से लेकर विदेश तक हर किसी ने सराहा और यही वजह कि वे उस दौर की मापदंड बन चुकी थी जिसके कारण समकालीन महिलायें आपसी फिकरेबाजी में एक-दुसरे को ये कहने से न चूकती कि , “तुम अपने आपको देविका रानी’ समझती हो क्या? अब आप ही कहिये जनाब कि इससे बड़ी किसी कलाकार की उपलब्धि क्या होगी कि वो जनमानस में इस कदर बैठ गयी कि लोगों को उनके सिवाय कोई दूसरा नजर न आता था उनकी सज-सज्जा, आपसी व्यवहार, बोल-चाल सब में ‘देविका रानी’ छाने लगी थी और हर महिला उनका अनुकरण करने लालयित रहती थी । उन्होंने अपने अभिनय के लिये लगभग सभी तरह के पुरस्कार प्राप्त किये यहाँ तक कि वे पहली अभिनेत्री थी जिन्हें फ़िल्मी दुनिया का सर्वोच्च समान पहला ‘दादा साहब फाल्के अवार्ड’ प्राप्त होने के अलावा पद्मश्री अलंकरण भी प्राप्त हुआ साथ ही अनेकों छोटे-बड़े ख़िताब हासिल हुये तो आज देश की उसी ख्यातनाम हस्ती को उनके जन्मदिवस पर अनेकानेक शुभकामनायें... :) :) :) !!!               
------------------------------------------------------------------------------------         
३० मार्च २०१६
© ® सुश्री इंदु सिंह ‘इन्दुश्री
●---------------●-------------●

मंगलवार, 29 मार्च 2016

सुर-४५४ : "अभिनय ईश्वर प्रदत्त... बाँट गये 'उत्पल दत्त'...!!!"


दोस्तों...

___//\\___

कभी हंसाया
तो कभी रुलाया
और कभी डराया भी
लिया रूप कोई भी    
पर, दर्शको को रिझाया
कुछ यूँ उतर गये
हर किरदार के भीतर तक
कि देखने वालों को फिर
‘उत्पल दत्त’ नजर न आया
अंतिम साँस तक
दर्शकों का मनोरंजन किया
तो प्रशंसको ने भी प्यार लुटाया
आज ‘जन्मदिन’ पर याद कर उनको
हमने भी अपना फर्ज़ निभाया
-------------------------------------●●●

कोई चाहे फिल्मों का दीवाना हो या नहीं या फिर उसे फ़िल्में देखने का शौक हो या नहीं लेकिन कुछ फिल्मों ने इस तरह से कीर्तिमान बनाया कि हिंदी सिनेमा के इतिहास में मील का पत्थर बन नाम ही नहीं कमाया बल्कि दर्शकों के दिलों पर भी अपना मुकाम यूँ बनाया कि बीत गये साल दर साल लेकिन उनका प्रभाव अब तक भी जरा-सा कम न हो पाया कुछ ऐसा ही जादुई असर हैं ‘गोलमाल’ मूवी का जो आज भी यदि किसी चैनल पर आ जाये तो फिर उंगलिया ‘रिमोट’ पर थमकर रह जाती हैं, जिसमें काम करने वाले हर एक अदाकार की सहजता-सरलता और भूमिका ने देखने वालों को अपना मुरीद बना लिया फिर भी ‘उत्पल दत्त’ और उनके इश्श्श्श कहने की अदा और मूंछों के प्रति लगाव को कोई भूल न पाया और यहाँ तक कि 'अच्छाआ....' बोलने की उनकी अपनी शैली ने तो उन्हें भीड़ में अलग खड़ा कर दिया जब-जब वे पर्दे पर आये उनके चेहरे की भाव-भंगिमा ने बिना बोले भी अपना काम कर दिया क्योंकि ‘उत्पल दत्त’ कोई बनावटी कलाकार नहीं बल्कि ‘मेथड स्कूल’ के सच्चे अभिनेता थे जो किसी भी भूमिका को महज़ खानापूर्ति न समझते थे बल्कि उसको पूरे दिल से निभाते थे बल्कि अपना काम पूर्ण समर्पण से इस तरह करते थे कि जो भी चरित्र उनको निबाहने को दिया जाता पूरी तरह से उसमें समा जाते थे तभी तो देखने वालों को भी वे ‘उत्पल दत्त’ नहीं बल्कि वही किरदार नजर आते थे

