शनिवार, 5 दिसंबर 2015

सुर-३३९ : "बेहतरीन अदाकारा... 'नादिरा'...!!!"


मुड़-मुड़ के देख
कि ऐसी अभिनेत्री
फिर न आई रजत पर्दे पर
जिसकी बेबाक अदाकारी
मंत्रमुग्ध कर लेती
बांध लेती अपनी निर्भीक
लाजवाब अदाओं में
जिसने एक जमाने को
दीवाना बना दिया
कि आज फिर हमने उस
फियरलेस नादिराको याद किया ॥
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मित्रों...,

१९५२ में भारतीय सिने जगत के इतिहास में एक सुनहरे अध्याय लिखा गया जब हिंदी फिल्मों के सरताज फ़िल्मकार महबूब खाननिर्देशित देश की पहली रंगीन फिल्म आनप्रदर्शित हुई जिसमें उस सदी के महानायक और अभिनय सम्राट दिलीप कुमारके सामने बिगडैल राजकुमारी 'राजश्री' का किरदार अदा करने के लिये एक नूतन अभिनेत्री का चयन किया गया जिसे महबूब खान ने एक विवाह समारोह के दौरान केवल एक नज़र देखा था लेकिन उतने में ही उस जौहरी ने उस हीरे की परख कर ली थी तो अपने ड्रीम प्रोजेक्टजिसे उन्होंने उस दौर में ही न सिर्फ कलरफुलबनाने का निश्चित किया बल्कि इसे व्यावसायिक तौर पर विदेशों में भी भी प्रदर्शित करने की बड़ी योजना भी बनाई साथ ही इसे एक साथ तीन अलग-अलग भाषाओँ हिंदी, तमिल एवं अंग्रेजी में बनाने का जोखिम भी लिया तो इस तरह यह एक ऐतिहासिक फिल्म साबित हुई जिसने अलग-अलग श्रेणियों में कीर्तिमान स्थापित किये जबकि हम समझते कि इस तरह के प्रयोग आज ही किये जाते लेकिन हमारे यहाँ इस तरह के प्रतिभाशाली एवं स्वपनदर्शी सृजनकर्ता हुये जिन्होंने न केवल हर तरह के प्रयोग किये बल्कि उसके लिये हर तरह की मुश्किलों का सामना करने भी तैयर हुये यही वज़ह कि वे फ़िल्में जो कम संसधानों, कम लागत एवं कम से कम सुविधाओं पर, अधिक से अधिक कठिनाइयों से निर्मित हुई सबने उल्लेखनीय सफ़लता के साथ अपनी ऐसी पहचान बनाई कि आज भी हम उनको याद करते तो जिस फिल्म का जिक्र कर रहे आनउसके निर्देशक, बेनर, कास्ट, संगीत सब कुछ आला दर्जे का था तो फिर लोगों को उसको देखने का इंतज़ार भी बहुत था तो जब वो रुपहले पर्दे पर आई तो उसके सतरंगी जादुई मायावी काल्पनिक संसार ने सबको अपने आकर्षण से बांध लिया उस पर फिल्म की बिंदास नायिका फ़रहत एज़ेकेल नादिराजिसे हम अब केवल नादिराके नाम से जानते के शाही सौंदर्य तीखे-तीखे से तेवरों ने भी उसकी जोरदार सफलता में इज़ाफा किया कि वो लड़की जिसे पूर्व में किसी तरह के अभिनय का कोई अनुभव न था वो अभिनय के बादशाह दिलीप कुमारके समक्ष किसी भी तरह से कमज़ोर नज़र न आई बल्कि उसका प्रभावशाली व्यक्तित्व तो अपने नायक की आँखों में आँखें डालकर बात करता नज़र आया तो फिर उसे कोई किस तरह से नज़रअंदाज़ करता तो रातों-रात उनको लोकप्रियता का आसमान हासिल हो गया ।

