मंगलवार, 18 जून 2019

सुर-२०१८-१६८ : #रानी_लक्ष्मी_बाई_सम_बनो #अपने_अधिकारों_के_लिये_लड़ो



झांसी के राजा गंगाधर राव की मृत्यु के बाद जब अंग्रेजों ने रानी के पास फरमान भिजवाया कि दत्तक पुत्र को वे वैध नहीं मानते अतः कोई वारिस न होने के कारण उनके राज्य झांसी को सरकार अपने अधीन करना चाहती है और रानी के लिए पेंशन की व्यवथा करने का प्रस्ताव भेजा पर, रानी को ब्रिटिश शासन की ये नीति पसन्द नहीं आई कि जिस पर हमारा राज और जो हमारा अपना हिस्सा उसे किस अधिकार से बाहर से आये विदेशी उनसे छीन लेना चाहते है  केवल, इसलिये कि उन्होंने जबरदस्ती हमारे देश पर कब्जा किया हुआ है यदि ऐसा ही चला तो इस तरह वे हर प्रान्त को अपने कब्जे में लेकर संपूर्ण भारतवर्ष को हमेशा गुलाम बनाकर रखेंगे इसलिये अभी इनका प्रतिरोध जरूरी नहीं तो कल को तो ये हमें ही अपने वतन से बाहर निकालकर खदेड़ देंगे अतः विपरीत परिस्थितियां व संसाधन न होने के बाद भी उन्होंने वीरतापूर्वक अपने हक के लिये लड़ने का कठोर फैसला लिया औऱ किसी भी दबाब के आगे न झुकने के उनके इस निर्णय ने दर्शाया कि नारी को यदि सत्ता सौंपी जाये तो फिर चाहे जो परिस्थिति आये वो पीछे नहीं हटती अपनी जिम्मेदारी को पूरे तरीके से निभाती है

इसलिये उन्होंने भी जब ये देखा कि जंग के सिवा दूसरा कोई विकल्प नहीं तब भी घबराई नहीं क्योंकि, तलवार-ढाल तो उसके बालपन के खिलौने थे जिसको किस तरह से इस्तेमाल करना वे अच्छी तरह जानती थी तो उन्होंने जान गंवाने की अंतिम स्थिति में भी अपने फैसले पर कायम रही आखिर, बात अधिकार और हक की थी जिसके लिए हर कीमत कम है तो उस जमाने में जबकि, नारी को अबला या घर की लाज या कोमल-कमजोर कहा जाता था उन्होंने उस कल्पित छवि को न केवल तोड़ा बल्कि, ऐसी नवीन मजबूत इमेज बनाई कि स्त्री के लिये प्रयुक्त होने वाले तमाम शब्द कम पड़ गये शब्दकोश में ढूंढने पर भी कोई ऐसा विशेषण नहीं मिला जो उनके अदम्य साहस, शौर्य व वीरता को परिभाषित कर सके क्योंकि, उन्होंने रणक्षेत्र में अपने योद्धकौशल ही नहीं बुद्धिमता का भी भरपूर प्रदर्शन किया जैसा कि उसके पूर्व इस तरह से देखने में नहीं आया था

इसलिये जब उनकी बहादुरी को अभिव्यक्त करने का समय आया तो उनके लिये ‘मर्दानी’ जैसा एकदम नूतन विशेषण गढ़ा गया जिसमें मर्दानगी की तरह झूठा दम्भ नहीं बल्कि, एक नारी के पराक्रम की कहानी समाई हुई थी जो स्त्रियों को ऐसी ही प्रतिकूल परिस्थिति आने पर निडरता के साथ सामना करने की प्रेरणा देता है आज ही वो तिथि थी जब उन्होंने बड़ी बहादुरी के साथ अंग्रेजों से लड़ते हुये अपने प्राण गंवाये उनका स्मरण हमें ये बल देता कि हम भी उनकी तरह बनने का संकल्प ले यदि पहले से ही उनके पदचिन्हों पर चले होते तो आज हमें महिला सशक्तिकरण की जरूरत ही नहीं पड़ती क्योंकि, सौ सालों से अधिक का ये समय हमको बराबरी के दर्जे पर खड़ा कर चुका होता जिसके लिये अभी भी न जाने कितना इंतजार करना पड़ेगा वाकई, जो अपने इतिहास को नकारते या उससे कोई शिक्षा ग्रहण नहीं करते उनकी सहायता भला फिर कौन करेगा ये अतीत के पन्नों से निकले ये दिन हमें यही याद दिलाने तो आते है  
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© ® सुश्री इंदु सिंह ‘इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)
जून १८, २०१९

