शनिवार, 20 अप्रैल 2019

सुर-२०१९-११० : #लघुकथा_फेक_मी_टू




दीदी, आज आपने न्यूज़ देखी अब तो हद ही हो गयी इस देश में तो महिलायें बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं जो न्याय देता उसी पर यौन उत्पीड़न का आरोप उफ़, किस पर विश्वास करें समझ नहीं आता मैं तो इस खबर से बेहद दुखी हूँ अब तक नेता, अभिनेता और पत्रकारों पर तो इस तरह के इल्जाम लगते ही रहे मगर, फिर भी कहीं ये विश्वास था कि जाँच के बाद इनको अदालत से जरुर इंसाफ मिलेगा लेकिन, आज पता चलता कि वो भी इसमें लिप्त फिर हम किससे न्याय की गुहार लगायेंगे सच, कहती हो आप मर्द जात ऐसी ही होती जहाँ लडकी देखी इनकी नीयत डोल जाती मगर, अब नहीं हम इसके खिलाफ मोर्चाबंदी करेंगे उस लडकी को अकेला नहीं महसूस होने देंगे और न ही उसे इस रसूखदार व्यक्ति के आगे झुकने देंगे आज ही रिपोर्टिंग कर के उसे ये मैसेज देते है कि हम उसके साथ है ।  

वैभवी, शांत हो जा हम ऐसा कुछ भी नहीं करने वाले बल्कि, हम जनता को जागरूक करेंगे कि वो इस खबर को गंभीरता से नहीं ले ये सरकार का एक षडयंत्र है ।

दीदी, आप ये किस आधार पर कह सकती हो ?

जिस तरह के हालात और समय चल रहा ये खुद अपने आप में साबित कर रहा कि ये सब किसी साजिश का हिस्सा है क्या तू नहीं जानती कि इनकी छवि कितनी साफ़ है और इनके पास सरकार के खिलाफ कई महत्वपूर्ण केस तो उनके लिये ही सरकार इन पर दबाब बनाना चाहती है ।

दीदी, आपको याद है जब पिछली बार अपने देश में पहली बार ‘मी टू’ का पहला प्रकरण सुनाई दिया था और उसके बाद एक-एक कर के चारों तरफ से यही गूँज सुनाई देने लगी थी मानो, सबको एक साथ ही अपने साथ हुये अत्याचारों को अचानक याद आ गयी हो शायद, ही कोई बचा हो कितने तो ऐसे नाम जिनके बारे में सुनकर ये विश्वास करना ही मुश्किल था उन सबकी इमेज भी क्लीन ही थी फिर भी आपने यही था कहा कि छोटी, तू अभी ये सब नहीं समझती इन मर्दों का चरित्र ही खराब कोई मौका नहीं छोड़ते उस पर यदि बड़े पद पर हो तो आसानी से अपने रुतबे का फायदा उठाकर मनमानी कर लेते है यदि अभी हमने इन पीड़िताओं की आवाज़ नहीं सुनी इनका साथ नहीं दिया तो फिर कभी कोई अपने साथ हुये अपराध के लिये बोल नहीं पाएगी और हम दोनों ने मिलकर उनके जस्टिस के लिये हैश टैग चलाये हर मामले की रिपोर्टिंग भी की जिसके बड़े पोजिटिव रिजल्ट्स भी मिले थे मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा तो फ़िल्मी कलाकारोंको फिल्म से हाथ धोना पड़ा फिर अब क्या अलग है ?
           
