सोमवार, 17 दिसंबर 2018

सुर-२०१८-३४७ : #याद_आया_वो_गुज़रा_जमाना #जिसमें_शामिल_अब्दुर्रहीम_ख़ानख़ाना




एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय ।
रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै फलै अगाय ॥

हम सबने ही अपने पाठ्यक्रम में कभी न कभी ‘रहीम’ के लिखे दोहे जरुर पढ़े होंगे और आज भी यदा-कदा उनको दोहराते है क्योंकि, उन्होंने जो भी लिखा वो गहरे अनुभवों से निकला सार था जो सदियों तलक प्रासंगिक रहेगा इसलिये उनका नाम भी उसी तरह सदियों-सदियों तक साहित्य के आकाश पर सूर्य की भांति चमकता-दमकता रहेगा और जब-जब १७ दिसम्बर आयेगा ये दिन हमें उनकी याद दिलायेगा कि आज ही वो शुभ दिवस जब उन्होंने जनम लिया और मुगल सम्राट अकबर के दरबार के नौ-रत्नों में अपना नाम लिखवाया इस तरह साहित्य ही नहीं इतिहास में भी अपना नाम दर्ज करा लिया ऐसे में उन्हें भूला पाना किसी के भी लिये आसान नहीं है

रहिमन चुप हो बैठिये देखि दिनन के फेर
जब नीके दिन आइहैं बनत न लगिहैं देर

रहीम के पिता वहीँ ‘बैरम खान’ थे जिन्होंने १३ वर्ष की आयु में ‘अकबर’ के कंधों पर राज-दरबार की जिम्मेदारी आने पर उनके सरंक्षक के रूप में दायित्व निभाया और जब वे ६० साल के थे तब उनका जन्म हुआ और उनका नाम भी ‘अकबर’ के द्वारा रखा गया और उनके पिता की मृत्यु के बाद उनकी देख-रेख का भर ‘अकबर’ ने अपने जिम्मे ले लिया धीरे-धीरे उनकी योग्यतायें प्रकट होने लगी वे बचपन से ही साहित्य प्रेमी और बुद्धिमान थे जिनसे अकबर बेहद प्रभावित हुये और उनको अपने दरबार में शामिल करने का निर्णय लिया माना जाता है कि वीरता, राजनीति, राज्य-संचालन, दानशीलता तथा काव्य जैसे अदभुत गुण अपने माता-पिता से विरासत में मिले थे ।

सबको सब कोउ करै कै सलाम कै राम
हित रहीम तब जानिये जब अटकै कछु काम

रहीम का पूरा नाम ‘अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना’ अथवा ‘अब्दुर्रहीम ख़ाँ’ था तथा उनके सम्पूर्ण व्यक्तित्व का अनाकलन करने के लिये उनके अलग-अलग स्वरूपों को समझना होगा क्योंकि, वे केवल एक कवि या साहित्यकार ही नहीं थे बल्कि, कुशल राजनीतिज्ञ, सेनापति, हिन्दुत्व प्रेमी, आश्रयदाता और बहुत बड़े दानवीर भी थे और बिना दान दिये उनका दिन नहीं गुजरता था उनकी दानशीलता का एक किस्सा बड़ा मशहूर है वे दान देते समय अपनी आँख उठाकर नहीं देखते थे जिसकी वजह फिर से कभी-कभी कोई दुबारा भी मांगने खड़ा हो जाता उनके समकालीन कवि गंग ने ये उदगार तब व्यक्त किये--

सीखी कहाँ से नवाबजूं ऐसी देनी देन ?
ज्यों- ज्यों कर ऊंचे चढ़ें ,त्यों त्यों नीचे नैन

तब रहीम ने उत्तर दिया --

देनहार कोई और है, जो देता दिन -रैन ,
लोग भरम मो पे करें, ताते नीचे नैन।

ऐसा ही एक और किस्सा है कि एक बार ‘तुलसीदासजी’ ने एक ब्राह्मण, जो कि उनके पास अपनी बेटी की शादी का खर्च लेने आया था को यह पंक्ति लिखकर रहीम के पास भेज दिया...

