सोमवार, 18 मार्च 2019

सुर-२०१९-७७ : हुई_असंख्य_आँखें_नम #हुये_जब_विदा_मनोहर_पर्रिकर



राजनीति में हर कोई नहीं आना चाहता खासकर पढ़ा-लिखा युवा इस पर वो उच्च शिक्षित हो तो सोच भी नहीं सकता लेकिन, मनोहर पर्रिकर पहले ऐसे नेता माने जायेंगे जिन्होंने मुम्बई से आई.आई.टी. करते हुये ही ये निश्चित कर लिया कि देशसेवा करना है जिसके लिए पॉलीटिक्स को जॉइन करना एक सही माध्यम है क्योंकि, इस मंच पर आकर सर्वाधिक परिवर्तन लाया जा सकता है एवं अधिक से अधिक लोगों की सेवा भी की जा सकती तो इस तरह उनके राजनैतिक कैरियर का आगाज़ हुआ जिसमें उनका माइंड सेट पहले से ही तय था कि किस तरह उन्हें अपने लक्ष्य का संधान करना है किस तरह जनता से सम्वाद कायम रखते हुए कदम दर कदम आगे बढ़ना है

उनकी सोची हुई रणनीति कारगर सिद्ध हुई जिससे वे सही मायनों में जनप्रतिनिधि कहलाये जिसके लिये वे जनता के सेवक है न कि निजहित हेतु उन्होंने इस पद का चयन किया वे जनता के द्वारा चुनकर उनकी आवाज़ ऊपर तक पहुंचने का माध्यम बने है अतः खुद को उनसे ऊपर नहीं बराबर समझकर उनके साथ-साथ चलना है तो मुख्यमंत्री पद तक का सफर तय करते हुये उस उच्च पद पर पहुँचकर भी मन-अभिमान छूकर भी न गया सादा जीवन, उच्च विचार शैली के नेता की तरह सामान्य वेशभूषा में रहते हुये ही जनता के साथ सड़क पर एक आम आदमी की तरह ही निकलते कोई अंदाजा भी न लगा सकता कि ये मुख्यमंत्री है यहां तक कि एक बार ऐसा वाकया भी हुआ जब सड़क क्रॉस करते हुए एक युवा खुद को बड़े अधिकारी का बेटा बताते हुए उनके सामने ही ट्रैफिक रोककर खड़ा हो गया तब उन्होंने जाकर उसे मुस्कुराते हुए बताया कि वे गोआ के मुख्यमंत्री है

ये सहजता-सरलता उनकी व्यक्तिगत व सार्वजनिक पहचान थी जिसने उन्हें वास्तविक ‘कॉमन मैन’ का दर्जा दिलाया और अपनी कार्य कुशलता व तकनीकी ज्ञान के बल पर वे रक्षा मंत्री के पद पर भी सुशोभित हुये और सर्जिकल स्ट्राइक के अगुआ बनकर सैनिक व जनता के जोश को हाई किया और अपनी बुद्धिमता का परिचय भी दिया जिस पर उनकी सादगी व सौम्य व्यक्तित्व ने उनके किरदार को एक उच्चतम प्रतिमान पर स्थापित किया जिसका अहसास कल उनके निधन की खबर आ जाने के बाद हुआ जब सभी ने एक स्वर में उनकी सिम्पल पर्सनालिटी व इफेक्टिव एक्टिविटीज का उल्लेख करते हुए उन्हें अपने श्रद्धा सुमन अर्पित किये

यूं तो सभी ने अपनी तरह से उनको श्रद्धांजलि दी पर, जो उन्हें करीब से जानते थे उन्होंने उनके बहुआयामी शख्सियत का अपनी तरह से वर्णन किया जिसमें आनंद महिंद्रा का ट्वीट उल्लेखनीय है जिन्होंने लिखा कि... यूं तो परंपरानुसार देश के किसी भी नेता के निधन पर कहा जाता कि राष्ट्र को क्षति हुई परंतु, उनके सन्दर्भ में ये उक्ति शत-प्रतिशत सत्य है । यह साबित करता कि देशसेवा का उनका जुनून इस हद तक था कि अपने अंतिम समय तक उन्होंने काम करना नहीं छोड़ा नाक में पाइप लगाए वे संसद में आये तो कहा कि मैं होश में भी हूँ और जोश में भी हूँ

उनकी कर्तव्यनिष्ठता की ये सीमा थी जिसने उनको कैंसर जैसे असाध्य रोग से लड़ने की क्षमता दी और देश के लिये कुछ कर गुजरने का हौंसला भी भरा अन्यथा कोई अन्य होता तो बीमारी का बहाना बनाकर आराम करता पर, वे एक कर्मयोगी की तरह इस दुनिया को अलविदा कहना चाहते थे तो वही हुआ और उन्होंने किस तरह आम जन का दिल जीता ये उनकी अंतिम यात्रा ने दिखा दिया....