वैभवी, मैंने पत्रकारिता का कोर्स किया मुझे अच्छी तरह पता कि सब मामले सच्चे नहीं होते कुछ झूठे भी होते और जब तक ये निश्चित न हो जाये कि इसमें कुछ सच्चाई है हम इस केस में चुप रहेंगे और तुझे भी ज्यादा हल्ला मचाने की जरूरत नहीं छोटी, तू राजनीति को नहीं समझती लेकिन, मुझे अच्छे से पता कब बोलना और कब नहीं ।

वाह दीदी, उस समय जब मैंने यही बात की थी कि दीदी केवल इन महिलाओं के बोलने मात्र से हम कैसे मान ले कि ये सच बोल रही सामने वाले कोई मामूली हस्ती नहीं तब आपने ही कहा था कि कोई लड़की बहुत हिम्मत कर के अपने साथ हुये यौन उत्पीड़न पर बोलती यदि हमने उस पर ही ऊँगली उठाई तो फिर वो दुबारा ये साहस नहीं कर पायेगी और कोई लड़की ऐसे मामलों में झूठ नहीं बोलती इसलिये हमें किसी भी हाल में उसका मनोबल नहीं टूटने देना है और आज आप इसे झूठा कह रही ऐसे में मुझे समझ नहीं आ रहा कि सच वो था या ये है अगर, आपकी बात मानूं तो लगता कि आपका वाला ‘रियल’ था और ये वाला ‘फेक मी टू’ है ।         
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© ® सुश्री इंदु सिंह ‘इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)
अप्रैल २०, २०१९

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2019

सुर-२०१९-१०९ : #मिटेगा_हर_भय_और_शोक #हनुमान_हो_गर_बच्चों_के_दोस्त




आज आधुनिकता से प्राप्त तमाम तरह के गेजेट्स व विडियो गेम्स की वजह से जहाँ बच्चों का आउटडोर खेलना बंद हुआ है वहीँ दुनिया भर की अच्छी-बुरी सामग्री के आसानी से उपलब्ध होने से बच्चे कुछ ऐसी जानकारियों से भी परिचित हो रहे जो उनके मानसिक व शारीरिक विकास के साथ-साथ उनके बचपन से भी एक तरह का खिलवाड़ है क्योंकि, कुछ बातें ऐसी होती जिनका एक निश्चित उम्र और परिपक्वता के बाद ही ज्ञान होना जरुरी अन्यथा वो मासूम बाल लीलायें जो उनके बालपन की स्मृतियाँ बनती और उन्हें एक स्वस्थ मानसिकता के अलावा सुरक्षित जीवन जीने का नजरिया देती कहीं खोखली हो जाती जिसकी सुदृढ़ नींव पर उनका आने वाला भविष्य ही नहीं उनके खुद के परिवार का भवन भी तैयार होता है ।

अतः घर का परिवेश व माहौल ऐसा हो जो उनको बाल्यकाल से ही नैतिक शिक्षा व संस्कारों की ऐसी घूटी पिलाये कि वो चाहे दुनिया के किसी भी हिस्से में उसके माता-पिता सुकून एवं विश्वास के साथ रह सके कि हमारी सन्तान न तो कभी कुछ गलत करे और न ही उसके साथ कुछ बुरा हो बल्कि, उसके आस-पास आध्यात्मिक व सकारात्मक ऊर्जा का ऐसा मंडल व सुरक्षा कवच हो जो उसके सम्पर्क में आने वालों को भी उसके जैसा बनने की प्रेरणा दे सके और ये असंभव नहीं अब से कुछ समय पहले तक ऐसे सशक्त चरित्र वाले लोग होते थे पर, अब तो एकल परिवार, डबल इनकम, टेक्नोलॉजी, फ़ास्ट फ़ूड, मॉडर्न लाइफ स्टाइल आदि ने घरों से बुजुर्गों ही नहीं संस्कारों की छाँव भी हमसे छीन ली जबकि, कभी घर-घर में सुबह की शुरुआत ईश्वर के स्मरण, कर वंदना, माता-पिता व बड़ों के चरण स्पर्श व अपनों के अभिवादन से होती बदले में उनका आशीष मिलता तो स्नान, ध्यान, पूजन, सूर्य की पूजा के पश्चात् भगवान् का आभार व्यक्त करते हुये भोजन ग्रहण किया जाता जो हर मोर्निंग को इतना पॉजिटिव बना देता था कि पूरा दिन तनाव रहित व्यतीत होता किसी भी मुश्किल से कोई विचलन भी न होता अब सब कुछ विलुप्त हो चुका या हो रहा है ।