यदि आज की पीढ़ी उनको उनके असल नाम से न भी पहचानती हो तो निसंदेह ‘गोलमाल’ के उनके काल्पनिक नाम ‘भवानी शंकर’ के रूप से आज भी बखूबी जानती हैं और एक अभिनेता के लिये इससे बड़ी उपलब्धी भला और क्या होगी कि सिनेमा हॉल से निकलने वाले दर्शक उसकी भूमिका को उसके अभिनय, उसके अंदाज़, उसके संवाद और उसकी अदायगी को विस्मृत न कर पाता हो उसकी नकल उतारकर उसको बार-बार दुहराकर उसके अहसास में डूब जाता हो कुछ ऐसा ही प्रभाव पैदा किया था ‘उत्पल दत्त’ ने अपनी हर एक भूमिका से जो उनकी अभिनीत हर एक फिल्म के साथ एक यादगार बन चुकी हैं और फिल्म जगत में आने वाले अभिनय के इच्छुक लोगों को प्रेरणा देने के अलावा उनसे कुछ अलहदा सीखने का अवसर भी देती हैं क्योंकि ये उस समय के ऐसे कलाकार हैं जबकि अभिनय को सीखने के लिये आज की तरह कोई संस्थान नहीं होते थे, न ही तकनीक ही इतनी सक्षम थी तब कलाकार स्वयं की प्रेरणा से या अपने भीतर के अनुभवों से ही किसी भी किरदार को रजत पर्दे पर जीवंत करते थे तभी तो उस साधनहीन, अनुभवहीन, गैर-तकनीक दौर के लोगों ने जो भी किया वो आज भी अमर-अमिट हैं और उसका गुणगान किया जाता हैं कि कम संसाधनों और तकनीक की अनुपलब्धता के बावजूद भी वे हर एक कल्पना, हर एक सपने को हूबहू सिनेमा के सेल्युलाइड स्क्रीन पर उतार पाने में कामयाब हो सके जो आज भी फ़िल्मी दुनिया में आने वाले प्रशिक्षुओं के पाठ्यक्रम ही नहीं बल्कि सिनमा के मुरीदों को भी आश्चर्यचकित करता हैं

उनके द्वारा ‘भुवन शोम’ में अभिनीत नायक की भूमिका ने जहाँ उनको अभिनय का ‘राष्ट्रीय सम्मान’ दिलवाया तो वही एक ही निर्देशक ‘ऋषिकेश मुखर्जी’ के निर्देशन में तीन बार सर्वश्रेष्ठ  हास्य अभिनेता का फिल्म फेयर पुरस्कार हासिल किया ‘गोलमाल’, ‘नरम-गरम’ और ‘रंग-बिरंगी’ फिल्म के लिये जो आज भी अपनी ताजगी बरकरार रखे हुए हैं क्योंकि कोई कितना भी प्रयास कर ले लेकिन उनकी मिमक्री करना या उनकी ज्यों की त्यों नकल कर पाना किसी के वश की बात नहीं हैं । यूँ तो उन्होंने अपने जीवन काल में कम ही फ़िल्में की लेकिन हर एक फिल्म और भूमिका में उन्होंने अपनी विशेष छाप छोड़ी जिसके बलबूते वे इतनी बड़ी फिल्म इंडस्ट्री में अपना एक अलहदा स्थान बना पाये जिसे आज तक उनसे कोई भी छीन नहीं पाया कि वो सादगी और अभिनय की सहजता जो प्राकृतिक थी उसे कोई भी कॉपी नहीं कर पाया इसलिये फ़िल्मी इतिहास में उनकी भूमिकाओं का अपना ही एक अलग अध्याय हैं अंग्रेजी रंगमंच से शुरुआत कर उन्होंने जिस तरह से बंगला एवं हिंदी फिल्मों में अपनी जगह बनाई उसकी मिसाल नहीं । 
      
उन्होंने केवल ‘हिंदी’ ही नहीं ‘बंगला’ फिल्मों में भी अपने अभिनय का जलवा दिखाया और हर तरह की भूमिकाओं को बड़ी कुशलता से परदे पर साकार किया फिर चाहे वो ‘नायक’ हो या ‘सह-नायक’ या ‘हास्य कलाकार’ या नकारात्मकता भरा ‘खलनायक’ या फिर कोई चरित्र भूमिका उन्होने सबके साथ पूरी तरह से न्याय किया यही वजह कि उनको किसी विशेष दायरे में बांधकर उनका आकलन नहीं किया जा सकता फिर भी जिस तरह से उन्होंने हल्की-फुल्की मजाकिया फिल्मों में अपने भूमिका को अभिनीत किया वो लाजवाब हैं । अधिकतर लोग मसखरे के रोल के लिये विविध स्वांग रचते और तरह-तरह के गेटअप धारण करते और आजकल तो अश्लील संवादों, फूहड़ आवरण व गलत इशारों से कॉमेडी करते फिर भी बेबाक हंसी की वो लहर पैदा नहीं कर पाते जो ‘उत्पल दत्त साहब’ केवल अपने बोलने या अपनी मुखमुद्रा से ही कर देते थे यहाँ तक कि अपनी गोल-गोल आँखों का इस्तेमाल भी वो कुछ इस तरह से करते कि देखने वाला मुस्कुराये बिना न रह पाता था याने कि बिना किसी उपरी आवरण या अश्लीलता का सहारा लिये वो सहज ढंग से ही देखने वालों को ठहाके लगाने पर मजबूर कर देते थे ।                   

आज उसी बहुमुखी प्रतिभा के धनी स्वाभाविक अभिनय में प्रवीण अदाकार, एक दक्ष नाटककार, सम-सामयिक विषयों पर सृजन करने वाले जारुक लेखक और कुशल निर्देशक को उनके जन्मदिवस पर अनेकानेक शुभकामनायें कि भले ही वो आज अपने दैहिक स्वरुप में हमारे बीच मौज़ूद नहीं हैं लेकिन अपने अभिनीत किरदारों के रूप में वे सदैव हमारा मनोरंजन करते रहेंगे, हमें गुदगुदाते रहेंगे... तो हमें ये अनमोल सौगात देने के लिये उनका बहुत-बहुत आभार और प्यार... :) :) :) !!! 
------------------------------------------------------------------------------------         
२९ मार्च २०१६
© ® सुश्री इंदु सिंह ‘इन्दुश्री
●---------------●-------------●