सुतिय नातिय नाग तिय, यह चाहत सब कोया ।

रहीम ने ब्राह्मण को तो पुरुस्कृत किया ही साथ-साथ दोहे के पद पूर्ति इस प्रकार की --

सुर तिय नर तिय नाग तिय, यह चाहत सब कोय।
गर्म लिए हलसी फिरै , तुलसी सो सुत होय।।

उनके जीवन के ऐसे अनगिनत प्रसंग है जो ये बताते कि वो मुसलमान होकर भी हिन्दू धर्म व भगवान कृष्ण के प्रति अपनी भक्ति भावना रखते थे और रामायण, महाभारत, पुराण तथा गीता जैसे ग्रंथों के कथानकों को लिया अपने काव्य का विषय बनाया यही नहीं भाषा के प्रति भी बेहद संजीदा थे इसलिये उन्होने अपनी कविताओं, छंदों, दोहों में पूर्वी अवधी, ब्रज भाषा तथा खड़ी बोली का प्रयोग किया है

टूटे सुजन मनाइए, जो टूटे सौ बार ।
रहिमन फिरि फिरि पोहिए, टूटे मुक्ताहार ॥

आज ‘रहीम’ को जन्मदिवस पर अनंत शुभकामनायें... ☺ ☺ ☺ !!!

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© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
नरसिंहपुर (म.प्र.)
१७ दिसम्बर २०१८

रविवार, 16 दिसंबर 2018

सुर-२०१८-३४६ : #खरीद_रहे_महंगे_प्रोडक्ट #साथ_मिल_रही_दर्दनाक_मौत




आज के समय में इतनी नई-नई बीमारियों के नाम सुने जा रहे पहले जिनका नामों-निशान तक न था हैरत की बात कि वो भी तब जबकि, लोग शिक्षित व जागरूक ही नहीं बल्कि, अपने स्वास्थ्य के बारे में हर बारीक़ जानकारी तक रखते है ऐसे में लगता कि वो जमाना ज्यादा अच्छा था जब हम भले ही पढ़े-लिखे कम थे लेकिन, प्रकृति के इतने नजदीक रहते थे कि शुद्ध वायु, पानी, अन्न और फल-फूल ही नहीं लम्बी आयु का वरदान व सेहतमंद जीवन प्राप्त होता था तब हम इतने आधुनिक नहीं थे तो क्या बिना ए.सी., फ्रिज, कार, गाड़ी, वाशिंग मशीन, मोबाइल के भी खुश रहते व इन तकनीक जनित दर्द-रोग से दूर अपनों के करीब होते थे

आज हम घरों के दरवाजे, खिडकियों को कस के बंद कर सुविधा के तमाम साधनों के साथ भीतर से फर्श-सामान को क्लीनिंग प्रोडक्ट से साफ़-स्वच्छ करके समझते कि हम तो सभी रोगाणुओं-रोगों से दूर हो गये लेकिन, ये भूल जाते कि महंगे दामों में हमने अपने लिये उत्पाद नहीं बल्कि, बीमारियाँ खरीदी है यकीन न हो तो अपनी हर जाँच में होने वाली बीमारी के कारण को जानने का प्रयास करें तो पायेंगे कि उनमें कहीं न कहीं या तो हमारा फ़ूड आयल/फ़ूड आइटम्स या हमारी जीवन शैली या ये आधुनिकता ही दोषी है ये सुविधायें हमको केवल सुख का वरदान ही नहीं दुःख का अभिशाप भी दे रही जिसे कहते न कि विज्ञान वरदान और अभिशाप दोनों ही है

हम भी ऐसे माहौल में रहते हुये खुद को दूसरों से अधिक हाई-फाई दर्शाने अपने शरीर को तमाम गेजेट्स से ढंक लेते, अपने घरों में तमाम यंत्र भर लेते फिर कहते कि पता नहीं हम बीमार क्यों हो रहे जबकि, कोई भी बीमारी अपने आप नहीं आती हम ही जाने-अनजाने उसे न्यौता देते है पहले और आज के समय का आंकलन करें कि तब चौके-चूल्हे में खाना बनता, सब नीचे बैठकर आलथी-पालथी मारकर खाते, कम से कम सुविधाओं का उपयोग करते हाथ से ही अधिक काम करते और गाड़ी भी जरूरत पर ही चलाते थे और सौन्दर्य-प्रसाधन भी ज्यादातर घरेलू ही इस्तेमाल करते थे