ऐसे में हमारे पर्व-उत्सव ही हमें याद दिलाते कि कभी हम कितने संस्कारी थे अब केवल औपचारिकता ही निभाते उस पर चंद बुद्धिजीवी, लिबरल्स, वामी ऐसे जो कोशिशों में लगे रहते कि जो कुछ बाकी बचा उसका भी सत्यानाश कर दे फिर भी माटी से जुडी सदियों की रवायतें अब भी उसी शान से कायम मगर, महानगरों की जीवन शैली में जो खो रहा उसे बचाने के यही अवसर है कि जब भी ऐसे कोई दिन आये हम अपने नौनिहालों को गर्व से इसके बारे में बताये जैसे कि आज वीरों के वीर महावीर रामभक्त संकटमोचन ‘हनुमान’ का जन्मोत्सव पूरे देश में मनाया जा रहा इसका लाभ उठाते हुये अपने नन्हे-मुन्नों का इनसे परिचय करवाये उनसे उनकी दोस्ती कराये और उनके मन में ऐसा अटल विश्वास भरे कि वे कभी-भी खुद को एकाकी न समझे और न ही किसी हाल में झुके या डरे क्योंकि, यदि बजरंग बली का साथ हो तो फिर हर भय खत्म हो जाता कोई-भी बाधा-विध्न हमें रोक नहीं पाती और हर मुश्किल आसान लगती है ।         

निर्बल के बल ‘राम’
भक्तों के मित्र ‘हनुमान’ !!!
        
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© ® सुश्री इंदु सिंह ‘इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)
अप्रैल १९, २०१९

गुरुवार, 18 अप्रैल 2019

सुर-२०१९-१०८ : #विश्व_विरासत_दिवस_मनाना #प्राचीन_धरोहर_अपनी_बचाना



इस  दुनिया में हर प्रान्त की अपनी कोई तो ऐसी विरासत होती है जिसे सहेजने और अगली पीढ़ी में हस्तांतरित करने की आवश्यकता होती ताकि, वे भी अपने अतीत से परिचित हो सके अपनी जड़ों से जुड़कर अपनी शाखाओं का ऐसा विस्तार करें कि चाहे फिर वो इस संसार के किसी भी कोने में रहे उसे अलग से पहचाने जा सके ऐसी ही कुछ धरोहरों को अपने में समेटे हुए है भगवान् नृसिंह की पावन नगरी ‘नरसिंहपुर’ जिनका अपना सामाजिक, धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व है जिसकी वजह से ये छोटा-सा शहर होने के बावजूद भी सबके आकर्षण का केंद्रबिंदु बना रहता और यहाँ रहने वालों को अपनी पुरातन परम्पराओं व सभ्यता से बांधे रखता और ये इस धरा में बहने वाली ‘माँ नर्मदा’ का ही प्रताप है कि जो भी यहाँ आता इसके मोहपाश में बंधकर फिर इसे छोड़कर किसी दूसरी जगह नहीं जाना चाहता और सदा-सदा के लिये यही बस जाता है ।  

मिट्टी की खुशबू और संस्कारों की छुवन सबका मन मोह लेती फिर थोड़े-बहुत अभाव भी हो तो कोई फर्क नहीं पड़ता कि जीने के लिये महज़ सुख-सुविधा या चमक-दमक ही पर्याप्त नहीं होती अगर, यही वहां के रहवासियों के मध्य परस्पर सम्वाद न हो और उनके रिश्ते आपस में प्रेमिल ऊष्मा से न गुंथे हो जो कि महानगरों के दिखावटी माहौल में बिल्कुल नजर नहीं आता लेकिन, यहाँ ये सब यहाँ बेहद आम बात जिसने यहाँ बहुत सारी कमियों के बाद भी इसे अब तक उसी तरह अपनी सदियों पुरानी विरासत के साथ सर उठाकर खड़ा रखा है तो इसने समय के साथ खुद में बदलाव करते हुये समय की दौड़ के साथ भी यदि अपनी प्राचीन रीति-रिवाजों को पीछे छूटने नहीं दिया तो युग परिवर्तन के साथ कुछ नूतन सांस्कृतिक परम्पराओं को भी अपने आप में जोड़ इनका विस्तार किया जिसे आगे बढाने का काम आने वाली जनरेशन का अतः वे सब मिलकर हर रस्म को आयोजित करते है ।