कभी उसने खुद भी सपने में न इस बारे में सोचा था कि ५ दिसम्बर, १९३२ को उनका जन्म इज़राइल में एक साधारण यहूदी परिवार में हुआ जहाँ उनकी माँ इराकी व पिता मिस्त्र के थे कहते हैं बचपन से ही उनका पालन-पोषण लड़कों की तरह किया गया अतः वे लड़कों के साथ मिलकर फुटबाल व गिल्ली डंडा खेलती और उन्ही की तरह दिन-रात हुल्लड़ मचाती शायद यही से उनके अंदर एक निर्भीकता आ गयी और व्यवहार में भी एक रौबीलापन जो सामने वाले को प्रभावित कर जाता और उन्होंने आगे चलाकर भूमिकायें भी हर तरह की निभाई जिसमें अधिकांशतः खलनायिका की थी लेकिन उस तरह की दुष्ट नहीं जो हथियारों से किसी की जान लेती बल्कि उसकी अदायें ही क़ातिल थी उनकी शख्सियत में ही वो शाहाना रवैया था कि फिर उनके सामने फिल्म का नायकहो या नायिकावो कम न नज़र आती बल्कि अपना प्रभाव छोड़ने में कामयाब रहती इसलिये तो जब १९५६ में हिंदी सिने जगत के 'सपनों के सौदागर' कहे जाने वाले 'राज-कपूर' की श्री ४२०आई जिसमें कि उन्होंने एक शातिर चालाक अमीरजादी मायाका किरदार निभाया जो भोले-भाले अभिनेता को अपने जाल में फंसाकर इस्तेमाल करती हैं और इसमें वे जब-जब पर्दे पर आती उनका हर एक दृश्य हर संवाद सबको मंत्रमुग्ध कर देता फिर जब वो लहराकर गाती मुड़ मुड़ के न देख... मुड़ मुड़ के...तो हर कोई उसे मुड़-मुड़ के देखता ही रह जाता कि इससे पहले उसने ऐसे जलवे ऐसी अदाकारी देखी ही नहीं थी जिससे बच पाना मुश्किल नहीं था तो आज भी लोग उसे मुड़-मुड़ के ही देखते उसके बाद दिल अपना और प्रीत पराईमें उनकी नकारात्मक भूमिका भला किसे याद न होगी जिसने राजकुमारजैसे अदाकार और ट्रेजेडीक्वीन कही जाने मीना कुमारीतक के सामने अपने अभिनय और अलहदा अंदाज़ के वो रंग बिखेरें कि उनके बिना उस फिल्म की कल्पना करना नामुमकिन लगता इस तरह जब उस दौर में सभी नायिकायें पतिव्रता चरित्रों को निभा रही थी नादिराने खल चरित्रों से अपना एक अलग मुकाम बनाया जो आज भी अपनी जगह उसी तरह कायम हैं ।

केवल नायिका , खलनायिका या सह-नायिका ही नहीं बल्कि बाद में उन्होंने उतनी ही ठसक से चरित्र भूमिकायें भी अभिनीत की जरा याद करें कालजयी पाकीज़ामें उनके द्वारा निभाई गयी मैडम गैहर जानकी जोशीली अदाकारी और सागरकी मिस जोसेफको जिसका ममतामयी स्नेहिल पात्र मानो प्रेम का बहता सागर नज़र आता तो जूलीफिल्म में जूली की माँ मार्गरेटका यादगार रोल जिसके लिये उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहनायिका का फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला और ये एक ऐसी फिल्म हैं जो अपने समय से आगे की कहलाई जाती क्योंकि उसका विषय उस वक़्त के हिसाब से बेहद आधुनिक था याने की हर तरह के किरदार को वे इस तरह से आत्मसात कर लेती कि फिर नादिरासिर्फ़ वही नज़र आती कि उसके खोल में यूँ उतर जाती थी उनकी अंतिम फिल्म सन २००० में शाहरुख़ऐश्वर्याअभिनीत जोशथी उसके बाद वे लगभग एकांतवास में रहने लगी और ९ फ़रवरी, २००६ को इस दुनिया से चली गयी पर इस दौरान उन्होंने लगभग ६० से अधिक फिल्मों में काम किया जो हिंदी सिनेमा की धरोहर हैं और हमें उनकी सदैव याद दिलाती रहेगी कि मायाकी माया सदियों तक अपने मायाजाल में लोगों को फंसाती रहेगी तो आज उनके जन्मदिवस के अवसर पर, उस महान गौरवमयी अदाकारा को ये शब्दांजलि... :) :) :) !!!         
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०५ दिसंबर २०१५
© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
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गुरुवार, 3 दिसंबर 2015

सुर-३३७ : "विकलांगता तन की ठीक हो भी सकती... पर, मन की...???"