अब तो बच्चे की नेपी से लेकर बड़े-से-बड़ा सामान हम बाज़ार से ला रहे वो भी जो हम स्वयं बना सकते पर, आलस ने सिलाई, बुनाई, कढ़ाई, बडी-पापड़, अचार-मुरब्बे जैसी घर में बनाने वाली चीजों व हस्त-कलाओं को ही नहीं लील लिया बल्कि, इसने न जाने कितनी छोटी-छोटी क्रियायों को विलुप्ति की कगार पर पहुंचा दिया और हमें रोगग्रस्त, अल्पायु का तोहफा दिया चूँकि, इन सबमें हमें अपना फायदा नजर आ रहा तो हम जाने-बुझते भी उन शत्रुओं को नजर अंदाज कर रहे जो हमारे घरों में बाथरूम से लेकर बेडरूम तक प्रोडक्ट्स के रूप में सजे हुये बल्कि, हम ही ने उनको वहां लाकर रखा हुआ है

#जॉनसन_एंड_जॉनसन एक ऐसी नमी-गिरामी कम्पनी जिसके प्रोडक्ट्स सभी जगह प्रयोग में लाये जाते हैं और यदि भारत की बात करें तो यहां उनको ही बच्चों के लिए बेस्ट माना जाता है लेकिन, एक नई रिपोर्ट में इस कंपनी को लेकर जो खुलासा हुआ है वहां बेहद चिंताजनक है कल न्यूज एजेंसी #रॉयटर्स की रिपोर्ट में कुछ खुफिया दस्तावेजों और सूत्रों के हवाले से यह दावा किया गया है कि, अमेरिकी फार्मा कंपनी #जॉनसन_एंड_जॉनसन को लंबे समय से पता था कि उसके बनाए बेबी पाउडर में हानिकारक केमिकल एसबेस्टस मौजूद है। इसमें ये भी कहा गया है कि, 1971 से लेकर 2000 तक कंपनी के बेबी पाउडर की टेस्टिंग में कई बार एसबेस्टस मिलाया गया ।

#बेबी_पाउडर में हानिकारक केमिकल होने के कई बार आरोप लगे है जुलाई में अमेरिका की  सैंट लुइस कोर्ट ने कंपनी के पाउडर में कैंसर फैलाने वाला केमिकल एसबेस्टसमिलने के बाद उस पर 4.7 अरब डॉलर (करीब 34 हजार करोड़ रुपए) का जुर्माना लगाया था । यह राशि उन 22 महिलाओं और उनके परिवारों को दी गई जिन्होंने पाउडर की वजह से कैंसर होने का दावा किया था । यह पहला मामला था जब एसबेस्टस की वजह से कैंसर होने का पता चला गौरतलब है कि #जॉनसन_एंड_जॉनसन वर्तमान में पूरे अमेरिका में मुकदमों का सामना कर रहा है इसके उत्पादों के द्वारा गर्भाशय का कैंसर होने का दावा करने वाली महिलाओं द्वारा 9,000 से ज्यादा मुकदमे दर्ज कराए गए है यहाँ तक कि, जॉनसन एंड जॉनसन के नो मोर टीयर वाले बच्चों के शैम्पू पर भी सवाल उठे इस शैम्पू पर कई स्वास्थ्य संगठनों ने सवाल उठाए

