शनिवार, 6 मई 2017

सुर-२०१७-१२६ : ‘कुलभूषण जाधव’ तुम मरो, हम फिल्म बनायेंगे तुम्हारी शहादत को सब मिलकर श्रद्दांजली देंगे...!!!

साथियों... नमस्कार...


ज्यादा दिन नहीं हुये अभी १० अप्रैल २०१७ की ही बात हैं जब भारतीय नागरिक ‘कुलभूषण जाधव’ को पाकिस्तान की सैन्य अदालत ने मौत की सजा सुनाई जिसका विरोध या प्रतिक्रिया हमारे देश में उतनी तीखी नहीं दिखाई दी जितनी कि किसी पाकिस्तानी कलाकार को बैन करने या फिर फिर किसी आतंकी को फांसी की सजा दिये जाने पर होता कि लोग संविधान से मिले अपने नागरिक अधिकारों या मानवाधिकार की दुहाई देते हुये उसके पक्ष में खड़े हो जाते यूँ लगता कि मानो इन्होने ‘राहत फ़तेह अली खान’ या ‘अतिफ़ असलम’ के गाने और ‘गुलाम अली’ की गाई गजलें न सुनी या फिर वहां के अभिनेता या अभिनेत्रियों को फिल्मों में न देखा तो उनका जन्म बेकार हो जायेगा । यदि हमारे कानून के अनुसार किसी पाकिस्तानी आतंकवादी को जिसका कि गुनाह भी सिद्ध हो चुका हैं यदि सज़ा-ए-मौत दी गयी तो देश से मानवता ही खत्म हो जायेगी तो इंसानियत के सारे ठेकेदार केंडल्स लेकर निकल पड़ते उस पर भी उन्हें लगता कि वे अपनी बात को सरकार तक पहुंचा नहीं पा रहे तो दया याचिका लगा उसकी फांसी को रोकने जुट जाते फिर भले ही रात को भी अदालत को खोलने पड़े तो कोई बात नहीं लेकिन किसी पाकिस्तानी की मौत न हो जाये इस बात की इतनी फिकर रहती कि हर हद पार कर देते चाहे फिर अपने ही देश के कानून को कोसना हो या अपनी ही सरकार पर तोहमतें लगाना हो या फिर अपनों की ही कमियों को उजागर करना हो मतलब कि हर हथकंडे अपनाकर ये कोशिश की जाती कि जो कुछ भी वे चाहते उसे मान लिया जाये ।

यही वजह कि पकिस्तान की अपनी हरकतों से बाज न आने के बावजूद भी यहाँ के लोगों का उनके कलाकारों के प्रति मोहभंग नहीं हुआ आये दिन कई लोगों को पढ़ती रहती जो कि कभी ‘सूफ़ी संगीत’ तो कभी ‘गुलाम अली’ की मखमली आवज़ तो कभी ‘राहत फ़तेह अली खान’ या ‘अतिफ असलम’ के गानों को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ बताते और उनके अभिनेता या अभिनेत्रियों की अदाकारी की हिमायत करते कि उन पर पाबंदी लगाना कला का अपमान हैं या कलाकारों को राजनीती से अलग रखा जाये और भी कई तरह के कु-तर्क उनके तरकश में होती जिसे वे आये दिन छोड़ते रहते उस वक़्त उनके जेहन में महज़ अपना इंद्रिय सुख या अपनी ख़ुशी ही सर्वोपरि होती । देश या देशभक्ति उनके उस कला प्रेम के आगे तिरोहित हो जाते कि यदि उन्होंने सूफी संगीत या उनके फनकारों का न सुना तो शायद, उनकी सांसें ही न चलेंगी तो कई तरह के कुतर्कों की आड़ लेकर वे अपने मन की बात कहते इसके लिये यदि उन्हें ‘राष्ट्रद्रोही’ भी कहलाना पड़े या अपने तिरंगे का अपमान भी सहना पड़े तो उनको कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनके लिये वो ज्यादा जरुरी लेकिन हमारा तो ये सोचना कि बात जब देश की हो तो फिर पकिस्तान में अमृत भी बाँट रहा हो तो हमारे लिये विष समान हैं कि हमने बचपन से ही पढ़ा कि “आवत ही हरषे नहीं, नैनन नहीं सनेह, तुलसी तहां न जाइए कंचन बरसे मेह” तो फिर उनकी आयातित वस्तुओं से इतना प्रेम क्यों ? ये कैसा मानवाधिकार ?? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ??

