रविवार, 26 जुलाई 2015

सुर-२०७ : "कारगिल विजय दिवस... शहीदों को करें नमन...!!!"

दुश्मन उपर
चोटी पर था बैठा
सेना नीचे
धरती से रही मार
ऐसा किया
जमकर उस पे वार
गिरा उसे
जमीन पे चटा दी धूल
जता भी दिया 
अब न करना ऐसी भूल
वरना...
हिलाकर रख देंगे तुम्हारी चूल
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मित्रों...,

कभी ये वतन अखंड था जिसमें सब एक साथ एक ही जमीन पर मिलकर प्रेम से रहते थे पर, जब इस ‘सोने की चिड़िया’ कहलाने वाले मुल्क पर विदेशियों की नजर पड़ी तो उन्होंने अधिक से अधिक फायदा उठाने के लिये ‘फूट डालो राज करो’ का अचूक हथियार चलाया और जिसने पूरी दुनिया के सामने ‘अनेकता में एकता’ की अद्भुत अनुकरणीय मिसाल पेश की उसी भारत भूमि के टुकड़े-टुकड़े करवा दिये तो वही जो कभी भाई-भाई थे हंसकर हर ईद-दिवाली मिलाकर मनाते थे किसी तरह का भेदभाव न मानते थे वही उनकी सियासी चाल का ऐसा मोहरा बने कि फिरंगियों के जाने के बाद भी अब तक राजनीतिज्ञों के हाथ में रखे ताश के पत्ते बने हुये हैं जिन्हें वो कभी भी अपनी जरूरतों के हिसाब से इस्तेमाल करता रहता हैं शायद, यही वजह हैं कि जब भी कभी भाइयों के बीच दूरियां मिटाने की बात होती हैं या कोई भी ऐसा प्रयास किया जाता हैं कि वे आपस में मिल अपने गिले-शिकवे दूर कर सके तो यही बंटवारा कराने वाले फिर सक्रिय हो जाते हैं और उन्हें बांटने वाली दीवार में ईट-सीमेंट का गारा और थोड़ा-सा भर देते हैं ताकि वो फिर से कमजोर न होने लगे और किसी के भी तोड़ने से न टूटे तभी तो हर कोशिश नाकाम दिखाई देती हैं और जो जहर दहशतगर्दियों के जेहन में भर दिया गया हैं वो उसे उगलने लगते हैं जिसका खामियाज़ा सबसे ज्यादा बेगुनाहों को भुगतना पड़ता हैं पर, सियासतदारों को क्या फर्क पड़ता वो तो यही चाहते कि जंग यूँ ही होती रहे, दुश्मनी यूँ ही बढ़ती रहे, नफरत की खाई गहरी होती रहे जिसका नतीजा वो ‘कारगिल युद्ध’ भी हैं जो उन कट्टरपंथियों की वजह से हुआ जो ये मानने को तैयार नहीं कि इंसानी जान किसी जमीन के हिस्से से अधिक महत्वपूर्ण हैं और यदि वो जबरन हमारे घर में डाका डालेंगे तो वही होगा जो हर बार होता हैं क्योंकि उनको धोखा देना या पीठ पर वार करना आता हैं तो हमको भी सीने पर वार झेलने और शत्रु को हर हाल में मार गिराने का हूनर आता हैं


भले ही इस ‘अखंड भारत’ के अनेक हिस्से कर दिये गये और उनके बीच ‘लाइन ऑफ़ कंट्रोल’ भी बना दी गयी पर, जिसे किसी संविधान, कानून या न्यायपालिका का भय नहीं और न ही किसी से प्रेम हैं वो भला कब इस तरह की लकीरों की इज्जत करने लगे तो हर मर्यादा की तरह आये दिन  इसे भी तोड़ने में लगे रहते ऐसा ही कुछ हुआ था मई १९९९ में जब कई पाकिस्तानी सैनिक एवं आतंकवादी इस दहलीज को पार कर हमारी भूमि में चोरों की तरह चुपके से घुस आये और हमारी बहुत सी महत्वपूर्ण चोटियों पर अपना कब्जा जमा कर बैठ गये थे साथ-साथ लेह-लद्दाख को भारत से जोड़ने वाली सडक भी अपने नियंत्रण में ले लिये थे जिससे कि सियाचिन ग्लेशियर पर हमारे देश को कमजोर कर अपना अधिकार कर सके ऐसी स्थिति में भी हमारे देश के जवान सैनिक बिलकुल न घबराये बल्कि उनको मुंह तोड़ जवाब देकर इस देश से निकालने के लिये जान की बाजी लगाने तैयार हो गये और इस तरह दुश्मन को भागने के लक्ष्य के साथ ‘ऑपरेशन विजय’ का आगाज़ किया गया और आख़िरकार आज के दिन यानी कि २६ जुलाई १९९९ को उन्होंने इसमें सफ़लता प्राप्त कर ही ली जिसने फिर इतिहास रच दिया कि शत्रु कितना भी ताकतवर हो या कितनी भी चालाकी क्यों न दिखाये लेकिन इस देश के वीर सैनिक जो सेना में भर्ती होते समय ही अपनी मातृभूमि की खातिर अपने प्राणों की भी परवाह न करने की शपथ लेते हैं उसे वो वक्त पड़ने पर शब्दशः निभाते भी हैं जिसे वो अनगिनत अवसरों पर सिद्ध कर चुके हैं और जब भी देश पर मुसीबत आई उन्होंने हंसते-हंसते जान की बाजी लगाई... आज के दिन उन सभी शहीदों को हर हिंदुस्तानी के दिल की गहराइयों से अपने उन हौंसलों के लिये बधाई... जिसकी वजह से हमने आज़ादी न गंवाई... :) :) :) !!!  
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२६ जुलाई २०१५
© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
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शनिवार, 25 जुलाई 2015