ऐसी ही एक खुबसूरत परम्परा की शुरुआत सामूहिक जवारे समिति द्वारा यूँ तो छोटे स्तर पर की गयी जिसने धीरे-धीरे विशाल स्वरुप ले लिया है और साल दर साल इसमें इजाफा होता जा रहा है और इसके अंतर्गत केवल जवारों का रोपण ही नहीं किया जाता बल्कि, अब तो इसमें देवी भगवती की भव्य प्रतिमा की स्थापना के साथ-साथ वृहत कन्या भोज, विविध सांस्कृतिक कार्यक्रम और सराफा एसोशियेशन के द्वारा कन्याओं का कर्ण-नाक छेदन भी शामिल हो चुका है और चैत्र पूर्णिमा पर इसकी शोभा यात्रा जिस तरह से निकाली जाती वो यहाँ का विशेष आयोजन बन चुका जिसमें अब दूर-दूर से भी कलाकार आकर शामिल होते अपनी कला का प्रदर्शन करते और नगर से जब ये यात्रा निकलती तो यूँ लगता मानो साक्षात् आदिशक्ति ही नगर भ्रमण के लिये आ गयी हो इस नजारे को देखना सुखद अनुभूति का अहसास देता जिसका इंतजार पूरे बरस हर कोई करता है ।

18 अप्रैल को अंतर्राष्ट्रीय धरोहर दिवस का मनाया जाना यही याद दिलाता कि हम अपनी धरोहरों के प्रति सदैव सतर्क व सजग रहे ताकि, अपनी आइडेंटिटी को जीवित रख सके वरना, जीते तो सभी है लेकिन, जीना वही जब अपनी रवायतों से हमारा जुडाव हो अपनी वास्तविक पहचान कायम हो न कि आधुनिकता की दौड़ में इतने आगे निकल जाये कि न घर के रहे आयर न ही घाट के केवल रोबोट नजर आये तो अब भी वक़्त सम्भल जाये अपने आस-पास नजर दौड़ाये जो भी अनमोल और जरूरी लगे उसे आगे लेकर जाये यही इस दिवस की सार्थकता और इसे सही मायने देना है तो इसे जरुर मनाये, अपनी विरासत को बचाये...।
             
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© ® सुश्री इंदु सिंह ‘इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)
अप्रैल १८, २०१९

बुधवार, 17 अप्रैल 2019

सुर-२०१९-१०७ : #अहिंसा_के_मानवीय_अवतार #राजकुमार_वर्धमान_बने_चौबीसवें_तीर्थंकर




बिहार के इतिहास से इतने गौरवशाली नाम और इतना वैभवपूर्ण अतीत जुड़ा है कि जहाँ उसे पढ़कर मन गर्व व हर्ष से भर जाता वहीं जब आज इस राज्य की हालत देखो तो विश्वास नहीं आता कि इस धरा पर कभी ज्ञान की अविरल गंगा प्रवाहित होती थी । इसकी माटी से कभी ऐसे अवतारी पुरुषों ने भी जनम लिया जो अपनी आंतरिक शक्तियों के जागरण से मानव से महामानव बन गये थे । जिन्होंने जगत को अपने उच्च तपोबल व असीम अनुभूतियों से अर्जित दिव्य ज्ञान से अज्ञान के अन्धकार को मिटाने ऐसा पारसमणि सदृश अखंड ज्योतिर्मय दीप दिया जिसकी रौशनी से अंतर्मन सदैव प्रकशित रहे । उनका वो खजाना आज भी उसी तरह हमारे पास सरंक्षित है लेकिन, हम ही अपने उस प्राचीन कालखंड से न केवल दूर हो गये बल्कि, उसे भूल भी गये अन्यथा जिस ज्ञान ने हमें विश्वगुरु बनाया आज उसके रहते हमें किसी का मोहताज नहीं होना पड़ता ।