‘तन’ की
विकृति तो
फिर भी प्रकृति प्रदत्त
कुछ किया नहीं जा सकता
जिसका इलाज़ ख़ुदा के पास
लेकिन ‘मन’ की
वो तो इंसानी फ़ितूर
जिसका इलाज़
सिर्फ़... खुद के पास
मगर, तब ही न
जब कोई उसे अपनाना चाहे
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मित्रों...,

३ दिसम्बर १९९१ से ‘सयुंक्त राष्ट्र संघ’ ने विकलांगों के प्रति होने वाले भेदभावों को खत्म करने के दृष्टिकोण से ‘अंतर्राष्ट्रीय विकलांग दिवस’ मनाने का फैसला लिया जिसने संपूर्ण विश्व में सकारात्मक माहौल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की और लोगों का इस तरह के व्यक्तियों के प्रति रुख भी बदला जिसकी वजह से अब उनको शारीरिक रूप से अक्षम कहने की जगह ‘असामान्य’ या ‘विशेष योग्यता युक्त’ उपमाओं का प्रयोग किया जाता हैं जो स्वयमेव ये दर्शाता हैं कि इस तरह के लोग जो कि जन्म से ये जन्म के बाद किसी भी वजह से किसी भी तरह की दैहिक कमियों से युक्त होते हैं वे वास्तव में अन्य पूर्ण रूप से स्वस्थ लोगों से इन मायनों में ‘असामान्य’ नहीं हैं कि उनके अंग-प्रत्यंग या शारीरिक व मानसिक योग्यताओं में कुछ कमियां हैं बल्कि उनको तो रब ने कुछ ख़ास तरह की क्षमताओं से नवाज़ा हैं जो कि सामान्य व्यक्तियों के पास नहीं तभी तो कई बार हर तरह से सक्षम दिखाई देने वाला शख्स भी अपने अंदर उपस्थित समस्त शारीरिक-मानसिक योग्यताओं का पूर्ण दोहन नहीं कर पाता जबकि वहीँ जिसे ईश्वर ने यदि एक तरफ किसी रूप में कमजोर बनाया तो वही दूसरी तरफ उसमें असीम शक्ति दी जिसकी वजह से उसने कभी बिना हाथ के ही बड़े-से-बड़े पहाड़ों का सीना चीर दिया या उसे बिना पैरों के ही फलांग लिया तो कभी बिना आँखों के ही सब कुछ न सिर्फ पढ़-सीख लिया बल्कि उससे ज्यादा लिख भी दिया तो किसी ने मूक होने के बावजूद भी बिना कहे ही दूसरे की जुबान से सब कुछ कह दिया तो किसी ने सभी तरह से विकलांग होने पर भी कभी भी खुद को असहाय महसूस न किया और वो सब कुछ कर दिखाया जो पूर्ण स्वस्थ इंसान कभी सोच भी न पाया याने कि इन लोगों ने ये सिद्ध किया कि किसी भी लक्ष्य की पाने या किसी भी ऊँचाई पर पहुँचने के लिये अंगों की नहीं बल्कि आत्मविश्वास की जरूरत होती और यदि वो भरपूर हैं तो फिर किसी भी तरह का अभाव महसूस नहीं होता पर, जिसके पास यही नहीं तो भले उसे कुछ भी मिल जाये निरर्थक ही रहता हैं