सुर-२०६ : "लघुकथा : जननी बनाम लेखक"


बात बहुत पुरानी हैं शायद, तब की जब से ये दुनिया बनी हैं... कोई पढ़ता हैं या नहीं इस बात की परवाह किये बिना वो रोज बिना नागा किये कुछ न कुछ लिखता था वजह किसी को नहीं मालूम पर, इसी वजह से सब उसे खुद से अलग समझते और हैरत से देखते थे लेकिन केवल वही जानता था कि ये उसका शौक या जरूरत नहीं बल्कि उसकी मजबूरी थी क्योंकि अनवरत कुछ जानी-पहचानी तो कुछ अनजानी आवाजें उसके जेहन में गूंजती थी और दुनिया के हालात, विसंगतियों से किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता केवल उसे ही दिखाई देती थी जिनसे वो इतना परेशां हो जाता था कि यदि उसे कागज पर न उकेरे तो शायद पागल हो जाये... ये और बात हैं कि इसके बावज़ूद भी घर हो या बाहर लोग उसे ‘पागल’ ही कहते थे उसका मजाक उड़ाते थे फिर एक दिन सबने देखा कि वो तो रहा नहीं पर, उसके जाने के बाद जिसने उसकी कलम उठाई वो भी उसके जैसा ही बन गया और ये सिलसिला ही चल निकला जिसने कलमकारों की एक जमात पैदा की जिसे कि ‘लेखक’ के रूप में पहचान मिली और लेखन उसका जीवन बन गया पर, इस लिखने के दौरान एक सच्चा ‘लेखक’ जिस पीड़ा से गुजरता हैं इसे केवल सृजनकर्ता ‘जननी’ ही समझ सकती हैं क्योंकि जब उसने ईश्वर से कहा कि वो भी ‘स्त्री’ की तरह माँ बनने के सुख को महसूस करना चाहता हैं तो भगवान ने ‘तथास्तु’ कहा था
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२५ जुलाई २०१५
© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
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शुक्रवार, 24 जुलाई 2015

सुर-२०५ : "जीने को एक ख्याल ही काफी हैं...!!!"

एकाकीपन
अक्सर डराता बहुत
जब होता नहीं
कुछ करने के लिये भी 
तो न भाता फिर
वही सब जो शौक था
ऊब जाता जी उससे 
बस, वो तो चाहता वही
जिसकी ख्वाहिश हैं
या फिर जो उस तन्हाई को
महफ़िल के अहसास से भर दे
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मित्रों...,