हम तो केवल अपने मानवीय गुणों प्रेम, क्षमा, धैर्य, दया, अहिंसा और शांति से ही किसी को भी जीतने की महारथ रखते है जिसके अनगिनत प्रमाण हमरे धर्मग्रंथों, वेद-पुराणों में उपलब्ध है कुछ ऐसे वास्तविक कथानक जो बताते कि अपनी सहनशीलता से हमने एक दुर्दांत दस्यु तक को महर्षि बना दिया तो किसी राक्षसी वृति के खलचरित्र को सतचरित्र बना दिया था । आज लेकिन, माहौल ऐसा कि हम अपनी स्वाभाविक वृतियों से ही पृथक हो रहे ऐसे में वही हो रहा जिसे हम देख नहीं पा रहे कि हम कृत्रिम माहौल में लगभग उसी की तरह बनाते जा रहे जो याद दिलाता कि हम अप्राकृतिक बन जाते जब हम प्रकृति से दूर हो जाते है । ग्रंथों में जितने भी महाचरित्रों के वर्णन उनका यदि सूक्ष्मता से अध्ययन करें तो पाते कि सभी एक सामान्य मानव के रूप में ही सामान्य प्रक्रिया से ही इस धरती पर जन्मे लेकिन, प्रकृति के निकट रहकर उन्होंने जो सहज ज्ञान पाया उसने उनके भीतर प्राणी मात्र के लिये ऐसी कोमलता उत्पन्न की जिसने उन्हें विशाल जनमानस का ईश्वर बना दिया ।

चाहे ‘राम’ हो या ‘सिद्धार्थ’ या ‘वर्धमान’ सभी राजमहलों में जनम लेते है और उन्हें सभी वैभव-सुख आँख खोलते ही प्राप्त होते है फिर भी उनके अंतर में खालीपन होता जो उन्हें विलासिता के जीवन में रमने नहीं देता और यही भटकन है जो उन्हें उस सत्य की तलाश में इन सुविधाओं से दूर ले जाती है । इसलिये इन सभी ने एक क्षण में ही उस ‘राजयोग’ को झटक दिया क्योंकि, हमारे यहाँ मोक्ष को ही सर्वोत्तम उपलब्धि माना जाता है तो उन्होंने उसे हासिल करने के लिये वनगमन किया जहाँ कुदरत के नजदीक रहकर उन्हें वायुमंडल में व्याप्त वो आत्मिक रहस्य प्राप्त हुआ जिसको जानने के बाद फिर कुछ भी जानना शेष नहीं रह जाता है । इन्होने अपने जीवन दर्शन से हमको बताया कि, अंतरिक्ष के वे गूढ़ रहस्य जिनको जानने के लिये वैज्ञानिक बरसों-बरस शोध करते और न जाने कितने यंत्रों का प्रयोग करते उसे हम कुदरत के निकट जाकर सहजता में ही पा सकते है ।     

आज एक ऐसे ही महापुरुष महावीर की जयंती है जिन्होंने ‘अहिंसा परमो धर्म’ के सिद्धांत को इस तरह से आत्मसात किया कि स्वयमेव ही अहिंसा के मानवीय अवतार बन गये तो आज सभी को इस परम पावन दिवस की अनंत शुभकामनायें... !!!
             