सोमवार, 17 जून 2019

सुर-२०१९-१६७ : #मन_के_रूप_अनेक #कह_गये_संत_कबीर_ये_भेद



दुनिया की प्रयोगशाला में नित होने वाले अनुभवों से निष्कर्ष निकालकर उसे सूत्र में बंधने का कार्य जिस तरह से संत कबीर ने किया वो एक संत प्रवृति के समाज सुधारक के द्वारा ही संभव है उन्होंने अपनी वाणी से किसी विशेष धर्म नहीं बल्कि, प्रत्येक मजहब की गलत बातों व कुरीतियों का खुलकर विरोध जताया और वो भी उस भाषा में जो जन-जन की है ताकि, किसी सामान्य व्यक्ति को भी उसके भाव ग्रहण करने में कोई दिक्कत नहीं हो यही वजह कि इतने बरसों बाद भी उनके मुख से निकले वो वचन आज भी उतने ही प्रासंगिक है क्योंकि, समय या युग परिवर्तन से लोगों की मानसिक स्थिति व जीवन दर्शन नहीं बदलता वो तो शाश्वत है इसलिए हर कालखंड में जब भी कुछ वैसा घटित होगा जिसे देखकर या सुनकर उनके मुंह से वो कथन निकला तो ऐसी हर परिस्थिति में उनका कहा गया दोहराया जायेगा कि उनका हर एक शब्द वास्तव में मनोविज्ञान है जिसे पढ़कर हम मानव मन की जटिलताओं व अंतर में चलने वाली गतिविधियों को समझ सकते है

वैसे तो हम उनका नाम समाज में प्रचलित कुरीतियों पर किये जाने शाब्दिक प्रहार के लिये सर्वाधिक लेते है लेकिन, उन्होंने केवल गलत के खिलाफ ही नहीं बोला बल्कि, प्रेम, दया, परोपकार, ज्ञान, मोह, माया, कर्म, काम, क्रोध, स्वार्थ जैसे मन में उठने वाले अहसासों पर भी बड़ी खुबसूरती से अपने मन्तव्य को स्पष्ट किया है पर, हम अमूमन उन्हीं सूक्तियों व दोहों को बार-बार प्रयोग में लाते जो व्यवाहर में अधिक प्रचलित पर, आज कबीर जयंती पर हम उन वाणियों का विशेष रूप से उल्लेख करेंगे जो ‘मन’ जैसे दुरूह विषय पर आधारित जिससे कि शायद, किसी अनसुलझी गुत्थी को सुलझाने में कोई मदद मिल जाये क्योंकि, ‘मन’ को तो एक पहेली कहा गया है जिसे समझने के प्रयास लगातार जारी तो जिस तरह से उन्होंने समझा और व्यक्त किया हम भी उसे उस तरह से समझने की कोशिश करते है...

मन किस तरह प्रतिपल बदलता रहता उसे उन्होंने कुछ इस तरह से ज़ाहिर किया...

मन के बहुतक रंग है, छिन छिन बदले सोय
एक रंग मे जो रहे, एैसा बिरला कोय

अर्थात, मन के अनेको रंग-विचार है और यह क्षण-क्षण बदलता रहता है । जो मत सर्वदा एक मन में स्थिर रहता है - वह दुर्लभ कोई एक संत होता है । वाकई, हम सब हमेशा यही महसूस करते कि हमारे भीतर विचारों का अंधड़ चलता रहता बहुत मुश्किल से ही हम किसी एक निर्णय पर स्थिर हो पाते है क्योंकि, ये चंचलता मन का नैसर्गिक स्वभाव है

मन के इस रंग बदलते स्वरुप को उन्होंने इस तरह से भी दर्शाया...

कबहुक मन गगनहि चढ़ै, कबहु गिरै पाताल
कबहु मन अनमुनै लगै, कबहु जाबै चाल

अर्थात, कभी तो मन मगन में बिहार करता है और कभी पाताल लोक में गिर जाता है । कभी मन ईश्वर के गहन चिंतन में रहता है तो कभी संसारिक बिषयों में भटकता रहता है उफ़, यह मन अत्यंत चंचल है किसी ठौर नहीं ठहरता एक पल जो ठीक लगता अगले ही पल गलत लगने लगता कि इसकी गति तो वायु से भी तेज जो रूकती ही नहीं

यही नहीं उन्होंने तो इसे लालची भी कह दिया...