जीते तो सभी है
मरना भी सबका तय है
पर, अमर होते चंद वही लोग
जो देश के नाम
अपनी सांसें कर देते है

ऐसे देशभक्त जुझारू व कर्मठ राजनेता थे मनोहर पर्रिकर उनके असमायिक देहांत पर मन से नमन एवं शब्दांजली...  !!!

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© ® सुश्री इंदु सिंह ‘इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)
मार्च १८, २०१९


रविवार, 17 मार्च 2019

सुर-२०१९-७६ : #गण_और_तन्त्र_का_समन्वय #तोड़े_प्रोटोकॉल_बनाये_देश_सशक्त




‘भारत देश’ अपनी सभ्यता संस्कृति और विशिष्ट परम्पराओं की वजह से ही सम्पूर्ण जगत में सबसे अलग दिखाई देता और उसके अभूतपूर्व ज्ञान-दर्शन ने ही उसे ‘विश्व गुरु’ के ऊंचे सिंहासन तक पर विराजमान कर दिया और जिसको मिटाने-भूलाने की लिबरल्स व बुद्धिजीवियों की तमाम साजिशों लगातार के कुप्रयासों के बावजूद भी वो अपने पथ पर कछुए की भांति चलता हुआ फिर एक बार सिरमौर बनने की तरफ अग्रसर है जिसकी झलक आये दिन दिखाई देती जो बताती कि वाकई ये देश बदल रहा, ये एक नया भारत है जहाँ लोकतंत्र का मतलब महज़ शासन नहीं बल्कि, जनता-जनार्दन व सरकार का सम्मिलित स्वरुप है दोनों के बिना ही कोई भी राष्ट्र पूर्ण तरक्की नहीं कर सकता यदि एक कदम सरकार उठाती तो दूसरा कदम अवाम को भी बराबरी से उठाना चाहिये और जब दोनों सम्मिलित रूप से कदम से कदम मिलाकर अपनी भूमिका का निर्वहन करते तो फिर उसे तोड़ना या उसे झुकाना नामुमकिन होता है

ऐसे में जब ऐसी तस्वीरें नजर आये जिसमें जमीन से जुड़ा एक आमजन जो अपने कर्तव्य पथ पर चलते हुये ये विचार नहीं करता कि उसे इसके बदले में क्या मिलेगा या किस तरह से समाज हित में किये गये उसके उस असाधारण कार्यों का मूल्यांकन किया जायेगा वो तो केवल राम जी की गिलहरी सम जब मानव जन्म का उद्देश्य समझ लेता और अपने आपको पहचान लेता तो बस, जुट जाता परमार्थ में अथक, अनवरत अंतिम साँस तक बिना ये परवाह किये कि कौन उसे देख रहा है वो तो जहाँ कहीं भी अव्यवस्था देखता या अपनी आवश्यकता महसूस करता जुट जाता सहयोग करने मगर, यदि प्रशासन सजग होता है तो उसकी सूक्ष्म दृष्टि से उसका देशहित किया गया वो योगदान चूकता नहीं है । ऐसा ही हुआ दूर-दराज के गाँव-कस्बों में उन अत्यंत गरीब पर, सही मायनों में समाजसेवकों के द्वारा जो कहीं कृषि तो कहीं वृक्षारोपण या कहीं शिक्षा या संगीत या नृत्य या पशुपालन जैसे छोटे-छोटे काम करते हुये निजहित की जगह समाज को सर्वोपरि मानते हुये सहयोग कर रहा था ।         

इनके इस साधारण से लगते काम को असाधारण मानते हुये सरकार ने पद्म पुरस्कार के योग्य समझकर इनका चयन किया जिसकी तस्वीरें जब कल सामने आई तो लोग आश्चर्य से देखते रहे कि किस तरह एकदम साधारण-सी चप्पल पहने आमजन देश के प्रथम नागरिक राष्ट्रपति से पद्म पुरस्कार प्राप्त कर रहे थे । इसमें एक तस्वीर ऐसी भी आई जिस पर प्रोटोकॉल तोड़ने का आरोप भी लगा जब माथे पर त्रिपुंड लगाये और हल्के हरे रंग की साड़ी पहने 107 वर्षीय ‘सालूमरदा थीमक्का’ जिन्हें कर्नाटक में 8000 से अधिक वृक्ष लगाने की वजह से ‘वृक्ष माता’ भी कहा जाता है । उन्होंने सम्मान लेते समय अपने मुस्कुराते चेहरे व सहज कदम से नंगे पांव आगे बढ़कर एक हाथ से सम्मान पकड़ दूसरे हाथ से राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद जी के सर पर आशीष भरा हाथ रख दिया तो स्वयं राष्ट्रपति ही नहीं प्रधानमंत्री और अन्य मेहमानों के चेहरे पर मुस्कान आ गई और समारोह कक्ष उत्साहपूर्वक तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा ।