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© ® सुश्री इंदु सिंह ‘इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)
अप्रैल १७, २०१९

मंगलवार, 16 अप्रैल 2019

सुर-२०१९-१०६ : #त्रासदी_से_जन्मी_कॉमेडी #कहते_जिसे_हम_चार्ली_चैपलिन




पीड़ा से
उपजती नहीं है
पीड़ा सदैव
अक्सर,
हास्यबोध लेता
वेदना के गर्भ से जनम
कहकहे लगाता जो
अपनी ही तकलीफों पर
चाहिये जिसके लिये
हर एक गम पर
ठहाके लगाने का जज्बा
सिखाये जो जीने का
इक अलग ही फलसफ़ा 
भूलकर फिर सभी
जीवन में मिली कड़वाहट
मुस्कुराने लगे लब
आँखों में फिर भले हो आंसू
नजर न आये मगर,
चेहरे पर उसके नक्श कोई
मुमकिन नहीं कि
कर सके सब ऐसा करिश्मा
कोई एक अलहदा
कर पाता यूँ हंस-हंसकर
मुश्किलों का सामना
सीखाता जो दुनिया को जीना
खुद पर हंसना
कहते जिसे हम मसीहा
‘चार्ली चैपलीन’
एक ऐसा ही नाम बना
जिसने बिना कहे
हंसी का खजाना गढ़ा
मूक बनकर जग को हंसाया
सच का आईना दिखाया ॥

#Happy_Birth_Day_Charlie_Chapline

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© ® सुश्री इंदु सिंह ‘इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)
अप्रैल १६, २०१९

सोमवार, 15 अप्रैल 2019

सुर-२०१९-१०५ : #आदर्श_चुनाव_आचार_सहिंता #किसी_दल_पर_कोई_असर_नहीं_दिखता




‘आदर्श आचार सहिंता’ मतलब देश में स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव कराने की कठोर नियमावली परंतु, इसके लागू होते ही सभी दलों के समस्त नेता एकदम से बेलगाम हो जाते है यूँ लगता मानो निर्वाचन आयोग के चुनाव की तिथियों की घोषणा के साथ ही उनको कोई खुली छूट दे गयी हो जैसे कोई किसी बड़ी प्रतिस्पर्धा का शुभारंभ हो गया हो और माईक से चिल्लाकर कहा गया हो ‘आपका समय शुरू होता है अब...’ बस, उसके बाद सब अपनी जुबान को यूँ आज़ाद कर देते जैसे किसी ने बहुत समय से बंधी पैरों की जंजीरें काट दी हो तो समझ ही न आ रहा कि ये जो समय मिला इसमें क्या-क्या न कर ले । इसलिये शायद, इन दिनों सभी हदें पार कर दी जाती हर किसी के द्वारा क्योंकि, कोई किसी से किसी भी मामले में पीछे नही रहना चाहता आखिर, इज्जत का मसला जो होता तो जिस नैतिक आचरण की अपेक्षा के साथ इसको सम्पूर्ण निर्वाचन के दौरान लागू किया जाता उसके ठीक विपरीत सभी पार्टियों के नेताओं द्वारा इसका पालन किया जाता जो इस पर कई प्रश्नचिन्ह खड़े करता है क्योंकि, इसे लागू करने का जो उद्देश्य होता वो कहीं पर भी दिखाई नहीं देता है ।

आये दिन इस गाइडलाइन की धज्जियां उड़ाते देश की बागडोर संभालते व पूरी दुनिया में इसका प्रतिनिधित्व करने वाले माननीय मंत्री इतने निम्न स्तर पर उतर आते कि ताज्जुब होता ये देखकर कि ये जन-प्रतिनिधि है इन्हें ही जनता ने चुनकर भेजा है और ये राष्ट्र का संचालन करते है वो जिन्हें बोलने तक की तमीज नहीं और जिनकी शिक्षा का स्तर उन सरकारी कर्मचारियों व अफसरों से भी कम जिन पर इनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी होती । फिर भी मजाल जो कोई इनकी अवहेलना कर दे बल्कि, इनके इन अपशब्दों पर तो श्रोतागण तालियाँ पीटते भले ये किसी स्त्री का अपमान करें या किसी अफसर का तो फिर क्यों न ये इससे भी अधिक नीचे उतरने को तैयार हो जब इनके पास अपने ‘वोट बैंक’ का भरोसा हो तो ये भी अपने उस विपक्ष को हर तरह से नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ते जिसके लिये ‘आदर्श आचार सहिंता’ में स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि “राजनीतिक दलों की आलोचना कार्यक्रम व नीतियों तक सीमित हो, न कि व्यक्तिगत” मगर, एक भी दल ऐसा नहीं जो इसका अक्षरशः पालन करता हो सभी एक-दूसरे पर व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप ही लगाते रहते है ।

