मंगलवार, 24 मार्च 2015

सुर-८१ : "लघुकथा : रोज मनाये... नवरात्र...!!!"


नवरात्र के प्रारंभ होते ही नन्ही-मुन्नी रिया-प्रिया बड़ी खुश हो गयी क्योंकि वे जानती थी कि इन नौ दिनों सिर्फ उनके दादा-दादी और परिवार ही नहीं बल्कि पूरा मोहल्ला उनको बड़ा प्यार करेगा और दावतें दे देकर अपने घर बुलायेगा जबकि बाकी दिन तो उनकी माँ के सिवा कोई उन्हें लाड़ करना तो दूर बात करना भी पसंद नहीं करता बस, दुत्कारता और बातें सुनाता रहता जैसे उन दोनों ने पैदा होकर कोई गुनाह कर दिया हो उनके दादा-दादी और पापा उनकी माँ को भी बातें सुनाते रहते जबकि वही लोग सारी दुनिया को ज्ञान दान कर खुद को महान शिक्षक कहलाते  लेकिन घर के अंदर आते ही जैसे उस विद्या को ही वही छोड़ आते जिस तरह का उनका बर्ताव था उसकी वजह से वो बच्चियां सिहर जाती थी ।

वे अक्सर अपनी माँ से कहती--- माँ ये नौ दिन हमेशा क्यों नहीं रहते देखो न सब हम लोगों के साथ कितना अच्छा व्यवहार करते कितना बढ़िया-बढ़िया खाने को मिलता हैं उनकी माँ मुस्कुराकर रह जाती वो खुद सबके दोगले व्यवहार से त्रस्त आ चुकी थी पर, कुछ भी कर नहीं पा रही थी और उसे तो रोज तीन घंटे न चाहते हुए भी अपने पति के साथ पूजा में बैठना पड़ता क्योंकि उसके पति का कहना था कि जोड़े से पूजन करने से ही वो पूर्ण होती हैं । अगले दिन सुबह जब उसके पतिदेव उसे सामने बिठाकर जोर-जोर से ‘दुर्गा सप्तशती’ का पाठ करते हुये उसका अर्थ बता रहे थे तभी उसे अपनी रिया के जोर-जोर से रोने  की आवाज़ आई और वो एकदम से उठकर जाने लगी तो उसके पति ने ऊँगली से उसे न जाने का इशार किया फुसफुसाते हुये बोले पाठ के बीच में जाना गलत हैं वो सहमकर रुक गई पर, उसका मन वहां नहीं था तभी प्रिया आई और बोली, माँ जल्दी चलो रिया सीढ़ियों से गिर गई तो उसने पति को और देखा और जैसे ही उन्होंने इंकार में सिर हिलाया पता नहीं किस तरह उसके अंदर एक ताकत आ गयी और वो झट देवी के मूर्ति के समक्ष खड़ी होकर बोली--- आप सोचते हैं कि अपनी बेटियों का निरादर कर उनकी पीड़ा को नज़रअंदाज़ कर मुझे अपने साथ बिठाकर इस पूजा मात्र से जगत माँ को प्रसन्न कर लेंगे तो यही बैठे रहे पर मेरे लिये तो मेरी बच्चियां ही साक्षात् देवियाँ हैं मैं चली उनके सेवा करने और वो तुरंत प्रिया का हाथ पकड़कर रिया के पास आ गयी और उन दोनों को अपने सीने से लगते हुये बोली--- आज से तुम दोनों के रोज नवरातें हैं ।
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२४ मार्च २०१५
© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’

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सोमवार, 23 मार्च 2015

सुर-८० : "शहीद दिवस की सार्थकता... समझे देश की जनता...!!!"