ऐसा कोई पहली बार नहीं हो रहा था इसके पूर्व भी जनवरी २००१ में खेतों में काम करने वाली दिहाड़ी मजदूर ‘चिन्ना पिल्लई’ जिसने महिला मजदूरों के हक की लड़ाई लड़ी उन्हें संगठित किया को ‘नारीशक्ति सम्मान 2019’ के लिये चयनित किया गया तो तत्कालीन प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी प्रोटोकॉल तोड़ते हुये उनसे उम्र में छोटे होने के बाद भी उनके पैर छूकर आशीर्वाद लिया था । चाहे वह ‘थिम्क्का’ के आशिर्वाद देते हाथ हो या ‘चिन्ना’ के पैर यह आम आदमी को गौरव से भरते है उन्हें ये विश्वास हो रहा कि अब तक जो सम्मान सिर्फ एलिट वर्ग तक सीमित थे जिन्हें पाने के लिये चापलूसी और जबर्दस्त लॉबिंग तक की जाती थी वे पुरस्कार खुद चलकर उस तक पहुंच रहे है अब देश के साधारण लोगों के असाधारण काम को सम्मानित करके पद्म सम्मान भी सम्मानित हो रहा है और ये सशक्त भारत की मजबूत दावेदारी को पेश करती वो छवियाँ है जिसने ये जता दिया कि हम सब यदि ईमानदारी से अपने कर्तव्य का पालन करे तो कितने भी अभावों में रहते हुये देश के विकास में न केवल अपना योगदान दे सकते बल्कि, उसकी पुरातन कमजोर छवि भी बदल सकते है

lll…..
गण और तंत्र
मिलते इस तरह जब
बनता इतिहास
होता अद्भुत समन्वय
समय की शिला पर
दर्ज हो जाता
एक ठहरा पल यूं ही
जहां आकाश झुक जाता
लेने धरा का आशीष
ऊपर से नीचे तक
आता नजर सच्चा लोकतंत्र
……….lll

#मेरा_देश_बदल_रहा_है
#आमजन_का_सम्मान_बढ़ाये_देश_की_शान

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© ® सुश्री इंदु सिंह ‘इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)
मार्च १७, २०१९

शनिवार, 16 मार्च 2019

सुर-२०१९-७५ : #चेतावनी




●●●
चमन वीरान है
कलियाँ भी खुद में सहमी है
आये बौर आम पर 
कोयल मगर, चुपचाप है
.....
नुच गये पंख तितलियों के
चिड़ियों को लील गयी आधुनिकता
फागुन की चली बयार लेकिन,
बुलबुल का स्वर उदास है  
.....
भंवरों ने ही लुट लिया
खिले गुलशन को दिया उजाड़
तोता रहा पुकार पर,
पिंजरे में पड़ी मैना की लाश है
....
हवसी भेड़िये
खा रहे बोटियाँ नोच-नोचकर
दबा दी गयी यहाँ
बोलती बेटियों की आवाज़ है  
.....
देखो,
चाहे जिस भी तरफ
आ रहे गिद्ध उड़ते नजर
कौओं का है बोलबाला
शोर मचा रहे खूनी चमगादड़
हुई गोरैया घायल है   
.....
उठो जागो,
सोने का मत करो नाटक
चेत जाओ यारों
निकट आ रही कयामत है
●●●

#Awake_India
#Listen_Voice_Of_Nation

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© ® सुश्री इंदु सिंह ‘इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)
मार्च १६, २०१९

शुक्रवार, 15 मार्च 2019

सुर-२०१९-७४ : #लापरवाही_किसी_की #जान_गई_किसी_दूसरे_की



कल मुंबई में ‘फुट ओवर ब्रिज’ के टूटने से जहाँ एक तरफ शासन-प्रशासन की लापरवाही उजागर हुई वहीँ दूसरी तरफ एक-दूसरे पर दोषारोपण कर जिम्मेदार लोग अपना पल्ला झाड़ते दिखे जिसने फिर एक बार ये जता दिया कि हमारे देश में जनता की जान की कीमत मुआवजे के रूप में आंकी जाती इसलिये जैसे ही कोई ऐसी खबर आती या कहीं कोई दुर्घटना घटित होती तत्काल उसके बदले सरकार कुछ नये आदेश, नई योजनाओं की घोषणा व मुआवजा देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेती लेकिन, फिर कहीं से कोई खबर आ जाती ऐसे में यही समझ आता कि हम भारतीयों के डी.एन.ए. में ही भूलने की कोई कोडिंग फीड जिसकी वजह से हम पिछले हादसों को भूलकर आगे बढ़ जाते और इसका फायदा उठाना राजनेता बखूबी जानते जबकि, जब भी कोई ऐसी घटना हो उस पर कार्यवाही होने के साथ ही ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिये कि सिर्फ वहीँ नहीं, कहीं दूसरी जगह भी उसी तरह की या कोई मिलती-जुलती घटना का दोहराव न हो पर, महज़ कुछ ऐलान होते या किसी को प्रभारी बनाकर बात खत्म हो जाती जबकि, ऐसा पुख्ता इंतजाम होना चाहिये कि फिर ऐसा न होने के प्रति हम आश्वस्त हो क्योंकि, जनता टैक्स व वोट देकर सरकार से केवल यही चाहती कि वह उसकी जान-माल की रक्षा ही नहीं उसके ऊज्वाल भविष्य की भी गारंटी ले और देश में ऐसी सुव्यवस्था कायम करे कि प्राकृतिक आपदाओं को छोड़कर कहीं से भी किसी भी तरह की कोई ऐसी खबर सुनाई न दे जिसमें कि अवाम को उसकी लापरवाही की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़े क्योंकि, इस हादसे में भी कहीं न कहीं सभी की जवाबदेही बनती जिन्होंने इसको ‘क्लीन चिट’ देते समय ये नहीं देखा कि इसकी हालत इस लायक नहीं कि ये लम्बे समय तक बोझ वहन कर सके अब भले सब इसके लिये अगले को दोषी मान रहे पर, थोड़ा-न-थोड़ा सबका कसूर जो किसी ने भी रिपोर्ट की पुष्टि करने की बजाय उसको सटीक मानते हुये आँख मूंद ली काश, कोई एक भी देख लेता उसकी जर्जर अवस्था को तो क्या इतने लोगों की जान जाती ???