कबीर यह मन लालची, समझै नाहि गवार
भजन करन को आलसी, खाने को तैयार

अर्थात, कबीर के अनुसार यह मन बहुत लालची है यह गॅवार की तरह नहीं समझता है । प्रभु की भक्ति के लिये तो आलसी बना रहता परंतु, खाने भोजन के लिये हमेशा तैयार रहता है । वाकई, मन केवल अपने मन की सोचता जो उसे पसंद या अच्छा लगता वो सदैव वही करना चाहता है फिर भले उसकी वजह से नुकसान हो जाये पर, उसे तो मन की करनी ही है । सिर्फ, वही जिन्होंने इस पर काबू किया वही बच पाते बाकी तो इसके इशारों पर नाचते रहते है ।

मन के भीतर एक साथ अनेक ख्याल चलते रहते जिनको समझना जरूरी है इसलिये उनके अनुसार चलने से पहले कबीर की इस वाणी पर विचार कर ले...

मन के मते ना चलिये, मन के मते अनेक ।
जो मन पर अस्वार है, सो साधू कोइ एक ॥

अर्थात, मन के कहने पर मत चलें मन के भीतर तो अनेक विचार रहते है । जो मन सर्वदा एक स्थिर रहता है - वह दुर्लभ मन कोई एक होता है । वाकई, मन में अनगिनत विचारों का बवंडर उठता रहता जो अपने साथ हमें भी ले उड़ता है । ऐसे में ये समझना जरूरी कि हम मन नहीं ‘मन’ हमारे तन का एक हिस्सा है । हमें मन के अनुसार नहीं चलना बल्कि, उसे अपने निर्देशानुसार चलाना है ।

इसलिये उन्होंने इस चंचल व लालची मन को वश में करने का तरीका भी यूँ बताया...

चंचल मन निशचल करै, फिर फिर नाम लगाय
तन मन दोउ बसि करै, ताको कछु नहि जाय

अर्थात, इस चंचल मन को स्थिर करें और इसे निरंतर प्रभु के नाम में लगावें । अपने शरीर और मन को वश में करें आप का कुछ भी नाश नहीं होगा । अस्थिर मन को स्थिर करने का तरीका कि उसे सद्विचारों में लीन कर दिया उसे ईश्वर की भक्ति में डूबो दिया जाये तब सिवाय ईश ध्यान के उसे कुछ सूझेगा नहीं और हम कुछ भी गलत कभी करेंगे नहीं पर, ये इतना आसान नहीं तो साधक के सिवाय सब कर नहीं पाते है

प्रभु को पाने का तरीका भी उन्होंने मन के माध्यम से इस तरह कहा,

चिन्ता चित्त विशारिये फिरि बुझिये नहीं आन
इंद्री पसारा मेटिये,सहज मिलिये भगवान

अर्थात, मन में चिंताओं को भूल जाईये और दूसरों से भी उनकी चिंताओं को मत पूछिये । अपने बिषय इन्द्रियों को फैलने से नियंत्रन करें तो आप सहज हीं प्रभु को पा लेगें । पढ़कर देखें तो लगता कितना सहज है ये मार्ग पर, अमल करो तो अहसास होता कि इतना दुष्कर कोई दूजा कार्य नहीं क्योंकि, मन में जब चिंता का रोग लगता तो वो चिता सम बन जाता है निरंतर उसी सोच में धूनी की तरह जलता रहता और जो एक बार उसे झटक दिया तो कोहरे छंटने से जैसे सब साफ हो जाता कुछ उसी तरह सब स्पष्ट नजर आने लगता है

क्योंकि, कबीर ने कहा है कि,

मन के हारे हार है, मन के जीते जीत
कहे कबीर हरि पाइये, मन ही के परतीत

अर्थात, मन के हारने पर आप हारते है और मन के विजय होने पर आप जीत जाते हैं । यदि मन में पूर्णविश्वास हो तो आप प्रभु को सुगमता से पा सकते है । सिर्फ, मन के भीतर अटल विश्वास की लौ जगाने की जरूरत है सब कुछ स्वयमेव ही सध जाता है  

इतना सब कुछ कहने के बाद उन्होंने ये भी हम पर ही छोड़ दिया कि हमें क्या करना है...

कबीर मन तो एक है, भाबै तहां लगाय
भाबै गुरु की भक्ति कर, भाबै विषय समाय

अर्थात, कबीर कहते है यह मन तो एक ही है और तुम्हारी जहाँ इच्छा हो इसे वहाँ लगाओ
मन हो तो इसे प्रभु भक्ति में समर्पित करो या विषय भोगों में लगाओ । मन है आपका तो निर्णय भी आपका ही चलेगा जिसे बेहद सोच-समझकर आपको लेना है

इसकी महिमा को पूर्ण रूप से अभिव्यक्त कर पाना कठिन इसलिये उन्होंने कहा...