नौजवानी
हो गयी शहीद
छोड़कर अपनी यादें
जलाकर मशाल क्रांति की
बुझने न देगी इसे भारत भूमि
जिसके कण-कण में लिखी हुई हैं
कहानियां अमर शहादत की
जर्रे-जर्रे में छिटका लहू
अब भी चीखकर सुनाता वो दास्ताँ
जिसे स्याही से नहीं उकेरा गया खून से ॥
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मित्रों...,

२३ मार्च १९३१ का दिन जब एकाएक ही अंग्रेज सरकार ने तीन नौजवानों 'भगत सिंह', 'राजगुरु' एवं 'सुखदेव' जो कि गुलाम देश के उग्र युवा क्रांतिकारी थे को ११ घंटे पूर्व ही फांसी देने का निर्णय लिया वो भी एक ‘सीक्रेट प्लान’ बनाकर जिसकी खबर भी उन तीनों को ऐन वक़्त पर ही गई तो उनका ये कदम ही साबित करता हैं कि वो इन तीनों के विद्रोह से किस कदर खौफज़दा थी जिन्होंने जेल के अंदर भी इंकलाब की मशाल रोशन कर दी थी जिसकी वजह से सरकार को उनके अनशन के आगे झुककर उनके पक्ष में फ़ैसला देना पड़ा जो अपने आप में ये ज़ाहिर करता हैं कि उनको ये अहसास हो चुका था कि यदि उन्होंने तयशुदा समय पर ये काम किया तो सारे देश में क्रोध का लावा फूट जायेगा और यदि ऐसा नहीं किया तो ये लोग जेल में रहते हुये ही इंकलाब की ऐसी आंधी लायेंगे कि सब कुछ खत्म हो जायेगा जबकि उसके एक दिन पूर्व ही ये तीनों 'गर्वनर' को पत्र लिखकर उनसे ये अपील कर चुके थे कि उन लोगों को फांसी देने के स्थान पर गोली से उड़ा दिया जाये क्योंकि उनके वकील ‘प्राणनाथ मेहता’ का सोचना था कि यदि वे लोग गर्वनर से क्षमायाचना से करें तो उनकी मृत्युदंड की सजा को माफ़ किया जा सकता हैं इसलिये वो एक माफीनामे का एक मसौदा लेकर उनके पास पहुंचे लेकिन उन लोगों के स्वाभिमान को ये मंजूर नहीं था तो उन तीनों ने मिलकर अपनी तरफ से ये पत्र लिखकर भेजा था---

आदरणीय महोदय,

सेवा में सविनय निवेदन है कि भारत में ब्रिटिश सरकार के सर्वोच्च अधिकारी-वायसराय ने एक विशेष अध्यादेश जारी करके लाहौर षड्यंत्र केस की सुनवाई के लिए एक विशेष न्यायाधिकारण की स्थापना की थी, जिसने अक्टूबर १९३० को हमें फांसी की सजा सुना दी हैं । हमारे विरुद्ध सबसे बड़ा अभियोग यह लगाया गया है कि हमने सम्राट पंचम के विरुद्ध युद्ध किया है न्यायालय के इस निर्णय से दो बातें स्पष्ट हो जाती हैं पहली यह कि अंग्रेज जाति और भारतीय जनता के बीच युद्ध चल रहा है दूसरी यह कि हमने नियमित रूप से उस युद्ध में हिस्सा लिया है ।