जिससे अपने ही वतन को हम आहत करें और अपनों को ही चोट पहुंचाये ऐसी जगह तो हमें सीना ठोककर कहना चाहिये कि कोई फर्क नहीं पड़ेगा यदि हम ‘गुलाम अली’ को न सुने या ‘राहत’ और ‘अतिफ’ यहाँ गाने नहीं आये वैसे भी उनकी वजह से हमारे प्रतिभाशाली गायक/गायिकाओं को काम नहीं मिलता तो इस तरह हम अपने देश की प्रतिभा को ही नुकसान पहंचाते याने कि इस तरह की बयानबाजी या हरकतों से पाकिस्तान को तो वाह-वाही मिलती पर, हमारी भारतमाता का सीना जरूरी छलनी हो जाता हमारे तिरंगे को तुम्हें पनाह देने में जरुर शर्म आती और ये धरती माता भी ऐसे गद्दारों को झेलने पर शर्मिंदा होती फिर भी माँ हैं तो सह ही लेती लेकिन ये गुस्ताख बच्चे अपनी नाफरमाबरदारी से बाज नहीं आते क्योंकि उन्हें तो खुद को बड़ा दरियादिल बताना या वो क्या बोलते सेक्युलर कहलाना पसंद तो जब भी ऐसा कोई मामला सामने आये आप उनका पलड़ा पाकिस्तानियों की तरफ ही झुकते देखेंगे । तभी तो उनके द्वारा दिये गये ६० दिन को यदि गिना जाये तो १० अप्रैल से आज ६ मई तक २६ दिन हो गये लेकिन सब ख़ामोश जबकि वहां तो फांसी की सजा ही नहीं दिवस भी निर्धारित कर दिये गये जिसमें से २६ तो निकल ही गये जो बचे वो भी गुज़र ही जायेंगे क्योंकि वहां हमारी तरह कोई वकील थोड़े जो रातों को कोर्ट खुलवाये और न ही ऐसे स्टूडेंट्स जो पाकिस्तान तेरे टुकड़े होने इंशाल्लाह... इंसाअल्लाह... चिल्लाये और न ही ऐसे मानवाधिकार संगठन जो मानवता की दुहाई दे ये केवल यही संभव उसके बाद भी लोग इसे अ-सहिंष्णु कहते क्यों न कहे क्योंकि वो इनकी बदतमीजी पर इन्हें सज़ा देने की बजाय सिर्फ नसीहत ही देता जबकि वहां तो साफ़ निर्देश दिये गये कि जो भी वकील उसके पक्ष में लड़ेगा उसे बर्खास्त कर दिया जायेगा उसकी बार सदस्यता समाप्त कर दी जायेगी और यहाँ तो ऐसे वकील सेलेब्रिटी बन जाते जो आतंकियों का केस लड़ते ।

भारत में तो जघन्य अपराध करने पर तमाम सुबूतों के मद्देनजर फांसी की सजा दिये जाने पर भी लोगों के दिल पिघल जाते और वहां अपराधी सहित सुबूत भी नकली बना सजा दी जाती तब भी किसी की मज़ाल नहीं कि अपने देश या कानून का विरोध कर सके न ही ऐसे ही समाज सेवी संगठन जिनके कलेजे में दर्द हो क्योंकि बात जब ‘भारत’ की हो तो उनके यहाँ सब एकमत हो जाते इसलिये तो वे इतनी बर्बरता से हमारे सैनिकों के सर काटकर ले जाते या हमारे देश के बारे में जो चाहे कहते जबकि हमारे यहाँ अपनी ढपली, अपने राग शुरू हो जाते क्योंकि धर्मनिरपेक्षता, कौमी एकता का ठेका इन्होने ही तो ले रखा यदि ये चाहे तो जिस सोशल मीडिया से ये उनके पक्ष में पुरजोर गुहार लगाते उसी से अपने देश के लिये भी तो अपील कर सकते पर, वहां उन्हें मामला सिर्फ और सिर्फ सरकार का लगता कि वही जाने जो करना । लेकिन आप किसी पाकिस्तानी कलाकार को प्रतिबंधित कर के तो देखो ये भूल जायेंगे कि ये इसी मिटटी की सन्तान ऐसी-ऐसी बातें अपनी सरकार व देश के खिलाफ़ लिखेंगे कि उस वक़्त उनको ये भी याद न रहेगा कि ये अपने आपको ही नीचा दिखा रहे क्योंकि इनके शब्दकोश में देश, देशप्रेम, कर्तव्य सब इनके अनुसार ही परिभाषित जो भारतीय संविधान से मेल नहीं खाता उस पर तुर्रा ये कि कोई इन्हें आईना न दिखाये वरना उसे तो फोड़ेंगे ही दिखाने वाले को भी कहीं का न छोड़ेंगे यकीन न हो तो सोशल मीडिया पर ऐसे किसी तथाकथित मानवतावादी को छेड़कर तो देखें दुम दबाकर न भागे तो कहना कि देश में अमन इनकी ही वजह से तो कायम ।                     
  
ये सब ‘कुलभूषण जाधव’ के बारे में तब आवाज़ उठायेंगे जब उनको फांसी दे दी जाये क्योंकि सरकार के खिलाफ कुछ कहने या लिखने का कोई भी मौका ये नहीं गंवाते और मीडिया भी चुप कि वो तो लोगों की स्मृति से परिचित ही कि कितनी कमजोर याददाश्त हमारी तो वो भी दूसरी बातो को हाईलाइट कर रहे ऐसे में वो दिन दूर नहीं जबकि अनहोनी हो जाये वैसे तो एक शंका ये भी व्यक्त की जा रही कि ‘कुलभूषण’ जीवित ही नहीं तो सच तो सामने आने से रहा जब तक कि उधर से कोई खबर न आये और वे तो झूठे प्रमाणों के जरिये उन्हें जासूस ही नहीं ‘रेम्बो’ साबित कर ही चुके तो फिर उनको मनमानी से रोकने की जितनी भी कोशिशें की जाये वे न टलेंगे जबकि पर्दे के पीछे की सच्चाई ये कि बलूचिस्तान का भारत की तरफ झुकाव देखते हुये ही ये झूठा प्रकरण बनाया गया और ३ मार्च २०१६ की गिरफतारी के बाद आनन-फ़ानन में १० अप्रैल को ही उनके केस का फैसला कर दिया गया और यहाँ तो सालों-साल आतंकियों को पाला जाता उसके बाद भी बहुत एहतियात बरतते हुये फांसी दी जाती कि उन्हें पता उनके अपने लोग उनके विरुद्ध जबकि वो सीना ठोककर गलत काम करते और इस बार भी ये आशंका कि ‘सरबजीत’ की ही तरह उनका अंजाम होगा और हम लोग उन पर फिल्म बनाकर उन्हें श्रद्धांजलि देंगे कि ये ज्यादा आसान... दुखद हो या कष्टपूर्ण लेकिन एक सच हैं ये भी... :( :( :( !!!      
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© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)

