मंगलवार, 18 सितंबर 2018

सुर-२०१८-२५९ : #लैंगिक_भेदभाव_को_तोड़ने_वाली #अन्ना_राजम_मल्होत्रा_पहली_आई_ए_एस_बनी




आज़ाद भारत में चंद महिलाओं ने आज़ादी पाकर उसका सदुपयोग इस तरह किया कि सिर्फ, शिक्षा ही हासिल नहीं बल्कि, वे सभी क्षेत्र जो अब तक मर्दों की बपौती समझे जाते थे उनमें भी खूब जमकर सेंध मारी ताकि, उसके जरिये वहीं नहीं अन्य महिलायें भी भी वहां प्रवेश कर सके हालाँकि ये सब करना उनके लिये उतना आसान नहीं था क्योंकि, उस वक़्त तो हालात स्त्रियों के लिये इतने भी अनुकूल नहीं थे कि वो जो चाहे वो कर सके और अपने सपनों को सजा जामा पहना सके

लेकिन, जिन्हें मिसाल बनना होता है वे इन सब बंदिशों या मुश्किलों की परवाह कब करती है तो ऐसा ही एक असंभव-सा लगने वाला कारनामा कर दिखाया १७ जुलाई १९२७ को केरल के एक गांव में जन्मी ‘अन्ना राजम’ ने जो स्वतंत्र भारत के महज़ तीन साल बाद ही देश की प्रथम ‘आई.ए.एस’. बनी और अपने इस साहसिक कदम से उन्होंने जो छाप बनाई उन पदचिन्हों पर चलकर न जाने कितनी स्त्रियों ने भी अपनी मंजिल पाई और ये जाना कि वो मार्ग जिन पर चलने के लिये पुरुष समाज उन्हें मना करता या जिन्हें उनके लिये वर्जित बताता वे इतने भी दुर्गम नहीं बस, संकल्प शक्ति व जुझारूपन की कमी होती जिसकी वजह से कमजोर स्त्रियाँ हिम्मत हार जाती और अपनी नाकामी को पितृसत्ता के सर पर मढ़कर घर-गृहस्थी की डोर थाम चुपचाप बैठ जाती है

परन्तु, इनके ही बीच कुछ वो भी होती जिन्हें खुद पर यकीन होता इसलिये वे जब तक अपने आपको आज़मा नहीं लेती परिस्थितियों से समझौता नहीं करती या कहे कि उनका आत्मविश्वास इतना बड़ा होता कि वे छोटे मुकाम पर ठहर अपनी प्रतिभा को घुट-घुट कर मरते नहीं देख सकती जैसे कि अमूमन आम महिलायें करती है तो जब ‘अन्ना’ को लगा कि वे आम औरतों की तरह केवल घर की चारदीवारी में अपना जीवन नहीं गुज़ार सकती तो फिर ऐसा क्या हैं जो वो करना चाहती है ये जिसके लिये उनका जन्म हुआ हैं जब उन्होंने इस पर विचार किया तो उन्हें लगा कि ‘सिविल सर्विस’ ही वो ‘टारगेट’ है
     
यूँ तो सभी का जन्म किसी न किसी ख़ास काम को अंजाम देने के लिये होता लेकिन, सबको ये ताउम्र पता ही नहीं चलता कि अखिर वे पैदा ही क्यों हुये तो यूँ ही सोचते-सोचते दुनिया से चले जाते पर, जिनको ये इल्म हो जाता वे फिर तब तक नहीं रुकते जब तक कि अपने ध्येय को प्राप्त नहीं कर लेते तो ‘अन्ना’ को जब ये ज्ञान हो गया तो उन्होंने भी एडी-चोटी का जोर लगा दिया और १९५० में सिविल सर्विसेस की परीक्षा पास कर ये साबित कर दिया कि अगर, महिलायें चाहे तो अपनी इच्छाशक्ति के दम पर वे केवल परिवार पर शासन ही नहीं कुशलतापूर्वक देश में प्रशासन भी कर सकती और उन कार्यक्षेत्रों में भी जा सकती जहाँ उनके लिये दरवाजे बंद कर दिए गये है पर, उसकी चाबी खोजना कठिन नहीं है ।