दुनिया में अकेला केवल वही जी सकता जिसका मन या तो ईश्वर की भक्ति में लीन हो गया हो या फिर रब के बनाये किसी बंदे में या फिर ख़ुदा की इबादत में या फिर उसके उस स्वपन में जिसे वो हर हाल में साकार करना चाहता हैं या फिर वो जो इस तरह जीने को मजबूर हो वरना, तन्हाई में तो सबका ही जी घबराता और वो उससे दूर जाना चाहता क्योंकि इंसानी फ़ितरत हैं कि वो जो नौ महीने निपट अँधेरे में गुज़ार लेता हैं तो वो आँख खुलते ही रौशनी और आदम जात के वजूद से वाकिफ़ होने के बाद से ही फिर कभी उस अंधकार में लौटना नहीं चाहता सही हैं जब तलक सूरज से न मुलाकात हुई हो उसका उजाला ही न देखा हो तो रात का अँधेरा ही भला लगता लेकिन जिस पल ये नजरें देख लेती चमचमाता रोशन नज़ारा फिर वो नहीं चाहती देखना अँधेरा और अकेलापन दुबारा कि उसमें तो जी सकता केवल वही जिसकी तकदीर को लिखा गया हो स्याह रातों की कालिमा से या जिसे करनी हो तपस्या पर, आदम जात की संतान से भरी इस दुनिया में कुदरत के कितने भी हसीन नज़ारे हो देर तक रोक नहीं सकते यूँ भी कहते हैं कि ये पर्वत, नदी, झरने, पेड़, पोधे, पक्षी, तितलियाँ भी सिर्फ एक हद तक ही मन की लुभाती पर, संगत तो हमजात की ही सुकून देती हाँ ये और बात हैं कि जिसे मिले हो सिर्फ धोखे ही धोखे इस संसार में तो फिर उसे होती वहशत अपनों से भी पर, ऐसे में भी वो अकेला नहीं रहना चाहता तभी तो या तो वो मूक पशुओं से प्यार जताता या निर्जीव वस्तुओं में सुख तलाशता और किसी न किसी तरह अपनी तन्हाई को बिताने का सामां ढूंढ ही लेता याने कि चाहे जीती जागती हो या फिर बेजान उसके अकेलेपन को दूर करने में जो भी सहायक हो वो उसे अपना लेता जो उसके जीने का भी सहारा बनता क्योंकि इस जगत में वही फिज़ूल अपना जीवन बिता सकता हैं जिसे कि इसकी सार्थकता का इल्म न हो लेकिन जिसने इसके मायने पा लिये तो फिर वो उसे किसी भी तरह गंवाना नहीं चाहता जो भी इसे अर्थ दे सके ऐसा कुछ करना चाहता       

कभी-कभी देखा हैं कि पास कुछ भी नहीं न तो कोई सामान न ही कोई इंसान फिर भी अकेला बैठा हुआ बंदा मुस्कुराता हैं वो अपनी संगत में ही बड़ा खुश दिखाई देता हैं और जब उसकी अंदरूनी तबियत कुछ ज्यादा ही प्रसन्न होती तो फिर वो गुनगुनाने भी लगता जिसकी वजह यदि पूछे तो जवाब कुछ भी नहीं या यूँ कहे कि उसे बयाँ कर सके वो अल्फाज़ मिलते नहीं क्योंकि ये तो उसके अंतर्मन की गहराइयों से उपजी उस ख़ुशी की एक हल्की सी झलक मात्र हैं जो उसे अपने किसी ख्याल से मिली हैं और उसे किसी को बता पाना मुमकिन नहीं कि ये वो राज हैं जो बोल देने पर उसके चेहरे की हंसी छीन लेगा जी हाँ... ये सच हैं कुछ बातें होती हैं ऐसी बिल्कुल गूंगे के गुड जैसी जिन्हें महसूस तो किया जा सकता है पर उसे बयाँ कर पाना संभव नहीं होता ये तो बस आपके हाव-भाव से अभिव्यक्त होती हैं तभी तो उस अदृश्य शक्ति की प्रार्थना में एकदम अकेला बैठा हुआ व्यक्ति कितना शांत कितना आनंदित नजर आता जबकि वो तो न तो उसे देख सकता न ही उससे बात कर पाता या उसके संग ही रह पाता क्योंकि उसने अपने तप से जो पाया वही उसका संबल बन उसे जीने का ही नहीं हर हालात से लड़ने का भी हौंसला देता हैं... और जिसने रूहानी प्रेम को पा लिया वो भी उसी के समकक्ष पहुँच जाता और उसे फिर सिवा उसके कुछ न भाता.. तभी शायद शायर ने लिखा कुछ नहीं हैं भाता जब रोग ये लग जाता... तो प्रेम का हर रूप हमें अकेलेपन में  जीने की ताकत देता हैं... :) :) :) !!!   
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२४ जुलाई २०१५
© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
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गुरुवार, 23 जुलाई 2015

सुर - २०४ : "एक नरम तो दूजा गरम... पर, देशभक्ति दोनों का धरम...!!!"

‘मातृभूमि’
का कर्ज चुकाना

‘कर्मभूमि’
उसको बना लेना 

‘जन्मभूमि’
को कभी न भूलना

‘देशभक्ति’
का सच्चा धर्म निभाना 

कर देता अमर
सदा-सदा के लिये
यहीं हैं ‘इतिहास’ का कहना
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मित्रों...,