०६ मई २०१७

शुक्रवार, 5 मई 2017

सुर-२०१७-१२३ : हंसते-हंसाते कार्टून्स कहे गहरी बात... कार्टूनिस्ट बनाये ऐसे कि लक्ष्य बेधे बाण...!!!

साथियों... नमस्कार...


देश-दुनिया में इतनी सारी समस्यायें हैं, इतने सारे विवादित मुद्दे और इतने तनावयुक्त मामले कि यदि उनको हल्के-फुल्के ढंग से पेश न किया जाये तो न जाने कितने प्रसंगों की वजह से जंग छिड़ जाये या फिर तनाव इतना बढ़ जाये कि फिर उसे नियंत्रण में ले पाना कठिन हो इसके अतिरिक्त किसी भी गंभीर बात को हास्यमय तरीके से प्रस्तुत करने या उन पर कोई तीखा कटाक्ष करने से सत्तासीन हुक्मरानों को भी उसकी आड़ में छोड़ा गया तीर जाकर सीधे हृदयस्थल में जाकर लगता और वे उसके मर्म को समझ जनता के मन की बात और समसामयिक मुद्दों पर लोगों की प्रतिक्रिया को समझ पाते इस तरह से ‘कार्टून’ ऐसे चित्र या रेखांकन होते जिनके माध्यम से किसी भी विषय को बड़े ही सहज-सरल ढंग से अभिव्यक्त किया जाता । यही वजह कि इसे भी एक पृथक पेशे के रूप में दर्जा दिया गया हैं और इसे चित्रित करने वाले ‘कार्टूनिस्ट’ के लिये अख़बार, पत्रिकाओं में अलग-से पोस्ट भी रखी जाती हैं और यदि कार्टूनिस्ट अपने काम में माहिर हो तो उसे मानदेय भी उसकी दक्षता के अनुसार दिया जाता यही वजह कि संपूर्ण विशव में आज का दिन इन कार्टूनिस्ट को ही समर्पित किया गया और ५ मई पूरी दुनिया में ‘वर्ल्ड कार्टूनिस्ट डे’ के रूप में मनाया जाता जो ये साबित करता कि इस विधा के महारथियों ने अपनी कलम से ऐसा कमाल किया कि इस जगत ने न केवल उसकी काबिलियत को स्वीकार किया बल्कि उसे झुककर सलाम किया और एक पूरा दिन उसके उस पूर्ण समर्पण से किये गये लोगों द्वारा सराहे गये कृतित्व को अर्पित किया कि उसकी कला को उसका हक़ व सम्मान प्राप्त हो क्योंकि कार्टून हमेशा सिर्फ हंसाते ही नहीं कभी-कभी किसी धर्म विशेष या संप्रदाय की भावना को चोट भी पहुँच देते तो आहत वर्ग के द्वारा उसकी जान पर खतरा मंडराता ऐसे में अपनी जान की परवाह किये बिना भी वो अपना कर्तव्य निभाता तो इस तरह इस दिन उसके इस जज्बे को भी श्रद्धांजलि देने का कार्य किया जाता...

कार्टूनिस्ट का काम आसान नहीं होता कि उसे महज़ चंद पंक्ति और रेखाओं के द्वारा ही अपनी बात को कहना होता जिससे कि उसमें छिपा हुआ बाण जाकर सीधा लक्ष्य पर लगे तो उसका बनाना भी सार्थक हो इसलिये जो भी इस काम में दक्ष होते अख़बार या पत्रिका वाले उसे हाथों-हाथ लेते और उन्हें पढ़ने वालों को भी उसमें छपे उन कार्टून्स का इंतजार रहता कुछ ऐसे ही विख्यात ‘कार्टूनिस्ट’ हमारे देश में भी हुये जिन्होंने अपने कार्टून्स के जरिये देश भर में हलचल पैदा की और उनकी प्रसिद्धि का आलम ऐसा था कि केवल उनके बनाये कार्टून को देखने के लिये ही लोग उस विशेष अख़बार या पत्रिका का इंतजार करते थे और उन्होंने अपने खुद के कुछ कार्टून कैरेक्टर भी निर्मित किये जो इतने लोकप्रिय हुये कि अब भी उनकी पहचान बने हुये जैसे कि आर. के. लक्ष्मण का ‘आम आदमी’, आबिद सुरती का ‘ढब्बू जी’ और प्राण के तो अनेक चरित्र हैं जैसे कि ‘चाचा चौधरी’, ‘रमन’,’ बिल्लू’, ‘पिंकी’, ‘चन्नी चाची’, ‘श्रीमतीजी’ आदि जिन्हें पढ़ने वालों की तादाद लाखों नहीं करोड़ो में होगी कि उन्होंने इन पात्रों को किसी आम व्यक्ति की तरह ही विकसित किया जिससे वो हर व्यक्ति से सीधे जुड़ सके तो इसका असर ये हुआ कि उनमें लोगों को अपने इर्द-गिर्द रने वाले लोग ही नजर आये और वे उनसे किसी दोस्त की तरह अटैच हो गये और फिर ये रिश्ता आजीवन बना रहा तो इस तरह से कार्टूनिस्ट का काम जो हमें सहज नजर आता हक़ीकत में मुश्किलों भरा कार्य भी होता कि उसकी किसी एक भी त्रुटि का उसे बहुत बड़ा खामियाज़ा भुगतना पड़ता जैसा कि हमने देखा कि एक कार्टूनिस्ट को उसके बनाये चित्र की वजह से कभी जान से मार डाला गया तो कभी केवल धमकी दी गयी तो कभी पकड़कर हवालात में बंद कर दिया गया कि उसकी चुभन को सामने वाला सहन न कर सका लेकिन इस तरह के हादसों ने उनके हौंसलों को टूटने न दिया यही वजह कि आज के दिन उन सबका ही स्मरण किया जाता...