उनके इम्तिहान पास करने के बाद भी अभी कुछ और इम्तिहान बाकी थे तभी तो परीक्षा क्रॉस करने के बावजूद पैनल ने उन्हें ‘फॉरेन सर्विसेज’ या फिर ‘सेंट्रल सर्विसेज ज्वॉइन’ करने की सलाह क्योंकि, उनके हिसाब से ये क्षेत्र महिलाओं के लिए ज्यादा मुफीद थे लेकिन, अन्ना तो दृढ़ संकल्पित थी कि उन्हें तो आई.पी.एस. ऑफिसर बनाना हैं तो वे इन कठिनाइयों के आगे भी नहीं झुकी फिर क्या वहीँ हुआ जो होना था याने कि उनके अपॉइंटमेंट पर उस वक्त प्रदेश के मुख्यमंत्री ‘सी .राजगोपालाचारी’ ने उन्हें डिस्ट्रिक्ट सब कलेक्टर बनाने की बजाय सीधे सचिवालय में नियुक्त कर दिया इस तरह वे सचिवालय में नियुक्त होने वाली पहली महिला भी बनी थी ।

‘अन्ना’ केवल पढ़ाई-लिखाई में ही उत्कृष्ट नहीं थी बल्कि, घुड़सवारी, पिस्टल, रायफल शूटिंग में भी माहिर थी और व्यावहारिक ज्ञान, मानव मनोविज्ञान व् सूझबूझ भी भरपूर थी इसलिये देश की पहली महिला प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी हो या देश के पहले प्रधानमन्त्री उनके पिता जवाहर लाल नेहरु दोनों ही उनकी सलाह लिया करते थे और उन्होंने तो राजीव गाँधी को भी उनके प्रधानमंत्रित्व काल में सहयोग दिया यही नहीं अपने जीवन काल में उन्होंने लगभग सात मुख्मंत्रियो के साथ काम किया लेकिन, कभी किसी के आगे झुकी नहीं जो सही लगा वही किया उनकी ईमानदारी व उनके प्रशासनिक कार्यों के लिये १९८९ में उनको ‘पद्मभूषण’ से भी सम्मानित किया गया था  

कल ९१ की उम्र में उनका निधन देश की एक अपूरणीय क्षति हैं और उनका जीवन आज की महिलाओं के लिये भी प्रेरणा दायक हैं जो आज सब कुछ पाकर भी भटक रही जबकि, उन्हें हर चीज़ पाने के लिये लड़ना पड़ा पर, फिर भी न तो झुकी, न हटी डटकर मुकाबला किया और विजेता बनी उनके आकस्मिक देहांत पर उनको ये शब्दांजली...!!!

_____________________________________________________
© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
नरसिंहपुर (म.प्र.)
१८ सितंबर २०१८

सोमवार, 17 सितंबर 2018

सुर-२०१८-२५८ : #श्रीराधा_अष्टमी_आई #साथ_अपने_महर्षि_दधिची_और #विश्वकर्मा_जयंती_लाई



भारत भूमि का चाव सिर्फ ऋषि-मुनियों को ही नहीं देवताओं को भी इस कदर हैं कि वे भी बार-बार जनम लेकर इसकी पावन माटी में खेलने चाहते हैं और माँ के आंचल में छिपकर अपने बाल रूप से केवल अपने जननी ही नहीं समस्त संसार को भी मोहित करना चाहते है इसलिये जब भी कोई ऐसा अवसर आता जबकि, ये देश विपदाओं से घिर जाता या पाप हद से जियादा बढ़ जाता तब भगवान् कोई न कोई रूप लेकर स्वर्ग से धरती पर चले आते और इसे पाप से मुक्त कर पुनः पुण्य व सत्य का साम्राज्य स्थापित करते है

देवताओं की एक अलग ही दुनिया हैं और धरती का अपना अलहदा संसार पर, धरती-आकाश की तरह ये भी क्षितिज़ पर कहीं मिले होने का आभा पैदा करते तभी तो हमें दूर गगन में रहने वाले वो ईश्वरीय अंश अपने ही परिवार का हिस्सा लगते और हम उनसे इस तरह अपना नाता जोड़ लेते कि बिना मोबाइल या इंटरनेट के हमारे मन की बातें अदृश्य सूक्ष्म तरंगों के माध्यम तक उन तक पहुँच जाती और जब भी कोई उन्हें करुण स्वर में आवाज़ देता तो वे उससे निराश नहीं करते दौड़े चले आते और साबित करते कि जिसका कोई नहीं उसके वे है बस, पूर्ण मन से उनको मानने व अपनाने की बात हैं फिर अकेलापन महसूस नहीं होता बल्कि, सर्वत्र व अपने आस-पास उनकी उपस्थिति का दिव्य अहसास साथ होता है