यही नहीं मतदाता की जात व धर्म के सम्बन्ध में भी साफ-साफ़ लिखा गया है कि “कोई भी दल ऐसा काम न करे, जिससे जातियों और धार्मिक या भाषाई समुदायों के बीच मतभेद बढ़े या घृणा फैले और राजनीतिक दल ऐसी कोई भी अपील जारी नहीं करेंगे, जिससे किसी की धार्मिक या जातीय भावनाएं आहत होती हों” फिर भी यही देखने-सुनने में आता कि सभी दल के नेता अपने वोट को साधने के लिये उनके मजहब को टारगेट बनाते उनसे अपने धर्म के लोगों को वोट देने की अपील करते है । वे ऐसा कुछ न कुछ जरुर करते कि विभिन्न समुदायों के बीच आपसी मतभेद उत्पन्न हो तो क्या ये सब नियम केवल सहिंता की शोभा बढ़ाने के लिये ही लिखे गये है इन पर अमल करना जरुरी नहीं यदि है तो इनके उल्लंघन पर चुनाव आयोग उसी तरह से कठोर कार्यवाही क्यों नहीं करता जैसा कि उल्लेखित किया गया है बल्कि, वो तो इन सबको नजरअंदाज करता रहता जब तक कि उससे इस पर एक्शन लेने को कहा न जाए ऐसे में ये सब महज़ औपचारिकता ही लगती है ।

सम्पूर्ण आचार सहिंता में नेताओं के ‘सामान्य आचरण’ से लेकर उनके द्वारा आयोजित की जाने वाली ‘जनसभाओं’ और उनके द्वारा निकाले जाने वाले ‘जुलूस’ हो या फिर ‘मतदान दिवस’ में उनसे अपेक्षित व्यवहार हो या ‘मतदान केंद्र’ पर उनके प्रवेश को लेकर दिशा-निर्देश हो सब को अलग-अलग चैप्टर में क्लियर लिखा गया है इसके अतिरिक्त सत्ताधारी दल के लिये भी अलग से विशेष नियम दिए गये है । ‘निर्वाचन घोषणा पत्र’ पर भी गाइडलाइन में किसी तरह का कोई संदेह नहीं है फिर भी जब उन नियमों का अध्ययन करो तो कोई भी दल उस पर सटीक बैठता दिखाई नहीं देता ऐसे में ये ‘आदर्श चुनाव आचार सहिंता’ का औचित्य क्या है ये समझ नहीं आता जबकि, उन नियमों से अलग सबके अपने नियम दिखाई देते है केवल आम जनता ही इससे प्रभावित होती क्योंकि, वो यदि किसी विभाग से अपना कोई काम कराना चाहे तो उसे दो टूक जवाब मिलता “आचार सहिंता लागू है” ।

#आचार_या_अनाचार_सहिंता
#जनता_अमल_करें_नेता_नहीं_मानता
     
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© ® सुश्री इंदु सिंह ‘इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)
अप्रैल १५, २०१९