संपूर्ण विश्व की बात करे तो ऐसे अनेक नाम सामने आयेंगे जिन्होंने एक कार्टूनिस्ट के तौर पर अभूतपूर्व ख्याति अर्जित की तो आज के दिन उन सबको ही उनके इस साहसपूर्वक किये गये कार्यों हेतु मन से नमन और सबको बहुत-बहुत शुभकामनायें कि वो इसी तरह कर्तव्य पथ पर यूँ ही लगन से आगे बढ़ते रहे और देश व् समाज को आईना दिखाते रहे... :) :) :) !!!

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© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)

०५ मई २०१७

गुरुवार, 4 मई 2017

सुर-२०१७-१२२ : “महिला सशक्तिकरण की प्रणेता : देवी सीता !!!”

साथियों... नमस्कार...


यूँ तो ‘सिया’ एक आध्यात्मिक पात्र हैं जिसे हम देवी मानकर पूजते और पुराणों के अनुसार उन्हें माता ‘लक्ष्मी’ का अवतार माना गया हैं जिन्होंने ‘त्रेता युग’ में जनम लिया लेकिन उनका ये जन्म भी उनकी ही तरह असाधारण था कि उन्होंने सीधे धरती माँ की कोख से पैदाइश लेकर सबको अचंभित कर दिया विदेह जनक मानो उन्हें पाकर धन्य हो गये जीवन में जो भी कमी थी वो पूरी हुई और मिथिला नरेश को उनकी संतान यूँ प्राप्त हुई इस तरह उन्होंने अपने जन्म से लेकर वापस भूमि में समाने तक के बीच में जो भी किया सब कुछ उनके व्यक्तित्व की तरह ही पहेली बना रहा कि उनके जन्म से कई मिथक जोड़ दिये गये जहाँ सबने उनका भूमिजा होना तो स्वीकार किया लेकिन उनके वास्तविक माता-पिता के रूप में मंदोदरी और रावण का उल्लेख किया जिसकी वजह से हमारे देश कई गाँव में ऐसी लोकगीत प्रचलित जिनका भावार्थ ये निकलता माँ सीता कहती हैं कि, “कैसे दूँ मैं श्राप कि रावण-मंदोदरी मेरे पिता-मात’ शायद, इसलिये रावण के इतने अत्याचार और जुल्म सहने के बाद भी वो उसे अभिशाप नहीं देती खैर, ये सत्य हो या नहीं इससे उनके चरित्र पर कोई आंच नहीं आती कि वे अपनी समर्थ से स्वयं प्रकट हुई इसलिये हम यदि धरती माता को ही उनकी माँ का दर्जा दे या फिर उन्हें पालने वाले राजा जनक और माता सुनयना को ये उनके पहेलीनुमा व्यक्तित्व को और भी अधिक रोचक बनाता और हम आश्चर्य से उनकी कथा पढ़ते या सुनते जाते कि किस तरह एक ‘स्त्री’ ने वसुधा को केवल माँ कहलाने ही नहीं बल्कि उसे महसूस करने का भी अभूतपूर्व अवसर दिया उनके गर्भ में खुद को स्थापित किया तो धरती भी उनकी इस कृपा से निहाल हो गयी और उन्होंने अपनी वो प्रिय संतान राजा जनक के हवाले कर दी कि उनके निसंतान होने का दुःख दूर हो जाये तो इस तरह जनक की पुत्री ‘जानकी’ या विदेहराज की बेटी ‘वैदेही’ की उत्पत्ति आज ही के दिन वैसाख शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को हुई हम सब राम नवमी तो बड़े धूम-धाम से मनाते लेकिन उनकी जयंती को बिसरा देते और वो तो हैं ही क्षमाशील तो हमारी इस गलती पर भी कभी ध्यान नहीं देती भले हम रोज उनकी पूजा न कर पाये लेकिन यदि हम उन्हें आज के दिन याद करे और जन्मदिन की बधाइयाँ दे तो क्या उन्हें भी ख़ुशी न होगी कि कलयुग में भी लोग उनसे प्रेरणा प्राप्त कर रहे क्योंकि स्त्री सशक्तिकरण की जैसी मिसाल उन्होंने दी वो तो आज भी देखने में नहीं आती...