वाकई... जो लोग अपने जीवन में सदैव किसी न किसी कमी का रोना रोते बैठे रह जाते हैं उनसे अच्छे वे लोग हैं जो मौज़ूद संसाधनों का सार्थक तरीके से उपयोग करना जानते हैं चाहे फिर वो एक हाथ हो या एक पैर या बिना हाथ-पैर के हो या दृष्टिहीन या दिमागी रूप से कमजोर किसी के मोहताज़ बनने की बजाय अपने आप में न सिर्फ खुश रहते हैं बल्कि जो भी उनको मिला हैं उसे इस्तेमाल कर आंतरिक व बाहरी ख़ुशी प्राप्त करते जिससे उन्हें असंभव को भी संभव बनाने की अनंत ऊर्जा मिलती जिसके दम पर वे हिमालय पर्वत सी असाध्य नज़र आने वाली मंजिल को भी पलक झपकते अपनी बाधाओं के बाद भी यूँ पार कर लेते जैसे कोई बहती नदी रास्ते में मिलने वाले हर तरह के छोटे-मोटे अवरोधों को लांघते हुये सागर में मिल जाती हैं तो फिर क्यों न उन्हें ‘असामान्य’ कहा जाये जो सचमुच न केवल सामान्य लोगों से अलहदा होते बल्कि काम भी बढ़-चढ़कर करते ऐसे में हमारा फर्ज़ बनता कि हमसे जो भी सहायता की जा सके वो जरुर करें लेकिन उसमें उनके प्रति सहानुभूति का अहसास न भरा हो जिससे कि यदि वे अपने काम को पूरा करने में जहाँ थोडा अधिक वक़्त लगाते वहां उसे समय से पहले ही हासिल कर सकते हैं यही तो इस दिन का मुख्य उद्देश्य हैं कि हम उनके साथ सहभागिता निभाते हुए उनको अपने साथ लेकर चले जिससे कि एक दूसरे की कमियों को एक-दूसरे की क्षमताओं से भरा जा सके ये कोई अधिक मुश्किल कार्य भी नहीं बड़े छोटे-छोटे से कदम उठाने हैं जैसे कि यदि वो हमारे साथ पढ़ते हैं तो उनका मजाक न करते हुये मदद के लिये हाथ बढ़ाना हैं और जो ऐसा करें उनको भी रोकना हैं और यदि वो हमारे आस-पास ही रहते हैं तो खुद आगे बढ़कर उनसे मित्रता करनी चाहिये न की उनके लिये मन में कोई हीन भावना रखना चाहिये जो वास्तव में हमें ही उनके समक्ष छोटा ज़ाहिर करती हैं इसी तरह जहाँ भी लगे कि उनको हमसे कोई अपेक्षा हैं तो उनके कहने के पहले ही उनकी वो ख्वाहिश पूरी कर देना चाहिये ।

ऐसी अनेक शख्सियत देश-विदेश में हुई जिन्होंने अपनी उपलब्धियों एवं काबिलियत से हर तरह की बड़ी-से बड़ी अपंगता को बौना साबित किया चाहे फिर वो ‘मैडम हेलेन केलर’ हैं जो कि कहने को तो शरीर से अपूर्ण थी मगर, हर काम पूर्णता से कर अच्छे से अच्छे समर्थवान को भी कमतर साबित किया इसी तरह ‘सुधा चंद्रन’ ने भी अपना पांव कट जाने के बाद भी उसी तरह से अपनी नृत्य साधना को पूरा किया जो ये साबित करता कि केवल अंग विशेष की कमी से कोई अयोग्य नहीं बनता बल्कि जो कुछ भी उसके पास हैं उसका सदुपयोग न करने से आदमी नाक़ाबिल कहलाता... तो इस दिन से ये भी सबक मिलता कि जिन लोगों को हाशिये पर रखा जाता कभी-कभी वही मुख्य धारा में आकर अच्छे-से अच्छों को उनकी कमतरी का अहसास करा जाते इसलिये आज का दिन हम सबके लिये जो ख़ुद को तो संपूर्ण समझ देहाभिमान में खोये रहते पर, जिनकी काया में दोष वे इससे परे बेफ़िक्र होकर हर दिन हर पल को खुलकर जीते फिर हम क्यों नहीं... :) :) :) !!! __________________________________________________
०३ दिसंबर २०१५
© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
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बुधवार, 2 दिसंबर 2015

सुर-३३६ : "आँख की किरकिरी... क्यों बनी...???"