तंत्र की ऐसी ही एक खामी का वाकया आज न्यूजीलैंड में भी देखने को मिला वो देश जो कि एकदम शांत व आपसी सौहार्द के लिये जाना जाता वहां एक आतंकी हमला हुआ जिसका खामियाजा निर्दोष व्यक्तियों को झेलना पड़ा दिन के 1 बजकर 45 मिनट के आसपास का वक्त था जब ‘सेंट्रल क्राइस्टचर्च’ में लोग जुमे की नमाज के लिए मस्जिदों में इकट्ठा हुए थे ठीक इसी वक्त दो अलग-अलग मस्जिदों में गोलीबारी होने लगती है और एक शख्स दनादन गोलियां दागता है जिसमें कई लोग मारे जाते हैं जिस शख्स ने इस गोलीबारी की जिम्मेदारी है वो 74 पेज का एक दस्तावेज छोड़ गया है जिसमें उसने हमले की वजह ‘मास इमीग्रेशन’, ‘लैंड जिहाद’ तथा ‘धर्मान्तरण’ को बताया है जिसके अनुसार हमलावर के निशाने पर वो लोग थे जो दूसरे देशों से आकर यूरोपीय देशों में रहते हैं खासकर उसका इशारा मुस्लिम लोगों की तरफ था इसलिये उसने मस्जिद को चुना इस तरह से ये सामने आता कि आतंक की वजह से शांति के टापू में भी भूचाल आ सकता तो अब ये जरूरी हो गया कि आतंकवाद का खात्मा किया जाये क्योंकि, इसका शिकार केवल भारत नहीं अन्य देश भी हो सकते है और कोई कुछ भी वजह बताकर अपना गुस्स उड़ेल सकता जबकि, हत्या या आतंक किसी भी तर्क से सही नहीं हो सकते जो बेकुसूरों की जान लेते और हम तो न जाने ऐसे कितने दर्दनाक मंजर देख चुके जहाँ हमारी जनता ही नहीं सैनिक भी आतंकवादियों द्वारा मारे जाते तो अब हमको अपने देश को इतना मजबूत बनाना है कि फिर यहाँ कोई आतंकवादी घुसकर किसी को मौत के घाट न उतार सके क्योंकि, कोई कहीं भी मेरे किसी भी वजह से मरे घायल इंसानियत ही होती तो उसी मानवता को जीवित रखने के लिये आतंकवाद का मरना जरूरी है और हम न्यूजीलैंड में हुए इस हादसे के मृतकजनों की पीड़ा को न केवल समझ सकते हैं बल्कि, भावना के स्तर पर उसे बाँट भी सकते है ये दर्द सबका साँझा होता है मगर, अब ये कोशिश सब तरफ से होनी चाहिये कि आतंकवाद के लिये सब एकजुट हो नहीं तो एक-दो दिन के शोर के बाद फिर एक लम्बी ख़ामोशी जब सब गाफिल होंगे अपने में तो फिर कहीं से एक धमाके के आवाज़ हमें जगायेगी तो क्या हम अभी नहीं जाग सकते ???