अत: हम राजकीय युद्धबंदी हैं यद्यपि इसकी व्याख्या में बहुत सीमा तक अतिश्योक्ति से काम लिया गया है, तथापि हम यह कहे बिना नहीं रह सकते हैं कि ऐसा करके हमें सम्मानित किया गया है । निकट भविष्य में यह युद्ध अंतिम रूप से लड़ा जाएगा, तब यह निर्णायक युद्ध होगा साम्राज्यवाद और पूंजीवाद कुछ समय के मेहमान हैं । इसी युद्ध में हमने प्रत्यक्ष रूप से भाग लिया है हमें इस कारण अपने पर गर्व है इस युद्ध को न तो हमने शुरू किया और न ही यह हमारे जीवन के साथ समाप्त हो जायेगा । हमारी ये सेवा इतिहास के उस अध्याय के लिए मानी जाएंगी जिसे यतींद्रनाथ दास और भगवती चरण के बलिदानों ने विशेष रूप से उजागर कर दिया इनके बलिदान महान हैं । इस स्थिति में हम युद्धबंदी हैं और इसी आधार पर हम आपसे मांग करते हैं कि हमारे प्रति युद्धबंदियों जैसा ही बर्ताव किया जाये और हमें फांसी देने की बजाय गोली से उड़ा दिया जाये । अब यह सिद्ध करना आपका काम है कि आपको अपनी न्यायालय के निर्णय में कितना विश्वास है अपनी कार्रवाई द्वारा आप इस बात का प्रमाण दीजिए हम आपसे सविनय अनुरोध करते हैं कि अपने सेना विभाग को आदेश दें कि हमें गोली से उड़ाने के लिए सैनिकों की एक टोली भेजी जाये ।

भवदीय
भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव
 
ये तीनों न सिर्फ युवा थे बल्कि हमउम्र भी और जंगे आज़ादी के सिपाही भी जो जल्द-से-जल्द ‘भारत माता’ को अंग्रेजो की गुलामी की जंजीरों से आज़ाद करना चाहते थे इसलिये तो २३ साल की नाज़ुक उम्र में भी उनको ये इल्म था कि वो क्या कर रहे हैं और उसका नतीजा क्या होगा तभी तो इन जुल्मों-सितम को उन सबने हंसी-हंसी बड़ी निडरता से कुबूल किया और अपने लिये फांसी की जगह गोली मार देने का सुझाव भी खुद ही दिया... हमारे देश की युवाशक्ति को इस त्रयी से इस बात का ही सबक लेना चाहिये कि वो अपने जोशे जुनून को फ़िज़ूल के कामों में बर्बाद करने के स्थान पर अपना लक्ष्य निर्धारित कर उस कर्तव्य पथ पर अथक चलते रहे क्योंकि भले ही अब हम आज़ाद हैं लेकिन इसका मतलब ये कतई नहीं कि अब इस देश में करने को कुछ बचा ही नहीं... ये और बात हैं कि लोगों को अपनी मस्ती के आगे कुछ दिखाई देता नहीं और न ही वो कुछ करना चाहते हैं वरना जिस स्वतंत्रता के लिये हमारे वीरों ने अपने प्राणों की आहुतियाँ दे दी हम उसे यूँ बिसारकर या एक दिन उनकी स्मृति में कार्यक्रम कर बाकी दिन उनको विस्मृत करने के स्थान पर इस देश को विश्व मंच पर अग्रणी स्थान दिलवाने के लिये प्रयत्न करते न कि सिर्फ अपने लिये जीते... इन शहीद दिवस की सार्थकता यही हैं कि जब-जब भी इस देश के किसी बलिदानी सपूत की कुर्बानी का दिन आये तो हम भी अपनी रगों में वही जोश भरकर फिर से नई ऊर्जा के साथ अपने कर्मपथ पर पूरी ईमानदारी और जोश के साथ बढ़ते चले... ‘इंकलाब जिंदाबाद’ या ‘वंदे मातरम’ केवल ऐसे समय में बोले जाने जुमले नहीं बल्कि अपने में बड़े गहन अर्थ छुपाये हुये हैं जिनको अपनी जबान से बोलते समय भी हम उसकी गहराई तक नहीं पहुँच पाते तभी तो अगले दिन से फिर उसी दिनचर्या में गुम हो जाते हैं.. तो अब यही संकल्प ले कि अपने देश के इन शहीदों के आत्मोत्सर्ग को व्यर्थ न जाने देंगे और जो अनमोल आज़ादी वो हमें देकर गये हैं हम उसके दम पर हम उनके सपनों का भारत बनाने अपना योगदान देंगे... यही होगी उन सभी क्रांतिकारियों को दी गई हमारी सच्ची श्रद्धांजलि... मन से नमन... हर एक बलिदानी को... कोटि-कोटि प्रणाम... जय-हिंद... :) :) :) !!!
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२३ मार्च २०१५
© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
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रविवार, 22 मार्च 2015

सुर---७९ : 'विश्व जल दिवस... किस तरह हो सार्थक...???"