अकथ कथा या मन की, कहै कबीर समुझाय
जो याको समझा परै, ताको काल ना खाय

अर्थात, इस मन की कथा अनन्त है ‘कबीर’ इसे समझा कर कहते हैं । जिसने इस बात को समझ लिया है उसका काल भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता है । 
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© ® सुश्री इंदु सिंह ‘इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)
जून १७, २०१९

रविवार, 16 जून 2019

सुर-२०१९-१६६ : #सबके_लिये_खामोश_जीता #लाता_है_कमाकर_खुशियाँ_पिता



सबके होंठों पर
खिली रहे मुस्कान सदा
आंखों में सजे सपने
पूरी हो दिल की हर ख्वाहिश
चाहे जो भी कीमत
उसके लिये करनी पड़े अदा
कभी करें ओवर टाइम
तो कभी अपने अरमानों को
बच्चों की इच्छा खातिर
भूला देता है पिता
सोचता नहीं कभी खुद को
विशलिस्ट में अपनी
डिमांड्स अपनों की रखता
जाये कभी कहीं भी तो
कानों में गूंजे हमेशा
पीछे छूटी तोतली आवाज़
महसूस होता यूं कि,
सीने में धड़कने वाला दिल
घर के किसी कोने में ही रह गया
दूर रहकर भी वो
अपनों से नहीं होता जुदा
जताता नहीं फिर भी
प्यार कितना भीतर भरा
खामोश रहकर वो
हर फर्ज अपना करें पूरा
‘माँ’ अगर, ममता तो
सुरक्षा कवच होता है ‘पिता’ ।।

#पितृ_दिवस_की_बधाई
#Happy_Fathers_Day

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© ® सुश्री इंदु सिंह ‘इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)
जून १६, २०१९

शनिवार, 15 जून 2019

सुर-२०१९-१६५ : #अपने_अधिकारों_के_प्रति_सचेत_रहे #कर्तव्यों_से_भी_मगर_न_कभी_डिगे



10 जून सोमवार, कोलकाता के एक सरकारी एन.आर.एस. मेडिकल कॉलेज अस्पताल में एक 75 साल के बुजुर्ग ‘मोहम्मद सईद’ को दिल का दौरा पड़ने के बाद एडमिट कराया गया जहां ‘मोहम्‍मद सईद’ को दूसरा दिल का दौरा पड़ा । उसी रात को ड्यूटी पर तैनात जूनियर डॉक्टर्स ने सईद को जीवनरक्षक इंजेक्शन लगाया, लेकिन वे उसकी जान नहीं बचा पाए शायद, कंडीशन अधिक गंभीर हो चुकी थी । ऐसा पहली बार तो नहीं हुआ अनेक लोगों के साथ अनेकों बार हुआ होगा जब उनके प्रिय को अस्पताल ले जाने के बावजूद भी बचाया जाना संभव नहीं होगा पर, यहाँ इसके बाद हालात बिगड़ गये परिजन अस्‍पताल में ही हंगामा करने लगे । ये भी कोई नई बात नहीं कभी-कभी स्थिति काबू से बाहर हो जाती और मरीज के साथ आये लोग उसका चले जाना सहन नहीं कर पाते तो झडप हो जाती जो कि स्वाभाविक भी है डॉक्टर्स भी उसकी मनोभावनाओं को समझकर इसे सामान्य तरीके से ही लेते हुये बुरा भी नहीं मानते पर, इस बार मामला कुछ अधिक ही बिगड़ गया क्योंकि, मरीज के परिजनों ने अपने इलाके से कुछ लोगों को बुलाया ।

फिर रात में करीब 11 बजे दो ट्रकों में भरकर लोग अस्‍पताल में पहुंचे जिन्होंने ड्यूटी पर तैनात डॉक्टर ‘परिवह मुखर्जी’ और ‘यश टेकवानी’ की बुरी तरह पिटाई कर दी । इस वजह से ईंट की चोट लगी और मुखर्जी के सिर में फ्रैक्चर हो गया जिसके बाद उनको एक निजी नर्सिंग होम में एडमिट कराया गया परन्तु, जब इस घटना की खबर अन्य डॉक्टर्स को लगी तो उन्होंने इसके विरोध में डॉक्टर हड़ताल करने का निश्चय किया कई डॉक्टर्स ने इस्तीफ़ा भी दे दिया जिसमें देश भर के डॉक्टर्स उनके साथ जुड़ते गये और ये राज्य की जगह राष्ट्रीय स्तर का मामला बन गया । उसके बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपनी बयानबाजी से डॉक्टर्स के जख्मों पर मरहम लगाने की बजाय नमक छिड़क दिया और इसने राजनीतिक रंग भी ले लिया सबने अपने-अपने तरह से प्रतिक्रिया दी किसी ने डॉक्टर का साथ दिया तो कोई उनके विरोध में भी अपना मत रखने सामने आया पर, जो भी ये तो तय है कि ये मामला किसी भी व्यवसाय से जुड़े व्यक्ति के अधिकारों के खिलाफ है