कुछ ऐसा ही महसूस होता पवित्र चातुर्मास में जब इन दिनों सकल वातावरण सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर हो जाता और सावन की तरह एक के बाद एक तीज-त्योहारों की झड़ी लग जाती जिससे समस्त प्रकृति व प्राणी उस अलौकिक आभा से दीप्तिमान होकर रिचार्ज हो जाते जिससे कि आने वाले मुश्किल हालातों का सामना कर सके और अपने आपको इतना मजबूत बना सके कि कोई भी बदलाव प्रभावित न कर सके तो इन चार महीनों का जानकार भरपूर फायदा उठाते और हर दिवस की महत्ता समझते हुये उसका उसी प्रकार से अनुभव करते जैसा कि वेद-पुराणों में वर्णित हैं

आज के समय में तो ये अधिक आवश्यक हो गया क्योंकि, नकारात्मकता इस स्तर तक बढ़ी हुई कि अपराध का ग्राफ निरंतर बढ़ता जा रहा तो आपसी रिश्तों तक में विश्वास की डोर न केवल कमजोर हो चुकी है बल्कि, समाप्ति की कगार पर हैं तो इन्हें पुनर्जीवित करने का यही एकमात्र यही उपाय हैं कि पुनः वेदों की और लौटे अपनी जड़ों से जुड़े अन्यथा अधर में लटके-लटके एक दिन कहीं के न रहेंगे इसलिये तो हमारे पूर्वजों ने बेहद सोच-समझकर ऐसी सामाजिक व्यवस्था व नियमावली जिसे अपनाकर हम अपनी जीवनशैली को चुस्त-दुरस्त व स्वयं को दीर्घायु, निरोगी बनाकर अपनी मर्जी से मोह-माया से मुक्त होकर अपने जीवन का त्याग कर सके और आगे आने वाले अपने जन्म को भी सुधार सके

आज एक ऐसा ही परम पावन सौभाग्यशाली दिवस है जब भगवान् कृष्ण की प्यारी बरसाने की लाड़ली राधारानी जिनकी एक छवि को निहारने भक्त नित दर्शन करने आते, देवताओं के शिल्पकार विश्वकर्मा जिन्होंने सतयुग में स्वर्गलोक, त्रेता में लंकापुरी और द्वापर में द्वारिका का निर्माण करने के अतिरिक्त भी अनेक समाजोपयोगी निर्माण किये और इस जगत को वृतासुर जैसे अतातायी से मुक्त करने अपनी हड्डियों तक का दान करने वाले महादानी महर्षि दधिची की जयंती हैं जिनकी कहानियां पढ़ना-सुनना आज कम हो गया और जिनसे जुडाव भी लगभग खत्म हो गया इसलिये पाप कर्मो की तरफ प्रवृति उन्मुख हो रही है ।

अब वो सात्विक और पवित्रतम वातावरण न रहा, न उपनिषद की प्रेरक कहानियां और न ही घरों में गूंजने वाली वो मंत्र ध्वनियाँ और न ही हवन के धुएं की वो सुगंधि जिनके होने से ही एक ऐसा सुरक्षा कवच हमारे चारों तरफ निर्मित होता जो हमें हर तरह की बुराइयों से बचाकर रखता बल्कि, अब तो तकनीकी युग ने ऐसा माहौल बना दिया कि मोबाइल हो या लैपटॉप या टेलीविजन जिनके माध्यम से हम अपनी सभ्यता व संस्कृति से भी जुड़ सकते की बजाय अधिकांश लोग इस तरह की गतिविधियों में लिप्त जिनसे शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य का ह्रास हो रहा, अश्लीलता बढ़ रही फिर भला दुष्कर्म क्यों न बढ़ेंगे ???              

दिन-ब-दिन बढ़ने वाली कुप्रवृति व अपराधिक घटनाओं को विराम देने का यही एक मार्ग हमारे पास बचा जिस पर चलकर हम पुनः कलयुग से सतयुग में पहुँच सकते कि हम अपने वेद, पुराण, उपनिषद, धर्मग्रंथ को पुनः खोले जहाँ न केवल इस कलिकाल का विस्तृत वर्णन मिलेगा साथ ही इससे निपटने का भी उपाय भी निकलेगा... पूजा-पाठ केवल ढोंग या औपचारिकता या धर्म का अंग नहीं बल्कि, ऐसा अमोघ अस्त्र है जिसके द्वारा हम हर समस्या को बड़ी आसानी से सुलझा सकते केवल अंतर से कलुष खत्म कर ले और मंत्रों के वास्तविक अर्थ ग्रहण करें तो हमको हराने वाला दुनिया में कोई न होगा... हमारे यहाँ तो ऐसे-ऐसे महानतम चरित्र हुये जो अपने आप में मिसाल है

आज ऐसी ही तीन विभूतियों का जन्मदिन हैं... प्रेम की पराकाष्ठा की प्रतीक वृषभान की दुलारी राधा, शिल्पकला के अद्भुत विशेषज्ञ व विशिष्ट निर्माण के महारथी विश्वकर्मा और जनहित में अपनी देह तक का त्याग करने वाले परोपकारी महर्षि दधिची... तो आज हम इनका स्मरण करें इन्हें नमन और प्रणाम कर ये वर मांगे इनसे कि हम सदैव पापकर्मों से विमुख रहे...  विश्व का कल्याण हो... राधे-राधे... ☺ ☺ ☺ !!!