मुम्बई एवं न्यूजीलैंड में हुये पीड़ादायक हादसों में मृत समस्त निर्दोष आत्माओं को भावपूर्ण श्रद्धांजलि जो पता नहीं किसकी चूक का शिकार हुये पर, अब ये सब रुकना चाहिये... किसी दूसरे की खामी का भुगतान कोई दूसरा कब तलक और क्योंकर करें... ॐ शांति ॐ

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© ® सुश्री इंदु सिंह ‘इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)
मार्च १५, २०१९

गुरुवार, 14 मार्च 2019

सुर-२०१९-७३ :#हम_इतिहास_बदल_नहीं_सकते #नया_इतिहास_मगर_लिख_तो_सकते_है




14 फरवरी को हुये पुलवामा हमले के बाद से ही ‘जैश_ए_मुहम्मद’ (मुहम्मद की सेना) और उसके सरगना “मसूद अज़हर” पर शिंकजा कसने की भारत कोशिश कर रहा जिसके लिये वो हर हथकंडे अपना रहा इसके बावजूद भी जबकि, उसने तमाम सबूत व तथ्य उसे वैश्विक आतंकवादी घोषित करने के लिये ‘संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद’ को सौंप दिए ताकि उनके आधार पर इस काम को अंजाम दिया जा सके तो 27 फरवरी को फ्रांस, ब्रिटेन और अमेरिका द्वारा ‘‘1267 अल कायदा सैंक्शन्स कमेटी'' के तहत अजहर को आतंकवादी घोषित करने का प्रस्ताव लाया गया परन्तु, चीन ने लगातार चौथी बार भारत की कोशिश को झटका देते हुए प्रस्ताव में न केवल रोड़े अटका दिये वरन अपनी उस ‘वीटो पॉवर’ का उपयोग करते हुये एक तरह से नामंजूर कर दिया जिसके बारे में कहा जाता है कि स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री पंडित जवाहर लाल नेहरु ने तश्तरी के रखकर परोसे गये ऑफर को स्वैच्छा से चीन को दे दिया जिसका खामियाजा आज तक हम सब भुगत रहे है

हालाँकि, ये एक ऐतिहासिक बहस का विषय जिसमें हमें पड़ने की जरूरत नहीं क्योंकि, अतीत के पन्ने पलटने से भले कड़वा सत्य हमारे हाथ लग भी जाये तो उससे क्या होगा क्योंकि, जो दर्ज है उन पन्नों में वो वैसा ही रहेगा जिसे बदलना नामुमकिन और बदलकर कुछ हासिल भी न होने वाला मगर, इतना तो हम सब मिलकर कर सकते कि आने वाले समय में नये भारत का नया इतिहास लिखे जिसमें उसकी मजबूत तस्वीर रख सके जिस पर आने वाली पीढ़ियों को गर्व हो न कि वो खुद को ठगा या भ्रमित महसूस करे या उसके भीतर अपने ही वतन के ऐतिहासिक तथ्यों को लेकर आत्मविश्वास कमजोर नजर आये जो कि आजकल के इन्टनेट या ‘गूगल’ के जमाने में किया जा रहा जिसमें कई तरह के न्यूज़ पोर्टल लगे हुये जिसकी वजह से सही जानकारी मिलने की जगह विवाद ही बढ़ जाता कि जिसे देखो वही कोई अलग लिंक समाने रखकर खुद को सही साबित करने की कोशिश में लग जाता है और असली मुद्दा या बात कोने में ही रखी रह जाती है

ये भी हमारे लिये एक सुखद बात कि इस प्रस्ताव के पक्ष में परिषद के 5 में से 4 स्थायी सदस्य यूके, यूएस, फ्रांस और रूस ने भारत का साथ दिया और चीन द्वारा रोक लगाने के कुछ घंटे बाद अमेरिका ने ने चेतावनी देते हुए कहा कि इससे दूसरे सदस्यों को 'अन्य एक्शन लेने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है’ यह अमेरिका की तरफ से एक कड़ा मैसेज है, जिसमें राजयनिक ने कहा कि 'अगर बीजिंग आतंकवाद से लड़ने के लिए गंभीर है तो उसे पाकिस्तान और अन्य देशों के आतंकियों का बचाव नहीं करना चाहिए' इस तरह ये ज़ाहिर होता कि फ़िलहाल भले हम इसमें कामयाब नहीं हुये मगर, अपने मिशन के काफी करीब पहुँच गये और जो कमी रह गयी उसे हमको ही मिलकर दूर करना है जहाँ तक इसकी मुख्य वजह भारत का आर्थिक रूप से उतना शक्तिशाली होना नहीं समझा जाता है जितने कि बाकी सदस्य है तो अगले कदम में अब देश को इस पर ही काम करना चाहिये

फिर भी यदि हम सब एक राष्ट्र के रूप में खड़े होकर विश्व के समक्ष खुद को एक परिवार की तरह दर्शाये तो एक बेहतरीन सन्देश जायेगा न कि ऐसे ट्वीट या पोस्ट या कमेंट्स लिखे जो हमें भारतवासी की जगह दुश्मन दिखाये बोले तो जो काम शत्रु देशों को करना चाहिए वो कुछ लोग करते नजर आ रहे जबकि, जब बात देश की होती तो इसमें कोई पक्ष-विपक्ष नहीं होता फिर भी पुलवामा हादसे के बाद से देश के कुछ जिम्मेदार लोग खुद को इस तरह से पेश कर रहे मानो वो इस देश के वासी नहीं पड़ोसी देश के रहने वाले है और भारत उनका दुश्मन है विरोध का ये स्तर किसी भी राष्ट्र के लिये घातक सिद्ध हो सकता जिसे समझना होगा कि यदि एक परिवार के सदस्य भी आपस में लड़ रहे हो तो विपरीत परिस्थिति या किसी दुश्मन के बीच में आ जाने पर हाथ में हाथ लेकर उसका सामना करते न कि उसके पाले में जाकर खड़े हो जाते है