कल तक
जिससे प्यार था
चाहने का वादा था
साथ न छोड़ने का दावा था
सब कुछ एकाएक
खोखला बन जाता कि
जब दिल किसी और के नाम से
धड़कने लगता
कोई और उसे भाने लगता
तो ‘प्रेम की नदी’ भी
अपनी दिशा बदल
उस तरफ ही बहने लगती
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मित्रों...,
  
‘राजन’ ने जब से ‘ख़ुशी’ को देखा तब से ही उसका अपना दिल ही उसका न रह गया था उसे यकीन न आता था लेकिन वो हर दिन खुद को उसके घर या कॉलेज या जहाँ भी वो होती उसके आस-पास ही पाता तो उसकी दीवानगी का कुछ तो असर ‘ख़ुशी’ पर होना लज़िमी था कि वो भी तो उम्र के उसी दौर से गुजर थी फिर ‘राजन’ में ऐसी कोई कमी न थी कि उसे देखकर अनदेखा कर दिया जाये या उसकी आँखों में झलकती प्यार की खुशबू को महसूस ही न किया जाये तो वही हुआ जो अक्सर इस तरह हमउम्र खुबसूरत प्यार से ख़ाली और प्यार की तलाश के मारे आशिकों के साथ होता तो देखते-देखते उनका प्रेम परवान चढ़ने लगा जिसका आगाज़ जितना हसीन था अंजाम भी उस समय तो उतना ही खुबसूरत लग रहा था कि दोनों ने सबकी रजामंदी से शादी कर अपना घर बसा लिया क्योंकि तब तक ‘राजन’ एक टॉप की कंपनी में न सिर्फ जॉब हासिल कर चुका था बल्कि कंपनी की तरफ से उसे अमरीका जाने का शानदार ऑफर भी मिल गया था तो फिर इंकार की तो कोई वज़ह ही न दिखी परिवार वालों को तो बस, चट मंगनी पट ब्याह कर ‘राजन’ जल्द लौट के आने का झुनझुना ‘ख़ुशी’ के हाथ में थमा उड़कर परदेस चला गया और देश में उसके पीछे रह गयी ‘ख़ुशी’ जो ‘मोबाइल’ और ‘लैपटॉप’ के जरिये उससे राब्ता रखती इंतज़ार की घड़ियाँ गुज़ारती इस उम्मीद पर कि बस, पहली फुर्सत में ही उसका हंस परदेसी फिर उड़कर आयेगा और उसे भी अपने साथ उड़ाकर ले जायेगा

शुरुआत में सब कुछ ठीकठाक ही चल रहा था जितनी बेचैनी उसे होती उससे अधिक बेताबी उसने ‘राजन’ के व्यवहार में पायी थी तो उसे यकीन हो चला था कि वो उसके बिना अधिक दिन अकेला न रह पायेगा और हर संभव कोशिश कर उसको अपने पास लेने आयेगा मगर, धीरे-धीरे जब एक साल ही गुज़र गया पर, न तो वो आया न ही अब उसकी बातों में ही वो बेकरारी या चिंता झलकती जो उसके अकेलेपन का सबसे बड़ा संबल थी तो उसे चिंता होने लगी पहले-पहल तो उसने उसे अपने दिमाग की खलल समझ उड़ाया कि ये तो हो ही नहीं सकता वो गलत समझ रही वजह कोई और होगी तो उसने हर तरह से उससे पूछने की कोशिश की कि आखिर वो अब उसे उतना समय क्यों नहीं देता मगर, पहले वो जहाँ उसे उसे काम की अधिकता का बहाना बनाकर टालने की कोशिश करता पर, जब उसने उसे बिल्कुल ही हाशिये पर डाल दिया तो उसके जेहन में सोये शक के सांप ने फेन उठाना शुरू कर दिया जितना वो इस बात को हल्के में लेकर उड़ाने की कोशिश करती वो सांप उतनी ही तेजी से उसे डसता फिर जब ज़हर ज्यादा ही फ़ैल गया तो ‘राजन’ पर भी उसके छींटे पड़ने ही थे तो एक दिन वो झल्ला पड़ा कि आख़िर, अचानक ये काम इतना ज्यादा किस तरह से इतना बढ़ गया कि उसे बात करने की फुर्सत ही नहीं मिलती और जब भी वो उसके आने की बात पूछती तो चिढ़ जाता अब उसे बताना ही पड़ेगा कि वो कब आ रहा हैं क्योंकि अब तो उसके परिवार वाले और रिश्तेदार भी सवाल करने लगे हैं और चाचाजी ने तो कह दिया कि वो उससे मिलकर सही बात का पता लगाकर ही रहेंगे तो एक-दो दिन में वो उसके पास पहुँच जायेंगे बस, इतना सुनना था कि ‘राजन’ ने ये कहकर कि वो अब किसी और को चाहता हैं और उसके बिना जी नहीं सकता अंतिम वार कर ही दिया ‘ख़ुशी’ को समझ ही नहीं आया कि वो क्या कहे इस सदमे को झेल पाना उसके लिए मुश्किल था कि विरह ने उसे पहले ही कमजोर कर दिया था उस पर ये शोकिंग न्यूज़ वो तो बहिश ही हो गयी ।