_____________________________________________________
© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
नरसिंहपुर (म.प्र.)
१७ सितंबर २०१८

रविवार, 16 सितंबर 2018

सुर-२०१८-२५७ : #गर_चाहते_जीवन_को_सहेजना #तब_ओज़ोन_परत_को_पड़ेगा_बचाना




बरसों-बरस
तपस्या की थी पृथ्वी ने
तब जाकर जीवन का वरदान पाया
जल, वायु, अग्नि, बादल और मृदा ने सजाकर
सुंदर हर-भरा प्राकृतिक स्वरुप बनाया
सूर्य, चन्द्रमा, सितारे और ग्रह-नक्षत्र ने मिलकर
अम्बर के आनन को खूब सुंदर सजाया
नदी, पहाड़, झरनों, पेड-पौधों और जंतुओं ने भी
धरती का पथरीला आँगन महकाया
संवर गया आसमान तो निखर गयी वसुंधरा
ओज़ोन परत ने फिर बीच में इनके
जहरीली गैसों से बचाने जीवन को कदम उठाया
वायुमंडल को सुरक्षा कवच पहनाया
रहकर इस सुरम्य सुरक्षित वातावारण में
हमने उसे ही नुकसान पहुँचाया
जान पर बन आई अब तो
धीरे-धीरे जब हाथों अपने सब लुटाया
अब भी न हुई हैं कयामत
अब भी बचा सकते हम जो कुछ शेष
कर सकते निर्माण जो गंवाया  
दिलाने ये याद हम सबको आज
विश्व ओजोन परत सरंक्षण दिवस आया
  
_____________________________________________________
© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
नरसिंहपुर (म.प्र.)
१६ सितंबर २०१८

शनिवार, 15 सितंबर 2018

सुर-२०१८-२५६ : #मोक्षगुंडम_विश्वेश्वरैया_की_बौद्धिक_क्षमता #देश_को_दिलाई_जिसने_पहचान_और_आधुनिकता




भारत भूमि सिर्फ सोना-चांदी या हीरे-मोती ही नहीं उगलती बल्कि, इसकी कोख़ से ऐसे अनमोल मानव रूपी रत्न भी जनम लेते जो अपनी प्रतिभा-हूनर से फिर इसका ऋण अदा करते जिन्हें हम ‘भारत रत्न’ कहते आज ऐसे ही एक नायाब नगीने ‘मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया’ की जयंती हैं जिसने इंजीनियर के रूप में अपने वतन के लिये ऐसा अद्भुत काम किया कि न केवल उन्हें सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ से अलंकृत किया गया बल्कि, उनके जन्मदिन १५ सितंबर को ‘अभियंता दिवस’ के रूप में मनाया जाने लगा ताकि हम सब एक साथ न केवल उनके प्रति अपने मनोभाव प्रकट कर सकें बल्कि, उनके ही समान ऐसे सभी इंजीनियर्स का भी शुक्रिया अदा कर सकें जिन्होंने हमारे देश को इस शिखर पर पहुँचाया कि विदेशों में भी इसकी शिल्पकला का गुणगान किया जाता जहाँ कि इमारतों की अभुतपूर्व कारीगरी और वास्तुकला की आज भी देखने वालों को चमत्कृत कर देती है