गुलाम भारत को स्वतंत्र कराने के लिये अनगिनत क्रांतिकारियों ने अपनी जान की बाजी लगा दी और उस महायुद्ध का मैदान बनी भारत की भूमि के कण-कण में वीरों का जो लहू टपका वो उनके  बलिदान की दास्ताँ स्वयं कहता हैं भले ही कुछ लोग इस लड़ाई के दौरान गुमनाम ही रह गये लेकिन ये ‘धरती’ माता तो अपने किसी भी लाल की कुर्बानी को नहीं भूली और न भूल सका हैं ये ‘देश’ जिसने पिता बन अपने साये के तले उसे आश्रय दिया, सदा आसमान की तरह उसका रक्षक बना रहा और उसकी शहादत पर जार-जार रोया भी तो फिर हम उसके हमवतन भाई-बहिन किस तरह से उनको विस्मृत कर सकते हैं जिन्होंने हम सबको न सिर्फ़ परतंत्रता की जंजीरों से छुड़ाया बल्कि हम सबको खुली हवा में सांस लेने के लिये ऐसा वातावरण दिया जहाँ देश ही नहीं उसकी बागड़ोर भी अपनों के हाथों में थाम दी और स्वदेश की जनता को उसका ही बनाया ‘लोकतंत्र’ का तोहफ़ा भी दिया जो भले ही उस तरह से आकार न ले सका जैसा कि उसका स्वपन देखा गया था फिर भी केवल आज़ादी के सौ साल के पहले ही जिस तरह से उसकी ‘पॉजिटिव’ तस्वीर नज़र आ रही हैं वो शायद, उसके ‘नेगेटिव’ से अधिक सुंदर नहीं हैं क्योंकि जिस तरह से सन ४७ से लेकर अब तक देश का माहौल बदला हैं और भ्रष्टाचार, अत्याचार, दुराचार, आतंकवाद, बेरोजगारी, भुखमरी, जनसंख्या विस्फोट के अलावा कई नई समस्यायें पैदा हुई हैं जो अभी तक हल हुई नहीं हैं और नई दूसरी सामने आती जा रही हैं जो उस भ्रम की पोल खोल देती हैं जिसके गलत प्रचार में हम जीते रहते हैं या जिसके झांसे में आकर आसानी से अपना कीमती ‘वोट’ किसी को भी दे देते हैं तब ऐसे में हमें इतिहास में पढ़ी ऐसे महानायकों की याद आती हैं जिन्होंने दूसरों के शासन में रहते हुये, बिना किसी तरह की आज़ादी या सुविधा न होने पर भी जिस तरह का भरपूर सार्थक जीवन जिया वैसा हम अपने लोगों के बीच समस्त तरह की सुख-सुविधा के होते हुये भी नहीं कर पा रहे जिसकी वजह भले ही कुछ भी हो लेकिन जिन लोगों ने हमें ये जिंदगानी देने के लिये अपने प्राणों की आहुति दे दी उनका पुण्य स्मरण करना तो हम सबका फर्ज़ बनता हैं या हम इतने कृतध्न हो चुके कि ये मानते हैं कि ये तो उनका फर्ज़ था तो उन्हें ये करना ही था या फिर आज के नौजवानों की तरह कंधा उचकाकर बोले कि, यदि हम उस दौरान पैदा होते तो हम भी करते इसमें हमारा क्या कुसूर जो हम अब पैदा हुये तो हम तो मस्ती से अपना जीवन जियेंगे

हर व्यक्ति की सोच उसके अपने व्यक्तिगत विचार हैं लेकिन किसी महापुरुष को नमन करने पर तो सबकी सहमति बन जाती हैं तभी तो जब भी किसी देशभक्त की पुण्य तिथि आती तो सबकी  जुबान पर उसकी अमर कहानी आ जाती कि किस तरह से विषम परिस्थितियों में उसने अपने लक्ष्य को प्राप्त किया और आज का दिन तो बड़ा विशेष हैं क्योंकि आज एक नहीं बल्कि दो महानायकों का जन्मदिवस हैं... जी हाँ २३ जुलाई का दिन बड़ा सौभाग्यशाली हैं कि उस दिन दो महान आत्माओं ने इस पावन धरा पर जनम लिया जिनका कर्ज तो हम किसी तरह से चुका नहीं सकते पर, उनको ह्रदय की अतल गहराईयों से आभार तो व्यक्त कर ही सकते हैं जिनके कारण हम अपने घर पर चैन से सोते हैं तो ‘प्रथम’ हम अपने श्रद्धा सुमन उस विराट व्यक्तित्व के चरणों में अर्पित करते हैं जिनका नाम था ‘लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक’ जो २३ जुलाई, सन् १८५६ ई. को ‘रत्नागिरि’ में एक सुसंस्कृत, मध्यमवर्गीय ब्राह्मण परिवार में पैदा हुये और उच्च शिक्षा हासिल तो की ही साथ युवावस्था में ही ये तय कर लिया कि वे कभी सरकारी नौकरी नहीं करेंगे और नौजवानों की को बेहतरीन शिक्षा देने के लिये एक व्यक्तिगत कॉलेज और स्कूल खोलेंगे जबकि हम सब सुविधायें तो शानदार चाहते भले ही फिर वो विदेशी हो लेकिन कामना सरकारी नौकरी की करते और बदले में देशवासियों के लिये कुछ करना भी नहीं चाहते पर, उस दौर लोग ही नहीं उनकी सोच भी श्रेष्ठ थी जिसने उन्हें सर्वश्रेष्ठ बना दिया । उन्होंने उस विषम समय में अपने लक्ष्य को साधने 'न्यू इंग्लिश स्कूल’ नाम से विद्यालय तो खोला ही पर, सामजिक कार्यों में भागीदारी करते हुये ‘केसरी’ और ‘द मराठा’ जैसे दो ‘मराठी’ एवं ‘अंग्रेजी’ के साप्ताहिक अख़बारों का प्रकाशन भी किया तो ‘नरम दल’ के नेता के रूप में स्वतंत्रता की लड़ाई में भी जोर-शोर से हिस्सा लिया और अपने साथियों को जोश में लाने के लिये “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार हैं और मैं इसे लेकर रहूँगा” नारा दिया और उसे साकार भी किया ।