ज्ञात हो कि ऐसे ही एक मामले में पिछले साल वर्जिनिया में कंपनी को लगभग 70 करोड़ (10 मिलियन डॉलर) का जुर्माना सहना पड़ा था इससे पहले 2016 में भी कंपनी को एक कैंसर के मरीज को समान समस्या होने के चलते 375 करोड़ (55 मिलियन डॉलर) का हर्जाना भरना पड़ा था टैल्कम पाउडर से ओवेरी कैंसर का पहला मामला 1971 में सामने आया था इसी साल अमेरिका के मिसूरी राज्य की एक अदालत ने एक परिवार को 72 मिलियन डॉलर यानी करीब 494 करोड़ रुपए का जुर्माना देने का आदेश दिया जब इस कंपनी के प्रॉडक्ट इस्तेमाल करने और एक महिला को कैंसर होने के बीच दावे सत्य साबित पाए गये यानि 2 सालों के अंतर्गत कंपनी को 5,950 करोड़ मुआवजा देने के आदेश दिए गए हैं । हालांकि, कंपनी का कहना है कि उसके प्रॉडक्ट पूरी तरह से सेफ हैं।

ये तो थी अमेरिका की बात जहाँ बेबी पाउडर से बीमारी के 6,610 मामले दर्ज हैं लेकिन, अब यदि भारत की बात करें तो यहां बेबी केयर का मार्केट 93,000 करोड़ का है। जिसमें जॉन्सन एंड जॉन्सन कंपनी का हिस्सा 60 फीसदी है इसके बाद भी यकीन है कि उनकी साख व दाम पर कोई आसर नहीं आयेगा क्योंकि, लोग तो उसके प्रोडक्ट्स को बेस्ट समझते तो उसे ही खरीदेंगे इस कम्पनी व इसके प्रोडक्ट्स के माध्यम से महज़ इतना समझाने का प्रयास किया गया है कि हम कृत्रिम नहीं प्राकृतिक जीवन जिये सोते ही न रहे और अपने जीवन को इन उत्पादों के भरोसे छोड़कर जीते रहे तो किसी दिन इसी तरह इनकी वजह से मौत की आगोश में पहुँच जायेंगे

कोई भी कम्पनी, कोई भी उत्पाद हमारी जान व स्वास्थ्य से बढ़कर नहीं है इसलिये कुछ भी खरीदने से पहले हम लोग उस पर दर्ज कम्पोजीशन को जरुर गौर से पढ़े कहीं उसमें ऐसा कोई एलिमेंट तो नहीं मिला जिसमें मौत मिली हो क्योंकि, हमारी आदत कि हम सब सिर्फ विज्ञापन देखकर कोई भी चीज़ खरीद लेते है  

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© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
नरसिंहपुर (म.प्र.)
१६ दिसम्बर २०१८

शनिवार, 15 दिसंबर 2018

सुर-२०१८-३४५ : #भ्रम_के_तिलिस्म #भूले_से_भी_टूट_न_पाये




बड़ी कठिन
मुश्किलों से भरी हुई 
कदम-कदम पर इम्तिहानों
हर मोड़ पर झटकों 
नये-नये छलावों से छलती
इक धोखा है जिंदगी...


उतनी ही मायावी
मन को भरमाती-ललचाती
मृग-मरीचिका है दुनिया
ख़ुशी से जीने के लिये जिसमें
जरुरी हैं कुछ ख्वाहिशें
खोखली ही सही
झूठी हसरतों की नुमाइंदगी...

वे न हो गर तो,
न जाने कितने जीवन
मंझधार में ही डूब जाये
कितने लोग समय से पहले ही
खत्म हो जाये तो
जरूरी है रब की बंदगी...

बस, रखना ये ख्याल कि,
पैरों तले जमीन खिसक न जाये
भ्रम के तिलिस्म टूट न जाये
भले एकदम झूठी हो
फिर भी पास कोई तो वजह हो
बनाये रखे जो हस्ती...

