शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

सुर-२०१७-१११ : निशाने पर हर कोई... गिद्ध दृष्टि से न बचा कोई... 👀 !!!

साथियों... नमस्कार...


बड़ी देर से
बड़ी दूर से
ताक रहा था जो
एक 'कुत्ता' था वो
बड़ी नादान
बड़ी अंजान
बेखबर इस बात से
खेल रही थी जो
एक 'गिलहरी' थी वो
आखिरकार...
एक लंबी प्रतीक्षा के बाद
हुई सफल साधना जिसकी
'कुत्ता' था वो
गंवा बैठी अपनी जान जो
'गिलहरी' थी वो
माना कि
छोटी सी, नन्ही सी
भोली-भाली और नासमझ
'गिलहरी' थी वो
तो बच न सकी घात से
मगर, जो बड़ी हैं
सब कुछ समझती हैं
क्या बच पाती वो ???
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© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)

२१ अप्रैल २०१७

गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

सुर-२०१७-११० : डिजिटल होती मानवीय संवेदनाएँ...!!!

साथियों... नमस्कार...


कहीं भी कोई भी घटना घटे या देश में किसी भी विषय पर कोई विवाद या किसी समस्या को लेकर कोई मुद्दा उठाये जाये लोग बड़े जोर-शोर से ट्विटर, फेसबुक, व्हाट्स एप्प पर अपनी खुशी, क्रोध जैसी हर संवेदना का पोस्ट या कमेंट रूपी वमन कर सारा दोष सरकार के मत्थे मढ़कर खुद को देश का सबसे बड़ा जिम्मेदार नागरिक मन लेते हैं याने कि अब इस तरह भी लोग अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे फर्क इतना हैं कि पहले मुंह चलाते थे अब कीबोर्ड पर उँगलियाँ चलाते उन समस्याओं के निराकरण हेतु कोई भी जमीनी कदम उठाने की न तो कोशिश करते और न ही जहमत उठाते कि शुरू से मनुष्य को सुविधाजनक विकल्प भाते...

यकीन न हो तो ये जीवंत नज़ारा देख ले...

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न्यूज़ चैनल पर
जैसे ही ये आई खबर कि
बैंगलुरु में सरेआम
एक लड़के ने राह चलती
लड़की के साथ जबर्दस्ती की
इंसानियत की हदें तोड़ी
तो उन्होंने हाथ में उठाया पकौड़ा
झट प्लेट में रखा
पट अपने सोशल मीडिया अकॉउंट में
जाकर टाइप किया
मन आहत हैं इस समाचार से
जाने समाज किधर जा रहा
बेटियां सुरक्षित नहीं इस देश में
और वापस जुट गये खाने में
सामने एक ने पढ़ा तो
चाय पीना छोड़ कमेंट किया
बहुत दुख हुआ यदि वहां होता तो
उन लड़कों को नहीं छोड़ता
तभी दूसरे ने सरकार को निकम्मा बताया तो
तीसरे ने कानून व्यवस्था को कोसा
और इस तरह हर एक
अपनी-अपनी जिम्मेदारी पूरी कर
अपने-अपने काम में लग गया
इस संतोष के साथ कि
उसने अपना दायित्व निभाया
जमीनी हकीकत से दूर
अब इस तरह आभासी दुनिया में
वास्तविक संसार के कर्तव्य
बड़ी जवाबदारी से पूर्ण किये जा रहे हैं
कागजी कार्यवाही की अब
हर किसी को आदत होती जा रही हैं ।।
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इस तरह के दृश्य तो अब बड़े आम हो रहे और देश व दुनिया की बड़ी से बड़ी समस्याओं का निराकरण इसी तरह किया जा रहा तभी तो हालात ज्यों के त्यों क्योंकि हमारा तो यही मानना कि हमारा काम केवल वोट देना बाकि सब जिम्मेदारी सरकार की तो इसका असर ये हो रहा कि लगातार गेजेट्स के संपर्क में रहने से हमारी कोमल भावनायें भी डिजिटल होती जा रही जिसका हमें अहसास भी नहीं कि हम संवेदनहीनता के चरम पर पहुँच चुके इससे पहले कि पूर्णरूप से रोबोट बन जाये चलो अपने भीतर की मनोभावनाओं को मरने स्व बचाये... :) :) :) !!!
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© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)

२० अप्रैल २०१७

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

सुर-२०१७-१०९ : लघुकथा : विज्ञापन !!!