अब हम अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं २३ जुलाई १९०६ को ‘भावरा’ ग्राम में जन्म लेने वाले ‘चंद्रशेखर आज़ाद’ जैसे युवा क्रांतिकारी को जिन्होंने अपने नाम को सार्थक करते हुये न सिर्फ अपने वतन के आज़ाद होने का सपना देखा बल्कि उसके लिये प्रयास भी किये महज़ २५ साल का छोटा-सा जीवन था उनका और २७ फ़रवरी, १९३१ को इस संसार से अलविदा भी हो गये जिस उम्र में आज के युवा खुद को समझ भी नहीं पाते उतने से जीवन में वो इतना बड़ा काम कर गये कि आज भी उनका नाम हम भूले नहीं और हमारे नौजवानों को उनसे प्रेरणा लेना चाहिये ताकि वे भी समझे कि जीवन की सार्थकता लम्बे बड़े फ़िज़ूल जीवन में नहीं बल्कि छोटे-से सार्थकता से भरे जीवन में हैं तो आज इन दो महानायकों के जन्मदिवस पर दोनों को शत-शत नमन... :) :) :) !!!
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२३ जुलाई २०१५
© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
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बुधवार, 22 जुलाई 2015

सुर-२०३ : "राष्ट्रीय ध्वज अंगीकरण दिवस... बना तिरंगे का जन्मदिवस...!!!"

हरा
सफेद
केसरिया
मिले तीन रंग
तो बन जाता ‘तिरंगा’
जो हैं देश का प्रतीक
मनाये हम सब मिलकर
आज उसका ‘जन्मदिवस’
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मित्रों...,


२२ जुलाई १९४७ का दिन हम सबको कभी भूलना नहीं चाहिये क्योंकि इस दिन हमारे देश को उसकी पहचान उसका प्यारा दुलारा ‘तिरंगा’ मिला जो उसकी आन-बान-शान का प्रतीक बना जिसका हर एक रंग किसी न किसी तरह का संदेश देता केवल हमारे देखने का नजरिया ही होता जो हम उसके उस मायने को उतनी शिद्दत से ग्रहण नहीं करते क्योंकि हमने केवल उसे पढ़ा हैं लेकिन कभी उस तरह से जाना या समझा नहीं जैसा कि उसके लिये जान देने वाले एक सच्चे देशभक्त ने उसे इतना अजीज मान लिया कि फिर उसका मान बरकरार रखने के लिये हंसते-हंसते अपनी जान तक न्यौछावर कर दी जबकि हम हर एक राष्ट्रीय पर्व पर उसे फहराता देखते कागज़ पर उसकी छवि देखकर उसे खरीद भी लेते पर, उसे धरती पर पड़ा देखकर कितने लोग उसे झुककर उठाते या उसका सम्मान करते क्योंकि संविधान के अनुसार तो उसकी छवि जिस किसी चीज़ पर बनी हो फिर वो उतनी ही सम्मानजनक हो जाती जितना कि पूज्यनीय वो असल परचम होता तभी तो जिसके अंतर में वो किसी सजीव काया के समान घर कर गया उसका अपना अंतर्मन ही पवित्र मंदिर बन गया क्योंकि ये तिरंगा सिर्फ़ तीन रंग से रंगा हुआ कोई कपड़ा नहीं बल्कि इसमें तो यदि कहीं शहादत की दुखद कहानियां भरी पड़ी हैं तो कहीं विजय की सुखद गाथायें भी लिखी हुई हैं जब इसकी ख़ातिर देश के वीर जवानों ने अपनी जान पर खेलकर भी इसकी लाज रखी तो उसके लहू का रंग छिटक कर उस झंडे पर गिरते हुये अपनी दास्ताँ लिख गया और जब किसी ने फ़तह हासिल कर उस जगह पर झंडा गाड़ अपनी जीत का जश्न मनाया तो उसकी आँख से गिरे ख़ुशी के आंसुओं ने उसी झंडे पर उसकी विजय कीर्ति का इतिहास लिख दिया याने कि इस तिरंगे के कहने को ही तीन रंग हैं लेकिन इसमें जीवन के हर एक रंग का कोई ख़ास दिलकश अफ़साना लिखा हुआ हैं जिसे पढ़ने के लिये सिर्फ नजरों का होना ही काफ़ी नहीं बल्कि दिल में देशभक्ति का जज्बा होना चाहिये और वो भी किसी विशेष दिवस नहीं बल्कि हर एक पल, हर एक क्षण उसे जीना चाहिये तभी तो फिर बातों में भी वो झलक जाता हैं    