एक बेटी और बहन के रूप में तो उन्होंने सुख के सिवाय कुछ न पाया लेकिन जब पत्नी बनी तब उनके जीवन का नया अध्याय ही नहीं शुरू हुआ बल्कि कहे कि उन्हें अपनी भूमिका निभाने का स्वर्णिम अवसर प्राप्त हुआ कि फूलों की शय्या पर सोने वाली और मखमली जमीनी पर चलने वाली उस कोमलांगी कन्या को अपने हर भोगे गये सुख के विपरीत जाकर वो अँधियारा पक्ष भी न सिर्फ देखना पीडीए बल्कि उसे भोगना भी पड़ा जिसने उन्हें बेटी, नभन, पत्नी, माँ के दर्जे से भी ऊंचा ‘देवी’ का दर्जा दिलवाया कि उन्होंने इन विपरीत परिस्थितयों में न तो हार मानी और न ही पलायनवादी रवैया अपनाया और न ही कर्तव्य पथ से विमुख होने वाले विकल्पों को चुना जो उन्हें उपलब्ध थे उन्होंने हर एक सुख-सुविधा को ठुकराकर वो चुना जिसने उन्हें निखारा उन्होंने हर परीक्षा को चुनौती की तरह स्वीकार किया इसलिये राजमहल छोड़ वन जाने का निर्णय लिया जबकि सबने उन्हें रोका परंतु वे जानती थी कि यदि उनके अर्धांग वन में नंगे पांव घूमेंगे राक्षसों का सामना करेंगे तो वे मखमली शैया पर एक पल न सो पायेगी तो तुरंत राजसी वैभव, परिधान, जेवर सबको एक क्षण में त्याग भगवा चोला पहनकर राम के पीछे चल पड़ी और पर्णकुटी में रहकर रुखा-सुखा खाने से परहेज न किया बल्कि जंगली जानवरों और दानवों से भी न घबराई और जब रावन बलात अपहरण कर ले गया तो वहां भी उसके किसी अत्याचार से घुटने न टेके और अग्निपरीक्षा की स्थिति बनने पर भी न तो किसी को कोसा न कोई सवाल किया कि जब बात चरित्र की हो तो उसे शब्दों से नहीं कर्म से सत्य सिद्ध किया जाता तो बेझिझक प्रचंड आग में बैठ गयी और जब राम ने गर्भवती अवस्था में बिना बताये त्याग दिया तब भी अविचलित रही और एकाकी ही न केवल सन्तान को जनम दिया बल्कि उन्हें अच्छे संस्कार दिए न कि पिता के खिलाफ हथियार बनाया और इस तरह एकल पालक की वो पहली मिसाल बनी जो अनुकरणीय कि दोषारोपण किये बिना उन्होंने अपने जीवन को जिया लेकिन अंत में जब पुनः खुद को सिद्ध करने की बात आई तो उन्होंने फिर एक पल भी उस जगह या उन लोगों के मध्य रुकना गंवारा न किया और अपनी माँ को आवाज़ लगे तो धरती ने उनके लिये पट खोल दिए जिसमें वे समा तो गयी लेकिन अपने दृढ चरित्र से महिलाओं को स्वाभिमान से जीने के बेमिसाल मंत्र दे गयी...

ऐसी अद्भुत सशक्त नारी भूमिपुत्री जनकनंदिनी माँ सीता को प्रणाम और जयंती की सभी मित्रगनों को अनंत शुभकामनायें... :) :) :) !!!
                   
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© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)

०४ मई २०१७

बुधवार, 3 मई 2017

सुर-२०१७-१२१ : ‘सच’ को छिपाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन हैं.. ‘अंतर्राष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस’ का भी ये कहना हैं...!!!

साथियों... नमस्कार...


हमारी आज़ादी के इतने बरसों बाद भी अक्सर ये कहने-सुनने में आता हैं कि लगता ही नहीं कि हम आज़ाद हो गये या हम तो आज़ाद देश के गुलाम हैं या बस, शासक बदल गये और भी कई तरह के जुमले लोग आये दिन बोलते रहते ऐसे में आज के दिन याने कि ३ मई को १९९१ में यूनेस्को और संयुक्त राष्ट्र महासभा के 'जन सूचना विभाग' ने ये निर्णय लिया कि देश व समाज के हित को देखते हुये प्रेस को मुक्त रखने की आवश्यकता हैं ताकि वो निर्भय होकर सच्चाई जनता के सामने ला सके लेकिन साथी ही इस बात का भी ध्यान रखा गया कि वो एकदम निरंकुश भी न बने कि सरकार को ही गरियाने लगे इसलिये उसकी नकेल अपने हाथ में ही ले रखी तभी तो स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी अख़बारों या पत्रिकाओं में केवल वही छपता जितना कि पेश करने की इजाजत दी जाती तो उसकी निष्पक्षता ही नहीं उसकी आज़ादी पर भी संदेह उत्पन्न होता कि जब हम ७० सालों बाद भी खुद को कहीं न कहीं परतंत्र महसूस करते तब पत्रकारिता को तो स्वतंत्र हुये महज़ २६ साल ही हुये जो कि किसी भी दृष्टिकोण से परिपक्वता की निशानी न मानी जायेगी कि इस उम्र में तो खुद का ही होश नहीं होता लेकिन चूँकि बात ‘प्रेस’ की हैं तो वो तो वैसे भी बंदिशों के बीच अपनी बात रखती कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में कई तरह की बाधाएँ जो हैं साफ़ शब्दों में बोले तो होंठ तो खुले हुये मगर, जुबान सिल दी गयी फिर सिर्फ लबों को हिलाने मात्र से तो कोई ‘सच’ जान नहीं पायेगा कि इस भाषा में निपुण जो नहीं कोई और इस जुबान को केवल तब ही खोला जाता जब वो पूरी तरह से वही दोहराने तैयार होती जैसा कि उसे कहा जाये या लिखकर दिया जाये तो ऐसे पत्रकार खुलेआम निरंकुश घुमते लेकिन उनसे ‘सच’ की उम्मीद करना हमारे भोलेपन और अज्ञानता की पराकाष्ठा हैं जिसकी वजह से आज लोग न्यूज़ चैनल्स को कोस रहे कि वहां सब कुछ प्रायोजित परोसा जा रहा तो ये सोचने पर मजबूर करता कि आखिर, ये आज़ादी किस तरह की हैं???
         