फिर एक लौह पुरुष ‘सरदार वल्लभ भाई पटेल’ जैसे कद्दावर लीडर की जरूरत है जो देश के इन बिखरे हुये नेताओं को उसी तरह एकजुट कर सके जिस तरह कभी उन्होंने इस राष्ट्र को किया था

#ChinaSupportsTerrorism
#Nation_First
#Stnad_With_India
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© ® सुश्री इंदु सिंह ‘इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)
मार्च १४, २०१९

बुधवार, 13 मार्च 2019

सुर-२०१९-७२ : #दुश्मन_के_घर_में_घुसकर #टारगेट_हिट_करने_वाले_वीर_उधम_सिंह




२० साल की उम्र में वो भी ब्रिटिश शासनकाल में गुलामी की ज़िन्दगी जीते हुये एक नवजवान के द्वारा ये फैसला लेना कि वो १३ अप्रैल १९१९ को जलियावाला बाग़ हुये जघन्य नरसंहार का बदला लेगा वो भी उस नराधम जनरल डायर से जो अपनी सरकार की बात न मानकर अपनी हुकूमत चलाता था और जिसे ये इल्म भी न था कि ये सब किस तरह मुमकिन होगा मगर, जब मन में शुभ संकल्प पैदा होता तो वो अनायास ही नहीं हो जाता बल्कि, प्रकृति स्वयं ही उसका सौभाग्यशाली का वरण करती जो उसे पूर्ण करने की शारीरिक व मानसिक योग्यता रखता तभी तो युवा ‘शेर सिंह’ के भीतर उस क्रूरतम हत्याकांड ने ऐसा आक्रोश उत्पन्न किया कि उसने ठान लिया कि इसके आरोपी को वह छोड़ेगा नहीं चाहे फिर इसके लिये उसे कहीं भी तलाश करना पड़े मगर, उसे ढूंढकर उसके अंजाम तक पहुँचायेगा तभी वो अपने उन असंख्य देशवासियों का प्रतिकार ले सकेगा जो निरीह, बेकुसूर, असहाय अवस्था में एक शैतान के द्वारा मौत के घाट उतर दिये गये थे

इसके लिये उसने पहले खुद को भारत के बाहर होने वाले सशस्त्र आंदोलनों से जोड़ा जिससे कि बाहर जाना आसान हो सके तो अपने इस अभियान की शुरुआत में उन्होंने पूर्वी अफ्रीका का दौरा किया और वहां रहकर मजदूरी करते हुये काफी वक़्त बिताया फिर इसके बाद अमेरिका चले गए जहाँ उन्होंने पंजाबी सिखों के क्रांतिकारी संगठन ‘गदर पार्टी’ के सदस्यों से संपर्क स्थापित किया जो उस समय अमेरिका में रहते थे और ब्रिटिश शासन से भारत को आजाद कराने की मंशा से एकजुट हुए थे लम्बे समय तक उन्होंने पूरे अमेरिका की यात्रा कर अपने आंदोलन के लिए समर्थन जुटाया इस कार्य के लिये उन्होंने अलग-अलग नामों का प्रयोग किया ताकि उनकी पहचान उजागर न हो सके तो इस दौरान उन्होंने अपनी योजना के प्रथम चरण हेतु अलग-अलग कालखंड में अलग-अलग रणनीति अपनाई जो पूरी तरह सफल रही क्योंकि, कायनात उनेक साथ थी उनकी मदद कर रही थी तो इस मुश्किल घड़ी में भी सब कुछ उनके लिये आसान हो गया था ।

फिर २१ साल के लम्बे इंतजार के बाद आज ही के दिन 13 मार्च 1940 को आखिरकार वो शुभ मुहूर्त आया जब वे अपने टारगेट को उसके ही घर में घुसकर मारने में कामयाब हो सके वो जगह लंदन का कैक्सटन हॉल था जहाँ पर ‘रॉयल सेंट्रल एशियन सोसायटी’ और ‘ईस्ट इंडिया असोसिएशन’ की मीटिंग चल रही थी धीरे-धीरे जैसे ही वो बैठक अपनी समाप्ति की तरफ बढ़ी तो ‘शेर सिंह’ जो ‘ऊधम सिंह’ के नाम से पासपोर्ट बनवाकर उस जगह पत पहुंचा था अचानक उठा उसने अपने कोट की जेब से रिवॉल्वर निकाला और गजब की फुर्ती दिखाते हुये एक अंग्रेज स्पीकर माइकल फ्रांसिस ओ डॉयर पर गोली दागना शुरू कर दी इस तरह पूरे 21 साल के अन्तराल के पश्चात् वो उन सभी निहत्थे भारतवासियों की हत्या का बदला ले सके और निडरतापूर्वक बड़े गर्व से आत्मसमपर्ण करते हुये खुद को पुलिस के हवाले कर दिया क्योंकि, अपना अंजाम उन्हें उस दिन से ही पता था जिस दिन उन्होंने ये शपथ ली थी कि वो उस हत्यारे को छोड़ेंगे नहीं तो जान हथेली पर रखकर चलने वाले मृत्यु से डरते नहीं उसको खुद आगे बढकर चुनते है     