साथियों... नमस्कार...


यहाँ सभी तरह के धर्म की लत छुड़ाई जाती हैं, हर धर्मांधता का इलाज़ किया जाता हैं...

पुराने से पुराने या नये से नये हर धर्म के नशे को शर्तिया ठीक किया जाता हैं...

यदि आप सबको आज़मा चुके हो हर तरफ से निराश हो चुके हो तो अवश्य पधारे...

एक बार सेवा का अवसर अवश्य दे, हमारी किसी भी जगह कोई अन्य ब्रांच नहीं हैं।

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© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)

१९ अप्रैल २०१७

मंगलवार, 18 अप्रैल 2017

सुर-२०१७-१०८ : ‘अंतर्राष्ट्रीय विरासत दिवस’ का पैगाम... अपनी सांस्कृतिक संपत्ति का करो विशेष रख-रखाव...!!!

साथियों... नमस्कार...


हमारी सभ्यता हजारों साल पुरानी हैं ये बात हमें पता चलती हैं उस युग के अवशेषों और बची-खुची इमारतों से जो भले ही खंडहर रूप में ही दिखाई दे रही हैं लेकिन उनके साथ जुड़ी स्मृतियाँ हमें उस दौर की कहानी सुनाती हैं जब कभी वे पूर्ण रूप से अपने मूल आकार में उससे जुड़े जीवित ऐतिहासिक चरित्रों के साथ स्वयं एक पात्र के रूप में खड़ी थी और किसी जीवंत सहयोगी के भांति उनकी उस यादगार कथा का हिस्सा बन एक मूक गवाह की तरह उसने उसे अपने भीतर बसा लिया तभी तो उनको देखकर हम भी उस युग में पहुँच जाते जिसकी यादें उसने संजोकर रखी इस तरह वे हमें अपने अतीत के उस सुनहरे दौर की बेशकीमती निशानियाँ लगती जो अब केवल इतिहास में ही दर्ज हैं और जिनके गले लगकर हम अपने पूर्वजों के अहसास को भी महसूस करते तो फिर ऐसी बहुमूल्य धरोहरों की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी तो हमारी हैं जिनसे हमारी जड़ें जुडी हुई हैं...

हर गाँव, हर नगर और देश में ऐसी बहुत-सी खुबसूरत इमारतें, अनमोल मुद्रायें, बोलती तस्वीरें, मनभावन मूर्तियाँ, प्राचीन मंदिर, बहुउपयोगी किताबें, भूलभुलैया सी गुफायें और अनेक ऐसी विधायें या पुरातन संस्कृति होती जो उस समय की वास्तु कला, शिल्पकला, चित्रकला, मूर्तिकला आदि का बेहतरीन नमूना पेश करती और यदि हम इनको संभालकर न रखे तो आने वाली पीढियां इन्हें किस तरह से जानेगी या वे केवल चित्रों या कहानियों में ही इनके बारे में सुनेगी और कल्पना से इनको समझने का प्रयास करेंगी लेकिन यदि हमने इनका सरंक्षण किया तो फिर हम उनको भूतकाल बन चुकी इन महत्वपूर्ण चीजों का वास्तविक अनुभव दे सकते हैं जैसे हमारे दादा-दादी व माता-पिता ने हमको दिया तो हम विश्वसनीयता के साथ उन तथ्यों को प्रस्तुत कर पाते जिससे उसकी प्रमाणिकता भी सिद्ध हो जाती अन्यथा वे बातें महज कपोल कल्पना ही लगती...