भारत में संविधान के अनुच्‍छेद 19 (1 ए) में "भाषण और अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता के अधिकार" का उल्‍लेख है, लेकिन उसमें शब्‍द 'प्रेस' का ज़िक्र नहीं है, किंतु उप-खंड (2) के अंतर्गत इस अधिकार पर पाबंदियां लगाई गई हैं इसके अनुसार भारत की प्रभुसत्ता और अखंडता, राष्‍ट्र की सुरक्षा, विदेशों के साथ मैत्री संबंधों, सार्वजनिक व्‍यवस्‍था, शालीनता और नैतिकता के संरक्षण, न्‍यायालय की अवमानना, बदनामी या अपराध के लिए उकसाने जैसे मामलों में अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता पर पाबंदियां लगाई जा सकती हैं जो स्वतः ही प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रश्नचिन्ह लगाता कि उसे कोल्हू के बैल की तरह एक सीमित दायरे में ही घूमने की इजाज़त उस पर घोड़े की तरह उसकी आँख पर शिकंजा भी कसा कि वो केवल वही देखे जो उसे दिखाया जा रहा अपनी आँखों को अतिरिक्त कष्ट देने की जरूरत नहीं और यदि कोशिश की गयी तो फिर अंजाम के जिम्मेदार वे स्वयं होंगे तो जान ऐसी चीज़ जिसे यूँ ही तो ‘सच’ जैसी अदृश्य शय के लिये लुटाया नहीं जा सकता फिर भी सलाम के पात्र हैं वे सभी पत्रकार जो हर कष्ट और मुश्किलों का सामना कर के सात पर्दों या पाताल में दबी हुई सच्चाई को भी सबके सामने लाकर रहते कि उन्होंने इस पेशे को अपनी बेहतरी या लक्जरी लाइफ जीने के लिये नहीं चुना बल्कि काँटों से भरे पथ और पत्थर के सिरहाने पर सर रख कंकरीली धरती पर सोकर भी ‘सत्यमेव जयते’ को चरितार्थ करने का संकल्प लेकर इस क्षेत्र का चुनाव किया और ऐसे में यदि उन्हें किसी कठिन परिस्थितिवश सितारों के बीच भी अपना मुकाम बनाना पड़े तो मलाल नहीं होता कि वो आकाश में तारे की तरह चमक कर भी आँखे के अंधे हमपेशा लोगों की राह रोशन करते कि शायद कभी वे भी अपने दयुत्व को समझ पाये और नामुमकिन को मुमकिन बना दे...

'अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस' प्रेस की स्वतंत्रता का मूल्यांकन, प्रेस की स्वतंत्रता पर बाहरी तत्वों के हमले से बचाव और प्रेस की सेवा करते हुए दिवंगत हुए संवाददाताओं को श्रद्धांजलि देने का भी दिन है तो उन सभी के प्रति जयहिंद का घोष करते हुए सभी कर्मरत पत्रकारों को आज के दिन की बहुत-बहुत बधाई और शुभकामना कि वे अपना कर्तव्य न भूले और हक़ीकत को हर हाल में जनता तक लाये जिसमें यदि उसे उसके साथ क जरूरत भी पड़े तो वो उसके हौंसले मजबूत करने उसके पक्ष में खड़ी दिखाई देगी बस, उसे अपना कार्य पूर्ण ईमानदारी से करना हैं, बाकी हिम्मत तो ‘सच’ से मिल ही जाएगी... :) :) :) !!!     
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© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)

०३ मई २०१७

सोमवार, 1 मई 2017

सुर-१२१ : “एक मजदूर की कलम से...!!!"

साथियों... नमस्कार...


श्रमिक अपने श्रम कणों से इमारतों और अपनी बनाई कलाकृतियों पर लिखता है अपने श्रम की कहानी जिसे पढ़ना आसान नहीं कि हम महज़ उसे बनवाने वाले को याद रखते इतिहास में उसका नाम दर्ज करते लेकिन उसके निर्माण में जिसने खून-पसीना बहाया हाड़-तोड़ मेहनत से उसे बनाया उसका कहीं जिक्र तक नहीं होता...