इसने डॉक्टर्स को ये अहसास कराया कि वे अपने परिसर में सुरक्षित नहीं है और यदि अभी इसका प्रतिरोध नहीं किया गया तो आगे से कोई भी इसी तरह से उनके साथ हिंसा का प्रयोग कर सकता है इसमें उनके पेशे से जुड़े सभी लोगों ने उनके पक्ष में खड़े होकर उन्हें समर्थन दिया और ये साबित किया कि एकजुटता से कोई काम किया जाये तो नेता क्या सरकार से भी अपनी बात मनवा सकते है आखिरकार, मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी को ये स्वीकार करना पड़ा कि ये उनकी धमकी या अल्टीमेटम से उनकी बात नहीं मानने वाले तो वे उनकी शर्तें मानने को भी तैयार हो गयी पर, वे इतने से राजी नहीं है पश्चिम बंगाल लगातार सुर्ख़ियों में बना हुआ वजह चाहे जो भी हो वहां जिस तरह से तानाशाही का माहौल बना हुआ वो संविधान के मुताबिक भी सही नहीं है । ऐसे में डॉक्टर्स के द्वारा उठाया गया ये कदम एक निर्णायक फैसला है जिसने सरकार को ये जता दिया कि वे भले सरकार के अधीन काम करते लेकिन, उनके गुलाम नहीं, न ही मूक भेड़ें जो उनके अनुशरण करती रहेंगी ।       

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© ® सुश्री इंदु सिंह ‘इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)
जून १५, २०१९

शुक्रवार, 14 जून 2019

सुर-२०१९-१६४ : #रक्त_न_करे_कभी_भेदभाव #वक्ते_जरूरत_बचाये_सबकी_जान




आये दिन कुछ ऐसा देखने में आता जो दर्शाता कि जिस तरह कुदरत ने सबको समान रूप से जमीन, आसमान, सूरज, चांद, बारिश और हर एक शय बिना किसी भेदभाव के दी उसी तरह उस परमपिता परमेश्वर ने भी सबके भीतर दौड़ने-भागने वाले लहू के रंग में भी कोई भेदभाव नहीं किया केवल उनका वर्ग अलग हो सकता फितरत सबकी मगर, एक सी हो होती उसके बिना शरीर की कार्यप्रणाली संचालित नहीं होती इसलिये ये नसों के द्वारा लोगों को जोड़ने का काम करता है

जिसकी बानगी किसी भी दृश्य में नजर आ सकती है

दृश्य - ०१ : रक्तदान शिविर में बड़ी हलचल थी बड़ी संख्या में युवा रक्तदान करने आये थे जिसे जमा कर के रखा जा रहा था और आश्चर्य की बात की बाहर से अलग-अलग समाज, समुदाय व धर्म को मानने वालों का खून एक ही समूह होने के कारण एक ही पैकेट में रखा जा रहा था जिसमें कोई भी भेदभाव नजर नहीं आ रहा था और न ही कभी खून की आवश्यकता होने पर किसी ने ऐसी मांग रखी कि उसे उसी व्यक्ति का रक्त चाहिये जो उसके मज़हब से संबंध रखता हो और ये कोई नई बात नहीं सभी जानते कि सबके शरीर एक समान पंचतत्वों से बने जिसको बनाने वाला भी वही एक है जो ऊपर बैठा फिर भी लोग अपने-अपने समुदाय के लिये लड़ाई-झगड़ा करते ऐसे में रगों में दौड़ने वाला लहू ही है जो उनको धर्म निरपेक्षता व अमन का पाठ पढ़ा सकता है ।

दृश्य - ०२ : यदि रक्तदान दिवस पर मानवीयता के लिये अपने रक्त का खुशी-खुशी दान करने वाला कोई ऐसी शर्त रख दे कि ये उसी व्यक्ति को दिया जाये जो सभी धर्मों का सम्मान करता हो, सबको इंसान समझता हो और जिसकी नजरों में किसी तरह का कोई भेदभाव न हो क्योंकि, कभी-कभी ऐसी स्थिति भी आती जब किसी अमीर को किसी गरीब का रक्त दिया जाता जो उसकी जान बचाता पर, उसे ये अहसास नहीं दिलाता कि भले, उसने पैसों के दम पर खून का इंतज़ाम कर लिया हो मगर, अब उसके भीतर जो बह रहा वो कम से कम उसके भीतर ये भाव तो जगा ही सकता कि उसने जिसे इंसान नहीं खुद से कमतर माना और हमेशा उसी दृष्टि से देखा लेकिन, आज जरूरत के समय वही काम आया तो ये ख्याल ही उसके भीतर समता का नजरिया सृजित कर सकता है ।