कहते सब
जीने के लिये
‘प्रेम’ हैं सबसे जरूरी
पर, जी सकता हैं इंसान
प्यार के बिना
लेकिन...
नहीं जी सकता
कोई भी ‘पानी’ के बिना...॥
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मित्रों...,

चंद भविष्य की झलकियाँ :
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दृश्य__०१ : (सन् २०२५ - पारिवारिक परिदृष्य) रीना अपने बच्चों के साथ अपने माता-पिता एवं अन्य परिजनों से मिलने मुंबई से उज्जैन अपने मायके जाना चाहती हैं, पर जलसंकट के कारण वे नहीं चाहते कि रीना अपने घर आये।

दृश्य__०२ : (सन् २०३० - राजनीतिक परिदृष्य) पानी का चुनाव पर असर नेताओं ने वादा किया कि यदि जनता उन्हैं वोट देगी तो वे उन्हैं पानी देंगे इस तरह पानी ने चुनाव में मुख्य भूमिका निभाई।

दृश्य__०३ : (सन् २०३५ - पारिस्थितिकीय परिदृष्य ) सभी पेड़-पौधे एवं पषु-पक्षी जलसंकट के कारण समाप्त। जंगलों, वनों में वनस्पति एवं जनजीवन का अंत।

दृश्य__०५ : (सन् २०४० - भारतीय परिदृष्य) पानी 50 रू. लीटर आम आदमी की पंहुच से बाहर और एक व्यक्ति ने पानी के लिये दूसरे की हत्या की।

दृश्य__०४ : (सन २०४० – विश्व परिदृष्य) अमेरिका ने कनाडा पर जल के लिये आक्रमण कर दिया हैं और कनाडावासी अपने तालाबों को बचाने के लिए अमेरिका से संघर्ष कर रहैं हैं ।

ये महज कल्पना या भयभीत करने करने वाला लेखन नहीं बल्कि चंद ऐसे खतरनाक और कठोर सच्चाई से भरे वास्तविक दृश्य हैं जिनके माध्यम से आने वाले समय में जल की कमी के प्रभाव को हर एक परिदृश्य में समझने का एक प्रयास किया हैं जो अभी तक हुआ तो नहीं लेकिन कभी भी ऐसी स्थिति आ सकती हैं जिसे अभी भी रोकना हमारे वश में हैं तभी तो २२ मार्च को ‘विश्व जल दिवस’ घोषित किया गया हैं । ताकि लोग न सिर्फ जलसंकट के प्रति सचेत  और जागरूक हो बल्कि उसके लिए अपना जो कुछ भी हो सकता हैं वो योगदान दे ताकि हम सब अपनी संतति को ही नहीं बल्कि सारे ब्रम्हांड को बचाने के पुनीत यज्ञ में अपने कर्मो की आहुति देकर एक सच्चे नागरिक बन सकें क्योंकि ये सब बहुत दूर नहीं बल्कि बड़ी जल्द ही देखने में आ सकता हैं और बहुत सी जगह तो नज़र आने भी लगा हैं । आज भी हमारे देश में बहुत-से स्थानों पर महिलाओं को जल लेने के लिए ६-७ किमी जाना पड़ता हैं और बहुत से हिस्सों में तो इसके लिये रोज लड़ाई-झगड़ा होना आम बात हैं अतः अभी भी देर नहीं हुई कि हम इसके विषय में बात करने के स्थान पर कुछ काम भी करें क्योंकि नये जल संसाधनों को स्थापित करना तो नाममात्र का हैं ही साथ प्राकृतिक जलस्त्रोत भी जिस तेजी से खत्म हो रहे हैं वो चिंताजनक हैं जिसकी वजह से अस्तित्व संकट भी पैदा हो गया हैं ।