२२ जुलाई १९४७ को भारत के संविधान ने इस ‘तिरंगे’ को ‘राष्ट्रीय ध्वज’ के रूप में स्वीकार किया और तभी से हर साल आज का दिन ‘राष्ट्रीय झण्डा अंगीकरण दिवस’ के रूप में मनाया जाने लगा जिसकी परिकल्पना १९१६ में ‘पिंगली वेंकैया’ ने इस सूत्र के आधार पर कि जिस देश में विविध भाषा, जाति, रंग-रूप वाले लोग रहते हैं वहां सबको एकसूत्र में बांधने वाला कोई प्रतीक होना चाहिए की और बस अपने दो अन्य मित्रों ‘एस.बी. बोमान जी’ और ‘उमर सोमानी जी’ के साथ मिलकर उन्होंने 'नेशनल फ़्लैग मिशन' की शुरुआत की और जब इसके लिये उन्होंने देश के राष्ट्रपिता ‘महात्मा गांधी’ से मशविरा लिया तो उन्होंने उस ध्वज के मध्य में ‘अशोक चक्र’ को रखने की सलाह दी और इस तरह हमारे तिरंगे के रूप में उनकी कल्पना साकार हुई तो आज उसी झंडे के जन्मदिन पर उसे अनंत शुभकामनायें और उसके जनक का भी हृदय से आभार जिनके कारण आज हम बड़े गर्व से उसे लहराते हैं और जोर-शोर से गाते हैं... झंडा ऊंचा रहे हमारा... विजयी विश्व तिरंगा प्यारा... :) :) :) !!!
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२२ जुलाई २०१५
© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
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मंगलवार, 21 जुलाई 2015

सुर-२०२ : "बेटा, 'सेल्फी' तो ले ले रे... पर, जान मत दे दे रे...!!!"

नज़ारा
बड़ा दिलकश
हाथ में मोबाइल
फिर कैसे रोके खुद को ?
जब एक क्लिक पर
खिंच जाये तस्वीर
फटाफट पोस्ट कर उसको
‘सोशल मीडिया’ पर
मिले बहुत से ‘लाइक्स’
बन जाये ‘सेलेब्रिटी’  
हो जाये मशहूर
लेकिन...
देखना जल्दबाजी में
कहीं हो न जाये कोई चूक  
जो कहलाये अंतिम भूल
गड़े सीने में सदा बनकर शूल  
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मित्रों...,

घटना---०१ : यह घटना ‘कोसीकला’ के पास ‘मथुरा’ रेलवे ट्रैक की है और यह हादसा २७ जनवरी  २०१५ को सुबह करीब ०९:३० बजे हुआ जब चार छात्र चलती ट्रेन के सामने ‘सेल्फी’ क्लिक करके इसे ‘सोशल मीडिया’ साइट पर अपलोड करना चाहते थे लेकिन इस स्टंट में उनमें से तीन को अपनी जान गंवानी पड़ी और चार में से तीन दोस्त ट्रेन के नीचे आ गये जिनकी उम्र २० से २२ साल के बीच थी याने कि सभी युवा थे

घटना---०२ : ४ फरवरी २०१५ को ABP न्यूज़ में आई खबर के अनुसार ‘सेल्फी’ लेने का शौक अमेरिका के एक पायलट को भारी पड़ा और उसका छोटा विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया और इस हादसे में पायलट और विमान में सवार एक अन्य व्यक्ति की मौत हो गई ‘अमेरिका’ के जांचकर्ताओं ने बताया कि पायलट कॉकपिट में अपने मोबाइल से ‘सेल्फी ले’ रहा था और इसी वजह से वो दुर्घटनाग्रस्त हुआ

घटना---०३ : २३ मार्च २०१५ को ‘महाराष्ट्र’ के ‘नागपुर’ के ‘कुही इलाके’ में पिकनिक मनाने गये सात लड़कों की डूबकर मौत हो गई ये हादसा उस वक्त हुआ जब युवक नाव में ‘सेल्फी’ ले रहे थे । पुलिस के मुताबिक सभी युवकों की उम्र १८ से २५ साल के बीच थी । रविवार की छुट्टी के कारण ये लड़के पिकनिक मनाने गए थे तभी ‘सेल्फी’ निकालते समय नाव डूब गई क्योंकि नाव में बैठे लड़के ‘सेल्फी’ के लिये एक तरफ इकट्ठा हुये जिससे संतुलन बिगड़ गया । घटना कुही तहसील के वडसगाव की है दस लड़के पिकनिक मनाने गये थे जिनमें से सात लड़के डूब गये ।