आज के तकनीकी युग में तो ‘विश्व विरासत दिवस’ की महत्ता अधिक बढ़ जाती क्योंकि आये दिन आने वाली नवीनतम तकनीकों की वजह से यंत्र-तंत्र बड़ी तेजी से बदलते जा रहे और पुराने का स्थान अधिक शक्तिशाली सुविधाओं से युक्त नूतन गेजेट्स लेते जा रहे जिससे कि उतनी ही तेजी से हमारी इस सभ्यता-संस्कृति के दुर्लभ निशान भी मिटते जा रहे हैं तो ऐसे में हमारा फर्ज़ बनता हैं कि हम जो कुछ भी बचा सकते हैं बचाये चाहे वो हमारी छोटी-छोटी देशज परम्परायें हो या फिर बोली-भाषा या भारतीय परिधान या भिन्न तरह की कलायें या फिर तरह-तरह के खेल हो जिनके अब केवल नाम ही बचे और मोबाइल व इंटरनेट के कारण तो इन के विषय में सम्बंधित जानकारी ही नहीं बल्कि इनके साधन भी गुम होते जा रहे जिस तरह मिक्सी, जूसर, वाशिंग मशीन, माईक्रोवेब, कंप्यूटर, मोबाइल, विडियो गेम्स, शोपिंग माल कल्चर के आने से सिलबट्टा, खलबट्टा, चक्की, मथानी, मोगरी, टेलीफोन, टाइपराइटर जैसे यंत्र ही नहीं बल्कि प्यारे-प्यारे खेल, लोरियां, बन्ने-बन्नी, रस्में भी विलुप्ति की कगार पर हैं क्योंकि अब किसी के पास समय ही नहीं तो हमें हर बड़ी ही नहीं छोटी-से-छोटी वस्तु का भी ख्याल रखना होगा कि ये महज़ हमारी जरूरतें पूरी करने का माध्यम भर नहीं बल्कि हमारे देश का इतिहास बनने जा रही धरोहरें हैं और यही तो इस दिवस का उद्देश्य भी तो उसके इस पैगाम को याद रखते हुये हम अपनी विरासत को सहेजने में अपना योगदान दे... इसी संदेश के साथ सबको ‘विश्व विरासत दिवस’ की शुभकामनायें... :) :) :) !!!

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© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)

१८ अप्रैल २०१७

सोमवार, 17 अप्रैल 2017

सुर-२०१७-१०७ : पाकिस्तान में मानवतावादी होने की सज़ा ‘मौत’...!!!

साथियों... नमस्कार...

‘इस्लाम’ क्या कोई लाक्षागृह हैं जो किसी भी चिंगारी या आग से जल जायेगा?
‘मजहब’ कट्टरता की हदों से पार चला जाये तो क्या उसमें बदलाव होना चाहिये या नहीं?
‘जिंदा इंसान’ की जगह ‘अदृश्य भगवान्’ की रक्षा से अंत में शेष क्या रहेगा?
‘भीड़’ कब तक भेड़ बनकर कुरीतियों के अंधे कुयें में खुद को गिराती रहेगी?
‘धर्म’ क्या वो हैं जो कुछ किताबों में दर्ज या वो जो व्यक्ति खुद के आंकलन से धारण करे?
‘ईशनिंदा’ से क्या ‘पैगंबर’ की छवि खराब हो जाती हैं ?
‘कुरान’ की आयतों का हवाला देकर ‘अमानवीयता कब तक की जायेगी?
‘अल्लाहताला’ ने किसे ये लाइसेंस दिया कि वो उसके न मानने वालों को मार-काट दे?
‘जीवन’ देना नहीं आता तो लेना कहाँ से सीखा? क्या मदरसे से??
‘इंसानियत’ के नाते किसी दूसरे धर्म की बात करना भी क्या गुनाह हैं वो भी इतना बड़ा कि जान ही ले ली जाये?
‘इस्लामोफोबिया’ का इलाज़ ढूढने का वक़्त आ गया या अभी और जानें लेना बाकी हैं?


ये वो चंद सवाल हैं... जो पाकिस्तान के ‘अब्दुल वली खान विश्वविद्यालय’ से पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे २३ वर्षीय जागरूक और सक्रिय छात्र बनाम ख़ुद को मानवतावादी कहने वाले मशाल खान ‘The Humanist’ की बर्बर हत्या और उसके विडियो को देखने के बाद से जेहन में कुलबुला रहे हैं...

क्या कुसूर था उसका जो इसे इतनी निर्ममता से मारा गया ???