‘चंद विश्वप्रसिद्ध उक्तियां’ :
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१.    अगली सदी में युद्ध पानी को लेकर होंगे।
           इस्माइल सेरागेल्डिन' (वाइस प्रेसीडेंट, विश्व बैंक 1995)

२.    हजारों लोग प्यार के बगै़र जिन्दा रहैं हैं, पर पानी के बिना एक भी नहीं।
          डब्ल्यू एच ऑडेन' (एंग्लो अमेरिकी कवि)

३.    जो भी व्यक्ति जलसंकट का समाधान करेगा, उसे दो ‘नोबेल पुरूस्कार’ मिलेंगे। एक विज्ञान के       लिए और दूसरा शांति के लिए।
          जॉन.एफ. केनेडी'  (पूर्व अमेरिकी राष्टपति)

‘जलसंकट’ के समाधान के बारे में मेरा सोचना हैं कि हम नागरिकों के अपने प्रयासों के अलावा  यदि सरकार इस पर कड़ा नियंत्रण लगाये तो इसे पूरी तरह हल किया जा सकता हैं क्योंकि अभी भी स्थिति एकदम नियत्रंण के बाहर नहीं हैं। सरकार अगर जलप्रदाय पूरी तरह अपने हाथ में रखें और सभी लोगों को सुबह और शाम सिर्फ एक-एक घंटा जल वितरित करे, जिस तरह कि वह बिजली के लिये करती हैं तो लोग पानी का दुरूपयोग नहीं कर पायेंगे। लोग के घरों मे जेटपंप और टयूबबेल आदि साधनों से जो सहजता से और आवश्याकता से अधिक पानी उपलब्ध हैं, तथा वे लोग जिनके घरों मे स्विमिंग पुल, शोवेर, झरने और पानी के दुरूपयोग के जो अनावश्यक साधन हैं उन्हैं पूरी तरह प्रतिबंधित कर देना चाहिये । सरकार को अमीर-गरीब का भेदभाव किये बिना जल वितरण अपने द्वारा करना चाहिये क्योंकि यदि असंतुलन रहा तो इसे संकट को पूरी तरह से समाप्त नहीं किया जा सकेगा । जिस तरह ‘भूटान’ विश्व का प्रथम देश  हैं जिसने धुम्रपान एवं तंबाकू के विक्रय पर प्रतिबंध लगाया है और ‘न्यूजीलैंड’ विश्व  का प्रथम देश हैं, जिसने ‘ग्लोबल वार्मिं’ग पर नियंत्रण हैतु कर लगाया हैं और हमारे यहाँ तो ‘तमिलनाडु सरकार’ ने 2004 में जल संरक्षण के लिये एक आदेश जारी किया कि तीन महीने के अंदर सारे शहरी मकानों और भवनों की छतों पर ‘वर्षा जल संरक्षण’ (‘वजस’) यंत्रों का लगाया जाना अनिवार्य हैं । सारे सरकारी भवनो को भी इसका पालन करना पड़ा पूरे राज्य में इस बात को व्यापक रूप से प्रचारित किया गया साथ ही यह चेतावनी भी दी गई कि यदि नियत तिथि तक इस आदेश का पालन नहीं किया गया तो सरकार उन्हैं दी गई सेवाएं समाप्त कर देगी। साथ ही दंडस्वरूप नौकरशाहों के पैंसे से ही इन संयंत्रों को चालू करवाया जायगा। परिणाम चैंकाने वाले और सुखद थे अगले एक साल के अंदर ही तमिलनाडु के लगभग हर भवन मे ‘वजस’ लग चुके थे कुओं मे पानी का स्तर बढ़ चुका था, खारापन भी कम हो गया था।