न जाने ये कैसे लोग थे जिन्होंने आर्थिक अभाव और हर तरह की सुविधाओं की कमी के बावजूद भी उस दौर में जबकि, देश गुलाम था और तकनीकी शिक्षा के लिये भी उतनी व्यवस्थायें नहीं थी इन्होने न केवल अपनी काबिलियत से ही उसे हासिल किया बल्कि, अंग्रेजों को भी अपनी प्रतिभा से इस तरह प्रभावित किया कि उन्हें ये मनाना पड़ा कि कुछ तो बात है इस देश में जहाँ के लोग किस भी तरह के हालात से घबराते नहीं उसका डटकर मुकाबला करते हैं तो जब ‘मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया’ को सरकारी पद पर कार्यरत रहते हुये कुछ कर दिखाने का अवसर प्राप्त हुआ तो उन्होंने प्राकृतिक जल स्त्रोतों से प्राप्त होने वाले जल जिसे भरने के लिये लंबी दूरी टी करनी पड़ती थी उसे घर-घर में पहुंचा दिया और कीचड़ व गंदे पानी की निकासी के लिये भी नदी-नालों की ऐसी सुनियोजित व्यवस्था की जिसे देखकर फिरंगी भी विस्मृत रह गये तो उन्हें ऐसी जगह में पानी की समस्या हल करने भेजा जहाँ ये एक दुष्कर कार्य था याने कि ‘सिंध’ पर, उन्होंने इस चुनौती को स्वीकार कर सफ़लता प्राप्त कर ये साबित किया कि उनके पास हर एक मुश्किल का हल है उनके इस असाधारण कार्य के लिये सरकार ने उन्हें केसर-ए-हिंद की उपाधि देकर सम्मानित किया

अपनी अप्रतिम बौद्धिक क्षमता व मौलिकता के प्रयोग से उन्होंने ऐसे अनगिनत काज किये जो उनके जाने का बाद भी उनकी स्मृति के रूप में हमारे बीच में शेष है जैसे खेतों में सिंचाई के लिये नहर व बांध का निर्माण करना या विद्युत् ऊर्जा के लिये पॉवर स्टेशन बनाना या फिर देश को आर्थिक रूप से सृदृढ बनाना ही उन्होंने अंतिम समय तक ये काम किया क्योंकि, उनका मानना था कि इसी तरह से अंग्रजों को जवाब दिया जा सकता है तो अथक-अनवरत देश को मजबूत बनाने की दिशा में कार्यरत रहे और आज़ाद भारत में भी उनकी सोच व कार्यक्षमता में कोई कमी नहीं आई जिसकी वजह से उन्हें सन् 1955 में भारत रत्न प्रदान किया गया तब उन्होंने देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू जी को लिखा, 'अगर आप यह सोचते हैं कि इस उपाधि से विभूषित करने से मैं आपकी सरकार की प्रशंसा करूँगा, तो आपको निराशा ही होगी। मैं सत्य की तह तक पहुँचने वाला व्यक्ति हूँ।'

उस समय में इस तरह की सच्चाई बयान करने का हौंसला करने वाले आधुनिक भारत के शिल्पकार ‘मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया’ की जयंती पर उनको शब्द सुमन व ‘अभियंता दिवस’ पर सभी इंजीनियर्स को बहुत-बहुत शुभकामनायें... और ये संदेश कि अब जबकि, सभी सुविधायें व तकनीक उपलब्ध है तब उनकी निष्ठा में ही कमी है जो वे इस तरह से निर्माण या नवीन अनुसंधान नहीं कर पा रहे है       
_____________________________________________________
© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
नरसिंहपुर (म.प्र.)
१५ सितंबर २०१८

शुक्रवार, 14 सितंबर 2018

सुर-२०१८-२५५ : #हिंदी_को_अब_यूँ_अपनाये #हर_सांस_में_अपनी_इसे_बसाये




हिंदी जैसी कोई नहीं
भाषा ऐसी एक ही बनी
वर्ण बहुत इसमें भरे
जिनसे नये-नये शब्द है बने
बोलो जैसी, लिखो वैसी
इसमें नहीं मूक व्यंजन कोई
संस्कृत की है प्यारी बेटी
कहावत-मुहावरों की नहीं कमी
जैसी करनी, वैसी भरनी
ज्ञान की ऐसी कई बातें है भरी
हर अक्षर ब्रम्ह स्वरूप
लिखे सदा सार्थक वाक्य संपूर्ण
सहज-सरल जाती लिखी
इसका आधार देवनागरी लिपि
शब्दों के पर्याय इसमें कई
जब भी पढ़ो-गुनो इसे लगती नई
राष्ट्रभाषा का मान इसे मिला
राजभाषा बना हमने प्रयोग किया
14 सितंबर 1953 का दिन
*हिंदी दिवस* बनकर गया खिल
आओ इसे कुछ यूं मनाये
हर दिन हम हिंदी को अपनाये
आओ हिंदी राष्ट्र बनाये
फिर से वो हिंदुस्तान बसाये
जहां हिंदी ही हिंदी हो
किसी से न उसकी तुलना हो
अपना देश, अपनी भाषा
मां जैसी हमें ये देती दिलासा
पूरी करें इसकी हर आशा
हमसे इसकी जो उम्मीदें है बंधी
उसे पूरा करने की आई घड़ी
अभी नहीं तो कभी नहीं
रोमन में न इसको तुम लिखना
हिंदी कुंजीपटल फोन में अपने रखना
निज भाषा की उन्नति करना
सकल उन्नति का है ये मूल न भूलना
हिय में न चुभा शूल कोई रखना

_____________________________________________________
© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
नरसिंहपुर (म.प्र.)
१४ सितंबर २०१८

गुरुवार, 13 सितंबर 2018

सुर-२०१८-२५४ : #शिव_पार्वती_का_दुलारा #घर_आया_मेहमान_सबका_प्यारा




अगले बरस तू जल्दी आ...