कभी भूले से भी  
न बताना उनको ये सच
समझकर उसे मज़बूत सहारा
खड़े हुये जो लोग
सुनकर ये कडवा सच
जीते जी ही न मर जाये कहीं
भ्रम भरी ज़िन्दगी ।।

#भ्रम_नहीं_ब्रह्म_जीवन_का_सत्य

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© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
नरसिंहपुर (म.प्र.)
१५ दिसम्बर २०१८

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2018

सुर-२०१८-३४४ : #गीतकार_शैलेन्द्र_शोमैन_राज_कपूर #सिने_प्रेमी_आप_दोनों_को_नहीं_सकते_भूल




दुनिया में दोस्ती एक ऐसा जज्बा और रिश्ता है जो नितान्त अजनबियों को अपनेपन की ऐसी डोर से बांध देता कि जितनी नजदीकी या गुफ्तगू कभी आपसी संबंधों में नहीं होती उससे कहीं अधिक इन बेगानों के इस खुद से बनाये नाते में होती जो यदि पक्का हो तो समय के साथ और मजबूत होता जाता कभी तो इतना अधिक बढ़ जाता कि दो जिस्म, एक जान की मिसाल बन जाता तो कभी मैं काया, तू साया की तरह एक दूजे की अहमियत को दर्शाता है ।

कुछ ऐसा ही करीबी व रूहानी रिश्ता बन गया था सपनों के सौदागर हिन्दी सिनेमा के सबसे बड़े शो-मेन और एक असाधारण प्रतिभाशाली गीतकार शैलेन्द्र के बीच जिनकी दोस्ती भी यूं ही अचानक ही गयी थी पर, जब एक बार दोनों ने एक-दूसरे को अपना जिगरी यार मान लिया तो फिर ताउम्र ये दोस्ताना बना रहा ।

यूं तो अपनी पहली मुलाकात में शैलेन्द्र ने राज कपूर जी द्वारा उनके लिए गाने लिखने के ऑफर को ठुकरा दिया था मगर, तकदीर में उनका मिलना लिखा तो परिस्थितियां कुछ ऐसी बनी कि वो खुद चलकर उनके पास आये और उनकी ब्लॉक बस्टर मूवी बरसात के लिए शीर्षक गीत व पतली कमर है जैसे गाने लिखकर उनके दोस्तों की फेहरिश्त में शामिल हुए तो फिर अंतिम सांस तक ये रिश्ता बना ही रहा जो संयोग कहे या दुर्योग कि राज कपूर के जन्मदिन 14 दिसम्बर से ऐसा जुड़ा कि दोनों की दोस्ती को सदा-सदा के लिये अमर कर गया और जब-जब ये तारीख आती इन दोनों नामों को एक साथ ले आती जहां राज कपूर के लबों पर आने वाले तराने हम गुनगुनाते या देखते तो दोनों के दीदार हो जाते एक के होंठ पर दूजे के लिखे शब्द इस तरह अर्थ पाते कि देखने वाले लाज़वाब हो जाते और इस जादुई अहसास को हम उनके हर गीत में महसूस कर सकते है ।

राज कपूर जब आज के दिन अपने जन्मदिन की खुशियां मनाने में व्यस्त थे तो उन्हें खबर नहीं थी कि आज उन्हें ऐसी मनहूस खबर भी मिलने वाली है जो उनके गीतों के साथी को उनसे सदा-सदा के लिए विलग कर देगी पर, अनहोनी को कौन रोक सकता है तो वही हुआ जो होना था उधर उनका दम निकला इधर राजा जी सदमे में आ गये कि ये क्या हुआ जो सोचा न था न ही गुमान था कि उनकी टीम से एक नायाब सितारा कम हो जायेगा अपने दुख को अपनी पीड़ा को उन्होंने शब्दों में बयान करने के लिये Filmfare मैगज़ीन में एक Open Letter लिखा था,

"मेरी आत्मा का एक हिस्सा चल बसा ये ग़लत है । मेरे बागीचे के सबसे सुंदर गुलाब को मुझ से दूर कर दिये जाने पर आज मैं रोता हूं । वो एक नेक़ दिल इंसान था अब वो चला गया और रह गई हैं तो सिर्फ़ उसकी यादें है" ।

आज इन दो दोस्तों के स्मृति दिवस पर उन दोनों के इस सृजन से उनको आदरांजलि व नमन...