जब कुछ होश में आई तो उसे समझ ही नहीं आया कि राजन किस तरह से ऐसा कर सकता हैं उसने उससे भी तो कहा था कि वो उसके बिना जी नहीं सकता और अब ये कोई और आ गयी जिसके प्रति भी उसकी वही फीलिंग कैसे हो सकती आख़िर वो किस तरह से उसके साथ धोखा कर सकता हैं... इस जैसे लोगों ने ही तो प्यार का नाम बदनाम किया हैं जिनके अहसास मौसम की तरह लडकियों को देख बदलते रहते ऐसे शख्स से प्यार करने वाले को कुछ भी हासिल नहीं हो सकता और उसने अपनी तरफ से ही उस पर धोखेधड़ी का इल्ज़ाम लगाते हुये तलाक का नोटिस भेज दिया तब उसके दिल को कुछ सुकून महसूस हुआ... :) :) :) !!!     
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०२ दिसंबर २०१५
© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
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मंगलवार, 1 दिसंबर 2015

सुर-३३५ : "साधे निशाना सीधे लक्ष्य पर... न देखें इधर-उधर...!!!"


‘बीमारी’
कुछ का होता
इलाज़ संभव तो
कुछ होती लाइलाज़
मगर, जैसी भी हो वो
छूपाने या छूपने से तो
कुछ होने का नहीं
तो बेहतर कि
बाहर निकले और 
करें कुछ ऐसा कि खुद भी
स्वस्थ बने और
गर, ये संभव न भी हो तो 
दूसरों को ही करें
आख़िर, जीना इसी का नाम तो हैं
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मित्रों...,

१ दिसंबर ‘एड्स दिवस’ जो मनाया तो जा रहा इतने सालों से मगर, सार्थक तभी होगा जबकि इसका नामों-निशान पूरी दुनिया से मिट जायेगा पर, आज इतनी अधिक जागरूकता और उपचार के साधनों के बावजूद भी अब तलक भी न सिर्फ लोग इसके चपेट में आ रहे हैं बल्कि इसकी गंभीरता से भी अनजान बने हुये हैं ये सोचकर कि वो तो सभी सावधानियां रख रहे तो फिर उनको तो ये रोग होने से रहा क्योंकि उनके जेहन में तो अपनी मनमानी करने के साथ-साथ इससे बचाव का उनका मनचाहा उपाय ही समाया रहता जिसे वे न जाने कब से देखते-सुनते आ रहे तो फिर चिंता किस बात की ये सोच बेफ़िक्र जो जी में आता करते रहते कि उन्हें तो इससे बचने का मानो ‘ब्रम्हास्त्र’ ही  मिल गया लेकिन भूल जाते कि जिसे वे अचूक हथियार समझते वो भी कभी-कभी चूक जाता लेकिन यदि उन्होंने इसके बजाय संयम-धैर्य खुद पर नियंत्रण करने का तरीका अपनाया तो फिर सिर्फ ये ही क्या दुनिया की कोई भी बीमारी उनको छू न पायेगी बशर्ते कि वे अपनी इंद्रियों पर काबू पाने के प्रति दृढ़ संकल्पवान हो और अपने मन को आकर्षण से बचाने के लिये उन सब चीजों से परे जाने की बजाय उसकी लगाम को कसकर थाम ले ताकि वो किसी भी दृश्य या अदृश्य कल्पना से भी विचलित न हो सके पर, ये तो थोड़ा मुश्किल लगता तो सब आसान उपाय की तरफ झुकते जिसमें उनका अपना स्वार्थ छिपा होता क्योंकि अगला भी तो उनसे ये नहीं कह रहा कि वो अपने आपको नियंत्रित करें बल्कि वो तो उन्हें खुली छूट दे रहा कि जो भी करना हो बेशक करो बस, अपने पास उसके ‘वायरस’ को आने से रोकने एक माध्यम का इस्तेमाल करो वो भी मुफ़्त में सरकार से हासिल करो वाह... क्या कहने हैं  