कहकर विदा करते जिस प्यारे को वो अपना वादा निभाता और जल्दी से हम सबके बीच वापस आ जाता यूँ तो कोई भी दिन हो या कोई भी काम की शुरुआत उसका नाम लिए बिना होती नहीं फिर भी जो आनंद ‘गणेशोत्सव’ में आता वो अवर्णनीय है...

गणपति बप्पा मोरया...

सुबह से ही ये नारे लगाते हुए सब अपने-अपने घरों से निकल जाते अपने प्यारे दोस्त, भगवान् और उस मेहमान को लिवाने जिसके लिये घर का कोना सजाकर रखा होता एक-दो दिन पूर्व से ही सारा परिवार तैयारी में लग जाता कि कब गणेश चतुर्थी आये और शुभ-मुहूर्त में गणेश प्रतिमा स्थापित कर पूजा की जाये और उनको लड्डू-मोदक का भोग लगाकर सबकके साथ-साथ खुद का भी मुंह मीठा किया इसी पल का तो इंतजार था...

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा...

सुबह-शाम इस आरती के साथ शुरुआत हो जाती दस-दिवसीय गणेशोत्सव की जिसमें सबसे ज्यादा भागीदारी नन्हे-मुन्ने बच्चों की और उसके बाद सभी परिजनों की होती और इस तरह से घर के सबसे छोटे सदस्य अपनी परंपरा और संस्कृति से जुड़ते और ईश्वर को कोई भय नहीं अपना मित्र समझते जिसके साथ अपने सभी सुख-दुःख साँझा कर सकते है...      

वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभः
निर्विघ्नं कुरु में देव सर्वकार्येषु सर्वदा

प्रतिदिन घर में मंत्रों के द्वारा दिन का शुभारंभ होता और इस बहाने घर के बच्चों में संस्कार की नींव मजबूत होती वे अपने धर्म के रीति-रिवाज सीखते और अपनी मधुर बोली में तरह-तरह के मंत्र बोल अपने अंतर ही नहीं वातावरण में भी सकारात्मक तरंगें निर्मित करते जिसके प्रभाव क्षेत्र में आने वाले सभी सकारात्मकता से भर जाते हैं...

यही तो होता हर एक परंपरा या रवायत का उद्देश्य की इंसान की जड़ें अपनी मिट्टी से गहरे तक जुड़े और उसके भीतर अपनी मातृभूमि, जन्मभूमि के प्रति ऐसी भावना भरे कि सात समंदर पार जाकर भी कोई उसकी बुनियाद हिला न सके और वो अपनी इस प्राचीन परंपरा को आने वाली पीढ़ियों में इसी प्रकार हस्तांतरित कर सके जिस तरह उसके पूर्वजों ने ये धरोहर पूर्ण आस्था-विश्वास के साथ उसके हाथों में सौंपी थी...   

आज तक उस परंपरा का निर्वहन अनवरत जारी हैं और अनंत काम तक यूँ ही होता रहे इस मनोकामना के साथ सबको दस दिवसीय गणेशोत्सव की अनंत शुभकामनाएं... ☺ ☺ ☺ !!!

_____________________________________________________
© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
नरसिंहपुर (म.प्र.)
१३ सितंबर २०१८

बुधवार, 12 सितंबर 2018

सुर-२०१८-२५३ : #फेमिना_बनने_का_शॉर्टकट #तीज_त्यौहारों_का_करो_ बॉइकॅट




जैसा कि एक रिवाज चल पड़ा है पिछले कई सालों से हालांकि ये नया नहीं पर, अब तक उड़ते-उडते या कभी कहीं से ही कुछ सुनने को मिलता वो भी किसी शोभा डे टाइप की महिलाओं के मुंह से तो हम सोचते पता नहीं ये कौन लोग है और कहां रहते है पर,  सोशल मीडिया बोले तो आभासी दुनिया में इसका जिस तरह खुलकर प्रचार-प्रसार हुआ वो गौर-तलब है