दृश्य - ०३ : लहू तो नफरतों को भी खत्म करने का काम करता अलग-अलग धर्म के दो लोग जो आपस में एक-दूसरे को नापसन्द करते हो यहां तक कि एक-दूसरे की शक्ल तक देखना पसंद नहीं करते हो पर, अनजाने में कभी ऐसा हो जाता जबकि, उन दोनों को आवश्यकता पड़ने पर एक-दूसरे का रक्त दिया जाता और जब इस बात का खुलासा होता तो जो कभी सूरत देखना तक गंवारा नहीं करते थे अब साथ बैठकर खाते-पीते और दोस्ताना निभाते है याने कि खून ही ऐसा जो लोगों को इस तरह से खून के रिश्तों में बांध सकता है ऐसी तासीर सबकी कहाँ क्योंकि, यही जिसकी जरूरत अमूमन सबको कभी-न-कभी तो जरूर ही होती है तब ये अपनी इस अनेकता में एकता वाली विशेषता का प्रदर्शन करता है ।

एक ‘रक्त’ ही है जिसमें इतनी खासियत होती कि वो व्यक्ति को इंसान बनाकर उसके भीतर इंसानियत जगा सकता है इसलिए ‘रक्तदान दिवस’ ही नहीं मनाना बल्कि, इसके गुढ़ सन्देशों को भी समझना है जो हमारे अंदर बहता हुआ रक्त हमसे हरदम कहता है कि

सबके भीतर मैं ही समाया
मैंने ही हर सोये अंग को जगाया,
समझो मेरी तासीर दोस्तों
भेदभाव की तोड़कर दीवारें सारी
मैंने सबको एक बनाया ।।

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© ® सुश्री इंदु सिंह ‘इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)
जून १४, २०१९


गुरुवार, 13 जून 2019

सुर-२०१९-१६३ : #एक_मुहिम_इंसानियत_के_नाम #न_देखे_अपराधी_की_जात_और_पात



पीड़िता व अपराधी का वर्गीकरण रोकने मातृशक्ति द्वारा ज्ञापन दिया गया

वर्तमान में सोशल मीडिया खबरों का एक सशक्त माध्यम हैं जो कि सत्ता परिवर्तन तक में अहम भूमिका निभा रहा है और इस पर सकारात्मक ही नहीं नकारात्मक तरीके से भी समाचारों को वायरल किया जा रहा हैं । कुछ दिनों से तो एक नया ट्रेंड देखने में आ रहा जहां एक तरफ बच्चियों के साथ होने वाली दरिंदगी से समस्त समाज वर्ग विशेष तौर पर मातृशक्ति आहत है । वहीं दूसरी तरफ ऐसा भी कुछ घटित हो रहा है जो देश को एक बार पुनः दो वर्गों में बांटने की साज़िश की तरफ संकेत कर रहा है जिस पर सभी ने गौर किया होगा लेकिन, इसके दुष्परिणामों पर विचार नहीं किया होगा । सोशल मीडिया पर कुछ षड्यंत्रकारी पीड़ित बच्चियों का धर्म देखकर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे यदि वो ‘हिन्दू वर्ग’ से सम्बन्धित है तो ‘मुस्लिम समुदाय’ और यदि ‘मुस्लिम समाज’ से जुड़ी है तो ‘हिन्दू वर्ग’ के द्वारा अपनी पोस्ट के माध्यम से उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है । ये देखते हुए मेरे गृहनगर नरसिंहपुर जिले की जागरूक नारी शक्ति ने ये निर्णय लिया कि इसके खिलाफ मोर्चा बुलन्द किया जाये अन्यथा किसी दिन गृहयुद्ध की स्थिति निर्मित हो सकती है । इस उद्देश्य से गाडरवारा की समाज सेविका आश्रिता पाठक, महिला पतंजलि योग समिति की तहसील प्रभारी के रूप में स्वयं मैं सुश्री इंदु सिंह और मेरी सहयोगी तहसील महामंत्री श्रीमती मंजू श्रीवास्तव, कोषाध्यक्ष श्रीमती सुनीता राजपूत, योग शिक्षिका भारती कौरव तथा अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं में बाबू भाई पटेल, शशिकांत मिश्रा, श्रीमती भागवती, प्रीति रैकवार व एक नन्ही-सी बच्ची ‘सौम्या धुर्वे’ ने जिले के ‘कलेक्टर महोदय’ व ‘पुलिस अधीक्षक’ को इस संबंध में संज्ञान लेते हुये कानूनी कार्यवाही करने हेतु एक ज्ञापन सौंपा ।