कुछ समाधान :
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● जल-प्रदाय केवल नगरपालिका द्वारा लोगों के निजी जेट, टयूबवेल आदि पर प्रतिबंध।
● मकानों की सिंचाई मे पानी अधिक खर्च होता हैं अतः बारिश के मौसम में ही भवन निर्माण किया जाये।
● स्विमिंग पुल, वाटर पार्क एवं पानी का व्यवसायीकरण प्रतिबंधित किया जाये।
● कुयें, बावड़ी, नहर, तालाब एवं हैंडपम्प बढ़ाये जाये जिससे कि खेती की जा सके ।
● नहाने एवं कपडे़ धोने का जल एकत्रित कर उसका पुर्नउपयोग किया जाये।
● समुद्री खारा पानी नेनोफिल्टर द्वारा पीने योग्य बनाया जाये।
● अन्य देषों की तरह भारत में भी ‘टायलेट पेपर’ के उपयोग को बढ़ावा दिया जाये जब हमारा देश हर बात में पश्चिम का अंधानुकरण कर रहा हैं तो इसमें क्या बुराई हैं पानी की बचत ही है।
● अगर स्पंज बाथ से काम चले तो पानी बचाया जाये और सभी बच्चों को एक साथ नहलाये जाये।
● सरकार सभी सरकारी कर्मचारियों के साथ-साथ हर व्यक्ति जो कि इस देष का नागरिक हैं बाध्य करें कि वो केवल उतना ही पानी खर्च करें जितना औसतन एक व्यक्ति के लिये आवश्यक होता है।
● अधिक जल उपयोग पर रोक लगाये और दंड का प्रावधान भी किया जा सकता है।

सरकार यदि इस तरह से सभी जगह आदेश जारी करे और सख्ती से उसका पालन किया जाय तो कुछ समय बाद ही सही पर इसके सुखद परिणाम देखने को मिलेंगे। निजी कंपनियां जो पानी का व्यवसाय करती हैं उनके लिये भी कुछ नियम निर्धारित किये जाये सिर्फ सोचने से इस समस्या को हल नहीं किया जा सकता न केवल जन समुदाय ही इसमें पहल कर सकता हैं। सरकार को भी आगे आना चाहिये और इस तरह के आदेश जारी करने के पूर्व जल-प्रदाय अपने हाथ में रखना चाहिये। इसमें कुछ समय एवं खर्च अवश्य आयेगा पंरतु इससे जो परिणाम मिलेगा उसकी तुलना में यह आर्थिक खर्च कुछ भी नहीं। विशेष प्रशिक्षण, शिविर, अभियान का आयोजन करना चाहिये, पोस्टर, पम्पलेट आदि का वितरण करना चाहिये जिनमें की पानी बचाने के उपायों का वर्णन हो । सरकार ज्यादा अच्छे तरीके से इस पर अंकुश लगाकर जनसमुदाय को मजबूर कर सकती हैं कि वह न केवल पानी बचाये वरन् नये संसाधनों के बारे में भी सोचे और साथ ही साथ सरकार द्वारा उन व्यक्तियों को पुरूस्कृत करना चाहिये जो इस कार्य में उल्लेखनीय सहयोग करते हैं क्योंकि जब-जब भी किसी भी देश की सरकार ने इस तरह का आदेश पारित किया हैं उसका देशव्यापी असर हुआ है ।
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२२ मार्च २०१५
© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
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शनिवार, 21 मार्च 2015

सुर-७८ : "सिर्फ आया नहीं नया साल... लाया सौगातें भी बेमिसाल... !!!"

नया दिन
नया सूरज
नया सबेरा
नया सज गया  
देखो... कुदरत का थाल ।
.....
और... बस...
बदल गया महा-काल
लो आ गया एक नया साल
अब मिला लो समय के साथ ताल... ॥
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मित्रों...,