सिर्फ यही कि उसने अपने दिलों-दिमाग का इस्तेमाल किया लकीर का फकीर नहीं बना और न ही आपके द्वारा लादे गये धर्म को जबरन ढोने को तैयार हुआ तो आपके पास सिवाय इसके कोई विकल्प न बचा कि आप इस ‘मशाल’ को बुझा दो जो अँधेरे में रोशनी फैलाकर उन लोगों को जगा रही हैं जिन्हें आपने मजहबी आयतों की लोरियां सुनाकर सदियों से नींद की आगोश में सुला रखा हैं और यदि वो इसमें कामयाब हो जाता तो पूरी दुनिया में जो आपने ‘इस्लामोफोबिया’ नाम की बीमारी पैदा की हैं उसका समाधान हो जाता तो आपने उस इलाज़ को ही खत्म कर दिया वो आवाज़ जो गूंगे-बहरों को राह दिखा रही थी उसे घोंटकर हलक में ही दबा दिया कि न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी वैसे भी आपको इसके अलवा आता क्या हैं आपने ‘मलाला युसुफजई’ के साथ भी तो यही किया था मगर, वो खुशकिस्मत थी कि आपकी गोली से बच गयी और दूसरे मुल्क ने उसे सरंक्षण देकर अपना बना लिया और वो ‘तस्लीम नसरीन’ वो भी तो आज तक दर-बदर भटक रही क्योंकि वो भी आपके हाथों की कठपुतली बनने को तैयार नहीं हुई आखिर क्यों होती उन सबके पास अपनी जागृत इंद्रियां अपने विचार और एक आग थी जिससे वो सिर्फ़ अपने वतन ही नहीं बल्कि समूचे विश्व को नूतन ज्ञान की रौशनी से जगमग कर देना चाहते थे पर, आप को तो किसी तरह का परिवर्तन या मजहब से कोई छेड़छाड़ पसंद नहीं आखिर ‘कुरान’ और ‘शरीयत’ में लिखी बातें महज़ शब्द नहीं आदेश हैं जिनके पालन का ठेका आपने ले रखा हैं तो कोई भी इसके विरुद्ध कुछ कहे या लिखे आप सीधे उसकी जुबान या हाथ ही नहीं काटते बल्कि पूरी क्रूरता के साथ इस तरह से उसका वजूद मिटा देते हैं कि ये देखकर ‘इंसानियत’ भी तड़फ उठती हैं कि अच्छा हुआ जो वो ‘इंसान’ न हुई वरना, अब तक आप उसके भी चीथड़े उड़ा देते वो संभव नहीं तो इस तरह आप अपनी भड़ास उस इंसान पर निकाल लेते हैं जिसके भीतर आपको वो नजर आती हैं....

वो एक अदद दिल और तार्किक दिमाग रखता था जो आपको नागवार गुज़रा कि इस आधार पर वो मानवतावाद का पैरोकार बन खुद को मानवतावादी कहने लगा और उन सब सदियों पुरानी सांकेतिक बातों को तर्क से काटने लगा जिनसे आपकी दुकानें चलती और रियाया आपको अपना खुदा मानती तो ऐसे में जो भी ‘धर्म’ के उपर ‘वैज्ञानिक तर्क’ को तरजीह देगा उसका यहीं अंजाम होगा ये कोई नई बात नहीं उसे भी इल्म था लेकिन फिर भी अपने ‘मशाल’ नाम को उसने ‘फुस्सी बम’ न बनाने दिया और इन सब मजहबी रवायतों या कुरीतियों को तर्कपूर्ण दलील से खारिज़ किया जिनका आपके पास जवाब नहीं क्योंकि आप तो केवल अपने रहनुमाओं के रिमोट कण्ट्रोल से चलने वाले रोबोट जिनकी रगों में बचपन से अफीम के तरह ‘धार्मिकता’ भर दी गयी जिसके आप इस हद तक कायल कि कोई यदि ‘अल्लाह’ को वल्लाह’ भी कह दे तो उसका मुंह तोड़ देते हो किसी गाने या किसी चुटकुले या कार्टून/व्यंग्य में भी कहीं उसका जिक्र तक हो तो आप उस लेखक, उस चित्रकार, उस कार्टूनिस्ट या उस पत्रकार का नामोंनिशान तक बचने नहीं देते कि आखिर उसने किस तरह से ये हिम्मत दिखाई ये जो आपने ‘मजहबी’ घुटन भरा माहौल बनाया हुआ हैं इसी की वजह से कभी-कभी कोई पाक़ रूह जिस्म का सहारा पाकर ताजा हवा के झोंके की तरह अपनी जान पर खेलकर आपको उस दमघोंटू माहौल से निकालने की कोशिश करती जिसे आप उसकी हिमाकत समझ उसे नेस्तनाबूद कर देते हो कि अँधेरे आपको रास आ चुके किसी ‘मशाल’ की आपको कोई जरूरत नहीं जो आप से अलहदा जेहनियत रखता हो ‘कार्ल मार्क्स’ या ‘चे ग्वेरा’ को पढ़ता हो ऐसे लोग आपको खतरे की लाल बत्ती दिखाई देते जिसे आप बेरहमी के साथ पत्थरों से संगसार कर देते आप हमेशा बड़ी ही बर्बरता / क्रूरता / निर्ममता / अमानवीयता / हैवानियत के साथ ही ऐसी जाग्रत देहों को मिटाते ताकि कोई दूसरा उसकी जगह न ले सके...