मैं उम्मीद करती हूँ कि हम सभी अपने-अपने शहरों में इस तरह का अभियान चलाये और मानवीयता की अलख जगाये क्योंकि, बच्चियां किसी समुदाय विशेष की नहीं सबकी सांझी होती जो अब स्वार्थ पूर्ति हेतु राजनीति का मोहरा बनाई जा रही इसे रोकने का एकमात्र तरीका जागरूकता फैलाना है जिससे कि वे लोग जो अब तक इससे अपरिचित वे भी समझे कि देश में ऐसी मानसिकता भी पनप रही जो अपराधियों को धर्म या मजहब के नाम पर प्रश्रय दे रही इससे तो उनके हौंसले बढ़ेंगे जिसे अब तोड़ने ही नहीं समूल नष्ट करने का वक़्त आ गया है यदि इस घटिया साजिश पर अभी लगाम नहीं लगाई गयी तो भविष्य में स्थितियां बेहद भयावह होंगी क्योंकि, लोगों को पीड़िता को न्याय मिलने से अधिक अपराधी से सहानुभूति होती जो समाज के लिये घातक है । इस तरह से हम जमीनी स्तर पर भी अपनी सोच को विस्तार दे पायेंगे जो कि लिखने से अधिक कारगर होगा और इसका जितना अधिक प्रचार-प्रसार होगा उतना ही ये अपने उद्देश्य में सफल होगा । बहुत-सी समस्यायें ऐसी होती जो शुरुआत में हमें इतनी मुश्किल प्रतीत नहीं होती हम ये सोचकर चलते कि सब कुछ हमारे हाथ में जब चाहे इस पर नियंत्रण कर लेंगे लेकिन, एक दिन पाते कि वो ररक्तबीज की तरह असाध्य बन चुकी होती है । हमारे इतिहास में भी ऐसी अनेकानेक घटनाओं का उल्लेख फिर भी हमें है कि जब तक पानी सर के उपर से न गुजर जाये सचेत नहीं होते जिसका नतीजा कि भले हम खुद को बचा ले मगर, संवेदनाओं को खो देते फिर हादसे भी हमें उतने खौफनाक नहीं लगते है । यदि इसी तरह से ये सब चलता रहा तो इसे देखते-सुनते हम इसके इतने अभ्यस्त हो जायेंगे कि फिर कोई घटना, कोई भी अपराध हमें उस तरह से आक्रोशित नहीं करेगा जैसा कि प्रारंभ में कर रहा था । हमने ये प्रयास किया जिसका मीडिया में भी सकारात्मक प्रतिसाद मिला तो लगा कि नेक काम में सब सहयोगी बनते केवल, आगे आने की जरूरत है ।

अपनी संवेदनाओं को बचाने, मरती इंसानियत को जिलाने और राष्ट्र को पुनः धर्म या मजहब के आधार पर बाँटने से बचाने का यही एक तरीका कि हम ऐसी हर एक घटना पर केवल लिखे या बोले नहीं कोई सकारात्मक कदम भी उठाये भले उसका उतना प्रभाव नहीं पड़े जैसा हमें अपेक्षित लेकिन, ये छोटे-छोटे वार ही एक दिन असंभव लगने वाली नफरत की दीवार को ढहायेंगे ये विश्वास ही हमें कामयाबी दिलायेगा... तो सब जहाँ हैं वहीं से एक कदम बढाये मंजिल खुद चलकर हमारे पास आ जायेगी क्योंकि, आरम्भ ही जीत का मन्त्र है ।

#कानून_ले_संज्ञान_अपराधी_न_हिन्दू_न_मुसलमान
#सोशल_मीडिया_को_बनाओ_हथियार_भेदभाव_पर_करो_वार        
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© ® सुश्री इंदु सिंह ‘इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)
जून १३, २०१९

बुधवार, 12 जून 2019

सुर-२०१९-१६३ : #जब_तक_गरीबी_रहेगी #बालश्रम_की_मजबूरी_भी_होगी



आज ‘विश्व बालश्रम निषेध दिवस’ जिसका उद्देश्य बच्चों से जबरन काम कराने से रोकना एवं उनको अपने बचपन को जीने का नैसर्गिक हक दिलाना है क्योंकि, इन नन्हे-नन्हे फूलों से ही तो देश का चमन गुलज़ार और आगे चलकर इन्हें ही तो इस देश की बागडोर सम्भालना है तो जब तक उनकी नींव मजबूत न होगी उनको शिक्षा व सभी सुविधायें हासिल न होगी वे किस तरह से इस जिम्मेदार को उठा पायेंगे लेकिन, तमाम कानूनों व सरकार की नीतियों के बाद भी अपेक्षित परिणाम नहीं मिल रहे क्यों ???