रिश्ता दिल से दिल के ऐतबार का
ज़िन्दा है हमीं से नाम प्यार का
के मर के भी किसी को याद आयेंगे
किसी के आँसुओं में मुस्कुरायेंगे
कहेगा फूल हर कली से बार बार
जीना इसी का नाम है

वाकई, जीना इसी का नाम है जो कर्मयोगी जैसा जीवन उन्होंने जिया... वो हमारे लिये प्रेरणा और उनका सार्थक कर्म हमारी धरोहर है ।

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© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
नरसिंहपुर (म.प्र.)
१४ दिसम्बर २०१८

गुरुवार, 13 दिसंबर 2018

सुर-२०१८-३४३ : #कला_फिल्मों_का_हासिल #भावप्रणव_अभिनेत्री_स्मिता_पाटिल




महज़ दस साल का फ़िल्मी कैरियर और मात्र ३१ साल की कम उम्र में दुनिया को अलविदा कहना तब बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है जबकि, वो उल्लेखनीय हो तो उसकी टीस आजीवन रहती और उस शख्सियत को भूल पाना नामुमकिन होता क्योंकि, वो अपनी किसी अद्भुत प्रतिभा से लोगों के दिलों पर इस तरह अपनी अमिट छाप बना लेता कि उसके जाने के बाद भी वो उसी तरह कायम रहती है

कुछ ऐसी ही गहरी स्मृति सर्वप्रिय संवेदनशील अदाकारा ‘स्मिता पाटिल’ की है जिन्होंने अपने भारतीय सौन्दर्य ही नहीं अपनी बड़ी-बड़ी बोलती आँखों व उस पर अपने भावप्रणव अभिनय से दर्शकों को इस तरह अपना दीवाना बनाया कि उनकी हर फिल्म के साथ वो दीवानापन बढ़ता ही गया जिसमें उनके अभिनीत पात्र भी ऐसे जो आम व्यक्ति के जैसे जिसमें वो अपना ही अक्स देखता और उसकी छवि अपने अंतर में बसा लेता ।

‘स्मिता पाटिल’ के आगमन के बाद हिन्दी सिनेमा में फिल्मों का एक नया दौर भी प्रारम्भ हुआ जिसे ‘कला फिल्मों’ के नाम से जाना गया और उन फिल्मों में कृत्रिम नहीं स्वाभाविक अदाकारी की दरकार होती थी जिसमें वे इस तरह माहिर थी कि जब भी किसी चरित्र को निभाती तो उसे रजत प्रदर पर इस तरह से प्रस्तुत करती कि फिर वो ‘स्मिता’ नहीं बल्कि, हूबहू वो काल्पनिक किरदार बन जाती थी ।

बहुत-ही कम उम्र से ही उन्होंने अपने भीतर छिपी आग को पहचान लिया था शायद, तभी तो एक बार जब कदम घर से बाहर निकाले तो फिर हर पड़ाव को पार करते हुये अनायास ही उस मंजिल तक पहुँच गयी जिस तक जाना उनकी किस्मत में लिखा था ऐसे में एक के बाद एक ऐसी कहानियां व फिल्में उनके हिस्से में आई जो उनकी उम्र व अनुभव से बढ़कर थी लेकिन, अपनी अदाकारी से उन्होंने उसे जीवंत कर दिया

आज ही के दिन वो सबकी आँखों में आंसू छोड़कर इस दुनिया को अलविदा कहकर चली गयी और उनकी इस आकस्मिक मौत से हतप्रभ सभी भौचक रह गये जिस पर वे आज भी विश्वास नहीं कर पाते कि इतनी छोटी उम्र में वो इस तरह विदा हो गयी और जब-जब १३ दिसम्बर की तिथि आती वो दुखदायी घड़ी भी साथ लाती जिसके पार्श्व में छिपी स्मिता की स्मृतियाँ भी झिलमिलाने लगती जो अब उसकी साथी है  

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© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
नरसिंहपुर (म.प्र.)
१३ दिसम्बर २०१८

बुधवार, 12 दिसंबर 2018

सुर-२०१८-३४२ : #लघुकथा_हर_वायरल_विडियो_फेक_नहीं_होता




बहुत-बहुत बधाई हो ‘चमन लाल’ तुमने और तुम्हारी पार्टी ने तो चुनाव में गजब जीत हासिल की जबकि, तुम्हारी गुप्त मीटिंग का वो विडियो वायरल होने के बाद तो उम्मीद कम ही बची थी फिर ये सब कैसे हुआ कुछ समझ नहीं आया ?