उसे तो ये भी ज्ञात नहीं कि उसके नाम पर पूरा एक दिन समर्पित किया गया हैं और इल्म हो भी तो क्या फर्क पड़ता हैं उसे तो आज भी परिश्रम कर के अपने पेट की आग को बुझाने की व्यवस्था करनी हैं ये आग ही तो हैं जिसकी वजह से सब कर्म भट्टी में सतत जुटे रहते और दाना-पानी से उसे बुझाते जो पुनः जल उठकर हमें कर्मरत रखती....  

ऐसे में उस श्रमिक के पास नहीं वक़्त कि वो लिखे किस्से-कहानी या कविता-आलेख ये तो कलमकारों का काम जो उसके लिये लिखते उसको सुनते-समझते फिर भी यदि कोई मजदूर यदि कुदाली की जगह कलम उठा ले और लिखना चाहे अपने मन के जज्बात तो शायद, वो कुछ इस तरह के होंगे...

••∙.........
संघर्षों ने प्यार से मुझको पाला हैं ।
पांव नहीं सीने में मेरे छाला हैं ॥

छाया हो या धूप न परवाह करते हैं ।
जीना पीकर जब अश्कों की हाला हैं ॥

गर्दिश के कांटे न मुझको चुभते हैं ।
हाथ में मेरे भरा दर्द का प्याला हैं ॥

बाजारों के झूठ से बचकर चलते हैं ।
पड़ा सुखों पर मज़बूरी का ताला हैं ॥

साधन कम हो पर न रोते रहते हैं ।
दीवारों पर लगा दुखों का जाला हैं ॥

होंठों पर मुस्कान सजाये रहते हैं ।
जलने वालों का हुआ मुंह काला हैं ॥

फूलों से दामन बचाकर चलते हैं ।
पहनी हुई गले में कंटक माला हैं ॥

मुश्किल के आगे कभी नहीं झुकते हैं ।
नहीं सलीब काँधे पर मेरे भाला हैं ॥

कोई प्रसाधन हो न हमको जंचते हैं ।
छाया मुख पर मेहनत का उजाला हैं ॥ 

हाल कोई हो सर उठाकर जीते हैं ।
जीवन हमको मिला बहुत निराला हैं ॥
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अथक श्रम से निर्मित उसके मनोभावों को समझ पाना या उसे पन्नों पर दर्ज कर पाना संभव नहीं कि उसमें आँसूं ही नहीं रक्त की लालिमा भी शामिल और वो अनकहा दर्द और दबी हुई इच्छायें भी जिन्हें पूरी करने की चाहत में उसने अपना आप मिटा दिया और जब कभी उसकी संतान ने कलम पकड़ी तो उसे अपने अनपढ़ होने का कोई दुःख न रहा... यही तो उसका एकमात्र ख्वाब या ध्येय होता कि भले मैं निर्धन और मजदूर बना लेकिन मेरे बच्चे ऐसे न बने अपने हाथों से मैं उनका भाग्य लिखूं और जुट जाता दिन-रात उस दिन की आस में जो बड़ी मुश्किल से आता और तब वो अपनी हर तकलीफ भूल जाता और यही इस दिन पर उनके लिये शुभकामना कि वे भले मजदूर बने पर, उनके बच्चे न मजबूर बने... :) :) :) !!!
   
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© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)

०१ मई २०१७

रविवार, 30 अप्रैल 2017

सुर-२०१७-१२० : "एक रिश्ता... आसमानी..."

साथियों... नमस्कार...

“एक रिश्ता आसमानी...!!!”
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यूँ ही
टहलते-टहलते
सागर किनारे
एकाएक थम गये कदम
तुम्हारी यादों संग...

सोचा...
रेत पर लिख दूँ
नाम तुम्हारा
पर, तभी देखा
बिखरता हुआ घरोंदा
तो फिसलते कण मिटा गये
मन में उठते शब्द

सोचा...
पानी पर लिख दूँ
नाम तुम्हारा
मगर, उठती-गिरती
बनती-बिगड़ती
आती-जाती समंदर की लहरें
संग बह ले गयी ये ख्याल

फिर सोचा...
हवा पर लिख दूँ
नाम तुम्हारा
तभी आया एक तेज झोंका
जो साथ अपने उड़ा गया
मन में उठता ये विचार

सोचते-सोचते...
मिल ही गयी वो जगह
जहां लिखे नाम न मिटते कभी
तो फिर रूह पर लिख दिया
प्यार से नाम तुम्हारा
और जन्मों-जन्मों तक बांध लिया
अमर प्रेम का ये नाता हमारा

इस तरह...
इक ख्याल ने
रेत से रूह और...
जमीं से आसमां तक का
अंतहीन सफर यूँ पूरा किया
इक रिश्ता आसमानी बना दिया ।।
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© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)

३० अप्रैल २०१७

शनिवार, 29 अप्रैल 2017

सुर-२०१७-११९ : “भारतीय नृत्य : कहीं हो न जाये अदृश्य --- अंतिम कड़ी”

साथियों... नमस्कार...