आप जो खुद को खुदा के बंदे कहते लेकिन उनकी कही गयी बातों की अपने ही ढंग से व्याख्या कर किसी और के नजरिये से उसे देखने को ‘अधर्म’ समझते ‘लाहोल विला कुव्वत’ कह कान पकड़ लेते जैसे उसने आपको कोई ‘पोर्न’ दिखा दी जबकि ‘पोर्न’ देखते समय आप रगों में दौड़ती-फिरती अपनी तथाकथित कट्टरता को नजरअंदाज़ कर देते याने कि दोगलापन आपके भीतर हैं जिसे आपने छद्म आवरण से छिपा रखा हैं और जो इस नकाब को हटाकर आपका असली चेहरा दुनिया के सामने लाने की गुस्ताखी करता उसकी नाफरमाबरदारी को आप हर्गिज़-हर्गिज़ बर्दाश्त नहीं करते आख़िर मज़हब को बचाने का सारा ठेका आपने ही तो ले रखा अल्लाह मियां आपको ही तो धर्म रक्षक नियुक्त कर गये...
                           
मुझे गर्व हैं कि,
मैं हिंदू हूँ
मैं भारतीय हूँ
उस देश में रहती हूँ
जहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर
वे लोग भी, जो कुछ भी नहीं
हिंदू देवी-देवताओं से लेकर देश के प्रधानमंत्री तक
हर किसी को गरियाते हैं
जब किसी ‘पहलू खान’ की जान कोई ले ले तो
अपने हिंदू होने पर शर्मिंदा होते हैं      
कि मेरा धर्म उदार हैं
मेरा देश ‘वासुदेव कुटुम्बकम’ का मानता हैं
वो सबको साथ लेकर चलता हैं
हर किसी को रहने व जीने को ‘स्पेस’ देता हैं
और वही जब उसे गाली दे
‘भारत माता की जय न बोले’
‘वंदे मातरम’ न गाये
यहाँ तक कि उसके टुकड़े-टुकड़े होने की बातें कहे
उसकी बेटी भी गर, कहे कि वो उसके शहीद की बेटी नहीं
तब भी खामोश रहता हैं बल्कि
उसने चाहने वालों को दर्द हो और वो भी
उसकी माँ-बहन एक करने की धमकी दे तो भी
अपने ही सीने पर उनको झेलता हैं
और आप का मुल्क जनाब,
एक ‘मशाल’ से डर जाता हैं वो भी तब जबकि
वो आपके ही मजहब, आपके ही वतन का
आपका मज़हब किसी को बोलने तो क्या सुनने की भी इजाज़त नहीं देता
कोई यदि आयतों के वास्तविक मायने समझाये तो
उसके खिलाफ कभी फतवा तो कभी देश निकाला और
कभी हिंसक बनकर उसकी जान ले लेता हैं 

जब ‘भारत में ‘पहलू खान’ की भी इसी तरह निर्ममता से हत्या की गयी तो मुझे ख़ुशी हुई कि हमारे लोगों ने उसके खिलाफ़ आवाज़ उठाई हमारे प्रधानमंत्री, सरकार को कोसा क्योंकि हमारा धर्म इतना संवेदनशील कि वो ‘दानव’ नहीं ‘मानव’ बनाता हैं इसलिये तो कोई उसके लिये द्रवित होकर अपने हिंदू होने पर शर्मिंदा होता हैं जबकि मैं नहीं शर्मिंदा कि इस धर्म की वजह से ही हमारे भीतर ये इंसानियत की हम सबको इंसान समझते...

‘पकिस्तान’ में एक भी ‘इस्लाम’ मानने वाला इंसान नहीं जो लिखे कि मुझे शर्म हैं कि मैं मुसलमान हूँ मैं पाकिस्तानी हूँ... मुझे पता हैं कि वहां ऐसा कोई नहीं कहेगा बल्कि मौलवियों ने तो उसकी मृत देह को दफनाने से ही मना कर दिया जबकि हमारे यहाँ आतंकवादी को भी उसके परिजन ले जाकर उसका अंतिम संस्कार करते... Because It happens only in India.  
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© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)

१७ अप्रैल २०१७