इसका मतलब तुम्हें भी यही लगता कि वो विडियो हमारी जानकारी के बिना वायरल हुआ तो इसका मतलब तुम हमें नहीं जानते तुम सबने ये सोच कैसे लिया कि कोई इतनी हिमाकत कर सकता कि हमारी नाक के नीचे विडियो भी बना ले और हमारी परमिशन के बिना उसे न्यूज़ चैनल तक भी पहुंचा दे वो भी तब जबकि, ये पहले से ही निर्देशित था कि ये एक सीक्रेट बैठक है

फिर... ये सब हुआ कैसे उसने आश्चर्य से आँखें फैलाते हुये आगला सवाल दाग दिया

कुछ नहीं यार, अब मीटिंग के द्वारा हम पूरे देश के लोगों तक एक साथ तो अपना संदेश पहुंचा नहीं सकते थे तो उसका यही तरीका निकला कि अपनी बातचीत के ख़ास अंश को टुकड़ों में वायरल किया जाये जिससे कि सभी ये समझे कि ये विरोधी की चाल है और मीडिया स्वयं हमारा प्रचारक बनकर हमाई बात करोड़ों लोगों तक पहुंचा दे तो बिल्कुल वही हुआ जो हमने सोचा था जो बात हम अपने वोट बैंक से कहना चाहते थे वो इस तरह बिना किसी विज्ञापन, बिना मीडिया को खरीदे ही प्रसारित कर दी और उनको पता भी न चला कि हमने उनका इस्तेमाल कर लिया उसने हंसते हुये जवाब दिया  

मान गये तुम्हें दोस्त, पार्टी ने तुम्हें सही ही चुना इस जिम्मेदारी के लिये वाकई ये काम तुम्हारे सिवा कोई न कर सकता था   

बस, हाईटेक जमाने में चुनाव लड़ने के तरीके बदल गये है तो हम भी अपडेट हो गये थोड़ा- समय लगा इसे सीखने में लेकिन, जान गये कि ये तो ज्यादा आसान है केवल, मैसेज वायरल ही तो करना है अब देखना आगे-आगे होता है क्या उसने आंख मारते हुये कहा और दोनों के ठहाके गूंज उठे
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© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
नरसिंहपुर (म.प्र.)
१२ दिसम्बर २०१८

मंगलवार, 11 दिसंबर 2018

सुर-२०१८-३११ : #दिलीप_कुमार_से_पूर्व #दिलीप_कुमार_के_पश्चात




हिन्दी सिनेमा का जन्म 1913 को मूक फ़िल्म 'राजा हरिश्चन्द्र' के साथ हो गया जिसके बाद उसमें विकास की सतत प्रक्रिया चलती रही और इस दरम्यान अनेकों फिल्में बनी व अनगिनत प्रयोग इस विधा में होते ही रहे । इसके साथ ही कई अभिनेताओं व अभिनेत्रियों के अपने काम से इसे नये आयाम देने और अपने अलहदा अभिनय से दर्शकों को अपना बनाने के प्रयास भी समानांतर चलते ही रहे । जिसके फलस्वरूप हम देखते है कि जहां शुरुआती दौर में अभिनय कुछ बनावटी और अति नाटकीयता से भरा दिखाई देता है वहीं बाद में उसमें चमत्कारिक रूप से स्वाभविकता की झलक दिखाई देती है ।