यदि इस सवाल का जवाब खोजे तो ज्ञात होता कि सरकार के ये सारे प्रयास भी मिलकर गरीबी के दैत्य से लड़ नहीं पा रहे आज़ादी के 72 बरसों बाद भी गरीबी हटाओ के भरपूर नारों के साथ भी देश में गरीब थे और आज भी है तथा कल भी रहेंगे कि जिस दिन ये गरीबी समाप्त हमारे राजनेता फिर किसे लुभायेंगे किसकी बिसात पर अपनी दुकान जमायेंगे इससे बेहतर उनके पास दूसरा विकल्प नहीं ऐसे में किस तरह से हम ये कल्पना कर सकते कि एक दिन अवश्य गरीबी खत्म होगी और जब गरीबी है बचपन भी मजदूरी करने को अभिशप्त रहेगा कि बच्चों द्वारा काम किये जाने की सबसे महत्वपूर्ण वजह ‘गरीबी’ ही है

कोई माता-पिता ये नहीं चाहते कि उनकी सन्तान पढ़ने-लिखने की उम्र में कलम की जगह बोझ उठाये या किसी के घर पर झाड़ू-पौंछा लगाये या किसी के बर्तन धोये या फिर किसी दुकान पर छोटू बनकर मालिक का हुकुम बजाये ये तो उनके हालत या मजबूरियां होती जो वे अपने बच्चों को वक़्त से पहले ही जिम्मेदारी के उस चक्र में फंसा देते जो आजीवन घूमता रहता और इसमें फंसने वाला अभिमन्यु की तरह इससे बाहर निकलने का मार्ग नहीं जानता और इसे ही अपनी नियति समझकर इसके समक्ष घुटने टेक देता कुछ ऐसे भी होते जो ऐसी परिस्थति में भी अपने जीवन को संवार लेते और इन चुनौतियों को स्वीकार कर अपने आत्मबल के दम पर अपने जीवन की दिशा मोड़ लेते है

इस तरह के आर्थिक अभाव की वजह से चंद अपराध की अँधेरी गलियों में भी फिसल जाते जहाँ उनका हर तरह से शोषण किया जाता जो उन्हें शातिर अपराधी में बदल देता ऐसे में सरकार को चाहिये कि बालश्रम की जड़ पर प्रहार करें न कि कानून बनाकर निश्चिन्त रहे कि इसके भय से लोग बच्चों को अपने यहाँ काम पर न रखेंगे बल्कि, वे तो खुद अपना पैसा बचाना चाहते इसलिये बच्चों को ही काम पर रखते ताकि, उन्हें अधिक मेहनताना न देना पड़े ऐसे में जागरूकता व दिवस के बाद भी बड़े-बड़े घर हो या कारखाने या होटल्स या दुकानें या फिर कोई भी संस्थान आपको ज्यादातर बच्चे की काम करते दिखाई देंगे कि इनसे काम करवाना, इन पर शासन करना तथा इन पर विश्वास करना आसान होता है

 ऐसे में इस दिवस को सार्थकता देने केवल सरकार के भरोसे बैठे रहना हमारी भी गलती है अतः हमें बच्चों को न केवल इससे बचना है बल्कि, ऐसे प्रयास भी करना है कोई मजबूरी या हालात किसी पालक को इतना विवश न कर दे कि अपने जिगर के टुकड़े को छाँव देने की जगह कड़ी धूप में घर से बाहर निकालना पड़े तो उनकी आर्थिक सहायता के लिये उन्हें ऐसी सरकारी योजनाओं व एन.जी.ओ. से परिचित करवाना है जिसकी मदद से वे निश्चिंत होकर बच्चों को स्कूल भेज सकें न कि इस चिंता में घुलते रहे कि कल भोजन मिलेगा या नहीं हालाँकि, सरकार हर तरह से उनकी सहायता कर रही फिर भी स्थिति में यदि सुधार नहीं हो तो जिम्मेदार हम सब ही है  
        
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© ® सुश्री इंदु सिंह ‘इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)
जून १२, २०१९