अभी 14 फरवरी 2019 को इस देश ने भी अपने वीर जवानों का दर्दनाक हत्याकांड देखा मगर, किसी की रगों में दौड़ते खून में वो उबाल न आया जैसा कि ‘उधम सिंह’ ने महसूस किया था जबकि, अब देश आज़ाद और दुश्मन भी कोई सात समन्दर पार नहीं मगर, भीतर वो जज्बा नहीं शायद, जो किसी युवा को ‘उधम सिंह’ बनाता है तो आज की पीढ़ी को अपने नायकों को चुनते समय सावधान रहने की जरूरत है क्योंकि, जैसा हमारा आदर्श होगा वैसा ही हमारा चरित्र बनेगा इसलिये बाल्यकाल से पालक उनको अपने देश के महापुरुष, वीरांगनाओं के शौर्य की कहानियां सुनाकर उनके लिये ऐसी मजबूत आधारशिला तैयार करते जिस पर उनके भविष्य की ईमारत तैयार होती थी मगर, आजकल जो सोशल मीडिया पर ही सारा युद्ध कौशल दिखाते वे नहीं समझ सकते कि किस तरह अभावों के बीच उसने अपनी राह बनाई जिस पर चलकर वो मंजिल पाई जिसको साधना असाध्य था  

आज का दिवस हम सबके लिये बेहद गर्व व हर्ष का जिस दिन भारत माता के सच्चे सपूत ‘उधम सिंह’ ने देश के सबसे बड़े दुश्मन को उसके घर में घुसकर मारा और नये भारत के जिस नारे को हम आज दोहरा रहे उसको अपने कारनामे से साकार किया... जय हिन्द... जय भारत... वन्दे मातरम... !!!

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© ® सुश्री इंदु सिंह ‘इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)
मार्च १३, २०१९

मंगलवार, 12 मार्च 2019

सुर-२०१९-७१ : #चौकीदार_का_अपमान #अब_नहीं_सहेगा_हिंदुस्तान




किसी बच्चे से उसके दोस्त ने पूछा, तुम्हारे पापा क्या करते है उसने बड़े गर्व से कहा, वो तो ‘चौकीदार’ है तो अगले के मुंह से बेसाख्ता ही निकल गया ‘चौकीदार चोर है’ जिसे सुनकर आस-पास खड़े सभी बच्चे जोर-जोर से हंसने लगे और वो बच्चा सकपकाकर शर्मिंदगी से भर गया मुंह से शब्द न निकले आँख में आये आंसू छिपाकर चुपचाप घर चला गया

इसमें बोलने वाले की भी गलती नहीं वो दिन-भर यही सुनता रहता तो उसके मस्तिष्क में वो शब्द इसी तरह से फीड हो गये फिर जैसे ही उसने ‘चौकीदार’ सुना ‘चोर है’ अपने आप जोड़ दिया क्योंकि, उसे तो यही रटवाया गया था उसे भी क्या पता कि ये इतना उथला या निम्नतम वाक्य नहीं कि किसी से भी कह दिया जाए उसे क्या खबर कि ‘चौकीदार’ एक जॉब या पोस्ट उसे तो सुन-सुनकर यही समझ आया कि चौकीदार चोर है ।


कांग्रेस अध्यक्ष माननीय राहुल गांधी जी लगातार बार-बार 'चौकीदार चोर है' कहकर किसी और का तो पता नहीं मगर, एक सम्मानित पेशे और पद का निरंतर अपमान करते जा रहे है वे इतने तो नासमझ या भोले नहीं जो उन्हें ज्ञात न हो कि 'चौकीदार' किसी व्यक्ति विशेष का नाम नहीं बल्कि, एक बड़े वर्ग व सेवाधारी का एक ओहदा है जो इतना जिम्मेदारी भरा कि अगर उसके साथ 'चोर' शब्द जुड़ जाये तो उसके लिए रोजी-रोटी कमाना ही नहीं सम्मान के साथ जीना भी मुश्किल हो जाएगा क्योंकि, उस पर तो सब भरोसा कर के निश्चिंत सोते है । उसका होना लोगों को दिलासा देता कि अगर चौकीदार ईमानदारी से अपना काम कर रहा, अपनी ड्यूटी का निर्वहन कर रहा तो डरने की कोई बात नहीं उसके जान-माल दोनों सुरक्षित है फिर उसका इस तरह अपमान करना तो सही नहीं जबकि, ये असंवैधानिक ही नहीं एक पेशे पर सरासर इल्जाम है