घटना---०४ : 'जियो न्यूज' की रिपोर्ट के अनुसार ‘फैसलाबाद’ शहर में २३ जून २०१५ को एक १५ वर्षीय बालक ‘फरहान’ अपने दोस्त के साथ हाथ में खिलौना बंदूक थाम ‘सेल्फी’ ले रहा था तभी  पुलिस ने उसे अपराधी समझकर बिना चेतावनी दिए गोली चला दी पुलिस को बाद में जाँच करने पर पता चला कि बंदूक एक खिलौना थी और ‘फरहान’ पर गोली चलाने वाले पुलिस अधिकारी को हिरासत में ले लिया गया

घटना---०५ : आज २१ जुलाई २०१५ को ‘दैनिक भास्कर’ के प्रथम पृष्ठ पर छपी एक दर्दनाक घटना के अनुसार एक युवा महज़ २० साल का भरी बंदूक को कनपटी पर लगाकर ‘सेल्फी’ लेने की कोशिश कर रहा था कि अचानक गलती से ट्रिगर दब गया और देखते ही देखते वो खुद ही तस्वीर में बदल गया ।

देश-विदेश में ‘सेल्फी’ की वजह से होने वाले ये खतरनाक हादसे बताते हैं कि किस कदर लोग सुविधाओं के दीवाने और जूनून की हद तक पागल हैं जिसके कारण यदि जान से भी हाथ धोना पड़े तो किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता... इसकी वजह से ‘अमरीका’ के आंतरिक मंत्रालय द्वारा प्रकाशित एक पुस्तिका में चेतावनी दी गई है "एक बेहतरीन सेल्फी लेने के चक्कर में आपकी जान जा सकती है" और इस साल ‘रूस’ ने भी होने वाली घटनाओं के मद्देनज़र ‘सेफ सेल्फी’ लेने के लिये निर्देश जारी किये गये हैं... जिसके तहत लोगों को सेल्फी लेते समय कई सावधानियां बरतने की सलाह दी गई है जैसे कि रेल पटरी पर, छतों पर चढ़कर, हाथ में बंदूक लेकर या किसी खतरनाक जानवर के करीब जाकर ‘सेल्फी’ लेने से मना किया है क्योंकि ‘रूसी’ पुलिस के मुताबिक पिछले साल वहां सेल्फी लेते समय १० मौतें हुईं और १०० से ज्यादा लोग घायल हुये... ‘सेल्फी’ लेकर उसे ‘सोशल मीडिया’ पर चस्पां करके लोगों के लाइकबटोरने की यह प्रवृत्ति कई बार घातक हो सकती है ।

उफ़... ये कैसा शौक या बोले पागलपन कि जिससे कुछ भी हासिल नहीं उसके पीछे इंसान अपनी इकलौती जान को यूँ ही बेवजह गंवा दे यार... ‘सेल्फी’ हैं क्या ???

अपने ही हाथों से ली गयी अपनी खुद की एक बेजान, बेजुबान तस्वीर ही तो हैं जो इतनी महत्वपूर्ण या कीमती तो नहीं कि उसके लिये कोई अपनी अनमोल जान ही मुफ्त में गंवा दे और उसके जाने के बाद उसके परिवार वाले रोते ही रह जाये... जब से मोबाइल फोन आये हैं लोग उसके प्रति ऐसे दीवाने हुये कि अपनी सेहत से ही खेल रहे थे और जैसे-जैसे उसमें नये-नये फ़ीचर जुड़ते गये लोग उतने ही उसके पीछे पागल ही होने लगे और जब से ‘सेल्फी’ के लिये विशेष तौर पर मोबाइल आने लगे तो उनकी ये सनक सर चढ़कर बोलने लगी और धीरे-धीरे इसने न जाने कितने युवाओं को अपनी गिरफ्त में ले लिया... ज्यादातर हादसे युवाओं के साथ ही इसलिये हुये क्योंकि उनके भीतर इसको लेकर जो बेइंतेहा जुनून हैं जिसके कारण वे कुछ भी नहीं सोचते और कुछ अनूठा या अनोखा करने के चक्कर में कुछ ऐसा कर जाते हैं कि अंत में उनका दुखांत सबको आश्चर्यचकित करता रह जाता हैं । न जाने ये किस तरह का शौक हैं कि जिस युवा शक्ति को अपनी ताकत अपनी सूझ-बूझ अपने कौशल का उपयोग अपने भविष्य के साथ-साथ अपने देश का नाम रोशन करने के लिये करना चाहिये वो उसे ‘इंटरनेट’ या ‘मोबाइल’ या ‘सेल्फी’ के साथ बिताने में बर्बाद कर रहे और उस पर कमाल ये हैं कि उनको ये अहसास भी नहीं भले ही अब हम आज़ाद हैं देश में कोई स्वाधीनता संग्राम या आन्दोलन नहीं चल रहा लेकिन इसका ये मतलब तो कतई नहीं कि जिस उम्र में इस देश के युवा जंगे आज़ादी के लिये अपनी जान गंवा शहीद हुए थे उस उम्र में हमारे युवा ‘सेल्फी’ लेने के लिये खुद को कुर्बान कर दे और उनकी ये शहादत किसी के काम भी न आये सही बात हैं न कि यदि मरने की इच्छा ही हैं तो फिर किसी सार्थक काम में उसका सदुपयोग करें न कि बेकार की फोटो खींचने में उसे इस तरह खर्च करें कि बाद में आपको याद कर के रोने वाला भी सोचे कि ये क्या कर दिया ???