रविवार, 14 अप्रैल 2019

सुर-२०१९-१०४ : #भारत_रत्न_भीमराव_अम्बेडकर #सामाजिक_समानता_के_प्रबल_पक्षधर




14 अप्रैल को सम्पूर्ण देश में ‘संविधान निर्माता’ के रूप में स्थापित ‘डॉ भीमराव अम्बेडकर’ का जन्मदिन उसी गरिमा और सम्मान के साथ मनाया जाता जिसके वो हकदार है और जिन संघर्षों के बाद उन्होंने ये मुकाम हासिल किया उसको समझाना सबके लिये अधिक जरुरी है क्योंकि, उन्होंने जिस कालखंड में जनम लिया वो आज के संदर्भ में अधिक कठिनाइयों भरा था फिर भी उन्होंने बिना ‘आरक्षण’ के न केवल खुद को उच्च शिक्षित किया बल्कि, अपना ऐसा व्यक्तित्व व शख्सियत बनाई कि उनके बिना आज़ाद भारत के संविधान की रुपरेखा बनाया जाना मुमकिन नहीं था तो ये जिम्मेदारी उनके कंधों पर डाली गयी उनकी काबिलियत को देखकर न कि उनको जात कि उन्होंने देश-विदेश से जो डिग्रियां व ज्ञान हासिल किया उसका निचोड़ वो देश की आधारशिला तय करने वाले इस सर्वोच्च ग्रन्थ में समाहित कर एक ऐसी पुस्तक लिख सके जिसमें हर धर्म, हर वर्ग, हर समुदाय और हर व्यक्ति को उसका हक़ व देश को सुरक्षित ढांचा मिल सके ।

इसके बाद उन्होंने भी दुनिया भर के सभी संविधान का अध्ययन कर जो ‘भारतीय संविधान’ बनाया वो अपने आप में एक ऐसा अनूठा महाकाव्य बन गया जिसमें सभी को संतुष्ट करने का भरसक प्रयास किया गया जिससे कि संतुलन स्थापित हो सके क्योंकि, ये हमारा देश विविधताओं ही नहीं विविध जातियों के लोगों का भी आश्रय स्थल है तो किसी को भी उससे कोई शिकायत न हो फिर भी कहीं न कहीं उनका पलड़ा एक वर्ग विशेष की तरफ ख़ास झुक गया जो प्रश्न खड़ा करता कि जब वे स्वयं इतने पढ़े-लिखे थे और उन्होंने उस दौर की विषमताओं का सामना करते हुये अपनी स्वतंत्र पहचान बनाई तो फिर वे अपने उस संप्रदाय के लिये ऐसी व्यवस्था क्यों कर के गये क्यों नहीं उन्हें भी यही सन्देश या सबक देने की कोशिश की गयी कि तुम भी मेरी तरह इसी समाज में रहकर अपने लिये अपने बूते पर जगह बनाओ अब तो हम स्वतंत्र है तो मुश्किलें उतनी नही जितनी कि गुलामी के दिनों में झेलनी पड़ी थी अब तो अपना देश, अपनी सरकार और अपना ही राज है तो फिर आरक्षण की सीढ़ी लगाकर चढ़ने की जगह अपने पैरों पर दम से खड़ा हुआ जाये जिस तरह मैंने कर के दिखाया आपमें भी तो वो कूवत है कि आप भी कर सको आखिर, उसी व्यवस्था में से निकलकर ही तो वे भी साधारण से अ-साधारण बन गये थे ।

ऐसे में उनको शैक्षणिक रूप से मजबूत करना ही पर्याप्त था क्योंकि, ज्ञान का दीपक तो हर तरह के अंधकार को पराजित करने की क्षमता रखता है फिर भी ऐसा कर उन्होंने समानता के अधिकार को स्वतः ही कमजोर कर दिया उसके बाद भी हम उनकी दूरदृष्टि व गहन सोच की वजह उनको समानता का प्रबल पक्षधर मानते है जो उन्होंने हर तरह की असमानता को झेलकर भी खुद को टूटने नहीं दिया हर गलत का विरोध कर अपना ही नहीं अपनों का भी भला सोचा और देश को एकसूत्र में बांधने के लिये जो कुछ संभव था वही किया जिसके आधार पर आज हर कोई उनके साथ खड़ा दिखाई देता है पर, जो उनके विशेष अनुयायी उनको आज उनकी जयंती पर उनकी आत्मकथा पढ़कर ये संकल्प लेना चाहिये कि वे आरक्षण नहीं सक्षमता के बूते पर वही ऊँचाई प्राप्त करेंगे जहाँ पर उनको देखने के लिये वे आजीवन कर्मरत रहे... आज जयंती पर उनको नमन... !!!                
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© ® सुश्री इंदु सिंह ‘इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)
अप्रैल १४, २०१९