नाच-गाना हमारी संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा हैं जिसको विकसित करने और उसे जन-जन तक पहुँचाने में उन कलाकारों का महत्वपूर्ण योगदान रहा जिसने इसे साधना की तरह अपने जीवन में अपनाया और अपनी मनभावन शैली व मनमोहक अदाओं के दम पर लाखों-करोड़ों लोगों को अपना दिवाना बना लिया लेकिन इन्होने केवल ‘शास्त्रीय’ या ‘लोक नृत्य’  को ही तवज्जो दी क्योंकि इनका ये मानना था कि केवल यही विशुद्ध नृत्य कला बाकी सब तो नृत्य के नाम पर महज़ हाथ-पैर पटकना या पश्चिम की नक़ल करना जिसकी वजह से अपनी इन पुरातन विधाओं को नुकसान हुआ हैं कि लोगों को ये लगना लगा कठिन परिश्रम के साथ लंबे समय तक इसे सीखना पड़ता तब कहीं जाकर वो उसे नियमानुसार सही तरह से प्रस्तुत करने के योग्य बन पाता जबकि जो कुछ भी आज नाच के नाम पर परोसा जा रहा वो कसरत नुमा या कलाबाजी टाइप लगता जहाँ नाच करने वाले किसी भी वेशभूषा में किसी भी तरह की भाव-भंगिमा या मुद्रा में मन के कोमल भावों की जगह द्विअर्थी इशारे करता जिससे कि नृत्य की गरिमा और सम्मान कम होता अतः अमूमन शास्त्रीय या लोक नृत्य प्रेमी इस तरह के डांस को पसंद नहीं करता उस ये भी खतरा रहता कि इनकी वजह से अपने धरोहर जैसे प्राचीन नृत्यों का अस्तित्व संकट में पड़ सकता क्योंकि इस तरह से हाथ-पैर अंग चलाने के न तो कोई विशेष नियम और न ही इनमें अपनी सभ्यता-संस्कृति का ही ध्यान रखा जाता चूँकि ये सीखने में आसान और कम समय लेते अतः इनकी लोकप्रियता दिनों-दिन बढती जा रही...

चूँकि अन्य नृत्यों को करना बेहद आसान तो वे लोगों को अधिक आकर्षित करते इसका कारण यह भी कि इसमें शास्त्रीय या लोक नृत्य की तरह कठिन नियमावली, परिधान, मुद्रा, भाव-भंगिमा आदि की बाध्यता नहीं होती तो लोग इसे अधिक पसंद करते और नित बनने वाली फिल्मों एवं रियाल्टी शोज ने इसमें वृद्धि ही की तो आज उसे सीखने वालों की तादाद बढती जा रही आज के जमाने में तो वैसे भी न तो किसी के पास धैर्य और न ही समय जो कि उन नृत्यों को सीखने व करने के लिये दरकार तो ऐसे में ये रेडीमेड स्टेप्स वाले शोर्ट टाइम में तैयार होने वाले नाच आजकल बेहद लोकप्रिय और जिसे देखो वही इन्हें सीखने के लिये लालयित उसे ये फ़िक्र नहीं कि उसकी इस अनदेखी या लापरवाही की वजह से हमारी वो समृद्ध विरासत हमारी अपनी वैयक्तिक पहचान खतरे में पड़ती जा रही उन्हें तो बस, आनन-फानन सफ़लता चाहिये जिसमें जिसमें टेलीविजन, कंप्यूटर, लैपटॉप और मोबाइल ने भी बहुत योगदान दिया जिसकी वजह से लोग ये भूलकर कि उन भारतीय नृत्यों में देश की आत्मा बसती वो इसी तरह के नाच को प्रचारित कर रहे जिससे कि विदेशों में भी भारतीयता की पहचान वास्तविक शास्त्रीय/लोक नृत्यों की जगह अब इस तरह के नृत्य प्रतिनिधित्व कर रहे तो इससे हमारी पहचान पर संकट खड़ा हो गया हैं तो ऐसे में हमारा भी फर्ज कि हम अपने नृत्यों के प्रति रूचि पैदा करे और किसी सच्चे गुरु से इसका ज्ञान प्राप्त करे जिससे कई लाभ होंगे और दूर-दराज के लोगों को भी ये पता चलेगा कि हमारे देश में कितनी तरह की विविध नृत्य शैलियाँ होती जिनको करने के लिये किसी साधक की तरह तपस्या करनी पडती न कि देख-देखर उनको सीख लिया जाता ये मिथक अगर, टूट गया तो हमारे नृत्य हाशिये पर न होकर मंच के बीचों-बीच पूरी शान-शौकत और गर्व के साथ प्रदर्शित किये जायेंगे...

एक समय था कि भारतीय नृत्य की विविधताओं ने उसे विश्व पटल पर जिज्ञासा का केंद्र बना दिया था जिससे कि विदेश में भी इसे सीखने की ललक बढ़ने लगी लेकिन आज सब जगह एक-सा उछल-कूद वाला नृत्य दिखाई दे रहा जो ये दर्शाता कि केवल हम ही पश्चिम से उसे आयातित नहीं कर रहे बल्कि वे भी भारतीय नृत्यों में दिलचस्पी दिखा रहे अतः अपनी कलाओं के सरंक्षण हेतु हमें भी प्रयास करना चाहिये ताकि हमारे विशुद्ध नृत्यों की शुद्धता कायम रहे... अंतर्राष्ट्रीय दिवस पर यही शुभकामना हैं... :) :) :) !!!

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© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)

२९ अप्रैल २०१७