हमारे देश में ही इसे सकारात्मक तरीके से भी इस्तेमाल किया गया हैं और ‘सेल्फी विथ डॉटर’ जैसे रचनात्मक अभियान की शशुरुआत की गयी तो अभी ‘जगन्नाथ रथयात्रा’ से युवाओं को जोड़ने के लिये भी इसकी एक प्रतियोगिता रखी गयी ताकि वे जवान लोग जो धार्मिक कृत्यों से दूर हो रहे हैं वो भी इसके करीब आ जाये तो फिर इसे गलत तरीके से प्रयोग करना सिवाय समय और जान की बर्बादी के और कुछ भी नहीं हैं । ‘इंटरनेट’ पर विभिन्न सामग्रियों का हिसाब-किताब रखने वाले एक संगठन ‘सिम्प्लीफाई 360’ के द्वारा जारी किये गये आंकड़ों के अनुसार वर्ष २०१३ में दुनिया में जहां केवल 23.80 करोड़ ‘सेल्फी’ खींच कर ‘सोशल मीडिया’ के अलग-अलग मंचों (फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम आदि) पर अपलोड की गई थीं वहीँ वर्ष २०१४ में इनकी संख्या लगभग तीस करोड़ जा  पहुंचीं जो अपने आप में इसके प्रति लोगों के रुझान को दर्शाती हैं । जो लोग अपने आस-पड़ोस या अपने परिवार वालो से ही अपरिचित हैं वो दुनिया भर के अनजान लोगों से तारीफ़ पाने की ख्वाहिश में इतने पागल हो जाये कि खाने-पीने, सोने-जांगने की बजाय सिर्फ पूरा समय ऑनलाइन बैठे अपडेट ही करते रहे जिसमें समय, जीवन के अलावा धन की भी तो बर्बादी होती हैं... और कुछ लोग तो इतने अमानवीय कि ‘लाश’ के साथ भी ‘सेल्फी’ लेने से बाज नहीं आते अभी हल में अख़बार में पढने आया कि अपने एक मित्र के अंतिम संस्कार पर गये अभिनेता ‘अमिताभ बच्चन’ को वहां पर मौजूद लोगों द्वारा सेल्फीलिया जाना पसंद नहीं आया और इस ७२ वर्षीय अभिनेता ने ‘सोशल नेटवर्किंग साइट’ ‘फेसबुक’ पर कहा है कि “लोगों की असंवेदनशीलता देख कर वह निराश हैं, जिनमें मृत और जीवित लोगों के प्रति कोई सम्मान नहीं है”...  अतः जरूरी हैं कि सही-गलत के साथ-साथ जरूरी-गैरजरूरी बातों में जल्द फर्क करना सीखे ।

हम ये नहीं कह रहे कि ‘सेल्फी’ लेना गलत हैं और इसमें जान ही जाती हैं पर, जिन स्थितियों में ऐसा हो सकता हैं वहां पर चौकस रहने की आवश्यकता जरुर हैं... यदि किसी भी चीज़ का सकारात्मक तरीके से उपयोग किया जस सकता हैं तो फिर उसे फ़िज़ूल इस्तेमाल करना बेवकूफी के अलावा कुछ नहीं... ‘बचपना’ और ‘बचकानेपन’ का ये अंतर जितनी जल्दी समझ आ जाये उतना ही युवाओं और देश के हित में हैं... इसलिये बेटा जी... अब ‘सेल्फी’ तो लो लेकिन सावधानियां रखना न भूलो... और यदि उसे सही तरीके से उपयोग में ला सकते हो तो वो करो... अभी भी देर नहीं हुई हैं... :) :) :) !!!     
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२१ जुलाई २०१५
© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
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