क्योंकि, यहां तो ये मान लिया गया कि जो भी महिला अपने आपको प्रोग्रेसिव और फेमिना बताना चाहती उसे कुछ ज्यादा नहीं करना केवल जब भी कोई हिंदू त्यौहार या उत्सव आये तो उसके खिलाफ जोरदार लिखना है ऐसा कि पढ़ने वाला तिलमिला जाए और उसकी धार्मिक आस्थाओं, उसके ईश्वर का जमकर मजाक उड़ाना है

ये सब इस तरह करना है कि अगला यदि कमजोर हो या हीन भावना से ग्रस्त तो तुरंत अपने आपको ‘बुद्धिजीवी’ कहलाने या आपकी सोहबत में रहने आपके पाले में शिफ्ट होने का निर्णय ले ले जिसे अपनी जीत मानकर आपका अहंकार इतना बढ़ जाये कि अगली दफा आप इससे भी घातक शब्द से प्रहार करें

इस तरह जो सिलसिला शुरू होता तो फिर आपका कारोबार बढ़ता ही जाता क्योंकि, हमारे यहां तो हर दिन ही कोई न कोई त्यौहार जिनको विधिवत मानने की जिम्मेदारी औरतों की ही होती तो वे जो अब इस जिम्मेदारी को उठाना नहीं चाहती या जिनको मनमाना जीना वे अपनी आत्मग्लानि को कम करने इस तरह के हथकंडे अपनाती है

जिसमें एक तरफ से देखने पर लगता कि ये कितनी एडवांस या आधुनिक जो अपना जीवन अपनी मर्जी से जी रही जो चाहे वो कर रही इन पर किसी की न बंदिश और न ही ये किसी रीति-रिवाज को मानती एकदम स्वछंद जीवन जीती ऐसे में जो बेचारी थोड़ी-सी भी इस मामले या फेक फेमिनिज्म से अनभिज्ञ होती वो इनके जाल में फंस जाती पर, बाद में जिसका खमियाज़ा भी भुगतती क्योंकि न तो वो इनकी तरह घर-बार काम-काज छोड़कर मॉडर्न बन पाती और न ही उस आदर्शवादी खांचे में ही फिट  बैठ पाती जिसे खुद ही तोड़-मरोड़कर नया आकार देने का प्रयास किया था जिसके चक्कर में नमूना बन गयी ।

इसका दूसरा पहलू या पक्ष जो अनदेखा रह जाता वो ये कि भले ये महिलाएं इस प्लेटफार्म खुद को कितना भी मजबूत या आत्मनिर्भर दर्शाये दरअसल घर के भीतर इनकी पोजीशन भी कोई खास अलग नहीं होती केवल इतना ही कि ये खाने -पहनने जैसे साधारण निर्णय तो खुद ले लेती लेकिन, जहां बात किसी ठोस या बड़े डिसीजन या बच्चे पालने, खाना बनाने, घर संभालने जैसी जिम्मेदारियों या फिर अकेले कहीं जाने या अपने दम पर कुछ करने की होती ये भी खुद को आश्रित महसूस करती

भले ही ये उसका दिखावा नहीं करती और जो भी मजबूरीवश करती उस पर अपनी पसंद का टैग लगाकर नकली मुस्कान ओढ़ लेती और फिर इस कड़वाहट को किसी पोस्ट पर इसी तरह उगल देती जैसे कि आज हरतालिका तीज जैसे पवित्र, कठोर, धैर्य-संयम के परिचायक व्रत के साथ कर रही हैं कोई इसे अमानवीय प्रताड़ना तो कोई स्त्रियों पर अत्याचार तो कोई सामाजिक दबाब और कोई तो इसे पुरुषसत्ता की चालाकी बताने में लगी हैं

वे खुद तो एक पल भूखी-प्यासी न रह सकती पर अपनी इस कुंठा को न्यायसंगत ठहराने के लिए ‘पितृसत्ता’ नामक पंच बैग पर अपना गुबार निकालकर इस तरह बात को पेश करती कि जिसने भी उनकी बात का समर्थन न किया वो एक बेबस अबला कहलाएंगी जो मात्र अपने पति की परछाई और उसका कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं

जबकि,  हकीकत ये कि ये खुद पति के बिना अधूरी और जैसे ही एक रिश्ते से छूटती दूसरा पकड़ लेती क्योंकि, पुरुष के सहारे के बिना खुद को असहाय पाती चूंकि ये उनकी तरह एक ही रिश्ते में बंधकर नहीं रहना चाहती तो अपने मन की लालसाओं का आरोप अपने ऊपर न लेकर ‘पितृसत्ता’ पर डाल देती जिससे ये साफ-साफ़ बरी हो जाती ।