सच, जब भी कभी ‘टी.वी.’ पर या सड़क के किनारे लगे ‘होर्डिंग्स’ या फिर दीवारों पर इससे संबंधित सर्वाधिक प्रचलित जुमला सुनती या पढ़ती हूँ कि ‘एड्स से सावधानी हेतु ‘कंडोम’ का इस्तेमाल करें’ तो हमेशा बेहद अजीब लगता भले ही ये कटू सत्य हैं कि इसकी मुख्य वजह ‘असुरक्षित यौन संबंध’ हैं तो क्या ये ज्यादा उचित न होगा कि इसके लिये ये कहा जाये कि इस तरह के संबंधों से परहेज किया जाये पर सरकार भी मानव मन की उस कमज़ोरी पर विजय पाने का सूत्र उनके हाथ में थामने की जगह ये चीज़ रख देती और ‘रेड लाइट एरिया’ को बंद करने की जगह वहां जाते समय क्या ले जाना जरूरी हैं ये बताती मतलब कि सभी ‘एड्स’ रोधी संस्थायें या नियंत्रक कार्यकर्त्ता लोगों को ये कहते कि जो इस ‘राजरोग’ का सबसे बड़ा कारण हैं उसको समाप्त न करो क्योंकि उन्हें पता कि उनके कहने मात्र से ही कौन इस बात को मान लेगा तो वे उन्हें रोकते नहीं इसके अलावा इसके पीछे उनका एक तर्क ये भी रहता कि ‘एच. आई. वी. ग्रसित’ व्यक्ति यदि अपनों के साथ भी सावधान रहना भूल जाये तो कहीं इस गलती का खामियाज़ा उसके साथी को न उठाना पड़े लेकिन कोई ये न सोचता कि बंदा उसी जगह पर असावधानी जरुर करता तो फिर ये तो साफ़ हो गया कि सभी लोग उस प्रमुख कारक को अनदेखा कर कहीं और निशाना लगा रहे तभी तो जो परिणाम अपेक्षित था वो अब तक मिला नहीं कि कोई भी व्यक्ति अपने जीवनसाथी के संग रहते समय इसकी उपेक्षा करता तो जिसे दूर-दूर तक इस खतरे का अंदेशा न था वही एक दिन अँधेरे कमरे में अकेला बैठ अपने जीवन की बची-खुची घड़ियाँ गिनता कोई इस पहलू की तरफ देखता ही नहीं वरना, इस रोग से मरने वालों या इसकी चपेट में आने वालों के आंकड़े इतने भयावह कभी न होते

क्या आपको पता कि १९८० से लेकर अब तक केवल ३५ वर्षों की इस छोटी-सी अवधि मात्र में ७.८ करोड़ से कुछ अधिक ही लोग इसकी लपेट में आ चुके हैं जिनमें से ३.९ करोड़ लोग तो इसकी वजह से मौत की आगोश में समा चुके हैं तो ३.५ करोड़ लोग अब भी इससे जूझ रहे हैं जिसमें से २१ लाख तो भारतीय ही हैं और सर्वेक्षण बताते हैं कि एशिया में १० में से ४ लोग इस वायरस के आक्रमण से लस्त-पस्त हो एकाकी जीवन बिता रहे हैं भले ही इसके साथ ये सुखद तथ्य भी शामिल हो कि २००१ से अब तक इसके संक्रमण में ३८% की कमी भी आई हैं जो अपने आप में खुद ही ये दर्शाता कि स्थितियां अधिक नियंत्रण में नहीं कि लोगों का अपना आप ही उनके नियंत्रण में नहीं तो फिर दूसरी वजहें भी इतनी मायने न रखती क्योंकि जब हम किसी अपराधियों के सरगने को ही मार देते तो उसके बाक़ी साथी तो स्वयमेव ही कमज़ोर होकर हार मन लेते तो इस ‘एड्स दिवस’ से यहाँ-वहां की जगह सीधे चिड़िया की आँख पर निशाना लगाये तो सब कुछ अपने आप ही संभल जायेगा... सच... :) :) :) !!!
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०१ दिसंबर २०१५
© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
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