‘चैत्र प्रतिपदा’ के साथ ही हम भारतीयों के ‘नूतन वर्ष’ का शुभारंभ हो जाता हैं जो कि कोई कैलेंडर की एक तारीख बदलने के समान सहज नहीं हैं, न ही ३६५ दिनों का कोई आकलन कि बस, इसके बाद अगला बरस आ जायेगा ये तो बड़े ही वैज्ञानिक ढंग से अनुभवी विद्वानों और हिंदू धर्म के पुरोधाओं के द्वारा निश्चित किया गया दिवस हैं जिसके आने की सूचना सारे ब्रम्हांड में प्रकृति के बदलाव के साथ ही देखी जा सकती हैं क्योंकि फागुन के जाते ही सर्द मौसम का खात्मा होने लगता और धीरे-धीरे दिन अधिक ऊर्जावान और बड़े जबकि रातें छोटी होने लगती हैं यही तो होता दो ऋतुओं का अद्भुत संगम या संधिकाल जो हमें इस नवीनता की सूचना देता हैं । अब तो सारी दुनिया भी हमारे इस विधि-विधान को जानकर चमत्कृत हैं कि हमारे यहाँ कोई भी तीज-त्यौहार या पर्व किसी दिन विशेष से नहीं बल्कि तिथियों से नियत होते इसलिये तो भले ही लोगों को लगता कि ये तो कभी-भी आ जाते लेकिन जब बड़े-बड़े वैज्ञानिक घड़ी-पल की गणना से उसी निष्कर्ष पर पहुंचते जिस पर हम लोग सदियों पहले ही पहुच चुके थे तो वे भी इसे अपना लेते । तभी तो जिन मंत्रों या श्लोकों को जपना छोड़कर हमने उनके रॉक-स्टार की तरह चिल्लाना शुरू कर दिया हैं वही उन्होंने हमारे यहाँ के ध्यान-चिंतन और हर रीति-रिवाज़ को अपनाना शुरू कर दिया हैं तभी तो हमें ही अपने यहाँ के लोगों को जताना पड़ता कि जागो... देखो हमारे यहाँ सब कुछ हैं हमारे तो खाने-पीने और रहन-सहन की शैली में भी जो गूढ़ रहस्य और अर्थ छुपे हुए हैं उनको जानकर हर कोई आश्चर्यचकित रह जाता कि ये भारतीय जो जमीन पर बैठकर हाथ से उँगलियाँ चाटकर खाते हैं तो ये असभ्य नहीं हैं बल्कि अपने स्वास्थ्य  के प्रति जागरूक हैं तभी तो इनकी हर छोटी-छोटी आदत के पीछे एक गहन शौध हैं पर, हम लोगों का हाल ये हो चुका हैं कि जब तक कोई परदेसी हमारी किसी चीज़ पर अपना ठप्पा लगाकर उसे महत्वपूर्ण न बता दे हम सोते रहते हैं और जब वो हमारे यहाँ की खोजों को अपने नाम से पेटेंट कर लेते तो रोने लगते हैं । इसलिये जरूरत हैं कि हम सब न सिर्फ इन बातों की केवल उपरी तौर पर देखने बल्कि इनकी महत्ता को समझते हुये अपने आपको एक भारतीय कहलाने में गर्व महसूस करें न कि सिर्फ शौकिया इस जुमले का प्रयोग कर खुश होते रहे सच, बड़ी पीड़ा होती जब हम देखते कि हमारे आयुर्वेद और पुरातन ज्ञान को वो लोग न सिर्फ इस्तेमाल कर रहें बल्कि पैकिंग कर हमें भी बेच रहे हैं ।