अपार जनसमूह के बीच न केवल ये कहना बल्कि दोहराना और उनसे भी तरह-तरह से ये कहलवाना किस तरह जनमानस में चौकीदारों की छवि को खराब कर रहा इसका उन्हें अंदाजा नहीं वो किस तरह की परिस्थितियों का सामना कर रहे या किस तरह ‘चौकीदार’ कहते ही लोग स्वतः ही ‘चोर है’ कहकर उसका मजाक बना रहे वो जो अपने कंधों पर सबकी जिम्मेदारी का भार लेकर रातों में गश्त करता, चोर-अपराधियों का सामना करता उसे बदले में ये सुनने मिलता कि वो ‘चोर है’ तो उसका सर किस तरह शर्म से झुक जाता है । उन्हें यदि किसी पर आक्षेप लगाना या किसी को चोर बताना तो व्यक्तिगत तौर पर उसका नाम लेकर इंगित करें न कि एक समुदाय को इस तरह से कटघरे में खड़ा करें या उसके पेशे पर प्रश्नचिन्ह लगाये जिसकी वजह से उसको या उसके परिवार को कभी-भी इस तरह की परिस्थिति का सामना करना पड़े कि वो खुद को अपमानित महसूस करें या अपना कार्य उसे चोरी लगे या फिर वो सचमुच ही गुस्से में आकर चोर ही बन जाए आप यदि आतंकी को ‘जी’ कह सकते तो क्या चौकीदार के लिये आपके अंतर में कोई सम्मान नही है ये सोचना भी आपका नैतिक फर्ज है ।

उनको अहसास नहीं कुछ के मन में तो ये नारा सुनकर क्रोध भी उबल आता होगा कि जब हम पूर्ण जवाबदारी व सेवा भावना से अपनी नौकरी निभा रहे तब ये सुनने मिल रहा तो इससे बेहतर चोर ही बन जाये कम से कम अपने परिवार वालों को तो सुखमय जीवन दे पाएंगे और माना एक भी इस राह पर चला गया तो इसका जवाबदेह कौन होगा ???

क्या वे जानते नहीं कि ‘चौकीदार’ होता क्या है ?

एक ईमानदार चौकीदार निष्पक्ष रूप से अपने मालिक की सुरक्षा में अपना तन और मन न्योछावर कर देता है वह अपने मालिक की सुख और शान्ति के लिए तमाम रात जाग कर एक प्रहरी की तरह गर्मी, सर्दी और बरसात में जाग कर उसकी सुरक्षा में तत्पर रहता है और अपने मालिक के द्वारा दी गयी पगार में ईमानदारी से अपने परिवार का पालन करता है

शेष कहानी...

जब चौकीदार का बच्चा रोता-रोता उसके घर पहुंचा तो उसे आंसुओं से एक पिता का हृदय द्रवित हो गया जो ये तो जानता था कि कहने वाले का आशय उसके प्रति नहीं है मगर, बालमन को किस तरह से समझाये तो उसे बहलाकर सुलाया और बैठ गया एक आवेदन लिखने...

माननीय राहुल गाँधी जी,

आप से विनम्र निवेदन है कि आप अपने राजनैतिक मामलों में हम गरीब व ईमानदार चोकिदारों को न घसीटे आपको जिससे भी जो भी शिकायत है आप सीधे-सीध उस व्यक्ति का नाम लेकर उस पर इल्जाम लगाओ न कि हमारी आड़ लेकर अपने तीर चलाओ क्योंकि, आप जानते नहीं कि आप जितनी बार ‘चोकीदार चोर है’ बोलते उतनी ही बार वो जहर बुझे तीर सीधे हमारे दिलों में आकर लगते है जिसकी चुभन अब बर्दाश्त नहीं हो रही और चुनाव के आते ही जिस तरह आपने अपनी रैलियों में इस कु-मन्त्र का जाप शुरू किया है लगता आपके ऐसा करने से इन्टरनेट, गूगल या जनता के जेहन में ही नहीं समस्त ब्रम्हांड में ये इस कदर चस्पा हो जायेगा कि जब भी कोई ये ‘चोकीदार’ बोलेगा ‘चोर है’ की प्रतिध्वनि बनकर वो गूंजेगा जिसके शोर में हमारा वर्तमान व भविष्य दोनों ही बर्बाद हो जायेंगे तो आप से करबद्ध प्रार्थना है कि कृपया हमारे जीवन से खिलवाड़ न करें न ही राजनीति में हमारा इस्तेमाल करें सधन्यवाद

आपका एक अदना सेवक-

‘चोकीदार’ (जो चोर नहीं है)     

#चौकीदार_चोर_नहीं_है
#ईमानदार_चौकीदार_सुरक्षित_जानमाल

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© ® सुश्री इंदु सिंह ‘इन्दुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)
मार्च १२, २०१९