ऐसी स्थिति में ये देखकर बेहद ख़ुशी होती कि वे पारंपरिक नारियां जो भारतीय संस्कृति की वाहक वे इस नकली दुनिया में नहीं है इसलिये इन तथाकथित स्त्रीवादियों के चोंचलों से बचकर बिना किसी कुंठा या तनाव के हर एक पर्व, हर एक रीति-रिवाज को पूर्ण उत्साह से मना रही हैं जिनकी ख़ुशी देखकर ये इस कदर भयभीत हो जाती कि कुछ भी अनाप-शनाप बकने लगती हैं

कृत्रिम वातावरण में रहते-रहते और पितृसत्ता के बहाने पुरुषों को कोसते-कोसते ये इतनी आत्ममुग्धा हो चुकी हैं कि देख ही नहीं पा रही कि ‘फेमिनिज्म’ को वास्तविक मायनों में तो यही जी रही जो अपनी सुविधा व अपनी सहूलियत के हिसाब से इन पर्वों व हर उस नियम में परिवर्तन कर रही जो वर्मन परिस्थिति में उनको अनुकूल नहीं लगता और कम से कम कष्ट सहते और अपनी पहचान को बरकरार रखते हुये इन सब रवायतों का पालन कर रही हैं

जो भी ‘हिंदू धर्म’ को नहीं जानते वो इसी तरह उसके हर उत्सव या हर रिवाज़ पर ऊँगली उठाते जबकि, इतना उदार और लचीला कोई दूसरा मजहब नहीं जो समय के अनुसार ढल जाता तभी तो इतने अत्याचारों के बाद भी बचा हुआ और जब कुछ भी न रहेगा तब भी शान से खड़ा रहेगा कि उसे ‘डार्विन’ का जीवन जीने का सिद्धांत भी पता तो वो जिस तरह का माहौल होता उसी तरह से शिथिलता अपना लेता अड़कर खड़ा नहीं रहता न ही कट्टरपन अपनाता सबको साथ लेकर चलने में ही विश्वास रखता

इसलिये तो व्रतराज तीज जिसे सबसे अधिक कठिन व्रत माना जाता क्योंकि, इसमें पूरे चौबीस घंटे निर्जल, निराहार रखकर व्रत-साधना व रात्रि जागरण किया जाता उसमें भी स्त्रियों ने अपने अनुसार नये नियम बना लिये या जैसा उन्हें ठीक लगता वो कर लेती क्योंकि, वे जानती हैं कि श्रीमदभगवतगीता जो स्वयं भगवान् के श्रीमुख से निकली में स्पष्ट लिखा हैं कि आत्मा को कष्ट देकर कोई भी उपासना या व्रत नहीं किया जाता तो कमजोरी लगने या जरूरत पड़ने पर जल, दूध, चाय, जूस, फल, ड्राई फ्रूट्स आदि जो चाहती खा लेती है

ये जानते हुये भी कि व्रता कथा के अनुसार वे सज़ा भी भुगत सकती पर, उन्हें उस धर्मिक किताब की लिखी बातों का अक्षरशः पालन करने का मन नहीं करता तो वे अपनी बुद्धि से उसमें भी कोई न कोई तर्क ढूंढ ही लेती जैसे कि इसमें तो चाय या जूस या मेवों के बारे में तो कुछ न लिखा तो इनका सेवन किया जा सकता और इस तरह हंसते-मुस्कुराते कब सुंह हो जाती पता न चलता मगर, जो इनकी ख़ुशी देखकर इर्ष्या से जलती उनका क्या कीजे जहर उगलती रहती

इस ‘छद्म नारीवाद’ ने स्त्रियों का फायदा तो कुछ नहीं किया पर, नुकसान अवश्य किया क्योंकि, जो ये सब करना भी चाहती तो मन-मसोस कर रह जाती कि कहीं कोई उन्हें शुद्ध भारतीय नारी न समझ ले जबकि, जिन्हें इसके असल माने पता तो सारा श्रृंगार भी करती, पूजा में भी विधि-विधान का ध्यान रखती और अपने अधिकारों सहित ‘फेमिनिज्म’ को भी जीती न कि ढोती उन सो काल्ड फेमिना की तरह... तो उन सभी रियल फेमिनाओं को हरतालिका तीज की हार्दिक बधाई... ☺ ☺ ☺ !!!

_____________________________________________________
© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
नरसिंहपुर (म.प्र.)
१२ सितंबर २०१८