‘विक्रम संवत्सर’ का प्रारंभ पूरी तरह से खगोलीय आंकड़ों और गणनाओं पर निर्भर करता हैं और इसका प्रतिपादन भी सृष्टि की रचना के साथ-साथ आगे बढ़ता रहता तभी तो हमारे सनातन हिंदू धर्म में जो चारयुग और काल का विभाजन हैं वो भी इतना सैधांतिक हैं कि जब हम उसका अध्ययन करते तो उसे महसूस भी कर पाते और जो कलयुग अभी चल रहा हैं उसके बारे में भी हमें ज्ञात होता कि जो कुछ भी अभी जैसा चल रहा हैं उसकी वजह क्या हैं जिसे हम ही अनदेखा कर रहे हैं जबकि जिस तरह की आसुरी प्रवृतियाँ दिखाई दे रही हैं वो सब उसी परिवर्तन के कारण हैं जो हम सबने दूसरों की देखा-देखी कर अपना लिया और अपनी मूल प्रवृति को छोड़ दिया तभी तो आज हमारे देश में भी वही सब अनाचार और घटनाक्रम नज़र आ रहा हैं जो सारी दुनिया में चल रहा हैं जबकि कभी हम ही सबको शांति का संदेश देते थे लेकिन अब हम ही उसे भूलते जा रहे हैं तो फिर किस तरह हमारी आने वाली पीढ़ी या संतति हमारे उस गौरवशाली अतीत को जान पायेगी उस स्वर्ण काल को जो अब केवल वेदों या धर्मग्रन्थों में कैद हैं और जिसे पढ़ना तो दूर कोई खोलता तक नहीं पर, जिनके भीतर अकूत ज्ञान का ही नहीं जानकारियों का खज़ाना भरा पड़ा हैं अब वक़्त आया कि हम स्वयं अपने आपको दोहराये और फिर समस्त विश्व में उसी तरह अपना नाम पहचान बनाये जिसके कारण हमें लोगों ने हमारे नाम से जाना नहीं तो हमारी अपनी भारतीय संस्कृति और परम्परायें भी पशु-पक्षियों की तरह लुप्त हो जायेंगी क्योंकि सम्भवतः ये अंतिम पीढ़ी हैं जो अब तक विरासत की उस डोर को मजबूती से थामे हैं और अपने नौनिहालों को उसके बारे में बता रही हैं लेकिन फिर भी कितने बच्चे हैं जो पालथी मारकर हाथों से खाना भूल चुके हैं... पत्तल तो दूर अब तो थाली में भी खाना नहीं लेते प्लास्टिक का प्रयोग चल रहा... इसी तरह घरों के भीतर का रहन-सहन भी उस भारतीय शैली का नहीं रहा जो हर हिंदू घर की पहचान था अब तो घर से रसोईघर, गुसलखाना, पूजन कक्ष सब नदारद रहते उनकी जगह मोड्यूलर किचन, अटेच बाथ और स्टोर रूम आ चूका हैं तो हम न सिर्फ अपनी जड़ों की तरफ लौटे बल्कि भारतीय सभ्यता के उस मुरझाते पेड़ को भी फिर से हर-भरा करें जिसमें हम अपने वास्तविक स्वरूप में नज़र आते हैं जहाँ हर घर एक आंगन में तुलसी और चारों तरफ़ एक पवित्र वातावरण झलकता हैं ।             

आज से माँ आदिशक्ति के साधना पर्व ‘नवरात्र’ की भी शुरुआत होती जो इस बात का सूचक हैं कि हम इस बदलती ऋतू के साथ सामंजस्य बिठाने के लिये अपने अंदर भी बदलाव लाये क्योंकि कुदरत को तो उपरवाला बदल देता लेकिन अपने आपको तो हमें खुद ही बदलना होगा और इन ऊर्जा से भरे नौ दिनों में हम भक्ति और उपासना से शक्ति का संचय कर आने वाले दिनों के लिए अपने आपको तैयार कर सकते हैं इसलिये तो हमारे यहाँ हर ऋतू परिवर्तन के साथ एक नवरात्र भी आती इस तरह चार नवरातें होती जिसमें से वासंतीय और शारदीय तो हम सब मनाते हैं और लेकिन दो गुप्त हैं... इन दिनों का एकमात्र उद्देश्य हमारा अपने आप को सुदृद बनाना और अगली पीढ़ी को अपने संस्कार सौपना हैं... तो सबको हिंदू नववर्ष और जगतजननी के नवरात्र की अनंत शुभकामनायें... :) :) :) !!! 
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२१ मार्च २०१५
© ® सुश्री इंदु सिंह “इन्दुश्री’
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