इसका पूरा श्रेय जिस अजीमों शान अभिनय के शहंशाह ‘यूसुफ खान’ उर्फ ‘दिलीप कुमार’ को दिया जाता है उन्होंने अपनी अदाकारी से अभिनय की नूतन परिभाषा ही नहीं फिल्मी एक्टिंग का ककहरा भी लिखा जिसे पढ़कर आने वाले कलाकारों ने उसको हूबहू अपनाने की कोशिशें की ताकि उनके समकक्ष न सही उनके आस-पास तो वे नजर आ ही सके जिसमें-से कुछ कामयाब भी हुये और उन्होंने अपनी सफलता का श्रेय अपने आदर्श फनकार को पूर्ण कृतज्ञता के साथ दिया भी जिनकी फेहरिश्त काफी लंबी है और ये वही है जिन्होंने उनकी फिल्में देखकर न केवल फिल्मों में आने का निर्णय लिया बल्कि, उनकी तरह नाम कमाने व अभिनय की दुनिया में अपने झंडे गाड़ने का भी निश्चय किया तो ऐसे में दिलीप साहब उनके लिए महज़ एक एक्टर नहीं अभिनय का जीता-जागता संस्थान थे ।

इस आधार पर ये समझना मुश्किल नहीं कि ‘दिलीप कुमार’ अपनी अदाकारी से एक ऐसे मानक में परिवर्तित हो गये जिनके पूर्व व पश्चात के सिनेमा पर दृष्टि डाले तो एकदम स्पष्ट समझ में आता कि, उन्होंने हिन्दी सिनेमा को जो योगदान दिया वो अमूल्य है क्योंकि, उन्होंने इससे पहले की नाटकीय अदाकारी को अपनी स्वाभाविक अदायगी से इस तरह परिवर्तित किया कि देखने वाले उनके दीवाने हो गये और उनकी रजत पर्दे पर उनकी उपस्थिति केवल फ़िल्म के हिट होने ही नहीं पुरस्कार की भी गारंटी बन गयी क्योंकि, सर्वश्रेष्ठ अभिनय के ज्यादातर सम्मान उनके ही नाम लिखे हुए है ।

अपनी आंतरिक संवेदनशीलता को वो फिल्मी किरदार के जरिये इस तरह से पर्दे पर प्रदर्शित करते कि वो कोई कल्पना नहीं हकीकत ही नजर आता था यही वजह कि उनके निभाये ज्यादातर पात्र अपने नाम से पहचाने जाते न कि उनके नाम से उन्हें याद किया जाता । यही तो एक असाधारण कलाकार की विशेषता कि वो जो भी करता उसमें एक मिसाल कायम कर देता जो उसके न रहने पर भी उस फील्ड में आगे आने वाले लोगों को दी जाती कि इस तरह से उसे अपने आपको भी स्थापित करना है । उनके द्वारा अभिनीत अधिकांश चरित्र भावुकता भरे हुए थे जिसने उनको त्रासदी का महारथी घोषित कर दिया और डूबकर अभिनय करने की उनकी ये आदत उनको अवसाद की तरफ ले गयी तो फिर उन्होंने हास्य भूमिकाओं से अपने नये रंग को प्रस्तुत किया व खुद का इलाज भी किया

आज मगर, हम सबको इतनी यादगार फ़िल्में व इतने यादगार चरित्र देने वाले वो अभिनय सम्राट यादों के जिन गलियारे में खो गए वहां से उनको निकालना संभव नहीं क्योंकि वे तो खुद को भी भूल गये इसमें गनीमत कि बात केवल इतनी कि इसके बावजूद भी वे हम सबके बीच सशरीर मौजूद है । आज हम सब उनका 96वां जन्मदिन मना रहे जिसका अहसास तक उनको नहीं शायद, ऐसे में ये ख्याल आता कि अभिनय की जिस पाठशाला ने हजारों को अभिनेता बनाया जिनका प्रेरणास्त्रोत आज खुद उसे किसी ऐसी रोशनी की जरूरत जो उनको इस बेमानी ज़िन्दगी व दुनिया में फिर से जीने का कोई मकसद दे दे अन्यथा हम उनको इस तरह मजबूर देखते रहेंगे ।

आज इस अवसर पर खुदा से यही दुआ कि उन्हें स्वास्थ्यपूर्ण लम्बी खुशहाल ज़िन्दगी अता करें... ☺ ☺ ☺ !!!
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© ® सुश्री इंदु सिंह इन्दुश्री
नरसिंहपुर (म.प्र.)
११ दिसम्बर २०१८